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Saturday, September 12, 2009

कल खुशी पर भारी पड़ा गम।


कहीं खुशी, कहीं गम, ये ही हाल रहा दो दिन के बारे में कहूं तो। दिल्ली में बारिश ही बारिश। हरियाणा से यमुना में पानी भी छोड़ा गया जिसके कारण दिल्ली में बाढ़ जैसे हालात हो गए हैं। पता नहीं कितने सालो बाद ऐसी बारिश हुई है। शायद 98 में दिल्ली में ऐसा ही एक बार हुआ था जब कि यमुना पुश्ता पर पानी भर गया था और दिल्ली में बाढ़ आई थी।
एक गाना हुआ करता था रिमझिम गिरे सावन....पर अब तो सावन बीत जाए और फिर रिमझिम शुरू हो जाए। ये हाल हो गया है मौसम का।

वैसे, मैं यहां पर बात क्या करने वाला था और क्या करने लग गया। कल के दिन खुशी मिली पर जब गम सामने आया तो वो खुशी पर भारी पड़ गया।

ऑफिस में इस बात का इंतजार हो रहा था कि क्या भारत आज का मैच जीत जाएगा। चार विकेट गिर चुके थे। मैं और मेरे साथ ही कुछ इस पर चर्चा भी कर रहे थे कि जब स्कोर छोटा होता है तो टीम इंडिया जरूर उतना ही मर मर कर जीतती है। ये नहीं कि शेर की तरह खेले और जल्दी जीत कर मैच को रफा-दफा करे। चार विकेट गिर चुके थे, द्रविड़ ने 65 मिनट क्रीज पर रहकर 45 गेंदों में महज 14 रन बनाए। द्रविड़ एक महान खिलाड़ी हैं पर क्यों द्रविड़ वन डे को भी टेस्ट की तरह खेलते हैं।

इस बीच एक खबर ने सब में रोमांच भर दिया। पहले था कि सीरीज जीतने पर ही टीम इंडिया नंबर वन बन पाएगी। पर अब ये खबर आई कि न्यूजीलैंड को हराने के साथ ही हम नंबर वन बन जाएंगे पर नंबर वन बने रहने के लिए कॉम्पेक कप जीतना जरूरी होगा। और थोड़ी देर बाद ही धोनी और रैना ने जीत दिला दी। धोनी और रैना दोनों की तारीफ करना चाहूंगा कि दोनों ने सूझबूझ कर बैटिंग की और अंत तक टिके रहे। आशीष नेहरा को मैन ऑफ द मैच से नवाजा गया। सचिन को सम्मान के रूप में बाइक दी गई जिसपर इस बार सचिन खुद ही बैठे धोनी को बैठने का मौका नहीं दिया।

अब बात गम की भी कर लें।

अभी ऑफिस से घर की तरफ निकले ही थे कि पता चला कि डीडी ने सेमीफाइनल और फाइनल के राइट्स खरीद लिए हैं। अब तो लगा कि वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भी भारत का झंडा ऊंचा होगा और विजेंदर अपने बाउट जीतकर फाइनल की जंग में पहुंच जाएगा।

पूरे ऑफिस में बताया गया कि रात के 1.30 बजे है बाउट। मैं घर पहुंच कर खाना पीना करके टीवी खोलकर कभी कुछ कभी कुछ देखते हुए जगने की कोशिश में लग गया। बार-बार न्यूज पर वापिस आता कि जब तक क्रिकेट का ही लुत्फ ले लिया जाए। दिल में एक इच्छा थी कि विजेंदर जीत जाए क्योंकि हाल ही में करोड़ों का मुनाफा हुआ है विजेंदर को।

इतिहास तो विजेंदर ने भी रच ही दिया है। पहली बार कोई भारतीय बॉक्सर इस ऊंचाई तक पहुंच पाया है। यदि विजेंदर जीत जाए तो अच्छा होगा क्योंकि बहुत हो लिया क्रिकेट। पर ये ही सोचते-सोचते कब नींद आगई पता ही नहीं चला। सुबह जब उठा तो तुरंत टीवी चलाया देखा तो हर न्यूज चैनल पर सिर्फ क्रिकेट ही क्रिकेट चल रहा था। लग गया कि विजेंदर का क्या हुआ। यानी हार गया विजेंदर।

जी हां, उजबेकिस्तान बॉक्सर अब्बोस अतोव जिसकी रैंक इस चैंपियनशिप में चौथी थी उसने पहली रैंक विजेदर को 7-3 से मात दे दी। जबकि पहले राउंड में 0-1 से आगे चल रहा थे विजेंदर। पर दूसरे राउंड में ज्यादा डिफेंसिव मोड विजेंदर को हार के कगार पर ले गया। और उजबेक बॉक्सर ने दूसरे राउंड में 5 अंक बटोर लिए और फिर अंतिम राउंड में तो सिर्फ खानापूर्ति ही रह गई। अतोव ने 2007 में लाइट वेट में वर्ल्ड चैंपियनशिप में फाइनल जीता था और वो भी तब जब कि वो बाउट के दौरान प्रतिद्वंदी के पंच के कारण नीचे गिर गए थे। दूसरे राउंड के बाद स्कोर 5-1 था और अंत में 7-3 से विजेंदर हार गया और मुझे लगता है कि बॉक्सिंग का फ्यूचर भी हार गया।

मैंने टीवी बंद कर दिया था। सोच रहा था कि आज भी दो मैच हैं। जहां एक जगह टीम इंडिया श्रीलंका से भिड़ेगी, वहीं दूसरी तरफ जीतेगा भी भारत और हारेगा भी भारत। अमेरिकी ओपन टेनिस चैंपियनशिप में भूपति और पेस होंगे आमने-सामने। देखते हैं कि खुशी मिलती है या फिर आज का पार्ट-2।
आपका अपना
नीतीश राज

Friday, March 6, 2009

लाहौर हमला, तीन थ्यौरी पर भारत महफूज

पाकिस्तान में श्रीलंका क्रिकेट टीम पर जो हमला हुआ है उसमें मुझे तो तीन थ्यौरी सामने आती हुई दिख रही हैं। जो तीन थ्यौरी हैं उन पर ही लगता है कि इस वक्त पाकिस्तान के हुक्मरान सोच रहे हैं। मेरे हिसाब से तीन थ्यौरी हैं---
१) तालिबान की करतूत
२) पाक के बाहर की शक्ति यानी भारत, एलटीटीई। (इसे वैसे तो खारिज कर दिया है पर फिर भी उंगली उठाने की फिराक में तो होंगे)
३) किसी घरेलू संगठन का हाथ। चाहे वो आईएसआई हो या फिर नवाज की पार्टी।
अब बताते हैं कि क्यों ये तीन थ्यौरी सामने आ रही हैं।
पहली थ्यौरी यानी तालिबान की करतूत। पाकिस्तान के बहुत बड़े सियासी हल्कों में ये माना जा रहा है कि श्रीलंका की टीम पर जो हमला हुआ है वो तालिबान का पाकिस्तान पर बढ़ते वर्चस्व की निशानी है। जैसे कि तालिबान में हमेशा से ही पढ़ाई, सिनेमा, औरतों का बेपर्दा होने और खासतौर पर खेल पर काफी कड़े और सख्त कानून बनाए हुए हैं। तालिबानी नहीं चाहते कि क्रिकेट जैसा खेल वो या फिर उनके देश में खेला जाए और जब से स्वात पर अपना कब्जा तालिबान ने किया है तब से पाकिस्तान को अपने देश का हिस्सा मानने लग गया है तालिबान। साथ ही स्वात के बाद पूरे पाकिस्तान पर तालिबान अपना अधिपत्य जमाना चाहता है। वैसे अभी तक तफ्तीश में ज्यादातर अफगानियों को ही पकड़ा गया।
दूसरी थ्यौरी यानी पाक के बाहर की शक्ति भारत,एलटीटीई। मुंबई हमलों का दोषी पाकिस्तान को माना गया और अब तो ये साबित भी हो गया कि 26/11 की साजिश पाकिस्तान में रची गई थी, हमलावर पाकिस्तान से आए थे और सारे दोषी पाकिस्तान में ही हैं। तो पाकिस्तान में ये मानने वालों की कमी नहीं है कि लाहौर हमला भारत के आंतकवादी गुट या फिर भारत की किसी खुफिया एजेंसी की कारसतानी है। बाघा बार्डर के रास्ते आए थे आतंकी पहला वक्तव्य था पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के एक आला अधिकारी का। दूसरी बात, लाहौर हमला मुंबई हमले का पार्ट-2 माना जा रहा है और इसी कारण से ये माना गया कि भारत की तरफ से उसी तरह इस हमले को अंजाम दिया गया जिस तरह से मुंबई हमलों को दिया गया था। यानी भारत ने बदला उतार लिया है। जब कि सारी दुनिया इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती। श्रीलंका में एलटीटीई पर हमले के बाद से ये माना जा सकता था कि ये हमला वो भी करवा सकता है पर सोचने वाली बात ये है कि अभी तो वो श्रीलंका में ही अपने आप को बचाए रखने में असमर्थ हैं तो वो कहां से पाकिस्तान में अफगानी कपड़े पहनकर हमला करेंगे और यदि वो करते तो रॉकेट लॉन्चर और ग्रेनेड चूकता नहीं। पर इस थ्यौरी को पाकिस्तानी सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया है। अब देखेंगे कि पाकिस्तानी मीडिया क्या कहता है?
साथ ही बड़े केनवस पर देखें तो लोगों का ये मानना है कि अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत को इस हमले से कई फायदे हो सकते हैं। पाकिस्तान को एक आतंकवादी राष्ट्र घोषित किया जा सके(जो कि पाकिस्तान है)। साथ ही ये कि भारत कितना असुरक्षित है अपने पड़ोसी से और इस पड़ोसी से भारत को हमेशा ही खतरा बना हुआ है। आतंकवाद को बढ़ावा देने के कारण पाकिस्तान को अमेरिकी मदद भी नहीं मिलेगी।
तीसरी थ्यौरी यानी किसी घरेलू संगठन का हाथ। चाहे वो आईएसआई हो या फिर नवाज की पार्टी। सबसे ज्यादा जो बात चल रही है कि ये जरूर से ही किसी घरेलू संगठन का हाथ हो सकता है। अंतिम वक्त पर बस के रूट में फेरबदल किया गया या नहीं किया गया वो ही रूट रखा जिससे एक दिन पहले गए थे इस पर भी शुरूआती बयान एक जैसे नहीं थे। माना ये भी जा रहा है कि किसी फोन के आने के बाद रूट में फेरबदल से इनकार किया गया था। जब दोनों टीमें एक साथ होटल से निकलती हैं तो पाकिस्तान की टीम श्रीलंका की टीम के साथ क्यों नहीं निकली। क्यों यूनुस खान ने अपनी टीम को ५ मिनट के लिए और रुकने को कहा? क्या कारण है इसके पीछे, ये सवाल तो खुद अंपायरों तक ने अपनी पीसी में कहा था।
जब ४८ घंटे पहले ही पंजाब प्रांत के पुलिस के आला अफसरों को ये बताया जा चुका था कि जल्द ही श्रीलंका की टीम को निशाना बनाया जा सकता है तब भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। खुद पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इमरान खान ने सुरक्षा के इंतजामों पर सवाल उठाए हैं। जहां मिलने थे ७० सिपाही वहां मिले महज़ २५? तो क्या गलती ये सरासर लाहौर पुलिस की नहीं है। अंपायर क्रिस ब्राड ने ये बताया कि जब हमला हुआ तो पाकिस्तानी पुलिस वहां से भाग गई, कोई भी मदद के लिए नहीं था, हम वहां पर अकेले छूट गए थे। तो क्या इसे पुलिस की बुजदिली नहीं कहेंगे।
वैसे भी ये सही है जो अधिकतर आक्रमण करता हो तो उसे ये नहीं पता रहता कि बचाव कैसे करना है, वो ही हुआ पाकिस्तानी लोगों के साथ। अधिकतर वो भारत पर हमले की बात सोचते हैं जब हमला हुआ तो बचाव नहीं सोच सके।
यदि आतंकवादियों का मकसद श्रीलंका की टीम को मारना ही होता तो आतंकवादी एक रॉकेट लॉन्चर ही क्यों छोड़ते? वो भी ठीक निशाने पर नहीं? दो हेंड ग्रेनेड फेंकते पर इस तरह से कि दहशत पूरी दुनिया में फैल जाए पर निशाना चूक जाए।
इतने अच्छे-अच्छे एंगल से कैसे शूट किया इस पूरे हमले को? कैसे एक टीवी क्रू को पता चल गया कि ये हमला हो रहा है। और जहां से भी हो सके हर जगह, हर आतंकी की तस्वीरें उतारी गई। क्या ये बात हजम होती है? टीवी पत्रकार होने के कारण मुझे लगता है कि इतने एंगल से एक साथ तस्वीरों को लेना मुश्किल है। टॉप एंगल, साइड एंगल, फ्रंट एंगल इतने एंगल वो भी सिर्फ सेकेंड में कैसे संभव है, मुझे तो नहीं लगता। इससे ये साफ होता है कि हमले से पहले ही हमले की जानकारी थी उस क्रू को। और ये क्रिकेट जैसे खेल के साथ ये खेल किसी घर के ही सदस्य ने ही खेला है। सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए कि दहशत हम फैला सकते हैं और यदि जरूरत पड़ी तो पाकिस्तान में हम कुछ भी कर गुजर सकते हैं।
पर अब तो दूसरी थ्यौरी को सिरे से पाकिस्तान की सरकार ने खारिज कर दिया है। अब बात अंदर के गुनहगारों और ये तो पाकिस्तान क्रिकेट का दुर्भाग्य है,कि जिस मैदान पर पाकिस्तान क्रिकेट के स्वर्णिम अश्रर लिखे गए उसी गद्दाफी पर पाकिस्तान क्रिकेट पर कालिख पुत गई।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, March 4, 2009

पाकिस्तान के लोग ऐसा क्यों सोचते हैं कि हमने ‘26/11-मुंबई हमलों’ का बदला लिया है।

मंगलवार की सुबह जब देर से उठा तो इल्म हुआ कि हां, रात देर से सोया था। अभी चाय के प्याले को मुंह तक लगा भी नहीं पाया था कि अल्साते मन को याद आया कि मैच भी है आज। टीवी खोलकर आंखें मलता हुआ स्कोर पढ़ा तो देखा कि अभी कुल 7-8 ओवर हुए थे सचिन-वीरू दोनों क्रीज पर थे। एक-दो चौकों के बाद लग रहा था कि सचिन आज शायद उतनी फॉर्म में नहीं हैं पर फिर भी इतने तो हैं कि नेपियर में अपना सर्वाधिक बना देंगे और जैसे मैंने सवाल पूछा था कि क्या सचिन अपने चाहने वालों का अरमान पूरा कर पाओगे? चाहने वालों को जवाब मिल गया, दो चौके मारने के बाद सचिन बाहर जाती बॉल को स्लिप के रास्ते चार रन तक पहुंचाने की कोशिश में बॉल से चकमा खा गए और कीपर को एक आसान सा कैच थमा बैठे।
हमने तुरंत मैच से यूं ही न्यूज की तरफ ऱुख किया। आंख फटी की फटी रह गई। अरे, ये क्या? कहां हुआ हमला, किसने किया, किनपर किया? ये तो पाकिस्तान है, तो क्या पाक टीम पर हमला हुआ है नहीं ये तो श्रीलंका की टीम आतंक की शिकार बनी है। बेहद दुख हुआ और नहीं जानता कि आलस कहां गायब हो गया तकरीबन 3-4 घंटे तक लगातार यूं ही चैनल खंगालता रहा। कई बार तो गुस्से ने दिमाग के सभी तारों को झनझना दिया।

अरे, क्या पागल होगए हैं पाकिस्तान के अधिकारी। जितने भी बयान किसी आला अफसर की तरफ से आ रहे थे उनमें से कुछ और साथ ही कई पत्रकारों के सवाल के निशाने पर कहीं ना कहीं भारत था। कई पाकिस्तानी न्यूज चैनलों पर ये साफ चला कि ये आतंकवादी बाघा बार्डर के रास्ते आए थे। मुझे ये समझ में नहीं आ रहा था कि पहले तो सुरक्षा में इतनी भारी चूक और उसपर तुर्रा देखिए कि अभी हालात को सामान्य करने की बजाय लगे हैं निशाना साधने पर।
इस पूरे हमले पर कई और कहां-कहां सवाल खड़े होते हैं पाकिस्तान के लिए----
1) कैसे हुई श्रीलंका की टीम की सुरक्षा में चूक? जब कि श्रीलंका की टीम को मिलती है ग्रेड ए यानी कि किसी दूसरे देश से आए हुए किसी भी राष्ट्राध्यक्ष जैसी सुरक्षा। श्रीलंका टीम के काफिले की सुरक्षा के लिए करीब 70 पुलिसवाले दिए गए थे। तो सवाल ये उठता है कि कहां गए 70 पुलिसकर्मी? यदि 70 पुलिसकर्मी वहां पर मौजूद थे तो 12 आतंकी उनको चकमा देने में कैसे कामयाब होगए, कैसे फरार हो गए सभी के सभी और वो भी 5-6 पुलिसवालों को मारकर?
2) गद्दाफी स्टेडियम तक जाने के कई रास्ते हैं। ऐसा बताया गया है कि टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक हर रोज दूसरे रास्ते से ले जाया जाता हैं। तो ये चूक कहां से हुई कि आतंकवादी जान गए वो रास्ता जिस रास्ते से आज टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक पहुंचना था?
3) दूसरे टेस्ट के दूसरे दिन जिस रास्ते का इस्तेमाल किया गया था टीम को गद्दाफी स्टेडियम तक लाने के लिए, तीसरे दिन भी उसी रास्ते का इस्तेमाल क्यों किया गया? रूट में हमेशा की तरह बदलाव क्यों नहीं किया गया?
4) पहले से ही सरकार को आगाह किया जा रहा था कि नवाज शरीफ और उनके भाई को पंजाब प्रांत से चुनाव ना लड़ने देने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। पंजाब सूबे में नवाज शरीफ का जो रुतबा है वो पूरे पाकिस्तान के किसी भी प्रांत में जरदारी या फिर गिलानी का नहीं होगा। पंजाब सूबे के लोग नवाज के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
5) 12 आतंकवादी ये प्लान बनाते हैं कि मेहमान टीम पर हमला करना है। इस बात का मतलब ये है कि आतंकी काफी दिनों से इस योजना को अंजाम देने की कोशिश में जुटे हुए थे। तो क्या पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी सो रही थी?
6) स्वात पर तालिबान का कब्जा हो गया है और वहां पर पाकिस्तान का नहीं तालिबान का फरमान चलता है और ये धमकी पहले से ही दी जा रही थी कि सिर्फ स्वात के बाद निशाना पूरे पाकिस्तान पर है, और खासतौर पर इस प्रांत।
7) पाकिस्तान के अधिकारी कह रहे हैं कि ये हमला पूरी तरह से देखने पर लगता है कि जैसे मुंबई हमलों को अंजाम दिया गया था बिल्कुल उसी तरह इस का प्लान लाहौर में भी किया गया। याने कि वो हमला भी पाकिस्तान में प्लान किया गया था और ये हमला भी अंदर के लोगों ने ही प्लान किया है।
8) अभी तक जो माना गया है कि ये अटैक सुनियोजित था और 12 के 12 आतंकवादी अपने में पूरे ट्रेनेंड थे। शायद वो पूरी श्रीलंका की टीम को बंदी बनाना चाहते थे। पर देखने से जो लगा कि उनके पास अस्ला, बारूद, सामान काफी था पर फिर भी उसके बाद सवाल ये उठता है कि यदि वो सब ट्रेनेंड थे तो फिर सवाल ये कि मास्क पहन कर हमला करना और फिर मास्क फैंक देना, क्यों? जिस बैग को आप हमेशा अपने साथ, पीठ पर लादे रख रहे थे फिर उनको छोड़कर भागने का औचित्य क्या? गन, ग्रेनेड, रॉकेट लॉन्चर इन सब को यूंही छोड़ कर क्यों भाग गए आतंकवादी? या फिर ये भी पहले से ही प्लान्ड था कि इनको छोड़ना था। बस पर इतने पास से रॉकेट दागा जाता है पर उसका निशाना चूक जाता है? बस के सामने से आकर बस पर ग्रेनेड फेंकने की कोशिश की जाती है और वो आतंकी के हाथ से छूटकर दूर गिर जाता है? क्या ऐसी ही ट्रेनेंड आतंकी थे जिन्होंने मुंबई पर हमला किया था?
9) सबसे बड़ा सवाल कि पाकिस्तान के इतने भरे-पूरे इलाके में 12 लोग हमला करते हैं और फिर मौका-ए-वारदात से गायब हो जाते हैं। एनकाउंटर तो दूर की बात लगभग 15 मिनट तक वो गोलीबारी करते हैं और फिर फरार हो जाते हैं और वहां कि पुलिस किसी को दबोचना तो दूर की बात उनका पता तक नहीं लगा पाती कि वो गए कहां। कोई भी वहां का निवासी ये बताने को राज़ी नहीं है कि आखिरकार वो किस तरफ गए हैं या उनको कहां देखा गया है। वैसे लाहौर के मॉडल टाउन इलाके से संदिग्ध 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, और इस मामले पर अब तक 60 लोगों को हिरासत में लिया गया।
10) दूसरी तरफ इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस पूरे हमले के पीछे वहीं पाकिस्तान की अंदरूनी रंजिश हो। किसी भी आतंकी का ना तो पकड़ा जाना और ना ही घायल होना, दाल को कहीं ना कहीं काला जरूर बनाता है।
तो ये सब सवाल खड़े हैं अपना मुंह खोले कि क्या कोई दे पाएगा इनका जवाब। लाहौर से बाघा बॉर्डर महज 20 किलोमीटर की दूरी पर है। तो कई की आशंका है कि वो सारे आतंकवादी वहां से भागकर सबसे सुरक्षित स्थान भारत में दाखिल हो सकते हैं। तो फिर यदि देखा जाए तो कोई भी सुरक्षित नहीं है। ना इस पार के ना उस पार के। पाकिस्तानियों को ये समझना चाहिए कि ये हमला उनके देश में बैठे कुछ नापाक दहश्तगर्दों ने करवाया है। हम मुंबई हमलों के लिए किसी को माफ नहीं कर सकते, लेकिन अपनी पर आजाएं तो उसकी कीमत चुकाने की औकात इस जमाने में नहीं।

हम तो शुक्रगुजार हैं भगवान के उस बंदे का जो श्रीलंका टीम की बस का ड्राइवर था जिसने हिम्मत दिखाते हुए टीम को सकुशल गद्दाफी तक पहुंचा दिया। जिसके सामने वाले शीशे पर गोलियां टकरा रहीं थी और उसने एक्सीलेटर और अपने पैर पर विश्वास करके पाकिस्तान, क्रिकेट और आईसीसी के साथ-साथ दुनिया को शर्मिंदगी उठाने से बचा लिया और अकेले आतंक को मात देने में कामयाब रहा।

आपका अपना
नीतीश राज

(फोटो साभार-क्रिक इन्फो)

न्यूजीलैंड में भारत जीता, पाकिस्तान में क्रिकेट हारा।

ट्वेंटी-20 सीरीज हारने के बाद धोनी और धोनी की टीम के लिए पहला वन डे बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने था। धोनी के लिए फिर टॉस अच्छा रहा, और टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला। ओपनर के रूप में जैसा कि सोचा जा रहा था वो ही हुआ सहवाग के साथ गंभीर नहीं सचिन ही थे। सचिन से लोगों को काफी उम्मीदें, सचिन ने जमने की कोशिश की। वहीं दूसरी तरफ सहवाग अपने रंग में आ चुके थे। जहां सहवाग अर्ध शतक के नजदीक थे वहीं सचिन अभी डबल फिगर को छू ही पाए थे।

सचिन ने भी अपने हाथ दिखाए और दो शानदार चौके लगाए। एक-दो चौकों के बाद लग रहा था कि सचिन शायद उतनी फॉर्म में नहीं हैं, फिर भी इतने तो हैं कि नेपियर में अपना सर्वाधिक बना देंगे और जैसे मैंने सचिन से सवाल पूछा था कि क्या सचिन अपने चाहने वालों का अरमान पूरा कर पाओगे? चाहने वालों को जवाब मिल गया, दो चौके मारने के बाद सचिन बाहर जाती बॉल को स्लिप के रास्ते चार रन तक पहुंचाने की कोशिश में बॉल की रफ्तार और हवा से चकमा खा गए और कीपर को एक आसान सा कैच थमा बैठे।
जिसकी उम्मीद थी बिल्कुल उससे हटके हुआ। जहां लोग सोच रहे थे कि लेफ्ट-राइट का कॉम्बिनेशन देने के लिए कोई लेफ्टी आएगा याने कि सबसे सफल जोड़ी फिर होगी क्रीज पर, पर ऐसा हुआ नहीं। लोगों और मीडिया की खरी-खरी सुनने के बाद अपना पसंदीदा नंबर 7 छोड़ कप्तान धोनी 3 नंबर पर बैटिंग करने पहुंचे। अपने इस निर्णय को साबित करने के लिए धोनी ने धीमे और सधी शुरुआत करी। वहां वीरू का बल्ला बोल रहा था। अब तक वीरू 56 गेंदों पर 11 चौके और 1 छक्के की मदद से 77 रन बना चुके थे। विटोरी की गेंद पर एक लाजवाब शॉट सहवाग ने खेली और सर्कल के अंदर खड़े टेलर ने उससे भी शानदार कैच लपक वीरू की शानदार पारी पर ब्रेक लगा दी। चौथे नंबर पर टीम के युवराज आए और
कप्तान के साथ दूसरे रन के फेर में पड़कर पवैलियन की राह पर निकल लिए। अब टी-20 के स्टार सुरेश रैना की बारी थी। 20-20 के क्रम को आगे बढ़ाते हुए रैना ने मैदान के हर कोने में बॉल पहुंचाई और शानदार 4 छक्के और 5 चौंकों की मदद से महज 39 गेंदों पर 66 रन बनाकर छक्के मारने के प्रयास में एलिट की गेंद पर ब्रायन को कैच थमा बैठे। वहीं दूसरे छोर पर कप्तान ने पारी संभाल रखी थी। अब धोनी का साथ देने क्रीज पर आए यूसुफ पठान आए और 10 गेंदों पर 1 छक्के और 2 चौकों की मदद से 20 रन बनाए। धोनी की इस समझदारी भरी पारी में सिर्फ ६ चौकों की मदद से 89 गेंदों पर 84 रन बनाए। न्यूजीलैंड के सामने 7.20 की औसत के साथ लक्ष्य 38 ओवरों में 274 रहा।
वैसे, इस बीच न्यूजीलैंड में झमाझम बारिश होने लगी और पाकिस्तान में श्रीलंका टीम की बस पर दनादन फायरिंग। पाकिस्तान में दूसरे टेस्ट के साथ-साथ दौरा भी खटाई में पड़ गया। खेल और क्रिकेट के इतिहास का काला दिन। वहीं दूसरी तरफ न्यूजीलैंड में बारिश के कारण पहला वन डे के ओवर कम कर दिए गए, मैच 38-38 ओवरों का हो गया।
इरफान की जगह टीम में आए प्रवीण कुमार ने बिना खाता खोले न्यूजीलैंड को दूसरे ओवर में ही पहला झटका मैक्कुलम के रूप में दिया। न्यूजीलैंड की तरफ से टी-20 का सितारा अस्त हो गया था। दूसरा विकेट भी प्रवीण कुमार की झोली में गया। गुप्टिल और टेलर जब खेल रहे थे तो लग रहा था कि औसर रन रेट तो बढ़ता जा रहा है पर फिर भी यदि ये दोनों टिके रहे तो मैच को कभी भी पलटने की काब्लियत रखते हैं। १६वें ओवर में यूसुफ पठान ने घातक होते टेलर को सचिन के हाथों कैच करवाकर न्यूजीलैंड की मुसीबत और बढ़ा दी। एलिट को सहवाग के सपाट थ्रू ने रन आउट कर दिया और बारिश शुरू हो गई।
डकवर्थ लुईस नियम को लागू किया गया और फिर जो टार्गेट न्यूजीलैंड के सामने था वो लगभग नामुमकिन सा ही था। 43 गेंद पर 111 रन। जब चौथा विकेट गिरा था तो न्यूजीलैंड को 102 गेंद पर 163 रन चाहिए थे और उनके हाथ में 6 खिलाड़ी थे।
जब मैच शुरू हुआ तो स्कोर को आगे बढ़ाने के कारण ओरम युवराज का शिकार बने। अब लगने लगा कि यदि गुप्टिल का विकेट भारत कैसे भी झटक ले तो फिर पूरी तरह मैच भारत के पक्ष में हो जाएगा। और हुआ भी कुछ यूं ही, पर अब बारी थी भज्जी की। चार गेंद पर भज्जी ने 3 विकेट झटक लिए। सबसे पहले गुप्टिल, फिर ब्रूम और फिर मिल्स को आउट कर न्यूजीलैंड की हार में चारों तरफ कील ठोंक दी। कहां एक समय 132 पर 5 विकेट थे वहीं 9 विकेट भी होगए। अब बस खानापूर्ति ही शेष रह गई थी। और भारत ने पहला वन डे 53 रन से डकवर्थ लुईस नियम से जीत लिया। मैन ऑफ द मैच चुने गए टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी।

जब टीम इंडिया बैटिंग कर रही थी तब ये खबर फैल चुकी थी कि श्रीलंका की टीम पर हमला हो गया है। और दोनों टीमों ने हाथ पर काली पट्टी बांधकर अपना विरोध दर्ज कराया। धोनी ने कहा कि अच्छा हुआ कि भारतीय टीम ने पाकिस्तान का दौरा नहीं किया और शायद ही अब कोई भी खिलाड़ी पाकिस्तान में जाकर खेलना पसंद करेगा।
पर सच तो ये है कि पाक में पनपे आतंक के सच से खुद पाकिस्तानियों को लड़ना होगा और क्रिकेट को जिंदा रखने के लिए तालिबानी ताकतों के सामने घुटने नहीं टेकने होंगे। फिल्म के बाद अब इन दहशतगर्दों के निशाने पर है क्रिकेट पर आतंक से तो लड़ना होगा ही।

आपका अपना
नीतीश राज

(फोटो साभार-क्रिक इन्फो)

पाकिस्तान में श्रीलंका टीम पर हमला, पाक में आतंक के आगे हारा क्रिकेट।

पाकिस्तान में श्रीलंका टीम पर हमला हुआ। क्रिकेट के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब कि विदेशी दौरे पर गई किसी टीम पर आतंकवादी हमला किया गया हो। श्रीलंका की टीम की जगह वो भारत की भी टीम हो सकती थी। जनवरी-फरवरी में भारत को पाकिस्तान का दौरा भी करना था। ऑस्ट्रेलिया और भारत के मना करने के बाद श्रीलंका ने दो फेज में पाकिस्तान का दौरा करना कबूला। जनवरी में वन डे और फरवरी-मार्च में दो टेस्ट।

दूसरे टेस्ट का तीसरा दिन, श्रीलंकाई टीम की बस होटल से गद्दाफी स्टेडियम जहां पर दूसरा टेस्ट खेला जा रहा था वहां के लिए रवाना हुई। साथ में आगे पीछे सुरक्षा दस्ता। सब ठीक चल रहा था, श्रीलंका की टीम इस पर हल्की चर्चा करने में मश्गूल थी कि कैसे गेंदबाजी करनी है। पाकिस्तान के समय अनुसार सुबह 8.40 पर टीम की बस गद्दाफी स्टेडियम के पास लिबर्टी चौक के पास पहुंची। जैसे ही राउंडअबॉयुट याने गोलचक्कर पर घूमी, चारों तरफ से बस और बस को सुरक्षा दे रहे पुलिस के दस्ते पर हमला कर दिया गया। 12 आतंकवादी बस पर अंधाधुंध गोलियां चला रहे थे जिसमें श्रीलंका की क्रिकेट टीम बैठी थी।
सामने से आ रही गोलियों से बच पाना बस के आगे चल रहे पुलिस दस्ते के लिए मुमकिन नहीं था। 7 पुलिसवाले मौके पर ही ढेर हो गए। बस पर ताबड़तोड़ गोलियां लग रहीं थी, और इधर खिलाड़ियों की चीख निकलने लगी।
6 खिलाड़ियों को गोलियां लगी।
फायरिंग की आवाज़ सुनते के साथ ही खिलाड़ियों ने झुकना शुरू कर दिया। चमिंडा वास ने बताया कि, फायरिंग के समय यदि वो झुके नहीं होते तो गोली लग सकती थी, गोली ठीक उनके ऊपर से गई थी। श्रीलंकाई बस के ड्राइवर मेहर मोहम्मद ने बताया कि गोली की आवाज़ के बाद पहले तो लगा कि कोईं पटाखे चला रहा है पर तुरंत पीछे बैठे किसी खिलाड़ी ने पीछे से आवाज़ लगाई कि ‘चलो, जल्दी चलो(go)’। ड्राइवर ने समझदारी का काम किया एक्सीलेटर पर रखा पैर और बस को गद्दाफी स्टेडियम के अंदर पर पहुंचाकर ही दम लिया। जो खिलाड़ी घायल हुए----

--कप्तान महेला जयवर्द्धने के पांव में टखना(ankle) में हल्का सा कट लगा, याने कोई खतरा नहीं।
--उप कप्तान कुमार संगकार के कंधे में गोली लगी, खतरे से बाहर।
--अजंथा मेंडिस-पीठ पर किसी चीज के गहरा घाव।
--थरंगा परनाविथाना-सीने में लगी गोलीघाव।
--थीलाना समरवीरा-जांघ में लगी गोली, खतरे से बाहर पर पूरी तरह नहीं। समरवीरा टीम के टॉप के बल्लेबाज जिसने पिछले टेस्ट और दूसरे टेस्ट की पहली पारी में दोहरा शतक जड़ा था।
--पॉल फरबरेस-श्रीलंकाई टीम के सहायक कोच के हाथ में गहरा घाव।

श्रीलंकाई टीम की बस के पीछे एलिट अंपायर की वैन भी आ रही थी। 5 अंपायरों के इस काफिले पर भी आतंकवादियों ने निशाना साधा और इसमें रिजर्व अंपायर एहसान रज़ा गंभीर रूप से घायल हो गए। अभी भी एहसान रज़ा अस्पताल में भर्ती हैं पर अभी-अभी पता चला है कि वो ख़तरे से बाहर हैं। लेकिन इस वैन को जो ड्राइवर थे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
पुलिस की तफ्तीश के बाद पता चला कि 12 आतंकवादियों का ये काम था और उन्होंने हमले में ऑटोमैटिक गन, हैंड ग्रेनेड, रॉकेट लॉन्चर और स्टार डायमंड पिस्टल का इस्तेमाल किया। कुछ का कहना ये है कि ये अटैक पूरा 26/11 मुंबई हमलों की तर्ज पर किया गया है।
वैसे ही पाकिस्तान में कोई भी खिलाड़ी जाकर नहीं खेलना चाहता। 2008 में ऑस्ट्रेलिया ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पाक का दौरा रद्द किया था। उसके बाद चैंपियंस ट्रॉफी रद्द की गई। फिर भारत ने मुंबई हमलों के बाद दौरा रद्द कर दिया, जिसे की आज पूरा विश्व सही ठहरा रहा है। जब ये फैसला लिया गया था तो मुझे याद है कि दुनिया और कुछ पाक के खिलाड़ी जैसे आफरीदी ने काफी कुछ उल्टा सीधा कहा था। श्रीलंका की टीम ने हौसला दिखाया और उसके इस निर्णय पर कई सवाल भी उठे थे।

इस हमले के तुरंत बाद श्रीलंकाई टीम का पाकिस्तान दौरा रद्द कर दिया गया। कोई भी खिलाड़ी इलाज कराने के लिए भी पाक में नहीं रुकना चाहता था। क्रिकेट के इतिहास में पहली बार ये हुआ होगा कि किसी टीम को मैदान से ही हेलिकॉप्टर से दूसरे देश ले जाया गया और फिर वहां से वो रात तक वापिस अपने देश में पहुंच जाएंगे।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, August 28, 2008

टीम इंडिया ने रच दिया इतिहास

भारत ने पहली बार वन डे में श्रीलंका से श्रीलंका में सीरीज जीती है। 23 साल भारत ने रचा है इतिहास। अब तक श्रीलंका के साथ भारत ने श्रीलंका में 5 सीरीज खेली हैं जिसमें से दो श्रीलंका के नाम और दो ड्रॉ रही हैं। पांचवीं सीरीज पर कब्जा जमाकर भारत ने रच दिया इतिहास। ये दो देशों के बीच की सीरीज थी वैसे कई और टूर्नामेंट भारत ने श्रीलंका में अपने नाम पहले किए हैं। लेकिन दो देशों की सीरीज में पहली बार भारत को ये गौरव हासिल हुआ।
इस जीत में सबसे बड़ा योगदान सुरेश रैना और कप्तान धोनी का रहा। सुरेश रैना को शानदार बल्लेबाजी और दो सुपर कैचों के लिए मैन ऑफ द मैच चुना गया। सुरेश रैना ने जबरदस्त 76 रन का योगदान दिया मात्र 78 गेंद में। जिसमें 6 चौके और एक शानदार छक्का शामिल था। कोहली के साथ मिलकर रैना ने दो विकेट के बाद टीम को संभाला। कोहली 7 चौकों की मदद से 54 रन बनाने के बाद तुषारा का शिकार बने। कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने कप्तानी पारी खेली। रैना के साथ मिलकर 143 रन की साझेदारी ने भारत की नैया पार लगा दी। धोनी ने 80 गेंद पर 71 रन का योगदान दिया। भारत ने श्रीलंका के सामने 259 का लक्ष्य रखा। इस बीच श्रीलंका के लिए सिर्फ एक खुशखबरी थी कि चमिंडा वास ने युवराज का विकेट चटकाकर 400 विकेट पूरे किए। तुषारा ने कमाल की गेंदबाजी की और 5 विकेट झटके।
जयशूर्या ने आते के साथ ही हाथ दिखाने शुरू कर दिए। ऐसा लग रहा था कि वो जल्दी से जल्दी मैच जीतने की फिराक में हैं। पर मुनाफ ने दूसरे छोर पर खड़े बर्नापुरा का विकेट झटक लिया। पटेल ने संगकारा का भी विकेट झटक लिया। फिर तो कप्तान जयवर्द्धना की कोशिशें भी श्रीलंका को हार से नहीं बचा पाई। थोड़ी बहुत कोशिश तुषारा ने की पर जहीर खान की गेंद पर रैना ने शानदार कैच लपक भारत की जीत पर मुहर लगा दी। भज्जी ने फिर गेंद से कमाल दिखाया 3 विकेट झटके।
धोनी ने दिखा दिया की वो एक शानदार कप्तान हैं। पहला वन डे हारने के बाद धोनी ने मेंडिस की तारीफ की थी और फिर दूसरे मैच से उसे धोनी ने पढ़ लिया। पूरी टीम को दिया मूलमंत्र 'पीटो मेंडिस को, मारो मुरली को'। रणनीति कामयाब रही और टीम पर छाया एम फेक्टर का खौफ खत्म हो गया। हम सीरीज जीत चुके हैं और साथ ही अब चयनसमीति ये सोचने पर मजबूर होगई है कि क्या धोनी को टेस्ट टीम की भी कप्तानी दे देनी चाहिए? वैसे हर जगह आवाज़ उठ चुकी है।


आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, August 12, 2008

क्या पांडव फिर कभी एक साथ खेल पाएंगे, मुझे लगता है ‘नहीं’

श्रीलंका से सीरीज गवांने का दुख तो है पर उस से ज्यादा है पांडवों का नहीं चलना। सब से ज्यादा उम्मीदें इन से ही थीं और ये ही नहीं चले। अब एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं क्योंकि जो होना था वो होगया। हम सीरीज हार गए। पर सवाल ये हैं कि क्या ये पांडव हीं हैं इस हार के सबसे बड़े दोषी? क्या ये हीं हैं जो हैं हार के गुनहगार? भई, सबसे ज्यादा अनुभव इन के पास ही था। जब टीम देश से रवाना हो रही थी तो कप्तान कुंबले ने कहा था कि मेंडिस की काट हमारे अनुभवी बल्लेबाज ढूंढ निकालेंगे। लेकिन मेंडिस ने तो रिकॉर्ड ही बना दिया। पहली सीरीज में सबसे ज्यादा विकेट लेने का कीर्तिमान हासिल कर लिया।
कुंबले जी के दो अरमान थे कि सचिन इस टूर में लारा का रिकॉर्ड तोड़ दें लेकिन
सचिन ने तो अरमानों पर ऐसा पानी फेरा कि अब कभी कुंबले अरमान ही नहीं करेंगे, और वो भी खासतौर पर सचिन से। दूसरा अरमान था कि सीरीज हम बेहतर अंतर से जीतें। लेकिन यहां पर पूरी टीम ने और बाकी बचे अनुभव ने लुटिया डूबो दी। कुंबले अब कहते फिर रहे हैं कि बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले....।
जहां तक सचिन की बात है तो सचिन एक लेजेंड हैं। उनके ऊपर पिछले समय में भी कई आरोप लगे लेकिन जब उन्होंने वापसी कि तो सबके मुंह बंद होगए। सचिन क्रिकेट मे गॉड की भूमिका रखते हैं खासकर भारत के लिए तो और ब्रैडमैन से उनकी तुलना यूं ही नहीं की जाती। लेकिन क्या सचिन की चोटें और उम्र अब उन पर हावी होने लगी हैं। दबाव जो कि धोनी की तरफ से उन पर आया है वो भी कुछ कम नहीं है। यहां पर बीसीसीआई को एक सलाह है कि एक-दो सीरीज बांग्लादेश और कीनिया के साथ रखकर सचिन का रिकॉर्ड बनावा दें और फिर सचिन को कहें की गुरू अब क्या बुढापे में भी खेलोगे, संन्यास ले लो। वैसे सचिन की किस्मत मैं ये नहीं था कि विदेशी धरती पर वो रिकॉर्ड बनाए। ऑस्ट्रेलिया के साथ होने वाली 4 टेस्ट मैचों की सीरीज में शायद वो ये रिकॉर्ड बना लें। पहला टेस्ट बैंगलोर में चिन्नास्वामी स्टेडियम में 9 अक्टूबर से 13 अक्टूबर तक होगा। भगवान ने चाहा तो इसी मैदान पर हम सचिन को ये कीर्तिमान हासिल करते देखेंगे।
दादा, द्रविड़ और लक्ष्मण तो पहले से ही निशाने पर हैं और अब इस प्रदर्शन ने तो और भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। वहीं द्रविड़ ने 4 मैच में 179 रन बनाए जिसमें सर्वाधिक 68 रहे और मैदान में सिर्फ 4 कैच में उनका योगदान रहा। दादा ने 4 मैच में 132 रन बनाए, सर्वाधिक 35 रन और 2 कैच लपके। वहीं लक्ष्मण ने 4 मैच में 215 रन बनाए, सर्वाधिक 61 नाबाद और 4 कैच लपके। ये आंकड़े हैं पूरी सीरीज के। लेकिन कप्तान साहब ने तो कमाल कर दिया जहां दूसरी टीम के गेंदबाज कमाल कर गए, वहीं कुंबले ने 4 मैच में सिर्फ 11 विकेट लिए और सर्वश्रेष्ठ रहा 30 पर 3 विकेट। बल्ले से मात्र 29 रन चार मैचों में। इनसे अच्छा तो भज्जी का प्रदर्शन रहा जिन्होंने सीरीज में 20 विकेट झटके और बेस्ट रहा 102 पर 6 विकेट, एक मैच में 10 विकेट भी लिए और 77 रन भी बनाए।


क्या लगता है कि इन आंकड़ों के साथ ये 5 पांडव फिर वापसी कर पाएंगे, मुझे तो नहीं लगता कि वापसी संभव हो पाएगी। इनमें से जो भी खिलाड़ी एक सीरीज के लिए बाहर हुआ तो उस को मान लेना चाहिए कि अब टीम इंडिया में वापसी के दरवाजे उसके लिए बंद हो गए और हो सके तो फिर उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए।

आपका अपना
नीतिश राज

क्या पांडव फिर कभी एक साथ खेल पाएंगे, मुझे लगता है ‘नहीं’

श्रीलंका से सीरीज गवांने का दुख तो है पर उस से ज्यादा है पांडवों का नहीं चलना। सब से ज्यादा उम्मीदें इन से ही थीं और ये ही नहीं चले। अब एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं क्योंकि जो होना था वो होगया। हम सीरीज हार गए। पर सवाल ये हैं कि क्या ये पांडव हीं हैं इस हार के सबसे बड़े दोषी? क्या ये हीं हैं जो हैं हार के गुनहगार? भई, सबसे ज्यादा अनुभव इन के पास ही था। जब टीम देश से रवाना हो रही थी तो कप्तान कुंबले ने कहा था कि मेंडिस की काट हमारे अनुभवी बल्लेबाज ढूंढ निकालेंगे। लेकिन मेंडिस ने तो रिकॉर्ड ही बना दिया। पहली सीरीज में सबसे ज्यादा विकेट लेने का कीर्तिमान हासिल कर लिया।
कुंबले जी के दो अरमान थे कि सचिन इस टूर में लारा का रिकॉर्ड तोड़ दें लेकिन सचिन ने तो अरमानों पर ऐसा पानी फेरा कि अब कभी कुंबले अरमान ही नहीं करेंगे, और वो भी खासतौर पर सचिन से। दूसरा अरमान था कि सीरीज हम बेहतर अंतर से जीतें। लेकिन यहां पर पूरी टीम ने और बाकी बचे अनुभव ने लुटिया डूबो दी। कुंबले अब कहते फिर रहे हैं कि बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले....।
जहां तक सचिन की बात है तो सचिन एक लेजेंड हैं। उनके ऊपर पिछले समय में भी कई आरोप लगे लेकिन जब उन्होंने वापसी कि तो सबके मुंह बंद होगए। सचिन क्रिकेट मे गॉड की भूमिका रखते हैं खासकर भारत के लिए तो और ब्रैडमैन से उनकी तुलना यूं ही नहीं की जाती। लेकिन क्या सचिन की चोटें और उम्र अब उन पर हावी होने लगी हैं। दबाव जो कि धोनी की तरफ से उन पर आया है वो भी कुछ कम नहीं है। यहां पर बीसीसीआई को एक सलाह है कि एक-दो सीरीज बांग्लादेश और कीनिया के साथ रखकर सचिन का रिकॉर्ड बनावा दें और फिर सचिन को कहें की गुरू अब क्या बुढापे में भी खेलोगे, संन्यास ले लो। वैसे सचिन की किस्मत मैं ये नहीं था कि विदेशी धरती पर वो रिकॉर्ड बनाए। ऑस्ट्रेलिया के साथ होने वाली 4 टेस्ट मैचों की सीरीज में शायद वो ये रिकॉर्ड बना लें। पहला टेस्ट बैंगलोर में चिन्नास्वामी स्टेडियम में 9 अक्टूबर से 13 अक्टूबर तक होगा। भगवान ने चाहा तो इसी मैदान पर हम सचिन को ये कीर्तिमान हासिल करते देखेंगे।
दादा, द्रविड़ और लक्ष्मण तो पहले से ही निशाने पर हैं और अब इस प्रदर्शन ने तो और भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। वहीं द्रविड़ ने 4 मैच में 179 रन बनाए जिसमें सर्वाधिक 68 रहे और मैदान में सिर्फ 4 कैच में उनका योगदान रहा। दादा ने 4 मैच में 132 रन बनाए, सर्वाधिक 35 रन और 2 कैच लपके। वहीं लक्ष्मण ने 4 मैच में 215 रन बनाए, सर्वाधिक 61 नाबाद और 4 कैच लपके। ये आंकड़े हैं पूरी सीरीज के। लेकिन कप्तान साहब ने तो कमाल कर दिया जहां दूसरी टीम के गेंदबाज कमाल कर गए, वहीं कुंबले ने 4 मैच में सिर्फ 11 विकेट लिए और सर्वश्रेष्ठ रहा 30 पर 3 विकेट। बल्ले से मात्र 29 रन चार मैचों में। इनसे अच्छा तो भज्जी का प्रदर्शन रहा जिन्होंने सीरीज में 20 विकेट झटके और बेस्ट रहा 102 पर 6 विकेट, एक मैच में 10 विकेट भी लिए और 77 रन भी बनाए।
क्या लगता है कि इन आंकड़ों के साथ ये पांडव फिर वापसी कर पाएंगे, मुझे तो नहीं लगता कि वापसी संभव हो पाएगी। इनमें से जो भी खिलाड़ी एक सीरीज के लिए बाहर हुआ तो उस को मान लेना चाहिए कि अब टीम इंडिया में वापसी के दरवाजे उसके लिए बंद हो गए और हो सके तो फिर उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए।

आपका अपना


नीतिश राज

“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”