Wednesday, May 19, 2010

“वो पुरानी खिड़की”-1


अब आगे....

.....जेठ के महीने की चिलचिलाती धूप में भी वो हौसला दिखाते हुए मुझसे मिलने पहुंच ही जाती थी मेरे तपते हुए कमरे में। उसके पत्थर फेंकने पर मैं धीरे से बिना आवाज़ किए सीढ़ी नीचे उतार देता और फिर हम दोनों घंटों बैठकर बातें करते रहते थे। कभी इतिहास (history) की तारीखों में उलझते तो कभी सांख्यिकी(statistics) का कोई सवाल ऐसा पेंच फंसाता घंटों उसी में उलझ कर रह जाते।

एक रात जब मैं शंभू के साथ खाने के बाद का कोटा(सिगरेट का) खत्म करके कमरे में लौटा तो थोड़ी ही देर बाद एक पत्थर कमरे की खिड़की तक नहीं पहुंच पाया। समझ ने दिमाग को तुरंत सतर्क किया, पर इस सतर्कता में मन घबरा गया कहीं ये वो तो नहीं है। तुरंत चर-चर करती अपनी चारपाई से उठते हुए खिड़की से हाथ बाहर निकाल दिया। धीरे-धीरे आंखों को खिड़की के बाहर तक लेगया। मैं हतप्रभ था। इस समय नीलम यहां पर? जल्दी से छज्जे पर पहुंचा, नीचे वो अपनी बहन के साथ साइकिल पर खड़ी थी। उसने सिर्फ एक कागज को पत्थर पर लपेट कर छज्जे की तरफ उछाल दिया और चली गई।

उसे सांख्यिकी के उस सवाल का हल मिल गया था जिस पर आज पूरी दोपहरी हम दोनों ने माथापच्ची की थी। उस पर्चे में मेरी वो छोटी सी गलती बता दी जिसके बाद हल तुरंत निकल गया। वो जानती थी कि मैं पूरी रात इसी सवाल में लगा रहूंगा जब तक कि हल नहीं मिल जाएगा। मैं पूरी रात आंखों में ना काटूं इसलिए सिर्फ वो हल बताने इतनी रात मेरे पास आई। दीवानी थी वो, पढ़ाई की और साथ ही मेरी भी।

पर धीरे-धीरे ये मुलाकातें, ये बातें पढ़ाई तक ही नहीं रह गई थीं। कभी घर की बातें होतीं तो कभी बिल्कुल निजी। निजी कुछ इतनी कि वो बातें हम दोनों में ही हो सकती थी किसी तीसरे से नहीं। वो चोरी छिपे घर आती और हम दूसरी दुनिया में गोते लगाने लगते। अब बातों का सिलसिला दूरियों से कम होता-होता हमारी नजदीकियों में समाने लगा। वो पल, उस समय के वो पल भुलाए नहीं भूलते।.....।

                                                जारी है.....

आपका अपना
नीतीश राज

4 comments:

  1. विचारणीय प्रस्तुती /

    ReplyDelete
  2. are waah pyaar parwaan chadh raha hai...agli ka intezaar rahega...

    ReplyDelete
  3. मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

    ReplyDelete

पोस्ट पर आप अपनी राय रख सकते हैं बसर्ते कि उसकी भाषा से किसी को दिक्कत ना हो। आपकी राय अनमोल है, उन शब्दों की तरह जिनका कोईं भी मोल नहीं।

“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”