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Thursday, June 10, 2010

हमारे अंदर का सबसे बड़ा जानवर ‘कौन’?


जितने मनुष्य उतनी शख्सियत, उतने चेहरे। सबका रहन-सहन अलग, नजरिया अलग, पहचान अलग। रोज ना जाने कितनी शख्सियत आंखों के आगे से गुजर जाती हैं। हर दिन हमें तरह-तरह के लोग रास्ते में टकराते हैं। जितने तरह के लोग उतने ही तरह के व्यक्तित्व। सभी की अपनी एक अलग पहचान, अपना एक अलग सोचने का ढंग और साथ ही अपनी-अपनी खूबियां और खामियां।

कई बार इंसानों के बारे में सोचता हूं तो एक सवाल मेरे मन को बार-बार कुरेदता है। हम सब की जिंदगी में ऐसे मुकाम बहुत बार आते हैं जब कि हम अपने अंदर के जानवर से दो-चार होते हों। तब हमें पता चलता है कि हमारे अंदर भी एक जानवर है और उस जानवर की वो काली छाया कितनी ताकतवर है। कई मौकों पर हम अपने अंदर के उस जानवर से लड़ के जीत जाते हैं और कई बार वो हमें शर्मिंदा होने पर मजबूर कर देता है।

कई मौके आते हैं जब हम अपने अंदर के जानवर से दो-चार होते हैं। मनुष्य के अंदर का जानवर खुद को तो परेशान करता ही है साथ ही दूसरों को भी तकलीफ पहुंचाता है। हमारे अंदर का जानवर क्या है? किन-किन कारणों से जानवर, शरीर के अंदर का जानवर जाग उठता है? और वो कौन-कौन से कारक होते हैं जो हमें जानवर बना देते हैं?

मैंने थोड़ी कोशिश की कुछ कारकों को टटोलने की जो कि हमें इंसान बने रहने नहीं देते और कई बार इंसानियत खोकर जानवर बनने पर मजबूर कर देते हैं।

हमारे अंदर का जानवर है क्या? ये बता पाना तो बहुत ही मुश्किल है। इस पर बहुत सोचने पर मैंने पाया कि हमारे अंदर की वो इच्छा, कल्पना या बात जिसे हर कीमत पर नैतिक-अनैतिक ढंग से पूरा करने की जिद। उस जिद में किसी और को नुकसान, क्षति हो तो भी कोई गुरेज नहीं।

अब बात करते हैं कारकों की। मैंने इन्हें 3 भागों में विभाजित किया है जो इंसान को इंसानियत छोड़ कर वैहशीपन अपनाने पर मजबूर करते हैं।

क्रोध (गुस्सा), हवस, घमंड। इन में से कौन सा वो कारक है जो कि सबसे खतरनाक होता है।

वैसे तो तीनों कारक ही एक दूसरे से मिलते जुलते लगते हैं। मजबूरी हो या फिर कोई और वजह, कई बार गुस्सा आता है, और पागल बना देता है। पागल मतलब जिसका अपने पर काबू नहीं, जो कुछ भी कर सकता है। आपके अंदर के जानवर को जगा देता है गुस्सा।

हवस, हमेशा नहीं जागती पर जब भी जागती है तो पाप होना स्वाभाविक सा ही है। वैहशी बना देती है हवस। फिर मनुष्य ये सोचने के काबिल नहीं रह जाता कि वो जिस को अपना शिकार बना रहा है वो कौन है।

पर सबसे बड़ा कारक है जो कि यदि एक बार आपके अंदर आ जाए तो आप को हमेशा के लिए जानवर बना दे, वो है घमंड। गुस्सा हमेशा नहीं बना रह सकता, हवस हमेशा नहीं रह सकती पर घमंड आपके साथ-साथ चलता है हमेशा। घमंड के कारण गुस्सा और हवस का जन्म हो सकता है पर हवस और गुस्से के कारण घमंड का जन्म नहीं हो सकता।

एक इंसान को जानवर बनाने का सबसे बड़ा कारक मुझे घमंड लगता है। घमंड को हमेशा अपने से दूर रखना चाहिए।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, June 7, 2010

क्या लोगों ने ‘उसे’ ठीक पीटा?


उस समय मेरे मुंह से सिर्फ ये ही शब्द निकले....ओह माई गॉड। उसे बुरी तरह से पीट रहे थे लोग। हर आता-जाता दो-चार तो कम से कम लगा ही देता, जहां दिल चाहता वहां मारता। कोई-कोई तो मन भरकर मारता और कुछ तो तब तक मारते जब तक कि खुद के हाथ-पैर दुखने ना लग जाएं। सुना था पर आज देख रहा था भीड़ का कानून।

कब-कौन-कहां से निकल कर उस लड़के के सामने आता और अपनी पूरी भड़ास उस पर निकाल देता, पता ही नहीं चल रहा था। हल्की दाढ़ी से भरे, लाल हो चुके गाल पर रसीद कर दिए जाते और यदि चेहरा छुपाने की कोशिश गर वो करता तो उसके कान तक आ चुके लंबे बाल उसके चेहरे को पीछे खींचने के लिए काफी होते। और फिर चेहरे पर तीन-चार....। कुछ तो उसे बॉक्सिंग पैड समझ कर सिर्फ पेट पर ही गुस्सा निकालते।

कुछ को तो मैंने देखा कि वो राहगीर थे उनको पता नहीं था कि मसला क्या है पर बाइक रोकी उतरे और चार लगाए बाइक शुरू की और चल दिए। कुछ सिर्फ वहां से गुजर रहे थे, देखा, लड़के को अपने दम के मुताबिक पीटा और चल दिए। कइयों को देख कर के ऐसा लग रहा था कि जैसे कहीं की खुंदक कहीं पर निकाल रहे हों।

मुझे फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस याद आई। जब सुनील दत्त एक चोर से बोलते हैं कि यदि मैंने तुम को यहां पब्लिक के आगे छोड़ दिया तो सोचो कि तुम्हारा क्या होगा। कोई घर से लड़ कर आया है, कोई बीबी से परेशान है, किसी को बॉस की टेंशन है, ऑफिस का झमेला, किसी की तुम जैसे जेब कतरे ने जेब काटी है सोचो जब इतने सब लोगों के बीच में तुम होगे तो क्या होगा? उस चोर की हवाइयां उड़ने लग गई। यहां पर भी मुझे वही परेशान लोग नजर आ रहे थे।

वहीं, पिटने वाला लगभग 18-19 साल का युवक होगा। बाल लंबे, कद लंबा, छरेरा शरीर पर अब सब कुछ धुमिल हो चुका लग रहा था। जगह-जगह से खून निकल रहा था, मुंह तो लहु-लुहान हो रहा था। कपड़े कई जगह से फट चुके थे। उस लड़के को समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो क्या करे क्योंकि जब तक संभलता तब तक फिर वो अपने आप को संभालने में जुट जाता।

जैसा वो चोर इस दुर्दशा के बाद सोच रहा होगा कि इस से तो बेहतर होता कि पुलिस के हत्थे चढ़ता। हुआ भी ऐसा ही ये सारा वाक्या होने के लगभग 5 मिनट के अंदर ही पुलिस मौके पर पहुंच कर उस लड़के में दो-चार लगाकर अपने साथ लेकर चलते बनी। कई बार तो शक भी होता है कि कहीं ये लोग भी तो नहीं मिले रहते इनसे?

लेकिन यहां के लोग झपट्टामार चोरों से परेशान हो चुके हैं। यहां कि लड़कियों,महिलाओं का तो दिन में सड़क पर निकलना दूभर हो गया है। सड़क पर मोबाइल पर बात कर ही नहीं सकते पता नहीं कब-कौन-कहां से आकर आपका कीमती सामान झपट जाए। कई बार तो लगता है कि उस लड़के के साथ अच्छा हुआ और पीटना चाहिए था पर कई बार सोचता हूं कि इतना नहीं मारना चाहिए था। मैं भी इंसान हूं क्या करूं!

कल एक जगह खबर पढ़ी थी कि लोगों ने झपट्टामार चोर को पकड़ा और इतना मारा कि वो मर गया। वो था इन चोरों से परेशान और पुलिस की नाकामियत पर भीड़ का कानून

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, May 28, 2010

’हूं...दीज आर फ्रॉम ओल्ड ईरा, विथ द सेम ओल्ड थिंकिंग’।


हर दिन की तरह आज भी दौड़ते-भागते मेट्रो में कदम रखा तो भीड़ होने के बावजूद सीट कब्जाने में मैं कामयाब हो गया। बिना वक्त गंवाए मैं रोज की तरह किताब के काले अक्षरों में गुम हो गया। मैं पन्ने दर पन्ने पलट रहा था, और मेट्रो, स्टेशन दर स्टेशन भागी जा रही थी। अगले स्टेशन पर दो लड़कियां चढ़ीं, लगभग 17-18 की होंगी। आते के साथ ही दोनों ने आंखें दौड़ाई कि महिला आरक्षित सीट कौन सी है और उस पर बैठे एक 55-56 साल के अंकल को ऑन्ली फॉर लेडीज का बोर्ड दिखा कर उठा दिया। मैंने अंकल को सीट दी पर अगले स्टॉप पर सीट वापस मिल गई, अंकल उतर गए।

मुझे याद आया कि उन अंकल जी को महिला आरक्षित सीट लगभग इतनी ही उम्र की एक लड़की ने दी थी। कभी-कभी ये देखने को मिलता है एक साथ सिक्के के दो पहलू। मैं फिर किताब के पन्नों में खो गया। मन को हल्का करने के लिए भारी किताबों से हिंदी हास्य-व्यंग्य संकलन का रुख कर चुका हूं। हरिशंकर परसाई की व्यंग्यात्मक पेशकश इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर में डूब गया। अपने में मजेदार शख्शियत इंस्पेक्टर मातादीन।

मैं जितना भी मातादीन के करेक्टर में डूबने की कोशिश करता मेरे मन को उस लोक पर जाने से पहले ही ब्रेक लग जाता। मन भटकने का कारण थी इस लोक की दो बालाएं। दोनों लड़कियां चैटर बॉक्स की तरह चालू थीं। मेरे कान के पास चैं चैं...पैं पैं....बाप रे। वो आपस में बात नहीं कर रहीं थीं, वो तो दुनिया को सुना रहीं थीं कि वो कितनी बोल्ड और मॉर्डन हैं। उनकी वार्ता की विष्य वस्तु लड़के, सेक्स और समाज।

जिन शब्दों को किसी भी फैमली चैनल पर बीप कर दिया जाता है उन शब्दों का उपयोग और उपभोग वो दिल खोल के कर रही थीं। अब बारी थी एंग्री यंग मैन लुक की पर हुआ कुछ नहीं, दोनों मुसकुराते हुए उस लुक को ओवर लुक कर गईं। मैंने किताब की तरफ ही रुख करना बेहतर समझा।

मैं किताब में डूबा हुआ था इनमें से एक लड़की ने पूछा कि हमें फ्लां-फ्लां जगह पर जाना है। अब मुसकुराने की बारी मेरी थी। दोनों को वहां जाना था जिसके लिए पिछले स्टेशन पर उतरना होता है और वहां से दूसरी मेट्रो पकड़नी पड़ती है। अब भी वैसे कुछ ज्यादा बिगड़ा नहीं था। मैंने उन दोनों का मार्गदर्शन किया। साथ ही अंत में एक मुनियों वाली वाणी में मैंने संदेश दिया जिसे दोनों ने बड़े ही ध्यान से सुना।

मेरी बातें जो दो-चार सुन रहे थे समर्थन कर रहे थे और साथ ही अपनी भड़ास मधुर वाणी में निकाल रहे थे। वहां खड़े हर किसी को पता चल चुका था कि मार्डन दिखने और लगने में बहुत फर्क होता है। मार्डन होने का ये मतलब नहीं कि अक्ल के दरवाजे बंद कर दो।

दोनों वहां से जल्द गेट पर पहुंची और जाते-जाते एक जुमला भी छोड़ गईं हूं...दीज आर फ्रॉम ओल्ड ईरा, विथ द सेम ओल्ड थिंकिंग मेट्रो का दरवाजा खुल चुका था और वो दोनों इस प्रकरण को हंसी में उड़ाते हुए आगे बढ़ गईं और पीछे छोड़ गई वो ओल्ड जनरेशन। मैंने किताब बंद की और बैग के हवाले करते हुए सीट छोड़ दी, मैं अपने गंतव्य तक पहुंचने वाला था।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, May 27, 2010

धीरे-धीरे एक आदत की ओर...


सुबह हर किसी को जल्दी, हर कोई अपने कदमों से तेज, दूसरे से पहले पहुंचने की होड़। एक अजनबी से भी एक अनजाना मुकाबला, आगे निकलने की जद्दोजहद। हर कोई भीड़ का हिस्सा और नहीं भी। एक-दूसरे को धक्का देते, कोहनी से पीछे ढकेलते, आगे बढ़ जल्दी से सीट लपकने की जी जान कोशिश। और फिर सीट पर बैठकर शून्य में खोने का वो एहसास। उफ!!...देखते ही बनता है, हजारों के साथ अकेले सफर करना, भीड़ में अपने ख्यालों के साथ खो जाना।

मेट्रो की सीढ़ियों से ही जैसे मुकाबला शुरू हो जाता है। सबसे पहले दौड़ कर लिफ्ट पकड़ने की चाहत। जो सवार हो गया तो उसे सीट कब्जाने की होड़ और जो नहीं चढ़ पाया उसे सीढ़ियों के रास्ते सीढ़ी दर सीढ़ी किसी को पीछे छोड़ने की होड़। प्लेटफॉर्म पर सिर से जुड़े सिर फिर भी हर कोई हर एक से जुदा-जुदा।

एक बार इधर-उधर अपने सिर को घुमाकर देखिए। पहले बहुत कम लोग पढ़ते हुए चला करते थे पर मेट्रो में इस का चलन वापिस शुरू हुआ है। ना मुझे इस से मतलब ना उस से। कान में इयर फोन, हाई मैमोरी बेस्ड मोबाइल जिसमें सुनने को अथाह सामाग्री। बड़ों की तरज पर हाथ में न्यूजपेपर या फिर अंग्रेजी का कोई नॉवेल। ये है कुछ युवाओं का चेहरा। कुछ युवा जुदा भी हैं। दोनों में कॉमन है मोबाइल, वो नॉवेल में ना करते हुए, मोबाइल में ही आरएनडी करते रहते हैं।

मैने मेट्रो में कुछ दिन तो और लोगों की तरह सिर से सिर मिलाकर आंखों में नींद या फिर पुराने ख्याली पुलाव या दिन के सपनों के साथ गुजार दिए। पर फिर लगा कि नहीं ऐसे 25-30 मिनट बेकार में बेकार करना ठीक नहीं। तो अधिकतर कोई किताब रखकर चलता हूं और जैसे ही मौका मिला, लग जाता हूं पन्ने पलटने में। मेट्रो के कारण कई किताब खत्म करने में कामयाब रहा हूं।

कई बार मेट्रो में कुछ बातें ऐसी होती है जो कि ना जाने क्यों दिल को छू जाती हैं और कुछ दिल को दुखा देती हैं। इन सब बातों की बात अगली बार।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, September 10, 2009

एंबुलेंस, ट्रैफिक और जिंदगी की कश्मकश


घर की सोसायटी से निकलते ही कुछ दूरी पर बाएं होते ही ट्रैफिक से सामना हो ही जाता है। रेंगती हुई चलती गाड़ियां ऐसे जैसे कोई अजगर शिकार निगलने के बाद धीर-धीरे रेंग कर किसी सुरक्षित स्थान पर लहराकर जा रहा हो। एनएच की राह पकड़ते-पकड़ते ही कई गाड़ी वाले अपना धैर्य खो देते हैं और आगे निकलने की होड़ में वो ऐसा काम करने लग जाते हैं जिसे हम सुबह-सुबह बोहनी खराब करना कहते हैं। पर अब तो आदत सी पड़ गई है फिर भी एनएच तक पहुंचने में ही काफी वक्त निकल जाता है।
एनएच पर गाड़ियों का काफिला एक दूसरे के पीछे और उनमें से कुछ ऐसे जो इस काफिले में सब से पीछे और हसरत सबसे आगे चलने की। रास्ते में सिर्फ और सिर्फ पों....पों....पों....पों.....की आवाज़। पता नहीं क्यों सारी दुनिया हॉर्न बजाने लग जाती है जब कि जानती है कि आगे वाला भी सड़क पर अपना घर बनाने नहीं आया। वो भी मौका पाते ही आगे बढ़ेगा और यदि वो आगे नहीं बढ़ रहा तो क्या हॉर्न बजाकर आप गाड़ी के ऊपर से निकल जाएंगे। पता नहीं क्यों लोग दिमाग से ज्यादा हॉर्न का इस्तेमाल करते हैं।
पीछे से एंबुलेंस के सायरन की आती आवाज़ ने मेरे ध्यान को भंग किया। टों....टों.....टों.... टों.....की आवाज़ दूर से ही अपने लिए रास्ता मांगते हुए लगी। अपनी बाइक की सीट से मैंने सायरन को देखने की कोशिश की। वो चारों तरफ गाड़ियों से घिरा सिर्फ और सिर्फ चीख रहा था जो वो कर सकता था। याद आता है बचपन में गुरूजी कहते थे कि बेटा एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और पुलिस की गाड़ियों के लिए हमेशा रास्ता छोड़ देना चाहिए। शायद सायरन भी बार-बार बजते हुए ये ही कह रहा था कि मुझे रास्ता दो
कुछ इसी उधेड़बुन में मैं लगा हुआ था और धीर-धीरे आगे बढ़ रहा था पर एंबुलेंस को आगे बढ़ने की जगह नहीं मिल रही थी। सायरन अपनी ही आवाज़ में चिंघाड़ रहा था,....टों....टों..... टों....टों.....। आवाज़ तेज होती जा रही थी और रास्ता उतना ही सकरा।
रेड लाइट पर ट्रैफिक वालों और कुछ लोगों की मदद ने उस एंबुलेंस को निकालने की पहल की। ट्रैफिक तुरंत साफ करते हुए एंबुलेंस को निकाला गया। एंबुलेंस के निकलते ही काफी कारें एक साथ झपटीं, सब के दिमाग में ये ही चल रहा होगा कि एंबुलेंस के पीछे रहेंगे तो बिना रुकावट गंतव्य तक पहुंच जाएंगे।
मैंने अपनी बाइक की स्पीड थोड़ी तेज की और एंबुलेंस के पीछे पहुंच गया। जब रेड लाइट पर मेरे पास से गुजरी थी एंबुलेंस तो आंखों ने देखा कि उसमें एक महिला बैठी हुई थीं और ग्लूकोस स्टैंड था। जब एंबुलेंस ने मुझे क्रॉस किया तो एक हाथ ऊपर उठा और फिर नीचे गिर गया। बस। क्या चल रहा है इस एंबुलेंस में ये जानने का दिल कर गया। एंबुलेंस का ड्राइवर मरीज की हालत की गंभीरता को समझते हुए शायद 60 के ऊपर नहीं जा रहा था या फिर सड़क में हो चुके गढ्ढे उसे जाने नहीं दे रहे थे। पर सायरन अब भी उसी तेजी के साथ रास्ते के ऊपर भागता जा रहा था।
एंबुलेंस में एक लड़के पर ग्लूकोज लगा हुआ था और बार-बार लड़का अपना दूसरा हाथ ऊपर-नीचे कर रहा था। हाथ चाहे ऊपर हो या फिर नीचे बगल में बैठी महिला लगातार शून्य में देख रहीं थी। एंबुलेंस ने लेफ्ट साइड का इंडिकेटर दिया और एंबुलेंस बाएं जाने लगी, धीरे-धीरे मुझसे दूर, मेरा और उसका रास्ता जुदा हो गया था। जब तक वो मेरी आंखों से ओझल नहीं होगई मेरी आंखें उसी का पीछा करती रहीं। मुझे दाहिने मुड़ना था मैं आगे बढ़ा और फिर उसी ट्रैफिक में ये सोचते हुए गुम हो गया, क्यों हम खुद से किसी के लिए रास्ता नहीं छोड़ते, क्यों?
आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, September 5, 2009

बेगम और बेटे ने मिलकर मेरे इस ‘खास’ दिन को बेहद ‘खास’ बना दिया।

रात के बारह बजने वाले थे घर में हम सब बैठे हुए थे। मैं कंप्यूटर पर आर्टिकल लिखने में मशगूल था। बेगम बेटे के साथ पढ़ने में लगीं हुई थी। मैं बार-बार बेटे से कह रहा था कि सो जाओ कल सुबह स्कूल जाना है। पर दूसरे दिनों की तरह आज पता नहीं क्यों बेटा सोने की बात पर खुश नहीं हो रहा था।


पापा सो जाऊंगा पहले ये पेंटिंग पूरी तो कर लूं

अरे कल पूरी कर लेना फिर सुबह स्कूल जाने के लिए उठने में ना नुकुर करते हो।

ठीक है, ये पेंटिंग पूरी कर लूं फिर सो जाऊंगा।

वहीं बेगम की किताब भी आज बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। वहीं मैं अपने काम में फिर से लग गया।


ठीक बारह बजे बेटे ने अपने हाथों से बना ग्रीटिंग कार्ड मुझे दिया और मुझे विश रके याद दिलाया की आज मेरा जन्मदिन है। मेरी आंखें आश्चर्य में खुल गई कि आंखों में नींद छुपाए बेटा इस इंतजार में था कि कब बारह बजें और वो मुझे अपने हाथों से गिफ्ट दे सके। मैंने उसे गले लगा लिया उस ग्रीटिंग कार्ड पर क्या बना हुआ था और क्या लिखा हुआ था वो आप चित्रों में देख सकते हैं।



ये कलाकारी मेरे बेटे की है। इस बार नवरात्र के पहले दिन वो पांच साल का पूरा हो जाएगा। वहीं दूसरी तरफ मेरी बेगम मुग्ध-मुग्ध मुस्कुरा रहीं थीं। उन्होंने भी मुझे विश किया और फिर मैंने कंप्यूटर बंद किया और बेटा मेरे गल लगकर सो गया।


सुबह उठा तो पाया की बीच-बीच में मोबाइल बज रहा है और कुछ संदेश रात के भी थे तो अपने मित्रों की बधाई का जवाब देने लग गया। फिर फोन कॉल्स का सिलसिला शुरू हो गया। माताजी-पिताजी-भैयाजी सब से बात करने के बाद मैं सुबह के कामों को निपटा कर पूजा-पाठ किया।

मुझे सुबह क्या रात से ही लग रहा था कि आज मेरा स्पेशल दिन है। बेगम और बेटा दोनों मेरे को ये एहसास कराने में लगे हुए थे कि आज मेरा जन्मदिन है। स्कूल से आते के साथ ही बेटा जितना बार मुझे मिलता तो सिर्फ एक बात कहता पापा हैप्पी बर्थ डे


अब सरप्राइज देने की बारी बेगम की थी। जैसा कि उन्हें पता है कि बच्पन में शायद मैं चार-पांच साल का था तो किसी ने कुछ कह दिया था तो फिर पापाजी कभी केक लेकर नहीं आए। तो इस बार बेगम की तरफ से ये थी भेंट।

फिर एक शर्ट जैसी कि कभी कॉलेज टाइम में मैं पहना करता था। अंदर राउंड नैक टी-शर्ट और फिर नीचे के दो-तीन बटन लगी कॉटन की शर्ट। दोपहर को मेरा मनपसंदीदा खाना उसी तर्ज पर जिस तरह मुझे पसंद है (अब भी मुंह में पानी आ रहा है, पेट भरा हुआ है पर.....।) फिर शाम को एक चैक शर्ट दी जिस तरह की शर्ट मैं काफी दिन से सोच रहा था लेने की। इतने सरप्राइज बहुत बढ़िया, सुभानअल्लाह।

मैं इतने सरप्राइज पाकर अपने आपको किसी वीवीआईपी से कम नहीं समझ रहा था। बेगम ने अपना काम कर दिया था। मैं चने के झाड़ में चढ़ चुका था। मैंने बोला अब शाम का डिनर तुम दोनों को मैं कराऊंगा। डिनर से ज्यादा तो जो डिनर के पहले और बाद में मंगाया जाता है उसके कारण जेब ज्यादा ढीली होती है। ऐसे मौकों पर यूं जाना जरा अच्छा लगता है.....

अंत में चलते-चलते प्रीती जी (मेरा सागर) को बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने मुझे इस खास मौके पर इतनी अच्छी कविता भेंट की। मैंने तो सोचा ही नहीं था कि कोई भी ब्लॉग में मेरे जन्मदिन को यूं मना सकता है। साथ ही बी एस पाबला जी को भी धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने मेरे इस खास दिन को मेरे लिए इतना अहम बना दिया और मैंने इस बार काफी ब्लॉगर दोस्तों से बधाई पाई। आप सब का एक बार फिर से धन्यवाद कहना चाहूंगा।


आपका अपना

नीतीश राज

Friday, September 4, 2009

इन बहकते कदमों का दोषी कौन?

बेगम ने फोन पर बताया कि, ‘सोसायटी में कुछ हलचल हो रही है और शायद पुलिस भी पहुंची हुई है’। मैं सैलून में सेविंग करवा रहा था। अमूमन मैं सेविंग घर पर ही करता हूं। एक तरफ जल्दी-जल्दी सेविंग हो रही थी और दूसरी तरफ मेरे दिमाग में कई बातें चल रही थीं। सैलून से फारिक़ होकर मैं घर की तरफ दौड़ लिया। इस बीच मैंने ये काम कर दिया था कि सोसायटी में एक और शख्स को फोन पर इस बारे में जानकारी दे दी थी और कह दिया था कि थोड़ा ध्यान रखे।

सोसायटी के गेट पर पहुंचते के साथ ही लग गया कि मामला गड़बड़ है। गेट के बाहर तक आवाज़ें आ रही थीं। गेट में दाखिल होते ही गार्ड ने मुझे रोक लिया फिर पहचान करके अंदर आने दिया। मैंने इस बीच ही आधी जानकारी गार्ड से ही ले ली। गाड़ी पार्किंग में लगा रहा था तब भी कई बार आवाज़ें बहुत तेज हो जाती और फिर किसी के बीच-बचाव करने पर तेज होती आवाज़ों पर लगाम लग जाती।

जहां से आवाज़ रही थी जब उस समूह के पास पहुंचा तो अधिकतर चेहरे नए थे दो-चार लोग कुर्ते-पजामें में दिख रहे थे, बाकी सब 35-40 के बीच की उम्र के थे। उनमें से कुछ तो पुलिसवाले के साथ गेट रजिस्टर की एंट्री को चैक कर रहे थे और कुछ गार्डों से सच निकलवाने की कोशिश में जुटे हुए थे। सच इसलिए क्योंकि कई बार वो लोग ये बात कह रहे थे कि इन गार्डों को पता है सारा सच। अभी तक मेरी समझ में ये तो आ गया था कि कौन परिवार का है और कौन-कौन साथ के या फिर मित्रगण हैं उस पीड़ित परिवार के। पर ये अभी तक नहीं समझ पाया था कि मामला क्या है।

थोड़ी देर बाद सारी स्थिति साफ हो गई। हमारी सोसायटी में रहने वाले एक बिजनेसमैन का बेटा तरुण बीती रात करीब दो-तीन बजे अपने घर से भाग गया। रात एक बजे तक परिवार के साथ बैठे होने की पुष्टि पूरा परिवार कर रहा था। परिवार के मुताबिक रात में पूरे परिवार ने मिलकर एक साथ खाना खाया और फिर टीवी देखा। बिजनेसमैन होने के कारण खाना देर से ही होता था। रात को तीन बजे से पहले ही तरुण घर छोड़कर भाग गया था और जाते-जाते बाहर से घर के दरवाजे की कुंडी भी लगा गया था। इस बात की पुष्टि गेट में मौजूद गार्ड की रजिस्टर एंट्री से हुई थी कि कोई भी रात 3 बजे के बाद नहीं गया था।

वहां पर मौजूद लोगों ने ये बताया कि उसकी उम्र 14 साल की है तब तो उसके दोस्तों को और कुछ गार्डस को साथ लेकर पुलिस वहां से चली गई। शाम होते-होते सोसायटी में इसी बात की चर्चा होने लगी। तब मुझे पता चला कि ये 14 साल का लड़का वो ही है जो कि बार-बार मना करने पर भी सोसायटी में सबसे तेज पल्सर बाइक चलाता था। सोसायटी के एक सज्जन ने मुझे बताया कि उस लड़के को काफी बुरी आदतें थीं। दोस्तों ने जो पुलिस को बताया वो ये कि तरुण तो कल से कह रहा था कि वो अपने किसी दोस्त के पास पुणे या गोवा जा रहा है। कोई उसे ट्रेस ना कर सके वो अपना मोबाइल फोन भी घर पर ही छोड़ कर गया था। पुलिस तफ्तीश में लगी हुई है।

यहां पर इस 14 साल के लड़के की बात को बताने का मतलब सिर्फ ये है कि कहीं हम अपने बच्चे को छोटी सी उम्र में सारी सहुलियतें देकर उन्हें बिगाड़ तो नहीं रहे। जैसे बाइक को चलाने की उचित उम्र तो 18 साल है पर उस लड़के को देखकर लगता था कि वो इस उम्र को भी पार कर चुका है। मैंने तरुण की तस्वीर देखी तो देख कर लगा कि वो कोई 18-20 साल का लड़का है। बच्चों के मांगने पर उन्हें हमेशा पैसे पकड़ा देने कहां तक उचित है? कहीं हम खुद ही तो उनको गलत राह पर नहीं धकेल रहे? इन बहकते कदमों का दोषी कौन? माना की इस दौड़ती भागती जिंदगी में घरवालों की सारी इच्छाओं और सहुलियतों और उनकी मांगों को मानने के लिए हमेशा काम में लगे रहना क्या हम अभिभावक अपनी जिम्मेदारियों से मुंह तो नहीं मोड़ रहे? कई बार तो ये भी समझ में नहीं आता कि इसके लिए क्या करें कि जो हर मोड़ पर हम सही और सब की इच्छाओं पर खरा उतर सकें?

आपका अपना
नीतीश राज

Sunday, August 30, 2009

सावधान! आप कार खरीदने तो नहीं जा रहे गर जा रहे हैं तो इसे पढ़ते जाइए।

कुछ दिन पहले की बात है लगभग महीने भर पहले की, मेरे एक जाननेवाले के साथ कुछ ऐसा हुआ जिसे मैंने क्या कभी मेरे जाननेवालों में से किसी ने नहीं सुना या देखा था। तभी से मैंने सोच लिया था कि इस बारे में जरूर से लिखूंगा और सबको आगाह करूंगा।

मेरे जाननेवाले एक बिल्डर की कंपनी में काम करते हैं। हर दिन सौ से ज्यादा लोगों से मिलना होता है। काफी दिन से सेंट्रो को चला रहे थे। एक दिन कहीं पर जाना था साथ में उनके बॉस भी थे, बॉस की गाड़ी में कुछ खराबी आगई थी। उस ड्राइव के बाद बॉस ने कहा कि बेहतर है कि दूसरी गाड़ी ले लो। बातों-बातों में बात निकली और तय होगया कि नई गाड़ी ली जाए। उनको पसंद थी होंडा सिटी।

कैसे ना कैसे करके 10 दिन के अंदर ही होंडा सिटी घर की पार्किंग में खड़ी थी। घर वाले काफी खुश थे। दोस्तों को पार्टी भी दी गई वो सब अलग। कहीं पर भी जाना होता तो होंडा सिटी से ही जाते। बेचारी सेंट्रो अपनी बारी आने की राह तकने लगी।

बहरहाल, गाड़ी खरीदने के एक महीने के बाद ही एक हादसा हो गया। एक महीने के बाद गाड़ी सर्विसिंग के लिए जाती है वैसे ही उनकी भी गई। सर्विसिग के दो-तीन दिन के बाद ही एक दिन जब वो ऑफिस जाने के लिए घर से उतरे तो देखा कि गाड़ी पार्किंग में मौजूद नहीं है। काटो तो खून नहीं जैसी स्थिति हो गई। उनके हाथ में गाड़ी की चाबी थी फिर गाड़ी गई तो गई कहां और कैसे?


तुरंत उन्होंने घर जाकर सबको बताया कि गाड़ी नहीं है पार्किंग में। कार साफ करने वाले से पूछा गया। उसने बताया कि गाड़ी आज उसने साफ की थी लगभग सुबह 7.45 के करीब। फिर जिस गार्ड की पार्किंग में ड्यूटी थी उस गार्ड से पूछा गया उसने भी बताया कि गाड़ी को खुद उसने सफाई होने के बाद चैक किया था। तुरंत दोस्तों को कॉल करके बुलाया गया कुछ ऑफिस जा रहे थे या कुछ रास्ते में थे सब वापिस सोसायटी आगए। सभी को बताया गया तो सब हैरान क्योंकि होंडा सिटी का दावा है कि उसकी डुप्लीकेट चाबी कोई बना नहीं सकता और बिना चाबी के वो खुल ही नहीं सकती। तो फिर गाड़ी कहां गई?

शाम तक ये साफ हो गया कि गाड़ी चोरी हो गई है। हम लोगों के प्रेशर के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली। पुलिस की शुरूआती तफ्तीश में एक ऐसी बात सामने आई कि जिसके कारण पैरों तले जमीन खिसक गई। पुलिस ने दूसरी चाबी की डिमांड की, तुरंत पेश की गई। और यहीं था सबसे बड़ा पेंच। दूसरी चाबी यानी की डुप्लीकेट चाबी जो कि आपको गाड़ी खरीदते वक्त दी जाती है वो इस होंडा सिटी की नहीं थी उस चाबी में फर्क था

पुलिस को शक हुआ डीलर के ऊपर और तुरंत उन लोगों को पकड़ा गया जिन्होंने डिलीवरी की थी गाड़ी की। डीलर के दो लोगों को पुलिस ने डिटेन किया। पर कुछ पता नहीं चला और फिर कई दिन तफ्तीश में निकलते चले गए। हम लोग यहां भागदौड़ कर रहे थे।

एक दिन दिल्ली पुलिस के रिनगर थाने से कॉल आया कि मेरे जानने वाले को कि गाड़ी मिल गई है। सभी पुलिस स्टेशन पहुंचे तो एक शख्स को पकड़ रखा था और गाड़ी को असम से रिकवर किया गया। गाड़ी के फर्जी कागजात यहां दिल्ली में ही बन रहे थे, तभी पुलिस ने इस शख्स को धर दबोचा।

उस गाड़ी चोर ने खुलासा किया कि 6 साल के अंदर अब तक 71 गाड़ियां चुरा चुका है। गाड़ियों को नॉर्थ इस्ट, उत्तराखंड जैसी जगहों पर ले जाकर बेच दिया जाता हैं। इस काम में पूरा गिरोह सक्रिय है और अधिकतर उन गाड़ियों को निशाना बनाया जाता हैं जो कि नई होती है क्योंकि उनमें एक भी पैसा नहीं लगता, सिर्फ कागजात बनवाने का खर्च आता है।

पर होंडा सिटी की चाबी कहां से मिली?

तब जो पता चला उसने हमारे होश ही उड़ा दिए। डीलर के यहां निचले तबके पर इनके गिरोह के लोग काम करते हैं। जब गाड़ी की डिलीवरी करनी होती है तब गाड़ी लाने के लिए उन लोगों से ही कहा जाता है। यही वो वक्त होता है जब वो खेल जाते हैं सबसे बड़ा खेल। तब वो एक्सीडेंटल गाड़ियों की चाबी के साथ उस नई नवेली गाड़ी की चाबी को बदल देते हैं और खुशी से लबरेज ग्राहक दोनों चाबियों को चैक करके नहीं देखते। अधिकतर लोग उस चाबी से ही ओपरेट करते हैं जिसमें कि रिमोट इन बिल्ट होता है और दूसरी चाबी को यूं ही बिना चैक किए जेब के हवाले कर देते हैं। जब उनकी गाड़ी सर्विसिंग के लिए आती है तो वहां पर भी गिरोह के लोग होते हैं। अधिकतर गाड़ी घर पर ही डिलीवर की जाती है तो एड्रेस(घर का) का पता चल जाता है। गर डिलीवरी घर पर नहीं होनी है तब गिरोह का दूसरा साथी सर्विस सेंटर के बाहर मौजूद होता है। जैसे ही गाड़ी मालिक गाड़ी लेकर जाता है तो बाहर खड़ा शख्स गाड़ी का पीछा करके घर तक पहुंच जाता है। फिर दो-तीन दिन तक लगातार गाड़ी के मालिक पर नजर रखकर किसी दिन भी हाथ साफ कर दिया जाता है। शान से बिना आवाज़ किए काम हो जाता है और ड्राइवर की सीट पर बैठकर चोर गाड़ी उड़ा ले जाता है।

तो ये है आज के हाईटेक चोरों की हकीकत। तो संभल जाइए कहीं आप अपने हाथ से ही चोरों को अपनी गाड़ी की चाबी तो नहीं दे कर आ रहे। कहीं आप गाड़ी खरीदने जा रहे हों तो आप तो वो गलती नहीं कर रहे। जब भी कोई भी चाबी लें तो सभी चाबियों को चैक जरूर करें और संतुष्ट होने के बाद ही वहां से हटें। तब थोड़ा वक्त गर आप लगा देंगे तो बाद में बहुत सा वक्त और आपकी गाड़ी बच जाएगी।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, August 26, 2009

कंप्यूटर जी ने लटकाया, 1 से 7 फिर 11।

14 अगस्त को पोस्ट डाल के कहीं जाना था तो निकल गया। कंप्यूटर शट डाउन कर चुका था तो सोचा कि चलो आज़ादी की बात कल ही करूंगा। जब अगले दिन कंप्यूटर खोला तो थोड़ी ही देर बाद एक छोटी सी विंडो आई और उसमें एक एर्रर लिखा हुआ था। जब तक उसे एर्रर को पढ़ पाता तब तक स्कैन विंडो खुल गई और उसमें पहला, फिर दूसरा और फिर तीसरा वायरस दिखा और कंप्यूटर बंद। तुरंत रिस्टार्ट किया और जल्दी से स्कैन पर डाल दिया कि एंटी वायरस अपडेट हो ही रहा है तो शायद सारे वायरस मारे जाएं। कंप्यूटर स्टार्ट तो बड़े ही आराम से हो गया लेकिन फिर वो ही प्रकरण और कंप्यूटर बंद।

अपने ऑफिस में सिस्टम(आईटी डिपार्टमेंट) के दोस्तों को अपने कंप्यूटर के लक्षण बताए तो उन्होंने कहा कि बीमार हो गया है तुम्हारा कंप्यूटर। बीमारी का नाम है वायरस। तुम्हारे कंप्यूटर पर शत्रुओं ने हमला कर दिया है और वायरस रूपी मिसाइलें दाग दी हैं जिससे बच पाना किसी भी सूरत में नामुमकिन है। तुम्हारा कंप्यूटर एफेक्टिड हो चुका है और ये स्वाइन फ्लू की तरह है यहां से वहां बहुत जल्दी फैलता है।

कंप्यूटर को सेफ मोड में चलाओ और सी ड्राइव से जो भी डेटा है वो निकाल लो। मैंने तुरंत उन सब चीजों को पेन ड्राइव में सुरक्षित कर लिया। फिर पास के ही एक अस्पताल यानी कंप्यूटर अस्पताल से डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर साहब आए और टूट पड़े इंजेक्शन यानी स्क्रू ड्राइवर लेकर और उतारने लगे कंप्यूटर के कपड़े।

नवज टटोलकर, धड़कन सुनकर डॉक्टर रूपी इंजीनियर ने बताया कि मिसाइलों के एटैक से आप की ’सी’ ड्राइव पूरी तरह छतिग्रस्त हो चुकी है और अब उस हिस्से को बचा पाना हमारे बूते की बात नहीं है। हमने पूछा तो इलाज बताएं डॉक्टर साहब। इलाज, इलाज तो एक ही है, पूरी ’सी’ ड्राइव फोरमेट की जाएगी मतलब नई बनाई जाएगी। गो एहेड (go ahead) हमने परमिशन दे दी।

डॉक्टर साहब ने आधे घंटे बाद माथे का पसीना पोछकर बोले, लीजिए आपकी ’सी’ ड्राइव फिर से जिंदा कर दी है। हैं ना हम कलाकार। हमने मन ही मन सोचा, सच आप कलाकार तो हैं ही। पर तभी कंप्यूटर जी ने आवाज़ लगाई डॉक्टर साहब, दवाई तो देते जाओ। डॉक्टर साहब ने तुरंत एक गोल सी रोटी निकाली और हमारे कंप्यूटर के मुंह में डाल दी।

थोड़ी ही देर में एंटी वायरस इंस्टॉल हो चुका था। पर ये क्या, एर्रर।।। अब डॉक्टर साहब की हालत खराब, हमने छूटते ही कहा अब कलाकारी दिखाइए। कंप्यूटर का नीला चेहरा देख डॉक्टर साहब के चेहरे का रंग ही उड़ गया। दो घंटे की मशक्कत और बीच में कई और डॉक्टरों से फोन पर राय लेने के बाद डॉक्टर साहब ने फैसला सुनाया। पेसेंट को अस्पताल में एडमिट कराना होगा। हम बोले अभी लेकर चलते हैं जल्दी चलेंगे तो शायद रात अपने घर पर कटे।
आदमी जैसा सोचता है वैसा होने लगे तो कहने ही क्या। जिस्म अस्पताल में और घर पर सिर्फ कंप्यूटर का बुझा-बुझा चेहरा। ऐसा लग रहा था दो जिस्म एक जान को जुदा कर दिया गया हैं। कितना काला पड़ गया बेचारे का मुंह।

जो भी हो अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। फिर से दोनों मिले पर वो पहले वाली बात नहीं आई। चेहरे ने जिस्म का साथ छोड़ना शुरू कर दिया। फिर डॉक्टर साहब को बुलाया गया इस बार फिर वो ही इंजेक्शन, वो ही नंगा करने का प्रकरण, बड़ा दुखदाई। फिर से ’सी’ ड्राइव बेचारी शहीद और फिर से जान फूंकी और वाह वाही लूटी गई। इस बार मरीज को पावर का टॉनिक दिया गया यानी कंप्यूटर की रेम बढ़ाई गई।

कंप्यूटर जी फिर दौड़ने लगे, हमने हाथ जोड़े कि वायरस फीवर भी तो 7 दिन खींच ही लेता है। पर यहां डॉक्टर साहब गए और कंप्यूटर जी ने 100 घंटे की रफ्तार को ब्रेक लगाया और हो गए फिर से री स्टार्ट।

हमने तुरंत अस्पताल में फोन लगाया अब तो डॉक्टर भी बचने लगे थे पर फिर भी टाइम मिल गया। आज दिन में किसी भी वक्त डॉक्टर साहब कम इंजीनियर साहब तसरीफ लाएंगे और अपने मरीज को देखेंगे। हमने भी इस बार अस्पताल में कह दिया है कि बहुत बार आप कंपाउंडर कम डॉक्टर को भेज चुके अब एक बार तो रीयल डॉक्टर को भेज दीजिए।

ग्यारह दिन के बाद आज लिख रहा हूं। इसमें भी हर दो-चार शब्द के बाद ’कंट्रोल एस’ करना नहीं भूलता। अभी ये लिखते वक्त भी कंप्यूटर जी बंद हो गए थे पर कंट्रोल एस ने बचा लिया। कंप्यूटर जी गर खराब हो जाएं तो क्या हाल होता है अब पता चल रहा है। इतनी खबरें हुईं कि लिखने को आतुर था पर.....। भगवान से दुआ करता हूं आज कंप्यूटर जी ठीक हो जाएं। जहां तक एर्रर देख लग रहा है कि नई रैम की प्रोब्लम है। यदि ठीक हो गया तो फिर नितीश नित हो जाएगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, July 28, 2009

सावन की पहली बारिश, चलो थोड़ा रुमानी हो जाएं

बारिश में भीगने का एक अलग आनंद होता है उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता और जो कर पाता है वो कवि बन जाता है। ये एक ऐसी अनुभूति है जो आपको अंदर तक भीगो कर रख देती है। सावन के तीसरे सोमवार को २००९ की पहली बारिश हमारे यहां पर हुई। इससे पहले बारिश तो हुई है पर उसने उमस को जन्म दिया और धरती की तो दूर हमारी प्यास तक नहीं बुझा पाई। पर आज दोपहर से जो बारिश शुरू हुई उसने देर रात तक धरती और हमें तर किया।
झमाझम सावन बरस रहा था और मैं दोनों हाथ फैलाए सड़क पर अपने अंदर मन तक भीगने को महसूस कर रहा था।

आज दोपहर में जब मैं थ्री व्हीलर में बैठने जा रहा था तो दो-चार बूंदों ने हमारा स्वागत किया तो फ्लाइओवर के नीचे रूक कर अपने को भीगने से बचा लिया। इस बात का पूरा भरोसा था कि ये बारिश चंद मिनट के लिए ही होगी और ऐसा हुआ भी। फिर ठहरे हुए हम राह पर निकल पड़े। करीब ६-७ किलोमीटर का सफर तय किया होगा कि थ्री व्हीलर के सामने के शीशे पर एक दम से मोटी-मोटी बूंद गिरने लगी। बादलों और बूंदों की रफ्तार से इस बात को समझने में देर नहीं लगी कि आज कुछ मिनट तक तो राम जी दिल खोलकर बरसेंगे।

थोड़ी देर में ही काले बादलों ने थ्री व्हीलर में मुझे पूरा भीगो दिया। मैंने कहा, अरे यार, पूरा भीग गया....(थोड़े अंतराल के बाद)...चलो अच्छा है कि बारिश तो हुई। थ्री व्हीलर वाला बोला, सर इस बारिश को कौन बुरा कह सकता है खासतौर पर यहां पर और वो भी इस वक्त पर। यकीनन इस मौसम की पहली बारिश थी ऐसा लग रहा था।

अब भीग गया था तो सोचा कि थोड़ा रुमानी हो ही लिया जाएं। मैंने मोबाइल, पर्स, पेपर्स सब बैग में डाला और जींस को नीचे से मोड़ दिया। अब भीगो जी भरकर। थ्री व्हीलर को घर से करीब सौ मीटर दूर रोकर पैदल आने का फैसला किया। झमाझम सावन बरस रहा था और मैं दोनों हाथ फैलाए सड़क पर अपने अंदर मन तक भीगने को महसूस कर रहा था। बारिश करीब १५-२० मिनट तक लगातार होती रही। वो सौ मीटर का सफर मैंने २०-२५ मिनट में पूरा किया होगा जब तक की बारिश बंद नहीं हो गई थी।

मैं दोनों हाथ फैलाए सड़क पर चल रहा था, पीछे बैग टंगा हुआ था। दुनिया देख रही थी एक जवान में छोटा बच्चा। वो अल्हड़ बच्चा, वहां कूदता जरूर है जहां पानी जरूर होता है। बारिश इतनी तेज थी कि आधी सड़क तक पानी भर गया था। मैं अपने बचपन में लौटता हुआ उस छोटे बच्चे के साथ पानी में छप-छप कर रहा था जिसकी मम्मी उसे इस तरह कूदने पर डांट रही थी। मुझे कूदता देख उन्होंने अपनी छतरी बंद की और हमारे संग अपने बचपन के दिनों में लौट चलीं।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, July 27, 2009

क्या सारे अखबार के संपादक मर्द हैं जो कि लड़कियों की तस्वीरों को प्राथमिकता देते हैं?

चार दिन की छुट्टी ली थी और बेगम ने चाहा कि क्यों ना आबो हवा बदल ली जाए। पर उन्होंने यहां सोचा और जब तक हम कुछ फैसला ले पाते उससे पहले वहां उनकी मौसी ने उसे कर भी दिया। यानी की वो अपने बच्चों के साथ हमारे यहां पर आबो हवा बदलने के लिए आ पहुंची। उनका बड़ा बेटा थोड़ा दुखी दिखा क्योंकि 12वीं में उसके सिर्फ 88 फीसदी अंक आए थे। ये बात गर्मी की छुट्टियों की है।

मैंने साले साहब को समझाया की ये तो बहुत अच्छे मार्कस हैं फिर क्यों चिंता कर रहे हो। उसके जवाब ने मुझे थोड़ा संतुष्ट किया। वो बोला, जीजाजी, ‘मैं चाहता था कि दिल्ली में मेरा एडमिश्न एक अच्छे कॉलेज में आसानी से हो जाए पर अब लगता है कि मुझे दौड़ भाग करनी होगी। दूसरी बात कि मैंने कुछ कॉम्पटीशन टेस्ट देने हैं उसमें पूरे भारत से बच्चे एग्जाम देते हैं। साथ ही बारहवीं में जिनके मार्कस अच्छे होते हैं उनको प्राथमिक्ता दी जाती है। मेरी चिंता है कि कहीं मैं पीछे ना रह जाऊं’। दिल्ली आने का दूसरा कारण ये भी था कि अखबार और टीवी के माध्यम से कॉलेजों के बारे में पता आसानी से चल जाता है। सुबह से ही पूरे dedication के साथ वो लग जाता। सबसे पहले सारे अखबार अपने पास रख लेता है और देखता कि कौन-कौन से कॉलेज अच्छे हैं वहीं साथ ही कि किन कॉलेजों में फॉर्म भरने चाहिए। सुबह से वो लंबी लाइन, दौड़-धूप, यहां जाना-वहां जाना और फिर शाम को वापसी।

एक दिन वो कई अखबार लेकर मेरे सामने आया, बोला, ये अखबार वाले हमारी फोटो क्यो नहीं छापते? मैंने पूछा कि क्या हुआ तुमने ऐसा क्या कर दिया कि तुम्हारी फोटो छापी जाए। जवाब में उसने कहा कि तो इन लड़कियों ने क्या कर दिया है जो हर पेपर में लड़के छोड़ लड़कियों के फोटो छपते हैं। हम लोग सुबह से शाम तक लाइन में नहीं लग रहते हैं, क्या हमारे लिए कॉलेज जाने का ये पहला मौका नहीं है? हेडिंग है कॉलेज जाने की तैयारी, तो दिखादी उछलती लड़कियां, कॉलेजों में लंबी लाइन तो दिखा दी 4-5 लड़कियां, आज कॉलेजों में भरे गए लाखों फॉर्म तो 2-3 लड़कियां बैठी हुई फॉर्म भरती हुई दिखा दी। स्कूल के बाद कॉलेज की तरफ बढ़े कदम, दो लड़कियां चलती हुई दिखा दी। क्या जीजाजी, हम लड़कों के लिए कॉलेज जाना जिंदगी की एक नया अध्याय नहीं है? क्यों हम लड़कों के लिए पेपरों में जगह नहीं है? क्या सारे अखबार के संपादक मर्द हैं जो कि लड़कियों की तस्वीरों को प्राथमिकता देते हैं?

मैं उसे जवाब के रूप में एक झूठी और फीकी सी स्माइल देकर रह गया। वो तो अपनी बात कह कर चला गया। वो जितने अखबार छोड़ गया था उसमें पिछले कई दिनों के अखबार थे। वो कुछ अखबार आगरा से भी लेकर आया था कुछ दिल्ली के थे और एक ही न्यूजपेपर नहीं थे, तीन-चार तरह-तरह के अखबार। मैंने गौर करना शुरू किया तो पाया कि उसकी बात काफी हद तक सही ही है। फिर मैंने पेपर में छपने वाले एड देखने शुरू किए। तो पाया कि एक एड छपा था कि कपड़ों पर 40 फीसदी की छूट और तस्वीर छपी थी एक मॉडल की ब्रा और पैंटी में। मुझे तो समझ नहीं आया कि ये किस पर छूट थी अंडर गारमेंट्स पर या फिर कपड़ों पर। देखा कि पूरे कपड़ों पर थी ये छूट फिर ऐसी तस्वीर क्यों छापी गई।

ऐसे विज्ञापन तो आम हैं, एक लड़की रेजर के साथ खड़ी हुई है, भई रेजर की लड़की को क्या जरूरत पर फिर भी एड में छपी हुई है। मर्दों की सेंडो बनियान को हाथों में लेकर खड़ी हैं एक महिला आखिर क्यों? सेंडो बनियान की उन्हें क्या जरूरत। सेंडो और ब्रीफ के लिए भी लड़कियों की जरूरत महसूस होती है। आखिर क्यो?

टीवी पर तो हमेशा इस बात की शिकायत करते हैं कि अंगप्रदर्शन हो रहा है पर अखबारों में भी जीना मुहाल कर दिया है। कहते हैं कि टाइम्स ऑफ इंडिया के डेल्ही टाइम्स (पंजाब केसरी के बाद डेल्ही टाइम्स ही बना था दूसरा पंजाब केसरी) के पहले सबसे ज्यादा बिक्री पंजाब केसरी की हुआ करती थी वो भी सिर्फ एक दिन। क्योंकि उसकी गुरुवार की बिक्री पूरे हफ्ते के अखबार से ज्यादा हुआ करती थी। क्यों? कारण था कि गुरुवार को सेलिब्रेटीज की बोल्ड रंगीन तस्वीरें हुआ करती थी, जो अब भी होती हैं।

कई बार सोचता हूं कि क्या लड़कियां सिर्फ टीआरपी जोन की वस्तु मात्र रह गई हैं? और दूसरी बात साले साहब की, क्या सारे अखबार के संपादक मर्द हैं जो लड़कियों की तस्वीरों को प्राथमिकता देते हैं? वैसे ये तो बात सही है मर्द प्रधान समाज में शायद ऐसा ही होता है! सोचने पर तो मजबूर हैं.....। अब तो सुधरो अखबार वालों, यारों जब देखो हर आईटम पर लड़की की तस्वीर ना लगा दिया करो।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, July 24, 2009

आखिर आ ही गई अक्ल

१८ जुलाई २००९ को मैंने यूपी में हाल ही में उठे उस बवंडर के बारे में एक पोस्ट ‘ये रेप की राजनीति है यूपी वालों, मायवती की दोगली नीति।’ लिखी थी जिसमें जिक्र किया गया था कि राजनीति का, जो उठी है रेप से। मैंने उस लेख के जरिए कई सवाल खड़े किए थे ‘.....इज्जत की कीमत तो आप २५ हजार दे रही हैं पर उस कीमत को चुकाने के लिए ५ लाख खर्च कर रही हैं। हेलिकॉप्टर से डीआईजी जगह-जगह जाते हैं और खर्च करते हैं करीब ५ लाख सिर्फ फ्यूल में। क्या ये बेहतर नहीं होता कि उस जिले के वरिष्ठ अधिकारी उस पीड़ित परिवार को मुआवजा दे देते……’।

अब सरकार ने ये फैसला किया है कि अब जिस जिले में रेप जैसा कुकर्म होगा तो उस जिले के वरिष्ठ अधिकारी को ही जलील होने के लिए और साथ ही पैसे पहुंचाने के लिए पीड़ित के परिवार वालों के पास जाना होगा। ये फैसला आने वाले दिनों के लिए काफी अच्छा है। क्यों हर बार एक प्रदेश के डीआईजी रैंक के अफसर को अपने ही डिपार्टमेंट के कुछ नाकारा लोगों की नाकामी की कीमत के एवज में अपनी गर्दन झुकानी पड़े। अब जो होगा नाकाम वो ही जाएगा शर्मिंदा होने के लिए। जो भी हुआ अच्छा हुआ अब फिजूलखर्ची तो रुकेगी ही और शायद खुदा ना करे कि कोई रेप का पीड़ित हो पर यदि कोई होता है तो ज्यादा से ज्यादा मुआवजा मिल सके।

कौन कहता है कि ब्लॉग नहीं पढ़े जाते, क्या मालूम हमारी पोस्ट को पढ़कर ही किसी ने ये बात आगे रखी हो। विभाग के अधिकारियों को ज्ञान मिलने के बाद ये फैसला ले लिया गया हो। हो तो कुछ भी सकता है।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, July 22, 2009

नींबू के आकार के सेब और आम, अब तो इनसे ही चलाना है काम।

कई दिन से हमारी बेगम कह रहीं थीं कि जब भी कुछ काम कहो, हर बार बहाना बना देते हो कि समय नहीं है। कभी तो घर परिवार के कामों के लिए भी समय निकाल लिया करो। वो जब भी ऐसा कहती हैं तो जानता हूं कि काफी दिनों के बाद ही कह रही हैं तो जरूर से एक-दो काम नहीं लिस्ट होगी कामों की। बस दिक्कत ये है कि कई बार ये लिस्ट इतनी बड़ी होती है कि दिन-ब-दिन करते हुए हफ्तों में जाकर काम खत्म होते हैं। मैंने सोचा कि इस बार की पूरी छुट्टी बेगम के काम के नाम मतलब हमारे घर के कामों के नाम कर देते हैं।

सुबह से ही काम में लग गए। कई काम दोपहर तक निपटा दिए गए थोड़ा आराम करने के बाद शाम को कहा गया कि आज जो साप्ताहिक सब्जी मार्केट लगती है वहां से सब्जी ले आते हैं। हम भी सब्जियों के दामों को आसमान में चढ़ते हुए देख तो रहे ही हैं शायद बाजार में ही सस्ती मिल जाए।

जब बाजार पहुंचे तो एक-दो रु तो कम जरूर मिली सब्जी पर यहां भी दाम आसमान छूते ही नजर आए। सबसे मजेदार बात तो लगी कि पहले चटनी के लिए पोधीना, धनिया और हरी मिर्च एक साथ १० रु की लेते थे इस बार तो देने से इनकार कर दिया गया, सब अलग-अलग मिलेंगी। अरे भई १० की दे दो चाहे थोड़ी यहां से काट लो वहां बढ़ा दो, पर नहीं। टमाटर ३० से नीचे नहीं मिले। चंद सब्जी में ही २०० रु खत्म।

अब हम बढ़ चले फल की तरफ। जानते तो थे कि यहां पर कम दाम की उम्मीद ना ही करें तो बेहतर। पहले बात सेब की, एक ठेले वाले भाईसाहब आवाज़ लगा रहे थे सेब ले लो सेब। बेटा हमें वहां ले गया। बड़े आश्चर्य के साथ हमने कहा कि क्या ये सेब हैं? पत्नी बोलीं, हां, ये खट्टे-मीठे सेब होते हैं। इनका आकार इतना ही होता है छोटे अमरूद की तरह। दाम ४५ रु किलो। बेगम से हमने कहा कि छोटे हैं आधा किलो ले लो इसमें ही काफी आजाएंगे।

अब बारी थी आम की। जो आकार में बड़े थे उनके दाम उनके आकार की तरह ही कुछ ज्यादा था। ६० रु के एक किलो, आदमी क्या खाए, क्या स्वाद ले। तो एक किलो में कुल चार-पांच आम चढ़े जो कि दो बार में ही खत्म हो जाएंगे। तो बढ़े चूसने वाले आमों की तरफ। देख कर लगा कि थोड़े बड़े आकार के नींबू रखे हुए हैं। इनके दाम भी कोई कम नहीं थे, ४० रु किलो। तो दिल को बहलाने के लिए २ किलो ये भी ले आए जिस के कारण थैले का वज़न भी बढ़ गया और दिल को तसल्ली भी हो गई की तीन किलो आम ले आए हैं जम कर खाएंगे। साथ ही साथ पत्नी को भी बता दिया कि देखो १४० रु में तीन किलो आम लाए हैं यानी ४७ रु किलो।

हम दोनों घर में आमों को खाते हुए मुस्कुरा रहे थे। आम के आकार ने हमारे पर्स का आकार इतना छोटा कर दिया कि एक छोटे से परिवार पर ३७५ रु ढीले हो गए। सोचता हूं कि शरीर ओवरवेट हो रहा है तो कुछ दिन जमकर डाइटिंग क्यों ना कर लूं....।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, July 17, 2009

साहित्य की तरफ एक कदम है ब्लॉग।

हाल फिलहाल में कई बार इस पर चर्चा होती आई है कि ब्लॉग आखिर है क्या? अपनी बात कहने का एक मंच, अपनी बात को अपने अंदाज में रखने का एक मंच मतलब अपने अनुभव या फिर अपनी निजी डायरी। अपनी कुंठा निकालने का एक मंच या उन लोगों की एक संगठित जगह जिन्हें लिखने की अभिलाषा है पर कहीं लिख नहीं पाते तो यहां पर हाथ साफ करते हैं या फिर ये एक ऐसा मंच है जो कि हमें साहित्य की तरफ ले जाने का एक जरिया बन रहा है। अभी ये पढ़ने को मिला कि कुछ चुनिंदा लोग तो इसे किसी भी तरह का मंच नहीं मानते। वो कहते हैं कि ये ना तो साहित्यिक मंच है और ना ही निजी डायरी। पर हां, इसके विपरीत अधिकतर लोग ये मानते हैं कि ये एक मंच जरूर है। जहां तक खुद की बात करूं तो मैंने यहां पर ऐसे-ऐसे आर्टिकल पढ़े जो कि बाहर की दुनिया की किताबों में भी नहीं पढ़े। तो आखिर ये ब्लॉग है क्या?

बात कहने का एक मंच या फिर अपने अंदाज को रखने का एक मंच मतलब अनुभव


ब्लॉग लिखने वालों में कई ऐसे हैं जो कि इसे अखबार कि तरह मानते हैं। जो ब्लॉग पर नियमित हैं और हर प्रकार की ख़बरों को अपने ब्लॉग पर छापते हैं और साथ ही उनका विश्लेषण भी करते हैं। कई इसे सिर्फ अपनी बात को कहने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। याने की अपनी बात बस कह दी और कुछ नहीं।

कई हैं अपने अनुभवों को दूसरे के सामने रखते हैं अपने ही अंदाज में जो कि सबसे जुदा और सबसे अलग होता है। थोड़ा रोचक अंदाज में अपने अनुभव या फिर अपनी सोच। उन ब्लॉगर में आते हैं समीर लाल, डॉ अनुराग, शिवकुमार और ज्ञानदत्त, जितेंद्र भगत, अब अनिल कांत और भी बहुत हैं, सबका एक साथ ध्यान नहीं आ रहा।

निजी डायरी या ट्रैबल गाइड


क्या ब्लॉग एक निजी डायरी का रूप ले सकता है? यदि कोई राज भाटिया या फिर प्रीती बड़थ्वाल की वो सीरीज पढ़े तो शायद ये कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि ब्लॉग एक निजी डायरी हो सकता है। जो कि आप अपने निजी और बहुत ही संवेदनशील और पर्सनल अनुभवों को पन्ने पर उड़ेल देते हैं जो कि आप किसी को भी बता सकते हैं। साथ ही कई बार ये बात भी सामने आई कि ब्लॉग पर ये अच्छा नहीं कि आप अपनी पर्सनल बातें शेयर करें।

यहां पर ये भी कहना चाहूंगा कि मैं अमिताभ बच्चन के ब्लॉग को इसी श्रेणी में रखता हूं।

अभी तक सबसे अच्छा इस्तेमाल यदि ब्लॉग का हुआ है तो वो ट्रेबल गाइड के रूप में। लोगों को घर बैठे-बैठे उन जगहों की जानकारी मिल जाती है जहां वो जाना चाहते हैं। कई ब्लॉग ने तो पिछले दिनों इतने अच्छे ढंग से किसी जगह का ब्यौरा और जानकारी दी कि कोई भी उस जानकारियों का इस्तेमाल करके उस जगह पर जा सकता। जितेंद्र, महेंद्र और ममता (...और भी हैं) ने कुछ ऐसी ही तस्वीर पेश की थी। यदि अंग्रेजी ब्लॉग की बात करें तो आप जिस जगह के बारे में सर्च करेंगे तो कई बार गूगल आपकी सर्च को ब्लॉग तक ले जाता है।

अपनी कुंठा निकालने का मंच या लिखने की अभिलाषा

मेरे एक साथी को पता चला कि मैं भी उसी की तरह ब्लॉग लिखता हूं और शायद मुझे ब्लॉग लिखने का सबसे ज्यादा दुख सिर्फ इसी बात का हुआ था कि उसे पता चला। क्यों? उसके पीछे का कारण भी है। उसने कहा था कि अपनी कुंठा को निकालने का सबसे बढ़िया जरिया यदि है तो ये ही है। साथ ही जो बात सबसे बुरी लगी वो ये थी कि उसने मुस्कुराते हुए कहा था, कि यार ये जो ब्लॉग है ना वो है अपने हाथ ज...., जब चाहो जितना चाहो करो। वो आज भी ब्लॉग लिखता है।

....या साहित्यिक मंच


काफी लोगों की तरफ से आया कि अमिताभ बच्चन का ब्लॉग साहित्य की सीमा में आता है। मैं पूछना चाहता हूं कैसे आप उसे साहित्य मान सकते हैं। सवाल के ऊपर सवाल ना दागिए जवाब दीजिए। हो सकता है कि कल वो पढ़ा जाएगा तो सिर्फ इसी कारण से आप उसे साहित्य मानेंगे।

मैं जानता हूं कि बहुत लोगों ने कुरु कुरु स्वाहा, गोली, कसप, अवारा मसीहा पढ़ी होगी, मेरे को उसी श्रेणी में कई ब्लॉगर की लेखनी लगती है। इसमें मैं लिखना चाहूंगा कि क्या किसी ने मौदगिल साहब की कविता, नीरज जी की रचनाओं को पढ़ा है। यदि पढ़ा है तो इन रचनाकारों पर कोई मेरे से प्रश्न नहीं पूछेगा। रंजना भाटिया, मीत की गजलें, प्रीती बड़थ्वाल की कविता पढ़ी हैं(चंद नाम दे रहा हूं यहां)। रंजना जी की यहीं पर कविता कि पुस्तक छपी, योगेंद्र जी तो अपने में ही नायाब हैं। क्या इनके द्वारा लिखी गई रचनाएं साहित्य की तरफ हमको नहीं लेजाती। मैं तो ये मानता हूं कि लेजाती हैं।

कल किसने देखा है पर ये एक पहल है आज जैसे हम पिछले पन्नों को पलट कर देखते हैं उसी तरह ब्लॉग के कुछ चुनिंदा पन्ने यदि ब्लॉग बचा रहता है तो जरूर देखे जाएंगे। पर अभी बड़ी कठिन है डगर पनघट की.......।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, July 15, 2009

जब मैं स्कूल में था तब भी ये ही सुनता था अब मेरा बच्चा स्कूल में है तब भी ये ही सुन रहा हूं। आखिर कब तक सुनना पड़ेगा?

जब स्कूल में था तब से देखता, पढ़ता और सुनता आ रहा हूं कि हमारा देश कहीं आगे हो या ना हो पर जनसंख्या में नंबर 2 पर जरूर है। जब-जब ओलंपिक हुआ करते थे तो सारा देश खुद से सिर्फ और सिर्फ एक ही सवाल पूछा करता था कि जनसंख्या के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर वाले देश में ऐसा कोई नहीं, जो कि एक पदक दिला सके। अब तो ये भी माना जा रहा है कि 21 साल बाद 2030 तक भारत चीन को जनसंख्या के मामले में पछाड़कर पहले पायदान पर काबिज हो जाएगा। यदि ये ही हाल चलता रहा तो भारत की जनसंख्या तब तक 148 करोड़ हो जाएगी और चीन की 146 करोड़। तभी तो भारत के स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने जनसंख्या दिवस के दिन एक समारोह में कुछ बिल्कुल अलग-अलग ढंग के ज्ञान दिए। ऐसी बात कह दी जिसे कुछ तो सही मानेंगे और कुछ दरकिनार कर देंगे। पर ऐसा नहीं है कि ये आप पहली बार जानेंगे पहले भी कई लोग ये बात कह चुके हैं।

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि 30 या उसके बाद ही शादी होनी चाहिए। वो ये नहीं कहते कि शादी की उम्र इतनी कर देनी चाहिए पर उनकी खुद की सोच ये है क्योंकि उनकी शादी भी 30 के बाद ही हुई थी। जहां तक मैंने समझा कि ऐसा वो क्यों सोचते हैं तो उसके पीछे की वजह ये हो सकती है। यदि 30 के बाद शादी करें तो कुछ चुनिंदा साल रह जाएंगे बच्चे पैदा करने के लिए। एक-दो साल मस्ती में निकल जाएंगे। जब आप पहले बच्चे के लिए जाएंगे और यदि उस पहले बच्चे की डिलीवरी के समय कुछ भी दिक्कत का सामना करना पड़ा तो जब तक दूसरे बच्चे के बारे में सोचेंगे तब तक उम्र ही निकल चुकी होगी और एक बच्चे से ही लोगों को सब्र करना होगा। क्योंकि खासकर भारत में 35 के बाद अब भी लड़कियों के लिए मां बनना ठीक नहीं माना जाता। यदि कोई रिस्क लेता है तो पैसा भी उसी तरह खर्च होता है और दोनों के ऊपर खतरा भी ज्यादा हो जाता है।

उन्होंने कहा कि गांवों में यदि बिजली पहुंचे तो लोग रात के बारह बजे तक टीवी देखेंगे और फिर वो इतना थक जाएंगे कि बच्चे पैदा करने के लिए वक्त ही नहीं मिलेगा। वैसे भी गांवों में सुबह जल्दी उठने का चलन है तो यदि कोई देर रात तक टीवी देखता है तो वो फिर इस काम में लिप्त नहीं होगा क्योंकि सुबह सूरज उगने तक तो खेत में जाना होता है वर्ना धूप होने पर भी लगे रहना पड़ेगा खेत में और वो कोई भी किसान नहीं चाहता।

हमारे इतिहास के टीचर ये कहा करते थे कि ठंडी में गांवों में लोग इसी काम में लिप्त रहते हैं क्योंकि दिन भी देर से होता है और जल्दी रात हो जाती है तो ज्यादा समय होता है साथ ही ठंड से बचने का उपाय और मनोरंजन के साधनों का अभाव। कई बार जब वो पढ़ाते रहते थे तो हम उनसे लड़ भी जाते थे कि जैसे आप इतनी आसानी से बता रहे हैं उतनी आसानी से बच्चे थोड़े ही पैदा हो जाते हैं। छोटे थे हम तब।

बचपन से ही मैं ये कई जगह पढ़ता और सुनता आया हूं कि हमारे देश में अशिक्षा और मनोरंजन के साधनों के अभाव ने आबादी में इजाफा करने में काफी योगदान किया है। वैसे ये किसी हद तक सच भी है कि यदि गांवों में बिजली की व्यवस्था अच्छी हो जाए तो जो खेत के काम 4 आदमी लग कर करते थे उसके लिए बिजली के औजारों की मदद से सिर्फ दो लोग ही आराम से कर सकेंगे। अशिक्षा के कारण गांवों के लोगों की धारणा बनी हुई है कि खेत में काम करने के लिए भी तो कोई होना चाहिए तो इसके खातिर वो कई बच्चे चाहते हैं। जितने ज्यादा बच्चे उतनी ज्यादा ताकत। और यदि पहली दो लड़कियां हो गई तब तो....।

स्वास्थ्य मंत्री जी के बयान से मैं तो काफी हद तक सहमत हूं। पर इस बयान में कई बातें जोड़ना चाहूंगा कि सिर्फ बिजली ही नहीं किताबों को भी घर-घर तक पहुंचाना होगा। हमें अपनी शिक्षा के स्तर को लोगों के हिसाब से सुधारना और बदलना होगा। शिक्षा के साथ-साथ कानून पर लोगों का विश्वास जगाना होगा। आज भी गांवों में पंचायत और उनके तालिबानी फरमान लोगों को सालते रहते हैं और लोगों को उन फरमानों को मानना पड़ता है क्योंकि हमारे कानून की प्रणाली में इतने पेंच हैं कि कोई भी इसमें उलझना नहीं चाहता। जहां तक शादी 30 साल के करीब या बाद में हो तो शहरों में तो अधिकतर लोगों की उम्र इतनी हो ही जाती है। हां, गांवों में ये नहीं है वहां आज कल भी लोग पेपरों में 18 साल देखते ही लड़की और 21 साल में लड़के की शादी कर देते हैं। कुछ की तो शादी उम्र की सीमा में नहीं बंधती, पहले ही हो जाती है।

यदि हमने जनसंख्या वृद्धि पर लगाम नहीं लगाई तो...कहीं ऐसा ना हो कि आने वाले दिनों में देश को प्राकृतिक आपदा से गुजरना पड़े। पर एक बात का अब भी जवाब नहीं मिल रहा कि जब मैं स्कूल में पढ़ता था तब भी सरकार ये बात जानती थी और आज जब मेरा बच्चा स्कूल में है तब भी ये ही बात दोहराई जा रही है इस पर काम क्यों नहीं हुआ। कब तक यूं ही हम बताया जाता रहेगा कब जाकर इसको कार्यान्वित किया जाएगा। आखिर कब?

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, July 14, 2009

ऐसा है हमारा कानून और ऐसे हैं हमारे कानून के रखवाले, शर्म आती है।

पहले फिल्मों में देखता था ये सब अब इसे सामने देख रहा हूं। डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, एक्टर सब कहते फिरते थे कि फिल्में हमारे समाज का आइना होती हैं और मैं विश्वास नहीं करता था पर आज मानने को मजबूर हूं।
जज तक ने कहा कि ये अभियुक्त दोषी ठहराए जा सकते थे पर सबूतों के अभाव में ऐसा करना संभव नहीं। तो क्या जज के हाथ भी बंधे हैं।

एक घटना है परसों की और दूसरी घटना है बरसों पहले घटी थी पर नतीजा कल आया। दोनों ही हरकतें शर्मनाक हैं। फिल्मों में दिखाते थे कि कानून पर कैसे भारी पड़ते हैं नेता, ये बात सच साबित होगई है। दूसरा, कैसे पुलिस और गुंडों-बदमाशों में होती है साठगांठ। कुछ पुलिसवाले ही होते हैं बदमाशों के इनफोर्मर। कैसे बदले जाते हैं दिए हुए बयान और कोर्ट में खुद कई पुलिसवाले कैसे मुकर जाते हैं अपने दिए हुए बयान से।
याद आता है एक छात्र जो कि अपने अध्यापकों के ऊपर चिल्ला रहा था, कह रहा था कि शिक्षकों के नाम पर कलंक हो।


प्रोफेसर सब्बरवाल हत्याकांड के सभी आरोपी बरी। क्यों?

सभी ने देखा था वो हादसा टीवी पर, पर अंधेकानून को नहीं दिखाई दिया, प्रमाण के अभाव में छोड़ दिए सभी आरोपी। जज तक ने कहा कि ये अभियुक्त दोषी ठहराए जा सकते थे पर सबूतों के अभाव में ऐसा करना संभव नहीं। तो क्या जज के हाथ भी बंधे हैं। बेटा फरियाद करता रहा कि पिता के हत्यारों को सज़ा मिले पर कानून इस बार अंधे के साथ-साथ बहरा भी निकला।

अगस्त २००६, उज्जैन के माधव कॉलेज के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट के हेड प्रोफेसर सब्बरबार को कथित तौर पर अभियुक्तों कॉलेज कैंपस में क्रूरता से पीटा था और पिटाई में गंभीर चोट के शिकार प्रो।सब्बरबाल ने अस्पताल में दम तोड़ दिया था। याद आती है वो व्हील चेयर जिसमें प्रो।सब्बरबाल को बैठाकर अस्पताल लेजाया जा रहा था, सभी न्यूज चैनलों ने इस को काफी अहमियत से दिखाया था।

याद आता है एक छात्र जो कि अपने अध्यापकों के ऊपर चिल्ला रहा था, कह रहा था कि शिक्षकों के नाम पर कलंक हो। क्यों कह रहा था वो ऐसा क्योंकि अध्यापकों ने उसे फेल नहीं कर दिया था ब्लकि कॉलेज में छात्रसंघ के चुनाव में धांधली के लगे आरोपों के कारण अध्यापकों ने चुनाव टाल दिए थे। वो युवक बीजेपी की यूथ विंग एबीवीपी का अगुवा था। शायद ही कभी किसी अध्यापक ने अपने छात्र से ऐसे संबोधन सुने होंगे। सारे न्यूज चैनलों ने गोला लगा-लगाकर बार-बार दिखाया था इसे। तो क्या कोर्ट को ये सब नहीं दिखाई दिया। कोर्ट ने ये बात कैसे मान ली कि जब ये हादसा हुआ तो ये ६ अभियुक्त वहां पर मौजूद नहीं थे।

सरकारी वकील पर उठ रही हैं उंगली उसके पीछे का कारण ये है कि जब मध्यप्रदेश में इस केस की सुनवाई होनी थी तब वहां के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पहले ही इसे हादसा घोषित कर दिया था। बीजेपी के हैं तो क्या बीजेपी के युवा छात्रसंघ का साथ नहीं देंगे क्या। साथ नहीं देंगे तो ये बात मुख्यमंत्री साहब भी जानते हैं कि फिर सत्ता में आना उनके लिए मुंगेरीलाल के सपनों की तरह हो जाएगा। कहा जा रहा है कि सरकारी वकील ने इस केस में कई कमियां छोड़ रखी थी। दूसरी बात पुलिस पहले दिए हुए अपने बयान से कोर्ट में मुकर गई। जब ये हादसा हुआ था तो २००६ था उसके बाद अभियुक्तों को पकड़ा गया था तो इतने समय से उनको जेल में क्यों रखा गया। कोर्ट ने भी इस बारे में चुप्पी नहीं तोड़ी। क्यों? वर्ना सवाल तो ये ही खड़ा होता है कि पुलिस ने इन लोगों को किस आधार पर पकड़ा जब सबूत ही नहीं था। चार दिन के अंदर प्रो। सब्बरबाल के बेटे हिमांशु सुप्रीम कोर्ट में अपील करने जा रहे हैं। पर इस फैसले से कि ६ के ६ सभी अभियुक्त बाइज्जत बरी कर दिए गए सबको हैरानी जरूर हुई है। और इस बात का पता भी चलता है कि कहां-कहां तक कौन-कौन आपस में मिला हुआ है।
यदि शिकायत करेंगे तो पुलिसवाले बदमाशों को आपका पता दे देंगे और फिर वो आपको आपके जीने के अधिकार से महरूम कर देगा और आप मरहूम कहलाए जाएंगे।


मुंह खोलोगे, मरोगे।

जी हां, यदि आप किसी की कंप्लेंट करने जा रहे हैं तो संभल जाइएगा। शिकायत करनी भी हो तो पर्दे के पीछे से कीजिएगा, किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि आप कौन हैं। क्योंकि आज कल रक्षक ही भक्षक बने हुए हैं। पता नहीं कब कौन पुलिसवाला जाकर उस गिरोह को बता दे कि आप हैं शिकायतकर्ता। और फिर वो गिरोह समय देखकर आपको आपके जीने के अधिकार से महरूम कर दे और आप मरहूम कहलाए जाएं।

दिल्ली के अशोक विहार में एक शख्स पार्क में चल रहे सट्टे के धंधे की शिकायत करने पुलिस थाने गया। वहां पर और लोगों के साथ मिलकर शिकायत लिखवाई जो कि पहले भी कई बार लिखवाई जा चुकी थी पर हुआ कुछ नहीं था। इस बार कुछ ऐसा हुआ जो कोई सोच भी नहीं सकता था। तीन पुलिसवालों ने इस शिकायत को जगजाहिर कर दिया और भी किस के सामने उनके जिनके खिलाफ शिकायत हुई थी। इस बात से साफ जाहिर हो गया कि पुलिसवालों की साठगांठ थी गोरखधंधा चलाने वालों से।

फिर क्या था रात के अंधेर में जब वो अपनी राशन की दुकान बंद करके आ रहा था तो उस शख्स को तलवार से काट दिया गया। मृतक के दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। कोई अमीर आदमी नहीं था जिसे मारा गया। यतीम हो चुके बच्चों का क्या था कसूर? वैसे तो चार लोगों को नामजद कराया गया है पर माना जा रहा था कि उसने काटने वाले सिर्फ चार नहीं थे दर्जन थे। उन तीन पुलिसवालों को फिलहाल तो सस्पेंड कर दिया गया है।

क्या अब किसी गलत काम की शिकायत करना भी गुनाह है? क्या किसी पर भी अब विश्वास नहीं किया जा सकता खासकर कि कानून से जुड़े लोगों पर? दोनों वारदातों के बाद तो कानूनवालों पर शर्म आई और अपने कानून पर भी।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”