Tuesday, September 29, 2009

भारत में पाकिस्तान से ज्यादा पाकिस्तानी रहते हैं।



बहुत सोचने के बाद तकरीबन दो दिन सोचने के बाद मैंने ये फैसला किया कि इस बात को सब के साथ शेयर करूं।

हमारे देश की किस्मत ही है कि यहां रहने वाले ही उसकी पीठ में खंजर भोंकते हैं। ये हमारे देश में रहने वाले कुछ लोगों की फितरत है कि जिस थाली में खाते हैं वो उसी थाली में छेद करते हैं।

याद आता है कुछ साल पहले तक जब भारत-पाकिस्तान का मैच हुआ करता था तो सड़कें खाली हो जाया करती थीं। लोग घरों में टीवी, रेडियो से चिपककर बैठ जाया करते थे कि भारत-पाक का मैच आ रहा है। सब दिल, जज्बे और ना जाने क्या-क्या दांव पर लगा देते थे। पर इमरान खान की टीम कपिल देव और सुनील गावस्कर की टीम पर अधिकतर भारी पड़ती थी। हमारी हार होती थी तो लोगों के घरों में खाना नहीं बनता था, टीवी फोड़ दिए जाते थे, कुछ को दिल का दौरा पड़ जाया करता था, कोई खुदकुशी कर लेता था। ये सारी घटनाएं तो मैंने देखी और सुनी हैं।

याद आता है कि जब भारत की हार होती थी तो दूर-दूर तक सन्नाटा छा जाता था। कॉलोनियां-बस्तियां-गांव सब चुप हो जाते थे। पर तब भी कुछ जगह पर कुछ ऐसे लोग होते थे जिनके कदम से हर एक भारतीय आगबबूला हो जाता था।

यहां भारत हारी और कुछ इलाकों से जहां पर भी उनकी बहुलता होती थी वहां से पटाखे फोड़ने की आवाज़ें आती थी। जीत को मनाने और सब को बताने का साधन पटाखों से बेहतर कुछ नहीं होता। पर ये क्या भारत में रहकर भी कुछ लोग हैं जो कि पाकिस्तान की तरफ हैं और भारत की हार पर जश्न मना रहे हैं।

26 को भारत-पाक का मैच हुआ। मैच को पाकिस्तान की तरफ से जंग की तरह ही खेला गया और जिस बात का दावा पाक टीम के कप्तान ने किया वो कर भी दिया। अपनी गलती हो या फिर जज्बे की कमी हो जो भी मानें पर हम हार गए। मैदान में किसी एक टीम की हार और जीत तो होगी ही। कभी हम कभी वो ये सिलसिला तो बदस्तूर चलता ही रहेगा। 26 को जब भारत पाक से मैच हारा तो हमारे घर के पास ही कुछ लोगों ने जमकर पटाखे फोड़े और अपनी खुशी का इजहार किया। जिससे मैं हैरान-परेशान हूं।



क्या हर एक भारतीय को उस पाकिस्तानी की ललकार का जवाब देने के लिए नहीं खड़ा होना चाहिए। यदि मुट्ठी में कोई भी उंगली कम बंद हो तो वो मुट्ठी मजबूत नहीं रह जाती। वैसे ही गर एक भी भारतीय पाकिस्तानियों की तरह सोचता है तो मुट्ठी बंध ही नहीं पाएगी। और अगर कोई सोचता है तो बेहतर है कि वो भारत को घुन की तरह ना खाए जाकर पाकिस्तान में ही बसे अपने भाइयों के बीच



हर बार मुस्लिम होने पर परीक्षा क्यों देनी होगी? बहुत लोग ये सवाल पूछते हैं। हम तो कभी उनको पराया नहीं समझते, हम हर उस शख्स को पराया समझते हैं जो कि हमारे देश के खिलाफ हो फिर चाहे वो हिंदू हो, मुस्लिम हो, अंग्रेज हो, ईसाई हो, सिख हो। क्यों कुछ लोग ऐसे हैं जो कि भारत की हार पर खुश होते हैं? तो उन खुश होने वाले लोगों पर तो प्रश्नचिन्ह बिल्कुल जायज है।

ऐसे लोग मेरे देश मे गर हैं तो बेहतर है कि वो निकल जाएं और गर नहीं जा सकते तो बेहतरी इसी में है कि दशहरे के मौके पर रावण के साथ अपने दुर्भाव जला दें। यदि नहीं जला सकते तो रावण के साथ खुद जल जाएं। क्योंकि कोई भी भारतीय भारत की हार पर पटाखे बर्दाश्त नहीं कर सकता।

आपका अपना
नीतीश राज



Monday, September 28, 2009

ब्लॉगवाणी बंद नहीं हो सकता!


ब्लॉगवाणी बंद होगया। सुनो ब्लॉगवाणी बंद होगया।
नहीं...नहीं ये नहीं हो सकता।
नहीं, ये हो गया है देखो ये पूरा एक पन्ने का लव लैटर। जिसमें पसंद को लेकर बवाल की बात कही गई है। उस कारण से ये बंद किया गया है।

बेगम के ये कहने की देर थी कि तुरंत उठकर पूरा पन्ना एक सांस में पढ़ दिया। विश्वास ही नहीं हुआ कि हिंदी ब्लॉग का एग्रीगेटर ब्लॉगवाणी बंद होगया। क्या ये बंद हो सकता है? और क्या सिर्फ पसंद के कारण ही ऐसा किया गया है? क्या हिंदी ब्लॉग को इतनी जल्दी नजर लग जाएगी?

ब्लॉगवाणी के अनुसार कि
.....अब ब्लागवाणी को पीछे छोड़कर आगे जाने का समय आ गया है।
विदा दीजिये ब्लागवाणी को, टीम ब्लागवाणी


मैथिली जी,
मैं जब चाहता था तब आप से बात कर लेता था। जब भी कुछ दिक्कत हुई तो सीधे फोन उठाया और घुमा दिया। काफी दिन बाद किया तो अपने ब्लॉग का हवाला दिया और आपने फट से पहचान लिया। यदि कभी हेडर में कुछ गलती हो जाती थी तो आप खुद ठीक कर के बता देते थे। इसका मतलब कि आप हमारा ख्याल रखते थे। अब वो कौन रखेगा?

माना कि दुकान आपकी है। आप जब चाहें बंद कर दें और जब चाहें खोल दें। भई सिस्टम अपग्रेड करना है तो ये तो काम चलते-चलते भी हो जाएगा। इसके लिए अलविदा कहने की क्या जरूरत?

उस दुकान पर जिसके मालिक आप लोग हैं उस पर हम ब्लॉगर भाइयों का छटाक भर अधिकार तो बनता ही है। इसलिए एक इल्तजा है कि इसे चालू रखें और धीरे-धीरे अपने सिस्टम को अपग्रेड करने की जरूरत आपको महसूस होती है तो करते रहें।

यूं चंद सवालों के खड़े होजाने पर पीछे ना हटें। ये आपकी नहीं हिंदी ब्लॉग जगत और ब्लॉगवाणी की हार होगी। एग्रीगेटर को बंद करना कोई हल नहीं हुआ। और वो भी उस दिन जिस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत हुई थी। नहीं...आपको बदलना होगा अपना फैसला।


आपका ब्लॉगर दोस्त और शुभचिंतक,
नीतीश राज।

ब्लॉगवाणी की पूरी टीम और सभी ब्लॉग भाइयों को--

हेप्पी दशहरा।।

Monday, September 14, 2009

क्यों नहीं 26/11 मुंबई हमले पर पाक मंत्री की ललकार के जवाब में वन-टू-वन करते पी चिदंबरम।


हाल ही में पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्री रहमान मलिक ने इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलेआम भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम को ओपन डिबेट के लिए ललकारा। मुंबई हमलों पर बोलते हुए रहमान मलिक ने साफ तौर पर ये कहा कि 26/11 के मसले पर भारत पाकिस्तान पर दोष मढ़ना बंद करे। सबसे बड़ी बात उसमें ये कही गई कि भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम के साथ वो भारत में कहीं पर भी, पाकिस्तान या फिर किसी भी मुल्क में ये डिबेट कर सकते हैं।

चिदंबरम को चैलेज देने के अलावा भी रहमान मलिक सच से पर्दा उठाते ही रहे। जैसे, भारत ने मुंबई हमलों पर 9 फरवरी को भेजी हमारी दरख्वास्त का जवाब 20 जून को जाकर दिया जो कि बहुत देर से था और जवाब मराठी में भेजा। (कोई भी राष्ट्र किसी को जवाब अपनी क्षेत्रिय भाषा में क्यों देगा, ये इल्जाम कितना सच है ये तो मलिक जी ही बेहतर जानते हैं।) भारत ने चार्जशीट दाखिल करने में 90 दिन से भी ज्यादा का वक्त लिया वहीं हमने महज 76 दिन में इस कवायद को पूरा कर लिया। भारत कभी किसी को मास्टरमाइंड बताता है तो कभी किसी और को। हमने जकीउर रहमान लखवी को गिरफ्तार किया तो भारत हाफिज सईद को मास्टरमाइंड बताने लग गया। (क्योंकि दोनों ही इस साजिश में शामिल थे।) वहीं भारत समझौता एक्सप्रेस मामले पर सबूत साझा नहीं कर रहा जो कि बहुत अहम है। आप हमारे कोर्ट का सम्मान करो और हम आपके कोर्ट का सम्मान तो करते ही हैं। इस पर कितना सच था और कितनी बातों पर सच का पर्दा पड़ा रहा, ये हम सब बेहतर जानते हैं।

ये सारी बातें तब कही गई हैं जब कि भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम अमेरिका दौरे पर थे और अमेरिका को पाक की नियत से रूबरू कर रहे थे। पाक मीडिया ने दोनों खबरों को खूब उछाला और साथ ही भारतीय मीडिया ने भी इन खबरों को दिखाया। फिर क्या वजह है कि इस बारे में पी चिदंबरम की तरफ से या फिर भारत की तरफ से कोई भी जवाब नहीं आया। क्यों?

सबसे ज्यादा बात जो खल रही है कि एक तरफ तो कोई ये कह रहा है कि कहीं भी बात करने के लिए तैयार हैं और हम उस पर प्रतिक्रिया भी नहीं दे रहे। क्यों? कब तक पाकिस्तान गलती करते हुए भी हर बात पर हेकड़ी जमाता रहेगा। गलती करके हमें ही ललकारता रहेगा और हम शांत रहकर उन बातों का जवाब बहुत गहन विचार करके ही देते रहेंगे। कब तक इन मामलों पर भी राजनीति होती रहेगी। क्यों सामने आकर कोई भी इस बारे में जवाब नहीं दे रहा है।
अभी थोड़े दिन पहले ही भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भारत को पाकिस्तानी तालिबान की तरफ से मुंबई हमलों की तर्ज पर हमले की आशंका से आगाह किया था। उस पर रहमान मलिक का जवाब था,
"There was a statement from the PM of India that they knew there might be Bombay-like attacks replicated in India by the Pakistani Taliban. Prime Minister Sir, you are the chief executive, whatever information you have, it must have come from your Intelligence agencies, why didn't you share it with us? Why were you holding this information before the Bombay attacks? Why didn't you tell us? We are two countries we could have investigated it together. I am still ready, let’s meet."

रहमान मलिक की इतनी बातों के बाद कोई भी ये सोचने पर मजबूर हो सकता है कि भारत सिर्फ इल्जाम लगाता रहता है लेकिन कार्रवाई करने से बचता है। इसका मतलब ये हुआ कि भारत गुमराह करने की पॉलिसी अपना रहा है। पर ये पूर्ण सत्य नहीं है।

भारत कैसे अपने इंटैलिजेंस सीक्रेट किसी दूसरे देश और वो भी पाकिस्तान जैसे दुश्मन राष्ट्र के साथ शेयर कर सकता है। कैसे-कैसे करके हमारी इंटैलिजेंस एजेंसी खबरों को इक्ट्ठा करती हैं उस पर यदि भारत ये बात भी शेयर करने लग गया तो शायद जो लोग इस काम में लगे हुए हैं उनकी जान सलामत नहीं रहे। लेकिन हां, भारत ये कर सकता था कि उस तथ्यों के पुलिंदों में से कुछ तथ्यों को पाकिस्तान भेज कर ये साबित जरूर कर सकता था कि हां हमारे पास एविडेंस है, सबूत हैं।

जानते हैं कि पाक उस पर कार्रवाई नहीं करता और गर करता भी तो पहले से ही वहां से आतंकी संगठनों को हटा दिया गया जाता। आतंकवादियों को हटाने या पकड़ने के लिए पाक का एक भी सिपाही मारा नहीं जाता। आर्मी इधर होती है तो बम उधर फटता है। क्या इस के पीछे की नीतियां समझ में नहीं आती?

चीन से मिलकर पाकिस्तान की भारत के ऊपर अपना रुतबा कायम करने की कोशिश असर नहीं दिखा पाएगी। माना कि भारत हथियारों और ताकत के मामले में चीन से पीछे है पर हथियारों कि गुणवत्ता में पीछे नहीं है। भारत के पास लेटेस्ट तकनीक के हथियार हैं और वही चीन के पास हथियारों की तादाद ज्यादा है पर वो बहुत पुराने हैं। भारत का एक हथियार उनके चार के बराबर है। पर ये सत्य है कि कई जगहों पर हम चीन के पासंग भी नहीं है। जहां तक पाकिस्तान की बात की जाए तो भारत उनसे हर क्षेत्र में कहीं ज्यादा आगे है।

ध्यान तो इस बात का रखना है कि भारत में मौजूद गद्दार भारत की जमीन को नुकसान नहीं पहुंचा सकें। साथ ही उन अलगाववादियों को भी ये सोचना चाहिए कि चाहे चीन दागे या फिर पाकिस्तान, गोली, बारूद और बम की आंखें नहीं होती वो दोस्त और दुश्मन में फर्क करना नहीं जानती। यदि भारत की जमीं पर बम फटेगा तो यहां मौजूद दोस्त-दुश्मन सब के शरीर छलनी होंगे। बेहतर है कि भारत को एकजुट रहने दो और खुद भी मिल कर रहो और दुश्मनों का मिलकर मुकाबला करो।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, September 12, 2009

कल खुशी पर भारी पड़ा गम।


कहीं खुशी, कहीं गम, ये ही हाल रहा दो दिन के बारे में कहूं तो। दिल्ली में बारिश ही बारिश। हरियाणा से यमुना में पानी भी छोड़ा गया जिसके कारण दिल्ली में बाढ़ जैसे हालात हो गए हैं। पता नहीं कितने सालो बाद ऐसी बारिश हुई है। शायद 98 में दिल्ली में ऐसा ही एक बार हुआ था जब कि यमुना पुश्ता पर पानी भर गया था और दिल्ली में बाढ़ आई थी।
एक गाना हुआ करता था रिमझिम गिरे सावन....पर अब तो सावन बीत जाए और फिर रिमझिम शुरू हो जाए। ये हाल हो गया है मौसम का।

वैसे, मैं यहां पर बात क्या करने वाला था और क्या करने लग गया। कल के दिन खुशी मिली पर जब गम सामने आया तो वो खुशी पर भारी पड़ गया।

ऑफिस में इस बात का इंतजार हो रहा था कि क्या भारत आज का मैच जीत जाएगा। चार विकेट गिर चुके थे। मैं और मेरे साथ ही कुछ इस पर चर्चा भी कर रहे थे कि जब स्कोर छोटा होता है तो टीम इंडिया जरूर उतना ही मर मर कर जीतती है। ये नहीं कि शेर की तरह खेले और जल्दी जीत कर मैच को रफा-दफा करे। चार विकेट गिर चुके थे, द्रविड़ ने 65 मिनट क्रीज पर रहकर 45 गेंदों में महज 14 रन बनाए। द्रविड़ एक महान खिलाड़ी हैं पर क्यों द्रविड़ वन डे को भी टेस्ट की तरह खेलते हैं।

इस बीच एक खबर ने सब में रोमांच भर दिया। पहले था कि सीरीज जीतने पर ही टीम इंडिया नंबर वन बन पाएगी। पर अब ये खबर आई कि न्यूजीलैंड को हराने के साथ ही हम नंबर वन बन जाएंगे पर नंबर वन बने रहने के लिए कॉम्पेक कप जीतना जरूरी होगा। और थोड़ी देर बाद ही धोनी और रैना ने जीत दिला दी। धोनी और रैना दोनों की तारीफ करना चाहूंगा कि दोनों ने सूझबूझ कर बैटिंग की और अंत तक टिके रहे। आशीष नेहरा को मैन ऑफ द मैच से नवाजा गया। सचिन को सम्मान के रूप में बाइक दी गई जिसपर इस बार सचिन खुद ही बैठे धोनी को बैठने का मौका नहीं दिया।

अब बात गम की भी कर लें।

अभी ऑफिस से घर की तरफ निकले ही थे कि पता चला कि डीडी ने सेमीफाइनल और फाइनल के राइट्स खरीद लिए हैं। अब तो लगा कि वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भी भारत का झंडा ऊंचा होगा और विजेंदर अपने बाउट जीतकर फाइनल की जंग में पहुंच जाएगा।

पूरे ऑफिस में बताया गया कि रात के 1.30 बजे है बाउट। मैं घर पहुंच कर खाना पीना करके टीवी खोलकर कभी कुछ कभी कुछ देखते हुए जगने की कोशिश में लग गया। बार-बार न्यूज पर वापिस आता कि जब तक क्रिकेट का ही लुत्फ ले लिया जाए। दिल में एक इच्छा थी कि विजेंदर जीत जाए क्योंकि हाल ही में करोड़ों का मुनाफा हुआ है विजेंदर को।

इतिहास तो विजेंदर ने भी रच ही दिया है। पहली बार कोई भारतीय बॉक्सर इस ऊंचाई तक पहुंच पाया है। यदि विजेंदर जीत जाए तो अच्छा होगा क्योंकि बहुत हो लिया क्रिकेट। पर ये ही सोचते-सोचते कब नींद आगई पता ही नहीं चला। सुबह जब उठा तो तुरंत टीवी चलाया देखा तो हर न्यूज चैनल पर सिर्फ क्रिकेट ही क्रिकेट चल रहा था। लग गया कि विजेंदर का क्या हुआ। यानी हार गया विजेंदर।

जी हां, उजबेकिस्तान बॉक्सर अब्बोस अतोव जिसकी रैंक इस चैंपियनशिप में चौथी थी उसने पहली रैंक विजेदर को 7-3 से मात दे दी। जबकि पहले राउंड में 0-1 से आगे चल रहा थे विजेंदर। पर दूसरे राउंड में ज्यादा डिफेंसिव मोड विजेंदर को हार के कगार पर ले गया। और उजबेक बॉक्सर ने दूसरे राउंड में 5 अंक बटोर लिए और फिर अंतिम राउंड में तो सिर्फ खानापूर्ति ही रह गई। अतोव ने 2007 में लाइट वेट में वर्ल्ड चैंपियनशिप में फाइनल जीता था और वो भी तब जब कि वो बाउट के दौरान प्रतिद्वंदी के पंच के कारण नीचे गिर गए थे। दूसरे राउंड के बाद स्कोर 5-1 था और अंत में 7-3 से विजेंदर हार गया और मुझे लगता है कि बॉक्सिंग का फ्यूचर भी हार गया।

मैंने टीवी बंद कर दिया था। सोच रहा था कि आज भी दो मैच हैं। जहां एक जगह टीम इंडिया श्रीलंका से भिड़ेगी, वहीं दूसरी तरफ जीतेगा भी भारत और हारेगा भी भारत। अमेरिकी ओपन टेनिस चैंपियनशिप में भूपति और पेस होंगे आमने-सामने। देखते हैं कि खुशी मिलती है या फिर आज का पार्ट-2।
आपका अपना
नीतीश राज

Friday, September 11, 2009

क्यों है हमारा कानून इतना लचीला? क्यों अपील करने पर दोषी को बाइज्जत बरी कर दिया जाता है?

आश्चर्य होता है मुझे कि हमारा कानून इतना लचीला क्यों है। क्यों एक तरफ हमारा कानून एक आरोपी को दोषी ठहराकर फांसी और दूसरे ही पल उसी आरोपी को बाइज्जत बरी कर देता है। या तो पहले वाली अदालत ने गलत फैसला दिया या फिर दूसरी अदालत याने की ऊपरी अदालत ने गलत फैसला दिया। कानून के कुछ जानकार खुद इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते कि एक अदालत और दूसरी अदालत एक ही केस पर दो निर्णय कैसे सुना सकती है। वहीं दूसरी तरफ कुछ जानकार ये भी मानते हैं कि जिस तरह से केस विशेष अदालत में पेश किया गया शायद उसी तरह से हाईकोर्ट में केस पेश नहीं किया गया। साथ ही, विशेष अदालत में आरोपी के पक्ष में शायद तथ्य उतने नहीं हो जितने कि हाईकोर्ट में बाद में पेश किए गए हों।


आज नोएडा के बहुचर्चित निठारी मामले में गाजियाबाद की विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुना दिया। पंधेर के मामले में विशेष अदालत के फैसले को गलत ठहराते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंधेर को रिम्पा हल्दर मर्डर केस में बाइज्जत बरी कर दिया। रिम्पा हल्दर मर्डर केस में सारे आरोपों से पंधेर को बरी कर दिया गया और इस मामले में उसे निर्दोष साबित कर दिया। वहीं सुरेंद्र कोली की फांसी की सज़ा को बरकरार रखा गया है। जुलाई 2009 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में विशेष अदालत के फैसले के खिलाफ मोहिंदर सिंह पंधेर और सुरेंद्र कोली ने याचिका दायर की थी।


जनवरी 2007 में निठारी का ये हैवानियत से भरा वाक्या हुआ था और आईपीसी की कई धाराएं दोनों आरोपियों पर लगी थी। सीबीआई को सौंपी गई थी इस केस की फाइल। दो साल तक गाजियाबाद की विशेष अदालत में चली थी सुनवाई। सुनावई के दौरान लोगों का आक्रोश इतना ज्यादा बढ़ गया था कि लोगों ने दोनों की जमकर धुनाई की थी। फरवरी 2009 को रिम्पा हल्दर केस में मोहिंदर सिंह पंधेर और सुरेंद्र कोली को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई। पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महीने तक लगातार सुनवाई करके विशेष अदालत के फैसले को गलत ठहराते हुए पंधेर को बरी कर दिया पर कोली के आरोप बरकरार रखे।


क्या गाजियाबाद की विशेष अदालत ने भावनाओं में बहकर दोनों आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी। या क्या कारण है कि आज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंधेर को बाइज्जत बरी कर दिया। मैं कोर्ट के फैसले की अवेहलना नहीं कर रहा। पर मुझे दुख इस बात का है कि एक कोर्ट किसी एक शख्स को मुजरिम ठहरा देती है और फिर वो शख्स मुजरिम कहलाता है। पर जब वो दो उसी केस में अपील करता है तो बाइज्जत बरी कर दिया जाता है तो क्या कोई भी कानून उसके वो दो साल जो कि उसने जेल में काटे वो वापस दिला सकता है। दलील है कि पंधेर उस वक्त ऑस्ट्रेलिया में था और शायद वो बेकसूर था तो फिर उसे सज़ा ही क्यों हुई? यदि सजा हुई है तो क्या कारण है कि अब वो रिहा हो गया।

वैसे 17 मामलों में 1 में फैसला उनके पक्ष में आया है अभी तो 16 केस बाकी हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, September 10, 2009

एंबुलेंस, ट्रैफिक और जिंदगी की कश्मकश


घर की सोसायटी से निकलते ही कुछ दूरी पर बाएं होते ही ट्रैफिक से सामना हो ही जाता है। रेंगती हुई चलती गाड़ियां ऐसे जैसे कोई अजगर शिकार निगलने के बाद धीर-धीरे रेंग कर किसी सुरक्षित स्थान पर लहराकर जा रहा हो। एनएच की राह पकड़ते-पकड़ते ही कई गाड़ी वाले अपना धैर्य खो देते हैं और आगे निकलने की होड़ में वो ऐसा काम करने लग जाते हैं जिसे हम सुबह-सुबह बोहनी खराब करना कहते हैं। पर अब तो आदत सी पड़ गई है फिर भी एनएच तक पहुंचने में ही काफी वक्त निकल जाता है।
एनएच पर गाड़ियों का काफिला एक दूसरे के पीछे और उनमें से कुछ ऐसे जो इस काफिले में सब से पीछे और हसरत सबसे आगे चलने की। रास्ते में सिर्फ और सिर्फ पों....पों....पों....पों.....की आवाज़। पता नहीं क्यों सारी दुनिया हॉर्न बजाने लग जाती है जब कि जानती है कि आगे वाला भी सड़क पर अपना घर बनाने नहीं आया। वो भी मौका पाते ही आगे बढ़ेगा और यदि वो आगे नहीं बढ़ रहा तो क्या हॉर्न बजाकर आप गाड़ी के ऊपर से निकल जाएंगे। पता नहीं क्यों लोग दिमाग से ज्यादा हॉर्न का इस्तेमाल करते हैं।
पीछे से एंबुलेंस के सायरन की आती आवाज़ ने मेरे ध्यान को भंग किया। टों....टों.....टों.... टों.....की आवाज़ दूर से ही अपने लिए रास्ता मांगते हुए लगी। अपनी बाइक की सीट से मैंने सायरन को देखने की कोशिश की। वो चारों तरफ गाड़ियों से घिरा सिर्फ और सिर्फ चीख रहा था जो वो कर सकता था। याद आता है बचपन में गुरूजी कहते थे कि बेटा एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और पुलिस की गाड़ियों के लिए हमेशा रास्ता छोड़ देना चाहिए। शायद सायरन भी बार-बार बजते हुए ये ही कह रहा था कि मुझे रास्ता दो
कुछ इसी उधेड़बुन में मैं लगा हुआ था और धीर-धीरे आगे बढ़ रहा था पर एंबुलेंस को आगे बढ़ने की जगह नहीं मिल रही थी। सायरन अपनी ही आवाज़ में चिंघाड़ रहा था,....टों....टों..... टों....टों.....। आवाज़ तेज होती जा रही थी और रास्ता उतना ही सकरा।
रेड लाइट पर ट्रैफिक वालों और कुछ लोगों की मदद ने उस एंबुलेंस को निकालने की पहल की। ट्रैफिक तुरंत साफ करते हुए एंबुलेंस को निकाला गया। एंबुलेंस के निकलते ही काफी कारें एक साथ झपटीं, सब के दिमाग में ये ही चल रहा होगा कि एंबुलेंस के पीछे रहेंगे तो बिना रुकावट गंतव्य तक पहुंच जाएंगे।
मैंने अपनी बाइक की स्पीड थोड़ी तेज की और एंबुलेंस के पीछे पहुंच गया। जब रेड लाइट पर मेरे पास से गुजरी थी एंबुलेंस तो आंखों ने देखा कि उसमें एक महिला बैठी हुई थीं और ग्लूकोस स्टैंड था। जब एंबुलेंस ने मुझे क्रॉस किया तो एक हाथ ऊपर उठा और फिर नीचे गिर गया। बस। क्या चल रहा है इस एंबुलेंस में ये जानने का दिल कर गया। एंबुलेंस का ड्राइवर मरीज की हालत की गंभीरता को समझते हुए शायद 60 के ऊपर नहीं जा रहा था या फिर सड़क में हो चुके गढ्ढे उसे जाने नहीं दे रहे थे। पर सायरन अब भी उसी तेजी के साथ रास्ते के ऊपर भागता जा रहा था।
एंबुलेंस में एक लड़के पर ग्लूकोज लगा हुआ था और बार-बार लड़का अपना दूसरा हाथ ऊपर-नीचे कर रहा था। हाथ चाहे ऊपर हो या फिर नीचे बगल में बैठी महिला लगातार शून्य में देख रहीं थी। एंबुलेंस ने लेफ्ट साइड का इंडिकेटर दिया और एंबुलेंस बाएं जाने लगी, धीरे-धीरे मुझसे दूर, मेरा और उसका रास्ता जुदा हो गया था। जब तक वो मेरी आंखों से ओझल नहीं होगई मेरी आंखें उसी का पीछा करती रहीं। मुझे दाहिने मुड़ना था मैं आगे बढ़ा और फिर उसी ट्रैफिक में ये सोचते हुए गुम हो गया, क्यों हम खुद से किसी के लिए रास्ता नहीं छोड़ते, क्यों?
आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, September 5, 2009

बेगम और बेटे ने मिलकर मेरे इस ‘खास’ दिन को बेहद ‘खास’ बना दिया।

रात के बारह बजने वाले थे घर में हम सब बैठे हुए थे। मैं कंप्यूटर पर आर्टिकल लिखने में मशगूल था। बेगम बेटे के साथ पढ़ने में लगीं हुई थी। मैं बार-बार बेटे से कह रहा था कि सो जाओ कल सुबह स्कूल जाना है। पर दूसरे दिनों की तरह आज पता नहीं क्यों बेटा सोने की बात पर खुश नहीं हो रहा था।


पापा सो जाऊंगा पहले ये पेंटिंग पूरी तो कर लूं

अरे कल पूरी कर लेना फिर सुबह स्कूल जाने के लिए उठने में ना नुकुर करते हो।

ठीक है, ये पेंटिंग पूरी कर लूं फिर सो जाऊंगा।

वहीं बेगम की किताब भी आज बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। वहीं मैं अपने काम में फिर से लग गया।


ठीक बारह बजे बेटे ने अपने हाथों से बना ग्रीटिंग कार्ड मुझे दिया और मुझे विश रके याद दिलाया की आज मेरा जन्मदिन है। मेरी आंखें आश्चर्य में खुल गई कि आंखों में नींद छुपाए बेटा इस इंतजार में था कि कब बारह बजें और वो मुझे अपने हाथों से गिफ्ट दे सके। मैंने उसे गले लगा लिया उस ग्रीटिंग कार्ड पर क्या बना हुआ था और क्या लिखा हुआ था वो आप चित्रों में देख सकते हैं।



ये कलाकारी मेरे बेटे की है। इस बार नवरात्र के पहले दिन वो पांच साल का पूरा हो जाएगा। वहीं दूसरी तरफ मेरी बेगम मुग्ध-मुग्ध मुस्कुरा रहीं थीं। उन्होंने भी मुझे विश किया और फिर मैंने कंप्यूटर बंद किया और बेटा मेरे गल लगकर सो गया।


सुबह उठा तो पाया की बीच-बीच में मोबाइल बज रहा है और कुछ संदेश रात के भी थे तो अपने मित्रों की बधाई का जवाब देने लग गया। फिर फोन कॉल्स का सिलसिला शुरू हो गया। माताजी-पिताजी-भैयाजी सब से बात करने के बाद मैं सुबह के कामों को निपटा कर पूजा-पाठ किया।

मुझे सुबह क्या रात से ही लग रहा था कि आज मेरा स्पेशल दिन है। बेगम और बेटा दोनों मेरे को ये एहसास कराने में लगे हुए थे कि आज मेरा जन्मदिन है। स्कूल से आते के साथ ही बेटा जितना बार मुझे मिलता तो सिर्फ एक बात कहता पापा हैप्पी बर्थ डे


अब सरप्राइज देने की बारी बेगम की थी। जैसा कि उन्हें पता है कि बच्पन में शायद मैं चार-पांच साल का था तो किसी ने कुछ कह दिया था तो फिर पापाजी कभी केक लेकर नहीं आए। तो इस बार बेगम की तरफ से ये थी भेंट।

फिर एक शर्ट जैसी कि कभी कॉलेज टाइम में मैं पहना करता था। अंदर राउंड नैक टी-शर्ट और फिर नीचे के दो-तीन बटन लगी कॉटन की शर्ट। दोपहर को मेरा मनपसंदीदा खाना उसी तर्ज पर जिस तरह मुझे पसंद है (अब भी मुंह में पानी आ रहा है, पेट भरा हुआ है पर.....।) फिर शाम को एक चैक शर्ट दी जिस तरह की शर्ट मैं काफी दिन से सोच रहा था लेने की। इतने सरप्राइज बहुत बढ़िया, सुभानअल्लाह।

मैं इतने सरप्राइज पाकर अपने आपको किसी वीवीआईपी से कम नहीं समझ रहा था। बेगम ने अपना काम कर दिया था। मैं चने के झाड़ में चढ़ चुका था। मैंने बोला अब शाम का डिनर तुम दोनों को मैं कराऊंगा। डिनर से ज्यादा तो जो डिनर के पहले और बाद में मंगाया जाता है उसके कारण जेब ज्यादा ढीली होती है। ऐसे मौकों पर यूं जाना जरा अच्छा लगता है.....

अंत में चलते-चलते प्रीती जी (मेरा सागर) को बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने मुझे इस खास मौके पर इतनी अच्छी कविता भेंट की। मैंने तो सोचा ही नहीं था कि कोई भी ब्लॉग में मेरे जन्मदिन को यूं मना सकता है। साथ ही बी एस पाबला जी को भी धन्यवाद देना चाहूंगा जिन्होंने मेरे इस खास दिन को मेरे लिए इतना अहम बना दिया और मैंने इस बार काफी ब्लॉगर दोस्तों से बधाई पाई। आप सब का एक बार फिर से धन्यवाद कहना चाहूंगा।


आपका अपना

नीतीश राज

Friday, September 4, 2009

इन बहकते कदमों का दोषी कौन?

बेगम ने फोन पर बताया कि, ‘सोसायटी में कुछ हलचल हो रही है और शायद पुलिस भी पहुंची हुई है’। मैं सैलून में सेविंग करवा रहा था। अमूमन मैं सेविंग घर पर ही करता हूं। एक तरफ जल्दी-जल्दी सेविंग हो रही थी और दूसरी तरफ मेरे दिमाग में कई बातें चल रही थीं। सैलून से फारिक़ होकर मैं घर की तरफ दौड़ लिया। इस बीच मैंने ये काम कर दिया था कि सोसायटी में एक और शख्स को फोन पर इस बारे में जानकारी दे दी थी और कह दिया था कि थोड़ा ध्यान रखे।

सोसायटी के गेट पर पहुंचते के साथ ही लग गया कि मामला गड़बड़ है। गेट के बाहर तक आवाज़ें आ रही थीं। गेट में दाखिल होते ही गार्ड ने मुझे रोक लिया फिर पहचान करके अंदर आने दिया। मैंने इस बीच ही आधी जानकारी गार्ड से ही ले ली। गाड़ी पार्किंग में लगा रहा था तब भी कई बार आवाज़ें बहुत तेज हो जाती और फिर किसी के बीच-बचाव करने पर तेज होती आवाज़ों पर लगाम लग जाती।

जहां से आवाज़ रही थी जब उस समूह के पास पहुंचा तो अधिकतर चेहरे नए थे दो-चार लोग कुर्ते-पजामें में दिख रहे थे, बाकी सब 35-40 के बीच की उम्र के थे। उनमें से कुछ तो पुलिसवाले के साथ गेट रजिस्टर की एंट्री को चैक कर रहे थे और कुछ गार्डों से सच निकलवाने की कोशिश में जुटे हुए थे। सच इसलिए क्योंकि कई बार वो लोग ये बात कह रहे थे कि इन गार्डों को पता है सारा सच। अभी तक मेरी समझ में ये तो आ गया था कि कौन परिवार का है और कौन-कौन साथ के या फिर मित्रगण हैं उस पीड़ित परिवार के। पर ये अभी तक नहीं समझ पाया था कि मामला क्या है।

थोड़ी देर बाद सारी स्थिति साफ हो गई। हमारी सोसायटी में रहने वाले एक बिजनेसमैन का बेटा तरुण बीती रात करीब दो-तीन बजे अपने घर से भाग गया। रात एक बजे तक परिवार के साथ बैठे होने की पुष्टि पूरा परिवार कर रहा था। परिवार के मुताबिक रात में पूरे परिवार ने मिलकर एक साथ खाना खाया और फिर टीवी देखा। बिजनेसमैन होने के कारण खाना देर से ही होता था। रात को तीन बजे से पहले ही तरुण घर छोड़कर भाग गया था और जाते-जाते बाहर से घर के दरवाजे की कुंडी भी लगा गया था। इस बात की पुष्टि गेट में मौजूद गार्ड की रजिस्टर एंट्री से हुई थी कि कोई भी रात 3 बजे के बाद नहीं गया था।

वहां पर मौजूद लोगों ने ये बताया कि उसकी उम्र 14 साल की है तब तो उसके दोस्तों को और कुछ गार्डस को साथ लेकर पुलिस वहां से चली गई। शाम होते-होते सोसायटी में इसी बात की चर्चा होने लगी। तब मुझे पता चला कि ये 14 साल का लड़का वो ही है जो कि बार-बार मना करने पर भी सोसायटी में सबसे तेज पल्सर बाइक चलाता था। सोसायटी के एक सज्जन ने मुझे बताया कि उस लड़के को काफी बुरी आदतें थीं। दोस्तों ने जो पुलिस को बताया वो ये कि तरुण तो कल से कह रहा था कि वो अपने किसी दोस्त के पास पुणे या गोवा जा रहा है। कोई उसे ट्रेस ना कर सके वो अपना मोबाइल फोन भी घर पर ही छोड़ कर गया था। पुलिस तफ्तीश में लगी हुई है।

यहां पर इस 14 साल के लड़के की बात को बताने का मतलब सिर्फ ये है कि कहीं हम अपने बच्चे को छोटी सी उम्र में सारी सहुलियतें देकर उन्हें बिगाड़ तो नहीं रहे। जैसे बाइक को चलाने की उचित उम्र तो 18 साल है पर उस लड़के को देखकर लगता था कि वो इस उम्र को भी पार कर चुका है। मैंने तरुण की तस्वीर देखी तो देख कर लगा कि वो कोई 18-20 साल का लड़का है। बच्चों के मांगने पर उन्हें हमेशा पैसे पकड़ा देने कहां तक उचित है? कहीं हम खुद ही तो उनको गलत राह पर नहीं धकेल रहे? इन बहकते कदमों का दोषी कौन? माना की इस दौड़ती भागती जिंदगी में घरवालों की सारी इच्छाओं और सहुलियतों और उनकी मांगों को मानने के लिए हमेशा काम में लगे रहना क्या हम अभिभावक अपनी जिम्मेदारियों से मुंह तो नहीं मोड़ रहे? कई बार तो ये भी समझ में नहीं आता कि इसके लिए क्या करें कि जो हर मोड़ पर हम सही और सब की इच्छाओं पर खरा उतर सकें?

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, September 1, 2009

चलो देख के अच्छा लगा कि मेरे देश में भी लोग फुटबॉल के दीवाने हैं। विलेन बना हीरो।

भारत में भी लोग फुटबॉल के दीवाने हैं ऐसा लगता नहीं था पर आज लगा। ऑफिस में अधिकतर लोग टीवी से चिपके हुए थे। लग रहा था कि ये फुटबॉल का नहीं बल्कि भारत बनाम पाकिस्तान के बीच कोई क्रिकेट का मुकाबला चल रहा हो।


दिल्ली में हो रहे नेहरू कप को देखने के लिए हजारों फुटबॉल प्रेमी अंबेडकर स्टेडियम पहुंचे। खचाखच भरे स्टेडियम में पिछली बार के चैंपियन भारत का मुकाबला पिछली ही बार की रनर अप सीरीया से था। 29 अगस्त, 2007 को भारत ने सीरीया को 1-0 से हराकर पहली बार नेहरू कप अपने नाम किया था। 31 अगस्त, 2009 को भारत ने फिर से सीरीया को हराकर दूसरी बार लगातार नेहरू कप पर कब्जा जमाया।


सीरीया की रैंकिंग पर यदि गौर करें तो वो भारत से 61 पायदान ऊपर है। जहां भारत की रैंकिंग श्रीलंका के बराबर 156 है वहीं सीरीया की रैंकिंग 95 है। नेहरू कप से पहले भारत के कप्तान और स्ट्राइकर बाइचंग भूटिया ने कप को फिर से अपने कब्जे में करने की बात कही थी और वो कर दिखाया।


लीग मैचों में सीरीया ने एक भी मैच नहीं गंवाया। वहीं भारत शुरूआती मुकाबला लेबनान से और लीगा का अंतिम मैच सीरीया से हारा। माना कि सीरीया के खिलाफ लीग मैच के दौरान भारत के चार स्टार खिलाड़ी नहीं खेल रहे थे। फाइनल में शुरूआत से ही दोनों टीमें एक दूसरे को टक्कर दे रही थी। सीरीया के लंबे कद काठी के खिलाड़ियों से पूरी तरह से कोच हॉटन की टीम टक्कर ले रही थी। 90 मिनट के बाद तक दोनों टीमें एक दूसरे पर गोल नहीं दाग सकी। इस 90 मिनटों में भारत के हाफ में बॉल ज्यादा रही पर फिर भी भारत के डिफेंडरों ने जान लगाकर बॉल को गोल के अंदर नहीं पहुंचने दिया। वहीं भारत की तरफ से गोल में ज्यादा बार निशाना साधा गया।


फिर मिला 30 मिनट के एक्स्ट्रा टाइम। अंतिम दस मिनटों के खेल में गर्मागर्मी भी कई बार हुई। भूटिया को गेंद लेजाते समय सीरीया के एक खिलाड़ी ने पीछे से जानबूझकर गिरा दिया। 114वें मिनट में भारत की तरफ से 8 नंबर की जर्सी पहने रेनेडी सिंह ने फ्री हिट ली। दाईं की तरफ से गेंद घूमी और फिर 5 खिलाड़ी की दीवार को झांसा देते हुए बाएं की तरफ घूमते हुए फुटबॉल गोलपोस्ट के अंदर समा गई। इस शानदार शॉट ने मुझे वर्ल्ड कप में बेखम की शॉट की याद दिला दी। भारत को बढ़त मिल चुकी थी। पर मैच की सीटी बजने से ठीक पहले सीरीया के ड्याब ने हेडर से गोल उतार दिया और एक्स्ट्रा टाइम के बाद स्कोर था 1-1। अब फैसला पेनेल्टी शूटआउट से होना था।


अब दारोमदार था भारत के गोलकीपर के ऊपर। उस गोलकीपर के ऊपर जिसे कभी कोलकाता का कोई भी क्रिकेट क्लब लेने से मना कर देता था क्योंकि इस शख्स के ऊपर कई बार इल्जाम भी लगे थे। उन इल्जामों के बारे में आज भी सुब्रतो पाल बात नहीं करते। जहां तक मुझे याद आता है 5 दिसंबर, 2004 को सुब्रतो पाल शायद वो ही गोलकीपर थे जिससे टक्कर लगने के बाद विपक्षी टीम के एक खिलाड़ी की मौत हो गई थी। उस खिलाड़ी का नाम था क्रिस्टियानो जूनियर। पाल को दो महीने के लिए सस्पेंड कर दिया गया था। आज वो ही विलेन हीरो बन गया।


भारत की तरफ से पहली पेनेल्टी में क्लाइमेक्स ने गोल दाग दिया। सीरीया के राजा राफे ने गोल बराबर कर दिया। पर भारत की तरफ से फील्ड में एकमात्र गोल करने वाले रेनेडी सिंह की बॉल गोलपोस्ट पर जा लगी और मिस हो गई। पर सुब्रतो पाल ने सीरीया के अयान की गेंद को रोक कर मामला फिर से पटरी पर ला दिया।


दिल्ली के छेत्री ने भारत को लीड दिला दी वहीं सीरीया के अहमद हज की गेंद को कमाल की गोलकीपरिंग का नमूना दिखाते हुए उसे बाएं हाथ से रोक दिया। और फिर भारत के डयास ने कोई गलती नहीं की बढ़त को और आगे बढ़ाने में।


यदि ये गोल सीरीया नहीं कर पाता तो वो मैच हार जाता। इस बार गोलकीपर कप्तान बलहउस ने हिट ली और गोल। भारत के मेहराजुद्दीन अब जीत का गोल दागने गए पर चूक गए। वहीं सीरीया के अब्दुल फतह ने गोल दाग दिया और स्कोर बराबर होगया।


अब बारी थी स्डन डैथ की। भारत की तरफ से अनवर ने गोल दाग दिया और जोश की लहर पूरे स्टेडियम में गूंज गई। निडर और कूल लग रहे भारत के गोलकीपर ने जाकर गोलपोस्ट संभाला और सीरीया के अलाटोउनी ने किक ली और उस ऊपर उठती बॉल को सुब्रतो पाल ने गोलपोस्ट के ऊपर से बाहर का रास्ता दिखा दिया। और भारत जीत गया।


मैन ऑफ द मैच के अवॉर्ड से भारत के गोलकीपर सुब्रतो पाल को नवाजा गया और मैन ऑफ द टूर्नामेंट बाइचंग भूटिया को दिया गया।


दिल्ली के खचाखच भरे अंबेडकर स्टेडियम में चक दे गूंज उठा। देख कर अच्छा लगा कि चलो भारतीय फुटबॉल के भी चाहने वाले हैं वो अभी मरी नहीं है यानी अभी इसे आगे बढ़ना है।

आपका अपना

नीतीश राज

“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”