Wednesday, August 5, 2009

आज के दिन का ना खत्म होने वाला इंतजार....--2

...........मेरी चचेरी बहन, पूरे खानदान के नौ भाइयों की इकलौती बहन। इस बार सभी नौ भाइयों की कलाई सूनी.....इस बार नहीं, शायद हर बार।

कितने मजबूर होते हैं हम, कई बार कुछ भी नहीं कर पाते। सिर्फ कठपुतलियों की तरह इधर से उधर होते रहते हैं। हमारे अपने दुख के उस समंदर में पहुंच जाते हैं जहां से उन्हें वापस लेकर आपाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन लगता है। क्योंकि अन्तर्मन के पटल पर जब एक बार जख्म बन जाए तो हर हाल में साल दर साल बाद भी निशान बाकी रह जाते हैं।
घर की हालत देखते ही बज्रपात हुआ हम सभी पर। हम में सबसे छोटी, अपने तीन बच्चों के साथ सिर्फ २४ साल की उम्र में वो.....।

याद आता है....मेरे को परिवार वाले बार-बार बोलते रहे कि नौ भाइयों की एक बहन है और हम चाहते हैं कि शादी में सभी लोग मौजूद रहें। मुझे याद नहीं आ रहा कि मैं क्यों नहीं शरीक हो पाया था शादी में। मेरी बहन ने मुझसे बहुत दिनों तक बात नहीं की थी, बहुत दिन या यूं कहें कि कई महीने। फिर धीरे-धीरे समय निकला और फिर मेरा उससे मिलना हुआ और फिर जिंदगी आगे यूं ही बढ़ गई।

दो महीने पहले सुबह-सुबह एक दिन भइया का फोन आया, मैं ऑफिस में था। जैसे कि मैं पहले भी बता चुका हूं कि ऑफिस में मैं ऐसी जगह बैठता हूं वहां पर कोई फोन अटैंड तो कर सकता हैं पर बात नहीं कर सकता। भइया ने मेसिज दिया और मैं अवाक सा फोन पकड़े खड़ा रहा। मैंने तुरंत अपने रिलीवर को फोन लगाया हर समय की तरह उसने फोन नहीं उठाया। मुझे लगा कि वो फोन उठाएगा भी नहीं और ना ही कॉलबैक करेगा पर थैंक्स गॉड उसने कॉलबैक किया। मैंने उसे ख़बर बताई और उसे जल्द से जल्द ऑफिस आने को कहा। वो जैसे बैठा था वैसे ही एक घंटे बाद ऑफिस पहुंच गया, मैं इतना टेंस था कि बिना उसे धन्यवाद कहे वहां से घर के लिए रवाना हो लिया।
वो मुझसे लिपट कर मुझसे पूछती रही कि, भइया तुम्हें तो मेरे घर का पता नहीं मिलता था ना....पर आज कैसे मिल गया....। मैं टूटता जा रहा था मुझे सभी ने खड़ा किया और मैं अपनी बहन से दूर होगया।

मैं तुरंत घर पहुंचा और हम निकल पड़े अपनी बहन की ससुराल। मैं कभी गया तो था नहीं तो काफी दिक्कत हुई पर हम उनके घर पहुंच गए। घर की हालत देखते ही बज्रपात हुआ हम सभी पर। हम में सबसे छोटी, अपने तीन बच्चों के साथ सिर्फ २४ साल की उम्र में वो.....हमारे सामने बिना चूड़ियों, बिना बिंदिया, बिना साजो समान, बिना सुहाग के जमीन पर मोक्ष सी पड़ी हुई थी। मुझे मेरे परिवार में मन का बहुत सख्त माना जाता है पर जैसे ही वो मेरे सामने आई मैं वैसे ही टूट गया और काफी देर से रुका बांध बह निकला।

वो मुझसे लिपट कर, मुझसे पूछती रही कि, भइया तुम्हें तो मेरे घर का पता नहीं मिलता था ना....पर आज कैसे मिल गया....। मैं टूटता जा रहा था मुझे सभी ने खड़ा किया और मैं अपनी बहन से दूर होगया।
सब कहते थे कि कितने दूर हो जाओ, इस एक दिन जरूर बहन से मिलने आओगे पर आज.....शायद तो............।

आपका अपना
नीतीश राज

(कुछ भी जीवन में गलती हुई हो, तो माफ जरूर कर देना। तुम हमेशा ही दिल के करीब रहोगी।)

4 comments:

  1. अपने को पूर्णतः स्पष्ट नहीं पा रहा हूँ. निश्चित ही आपका दुख असीम है.

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  2. मै आपका दुःख तो महसूस कर पा रहा हूं लेकिन अपना दुःख अभिव्यक्त नही कर पा रहा हूं।

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  3. इस दुःख को समझा जा सकता है।

    रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
    विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!

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  4. बहुत ही भावपूर्ण रचना ....!!

    आँखें नम हो गयीं ...ज़िन्दगी के कुछ ऐसे हादसे गहरी चोट दे जाते हैं .....पर जब आप लोगों के घरों में झांक कर देखेगे तो पायेगे कि ये दुनियां तो दुखों से भरी है ...तब अपना दुःख हल्का महसूस होता है .....!!

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“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”