Friday, January 29, 2010

स्टोव की गर्मी


फटररररर...फटरररररर....खटररररर...खटरररररर...। ग्लास से बार-बार टकराती चम्मच की खटररररर....खटररररर....। खटररर...खटरररर...होने के बाद तेल में छप्प से एक चिरमिराहट के साथ वो ग्लास को स्टोव पर रखे फ्राइकपेन में उड़ेल देता।
अच्छे से सेकना...पर जलाना नहीं और हां, यार...दो अंडों का ऑम्लेट और कर देना विद आउट ब्रैड।

फुल बाजू की कमीज पर आधे बाजू का पैबंद लगा स्वेटर। कोहरे से भरी रात में जहां 10 हाथ दूर दिखाई नहीं दे रहा वहां रात के 1 बजे ये शख्स आधे बाजू के कुछ ऊन के टुकड़ों से ठंड से लोहा ले रहा है। ना सर पर टोपी, ना पैरों में जूते, ना ही कोई ऊपर से कपड़ा। हां... पैरों में जगह जगह से फटी जुराब जरूर पहन रखी थी। गौर से देखा तो जान पड़ा कि एक नहीं दो जोड़ी फटी पुरानी सी जुराब एक के ऊपर एक थी।

वहीं, हमने सर पर टोपी, गले में मफलर, हाथ में दस्ताने, पैर में जूते और अंदर मोटी जुराब अड़ाई हुई थी। हमने अपने शरीर को मोटी-मोटी कपड़ों की परतों से ढका हुआ था। फिर भी जान नहीं पड़ रहा था कि ठंड कहां से लग रही है।

लोग आते उसे ऑर्डर देते और वहीं कहीं पर खड़े होकर अपने-अपने पेय पीने लग जाते।  एक बार वो ऑर्डर देने वाले को देखता और फिर अपने काम में जुट जाता। पता नहीं कहां से उसे पता होता कि फलां ऑर्डर वाला कहां खड़ा हुआ है। नहीं जानता मैं कि वो किस तरह से याद रखता था कि पहले ये है और दूसरा ये...। पहले वाले की चाय में चीनी कम रखनी है और इलायची नहीं डालनी, दूसरी वाले के ऑमलेट में हरी मिर्च नहीं डालनी है। ख्वाहिशें होती रहती और मजबूरी नीचे झुके उन ख्वाहिशों को पूरा करती रहती।

जब हम चलने लगे तो मैंने उससे पूछा, क्यों ठंड नहीं लग रही क्या? उसने नजर उठाके देखा और फिर लग गया खटरररर....फटररररर...में। तब तक काफी लोग जा चुके थे, कुछ ऑर्डर वो पूरा करने में लगा हुआ था। पैसे वापिस करने के बाद उसने कहा, भाईसाहब, पैर अकड़ जाते हैं जबकि मैं दो जुराबें पहनता हूं। मेरे पास ना तो जूते हैं और ना ही गर्मी देने को अंगीठी। पूरे टाइम तो स्टोब चलता ही रहता है और मैं चलता रहता हूं। स्टोव के पास आने की चाहत ही मुझे जल्दी-जल्दी काम करवाती है। मैं जब ठेला छोड़ता हूं तो ठंड महसूस करता हूं पर सामान देकर लौटने पर गरमाहट दूर से ही लगने लगती है।

साहब, स्टोब की गर्मी जिस्म में गर्मी तो भर देती है पर पैर ठंड में मारे खड़े रहने में दिक्कत पैदा करते हैं।
मैंने कुछ पैसे उसकी तरफ बढ़ाए और अपने लिए गर्म जुराबें ले लेना।
नहीं साहब, ये पैसे तो मैं ले ही नहीं सकता, हां, गर कोई फटा पुराना मोजा आपके पास पड़ा हो तो आते-जाते वक्त.....।
वो बोल पूरे नहीं कर पाया, नीचे देखने लगा।
...फटे भी होंगे तो चलेंगे दोनों जुराबों के ऊपर ही पहन लूंगा।

पैसे उसने नहीं लिए....क्या आदमी है....पता नहीं कहां से आती है इतनी सहनशक्ति। क्या सिर्फ स्टोव की गर्मी में रात बिता देता होगा वो....यहां तो चारदिवारी के अंदर भी रूम हीटर चला लेते हैं लोग।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, January 28, 2010

पैसे के लिए कुछ भी करेगा। कभी ख़फा होगा, कभी खुद मान जाएगा, पर पैसा तो नहीं छोड़ेगा।


आजकल ये बहुत देखने में आ रहा है कि लोग पैसे के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं। कुछ भी मतलब कुछ भी, शायद सब समझ गए होंगे कि इस कुछ भी का क्या मतलब होता है। पहले मैं सोचता था कि ये पैसा तो सिर्फ कॉरपोरेट कल्चर वालों को ही अपने इशारे पर नचाता है। पर धीर-धीरे मेरी जानकारी में इजाफा हुआ कि नहीं ये तो हर जगह बॉस है। चाहे फिर वो राजनीति हो, मीडिया हो, बॉलीवुड या फिर खेल।

अब देखिए हाल ही में कितना बवाल मचा था आईपीएल की बोली पर। क्यों पाकिस्तानी खिलाड़ी नहीं लिए गए, चैंपियनों को दर किनार कर दिया, वगैरा वगैरा। पाकिस्तान का बच्चा-बच्चा (बकौल पाकिस्तानी मीडिया और क्रिकेटर) सब की जुबान सिर्फ दो को ही कोस रही थी, एक आईपीएल(बकौल उनके कि जिसे भारत सरकार चला रही है) और दूसरा ललित मोदी। दहाड़े मार-मार कर कहा जा रहा था कि पाकिस्तानी आवाम, पाक सरकार, और खुद पाकिस्तानी क्रिकेटर और पड़ोसी देश को आघात पहुंचा है। कभी भी भारत के साथ कोई भी संबंध बढ़ाने की बात तो दूर संबंध रखा भी नहीं जाएगा (बात बेसर पैर की)।  

पर अब देखिए चार दिन बाद पैसे ने अपना जलवा दिखाया और फिर उन्हीं खिलाड़ियों के मुंह से अलग शब्दों की बौछार होने लगी है जो अब तक अपना अपमान मान कर भारत में ना खेलने का दम भर रहे थे। पीसीबी की माली हालत कितनी मजबूत है ये सारा क्रिकेट जगत जानता है। खाने के लिए दाने नहीं है और बातें गड़े हुए मुर्दे की कब्र के सामान खोखली, है कुछ नहीं पर घमंड में आंच ना आए।

एक बार बेइज्जती कराने के बाद भी ये नहीं सुधरे हैं। अब क्यों आफरीदी और तनवीर की जुबान पर ये जुमला आने लगा है कि ”we will forgive and play”। दिखादी ना अपनी औकात इन्होंने सिर्फ पैसे के लिए। क्योंकि वो बेहतर जानते हैं कि पैसा आईपीएल में बहुत है। इनके लिए ना बेइज्जती बड़ी है और ना ही देश। पैसा इनके लिए सबसे बड़ा है। और हमें इसे दोस्ताना समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, January 23, 2010

’मेरी मर्जी’


सर, मेरे पास भी वो ही सामान है जो कि उस स्टॉल पर है। आपने मेरा सामान देखा, मुझसे बात की और फिर दूसरे स्टॉल पर जाकर सामान खरीद लिया। जबकि मेरा सामान उसके सामान से क्वालिटी में बेहतर है, फिर भी आपने ऐसा किया। आपने जानबूझकर मेरे साथ ये बुरा व्यवहार किया है। आप नहीं चाहते कि मैं ऊपर उठूं। आपने उस दुकान से ही ये सामान क्यों लिया, आपको मेरे से ही सामान लेना होगा, नहीं लोगे तो मैं ट्रेड फेयर के मालिकों से और अपनी सरकार से आपकी शिकायत करूंगा। आपने मेरे साथ गलत किया है?’
मेरी मर्जी, मेरा पैसा मैं चाहे किसी से सामान खरीदूं, तुम कौन? मेरी मर्जी!’

ऐसा वाक्या आपके साथ भी हुआ होगा, कई बार ऐसा होता है। पर इसका ये मतलब नहीं कि दाना-पानी लेकर कोई दूसरे के ऊपर चढ़ जाए। पर कुछ ऐसा ही आजकल देखने में आ रहा है स्पोर्टसमैनशिप के नाम पर आईपीएल में।

पाकिस्तानी खिलाड़ियों को आईपीएल 3 के लिए यदि नहीं लिया गया तो इसमें कहां से आगई दुश्मनी की बात। क्यों बार-बार सरहद के पार से ये बयान आ रहा है कि पाक खिलाड़ियों पर बोली ना लगाकर उनकी बेइज्जती की गई है। अब तो हर पाकिस्तानी का मानना है कि इसमें हिंदुस्तान का षडयंत्र है। भारत सरकार ही नहीं चाहती कि पाकिस्तानी खिलाड़ी भारत में आकर खेलें और पैसा कमाएं।

अब बात मैं तर्कों से करता हूं।

सबसे पहला तर्क, ऑस्ट्रेलिया खिलाड़ियों को भी नहीं लिया गया, उनकी बोली नहीं लगी तो क्या ऑस्ट्रेलियन भी ये बोलने लगें कि ये भारत सरकार की करनी धरनी है? ऑस्ट्रेलिया में भारतियों पर हमला होने के कारण टेनिस सितारों ने नाम वापस ले लिया। तो ये भी सरकार का ही फैसला होगा? जबकि हाल में जो शिवसेना ने धमकी दी उसके बाद ऑस्ट्रेलियन खिलाड़ी ऐसा मानते हैं कि भारत में खेलने में कोई हर्ज नहीं है। पर भारतीयों पर हो रहे हमले पर भारतीयों की प्रतिक्रिया को क्या ऑस्ट्रेलियन नहीं समझते होंगे। जब एक देश समझ रहा है तो दूसरा देश हमारा पड़ोसी मुल्क समझने में कोताही क्यों बरत रहा है। क्या पाकिस्तान के लोगों को ये पता नहीं होता कि भारत की राजनीति में क्या चल रहा है?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि 20-20 के चैंपियनों की बेइज्जती हुई है। पर ये बेइज्जती की किसने है? मेरा जवाब है खुद पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने अपनी बेइज्जती करवाई है?
क्या पाकिस्तानी खिलाड़ी या वहां कि आवाम ये नहीं जानती कि 26/11 का घाव अभी भी हरा है। फिर कैसे कोई भी फ्रेन्चाइजी ओनर उसी ट्राइडेंट होटल में बैठकर उन्हीं पाकिस्तानियों की बोली लगाता जिसके देश से आए लोगों ने इसी होटल को कुछ समय पहले कब्रगाह बना दिया था।

आईपीएल एक प्राइवेट संस्था है वो किसको रखेगी कब वेन्यू चेंज करेगी इसमें सरकार का कोई भी हस्ताक्षेप नहीं है। यदि ये छोटी सी बात पाकिस्तानियों की मोटी बुद्धि(जो कि उनके पास नहीं है) में नहीं आती तो इसमें कोई भी कुछ नहीं कर सकता। मेरी मर्जी मैं आपको लूं या ना लूं। इतना बड़ा आईपीएल सीजन है उसमें से कोई मजबूत खिलाड़ी नहीं पहुंचे तो उस टीम पर कितना फर्क पड़ेगा ये शायद दूर से हाथ सेकने वाले नहीं समझ सकते। उनको तो पैसा मिल जाता और फिर जो भी नुकसान होता फ्रेन्चाइजी को होता। क्या कोई भी पाकिस्तानी ये आश्वासन दे सकता है कि मार्च 13 तक भारत पर आतंकी हमला नहीं होगा। शायद कोई नहीं उनके हुक्मरान तक नहीं।

बिना किसी से पूछे आईपीएल ने अपना पहले मैच का वेन्यू चेंज कर दिया। क्या इसमें भी साजिश है नहीं। ये दिमाग है, दूरदर्शिता है।

तो क्यों वो खिलाड़ी इन सब कारणों को जानते हुए भारत में अपनी बेइज्जती करवाने आए? क्यों उन्होंने और पीसीबी ने एक बार भी नहीं सोचा कि ऐसा हो सकता है पर शायद मुझे लगता है कि उनकी बेइज्जती नहीं हुई उन्हें तो बख्स दिया गया वर्ना उन्हें तो इस से भी ज्यादा जल्लात सहनी पड़ती।

अंत में मेरी राय तो ये है कि जब तक संवाद ठीक नहीं हो जाते तब तक पाकिस्तानियों को भारत में आने से पहले सोचना चाहिए क्योंकि यहां पर कुछ भी उनके साथ घट सकता है और हो सके तो अभी नहीं आए तो बेहतर।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, January 1, 2010

नव वर्ष मुबारक हो, नए साल पर वापसी


29 सितंबर के बाद से कुछ यूं व्यस्त हुआ कि ब्लॉग पर तब से वापसी संभव ही नहीं हो सकी। काफी दिन से सोच रहा था कि कुछ लिखूं पर लिख नहीं पा रहा था, ना जाने क्यों? सोचता था कि काफी बातें हैं जहन में जिनका वक्ता आ चुका है बिखर कर छप जाने का। तो, चलो वापसी की जाए और फिर से ये संवाद शुरू किया जाए।

आज के दिन से बेहतर और कोई दिन वापसी के लिए लगा नहीं या यूं कहूं कि हो नहीं सका। तो, नए साल के अवसर पर ब्लॉगजगत में वापसी कर रहा हूं। पूरे तीन महीने एक दिन के अंतराल के बाद। ठहर क्यों गया था वहां पर या क्यों नहीं लिखा, कुछ इस बारे में ठीक से नहीं कह सकता। व्यस्त था पर कुछ और भी था मन में जो रोकता रहा हाथों को, ये जानता हूं मैं। अब वक्त है जाते हुए साल के साथ-साथ पुरानी बातों को छोड़कर नए साल के साथ कदम से कदम मिलाया जाए। ये ही बेहतर है और ये ही मैं कर रहा हूं।

नव वर्ष के मौके पर सभी को मेरी तरफ से हार्दिक बधाई।

आपका अपना
नीतीश राज 






“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”