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Friday, August 19, 2011

’हमें भूलने की बीमारी है।‘


बहुत लोगों कह रहे हैं कि अन्ना का ये अनशन एक ब्लैकमेलिंग है। अन्ना सरकार को ब्लैकमेल कर रहे हैं। साथ ही अरविंद केजरीवाल का एक कमेंट, जनतंत्र में जनता की तानाशाही को ही जनतंत्र कहते हैं। डायलॉग था, अच्छा लगना ही था।

हमारे घर में घुसकर 164 से ज्यादा लोगों को मार देना और उस कातिल की हिफाजत के लिए करोड़ों खर्च करना, किसी लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी है। उन 164 लोगों के परिवार से पूछो कि वो क्या चाहते हैं और पूछो 300 से ज्यादा लोगों से जो उस हमले में घायल हो गए। हमें भूलने की बीमारी है

मैं इस अनशन को तानाशाही नहीं मानता, जब पानी सर से ऊपर चला जाता है तो ऐसी क्रांति होती है। सरकार को बताने के लिए कि अपनी मनमानी मत करो। जनता ही यहां की सिकंदर है।

वहीं मैं अपने उन दोस्तों से पूछना चाहता हूं कि जब सरकार किसी काम को करने की पहल ना करे। तब जनता उस काम को खत्म करने के लिए कदम आगे बढ़ाए तो क्या गलत है। लोग कह रहे हैं कि अन्ना का तरीका गलत है पर मैं कहता हूं कि इस तरीके में बुराई क्या है। सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठा रही और जो उठा रही है वो नाकाफी हैं। जिन पर लगाम लगाने की जरूरत है उन पर लगाम नहीं लगा रही तो सरकार की ऐसी कोशिशों का क्या फायदा? वो तो करप्शन को ही बढ़ावा दे रहे हैं।

लोग कह रहे हैं, हमारे देश में संसद है और संसद से बड़ी कोई चीज नहीं। हम भी कहते हैं कि हां संसद में ही लोकपाल बिल बने पर वो जन लोकपाल बिल हो। उस बिल में सांसदों, नेताओं और दबंग लोगों को रियायत ना मिले।

संसद के नुमाइंदे बनाएंगे लोकपाल। बनाओ, किस ने मना किया है। पर उस बिल से हमें शर्मिंदा ना होना पड़े। जैसे कि नोट फॉर वोट केस में होना पड़ा था। उन सांसदों को जनता ने ही चुना था। जिनको आज एतराज हो रहा है उन्होंने सांसदों को बड़ा भलाबुरा कहा था। जानता हूं कि हमें भूलने की बीमारी है

सरकार के मनीष तिवारी अन्ना पर आरोप लगाते रहे तब लोगों को ये क्यों नहीं लग रहाकि सरकार गलत कर रही है। सावंत कमिशन का हवाला देते हुए मनीष तिवारी ने तो अन्ना को सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी तक कह डाला। तब किसी ने 74 साल के उस शख्स के बारे में, जिसे अन्ना कहते हैं, नहीं सोचा। सरकार का मतलब साफ था कि आप अनशन करोगे या सरकार के खिलाफ बोलोगे तो हम आपके ऊपर इल्जाम लगाएंगे। इसे आप क्या कहेंगे भाईचारा’?

आज ऐसा जनसैलाब उमड़ा है वो टीम इंडिया के वर्ल्ड कप जीतने के बाद भी नहीं देखा गया था। लोग चल रहे हैं पानी में भीग कर साथ दे रहे हैं। आप भी साथ दो अन्ना का ना सही पर भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए आगे आओ। जब हम सुधरेंगे तब सिस्टम सुधरेगा। 
अब भी सोए रहे तो फिर कब जागोगे?

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, September 10, 2009

एंबुलेंस, ट्रैफिक और जिंदगी की कश्मकश


घर की सोसायटी से निकलते ही कुछ दूरी पर बाएं होते ही ट्रैफिक से सामना हो ही जाता है। रेंगती हुई चलती गाड़ियां ऐसे जैसे कोई अजगर शिकार निगलने के बाद धीर-धीरे रेंग कर किसी सुरक्षित स्थान पर लहराकर जा रहा हो। एनएच की राह पकड़ते-पकड़ते ही कई गाड़ी वाले अपना धैर्य खो देते हैं और आगे निकलने की होड़ में वो ऐसा काम करने लग जाते हैं जिसे हम सुबह-सुबह बोहनी खराब करना कहते हैं। पर अब तो आदत सी पड़ गई है फिर भी एनएच तक पहुंचने में ही काफी वक्त निकल जाता है।
एनएच पर गाड़ियों का काफिला एक दूसरे के पीछे और उनमें से कुछ ऐसे जो इस काफिले में सब से पीछे और हसरत सबसे आगे चलने की। रास्ते में सिर्फ और सिर्फ पों....पों....पों....पों.....की आवाज़। पता नहीं क्यों सारी दुनिया हॉर्न बजाने लग जाती है जब कि जानती है कि आगे वाला भी सड़क पर अपना घर बनाने नहीं आया। वो भी मौका पाते ही आगे बढ़ेगा और यदि वो आगे नहीं बढ़ रहा तो क्या हॉर्न बजाकर आप गाड़ी के ऊपर से निकल जाएंगे। पता नहीं क्यों लोग दिमाग से ज्यादा हॉर्न का इस्तेमाल करते हैं।
पीछे से एंबुलेंस के सायरन की आती आवाज़ ने मेरे ध्यान को भंग किया। टों....टों.....टों.... टों.....की आवाज़ दूर से ही अपने लिए रास्ता मांगते हुए लगी। अपनी बाइक की सीट से मैंने सायरन को देखने की कोशिश की। वो चारों तरफ गाड़ियों से घिरा सिर्फ और सिर्फ चीख रहा था जो वो कर सकता था। याद आता है बचपन में गुरूजी कहते थे कि बेटा एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और पुलिस की गाड़ियों के लिए हमेशा रास्ता छोड़ देना चाहिए। शायद सायरन भी बार-बार बजते हुए ये ही कह रहा था कि मुझे रास्ता दो
कुछ इसी उधेड़बुन में मैं लगा हुआ था और धीर-धीरे आगे बढ़ रहा था पर एंबुलेंस को आगे बढ़ने की जगह नहीं मिल रही थी। सायरन अपनी ही आवाज़ में चिंघाड़ रहा था,....टों....टों..... टों....टों.....। आवाज़ तेज होती जा रही थी और रास्ता उतना ही सकरा।
रेड लाइट पर ट्रैफिक वालों और कुछ लोगों की मदद ने उस एंबुलेंस को निकालने की पहल की। ट्रैफिक तुरंत साफ करते हुए एंबुलेंस को निकाला गया। एंबुलेंस के निकलते ही काफी कारें एक साथ झपटीं, सब के दिमाग में ये ही चल रहा होगा कि एंबुलेंस के पीछे रहेंगे तो बिना रुकावट गंतव्य तक पहुंच जाएंगे।
मैंने अपनी बाइक की स्पीड थोड़ी तेज की और एंबुलेंस के पीछे पहुंच गया। जब रेड लाइट पर मेरे पास से गुजरी थी एंबुलेंस तो आंखों ने देखा कि उसमें एक महिला बैठी हुई थीं और ग्लूकोस स्टैंड था। जब एंबुलेंस ने मुझे क्रॉस किया तो एक हाथ ऊपर उठा और फिर नीचे गिर गया। बस। क्या चल रहा है इस एंबुलेंस में ये जानने का दिल कर गया। एंबुलेंस का ड्राइवर मरीज की हालत की गंभीरता को समझते हुए शायद 60 के ऊपर नहीं जा रहा था या फिर सड़क में हो चुके गढ्ढे उसे जाने नहीं दे रहे थे। पर सायरन अब भी उसी तेजी के साथ रास्ते के ऊपर भागता जा रहा था।
एंबुलेंस में एक लड़के पर ग्लूकोज लगा हुआ था और बार-बार लड़का अपना दूसरा हाथ ऊपर-नीचे कर रहा था। हाथ चाहे ऊपर हो या फिर नीचे बगल में बैठी महिला लगातार शून्य में देख रहीं थी। एंबुलेंस ने लेफ्ट साइड का इंडिकेटर दिया और एंबुलेंस बाएं जाने लगी, धीरे-धीरे मुझसे दूर, मेरा और उसका रास्ता जुदा हो गया था। जब तक वो मेरी आंखों से ओझल नहीं होगई मेरी आंखें उसी का पीछा करती रहीं। मुझे दाहिने मुड़ना था मैं आगे बढ़ा और फिर उसी ट्रैफिक में ये सोचते हुए गुम हो गया, क्यों हम खुद से किसी के लिए रास्ता नहीं छोड़ते, क्यों?
आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, September 1, 2009

चलो देख के अच्छा लगा कि मेरे देश में भी लोग फुटबॉल के दीवाने हैं। विलेन बना हीरो।

भारत में भी लोग फुटबॉल के दीवाने हैं ऐसा लगता नहीं था पर आज लगा। ऑफिस में अधिकतर लोग टीवी से चिपके हुए थे। लग रहा था कि ये फुटबॉल का नहीं बल्कि भारत बनाम पाकिस्तान के बीच कोई क्रिकेट का मुकाबला चल रहा हो।


दिल्ली में हो रहे नेहरू कप को देखने के लिए हजारों फुटबॉल प्रेमी अंबेडकर स्टेडियम पहुंचे। खचाखच भरे स्टेडियम में पिछली बार के चैंपियन भारत का मुकाबला पिछली ही बार की रनर अप सीरीया से था। 29 अगस्त, 2007 को भारत ने सीरीया को 1-0 से हराकर पहली बार नेहरू कप अपने नाम किया था। 31 अगस्त, 2009 को भारत ने फिर से सीरीया को हराकर दूसरी बार लगातार नेहरू कप पर कब्जा जमाया।


सीरीया की रैंकिंग पर यदि गौर करें तो वो भारत से 61 पायदान ऊपर है। जहां भारत की रैंकिंग श्रीलंका के बराबर 156 है वहीं सीरीया की रैंकिंग 95 है। नेहरू कप से पहले भारत के कप्तान और स्ट्राइकर बाइचंग भूटिया ने कप को फिर से अपने कब्जे में करने की बात कही थी और वो कर दिखाया।


लीग मैचों में सीरीया ने एक भी मैच नहीं गंवाया। वहीं भारत शुरूआती मुकाबला लेबनान से और लीगा का अंतिम मैच सीरीया से हारा। माना कि सीरीया के खिलाफ लीग मैच के दौरान भारत के चार स्टार खिलाड़ी नहीं खेल रहे थे। फाइनल में शुरूआत से ही दोनों टीमें एक दूसरे को टक्कर दे रही थी। सीरीया के लंबे कद काठी के खिलाड़ियों से पूरी तरह से कोच हॉटन की टीम टक्कर ले रही थी। 90 मिनट के बाद तक दोनों टीमें एक दूसरे पर गोल नहीं दाग सकी। इस 90 मिनटों में भारत के हाफ में बॉल ज्यादा रही पर फिर भी भारत के डिफेंडरों ने जान लगाकर बॉल को गोल के अंदर नहीं पहुंचने दिया। वहीं भारत की तरफ से गोल में ज्यादा बार निशाना साधा गया।


फिर मिला 30 मिनट के एक्स्ट्रा टाइम। अंतिम दस मिनटों के खेल में गर्मागर्मी भी कई बार हुई। भूटिया को गेंद लेजाते समय सीरीया के एक खिलाड़ी ने पीछे से जानबूझकर गिरा दिया। 114वें मिनट में भारत की तरफ से 8 नंबर की जर्सी पहने रेनेडी सिंह ने फ्री हिट ली। दाईं की तरफ से गेंद घूमी और फिर 5 खिलाड़ी की दीवार को झांसा देते हुए बाएं की तरफ घूमते हुए फुटबॉल गोलपोस्ट के अंदर समा गई। इस शानदार शॉट ने मुझे वर्ल्ड कप में बेखम की शॉट की याद दिला दी। भारत को बढ़त मिल चुकी थी। पर मैच की सीटी बजने से ठीक पहले सीरीया के ड्याब ने हेडर से गोल उतार दिया और एक्स्ट्रा टाइम के बाद स्कोर था 1-1। अब फैसला पेनेल्टी शूटआउट से होना था।


अब दारोमदार था भारत के गोलकीपर के ऊपर। उस गोलकीपर के ऊपर जिसे कभी कोलकाता का कोई भी क्रिकेट क्लब लेने से मना कर देता था क्योंकि इस शख्स के ऊपर कई बार इल्जाम भी लगे थे। उन इल्जामों के बारे में आज भी सुब्रतो पाल बात नहीं करते। जहां तक मुझे याद आता है 5 दिसंबर, 2004 को सुब्रतो पाल शायद वो ही गोलकीपर थे जिससे टक्कर लगने के बाद विपक्षी टीम के एक खिलाड़ी की मौत हो गई थी। उस खिलाड़ी का नाम था क्रिस्टियानो जूनियर। पाल को दो महीने के लिए सस्पेंड कर दिया गया था। आज वो ही विलेन हीरो बन गया।


भारत की तरफ से पहली पेनेल्टी में क्लाइमेक्स ने गोल दाग दिया। सीरीया के राजा राफे ने गोल बराबर कर दिया। पर भारत की तरफ से फील्ड में एकमात्र गोल करने वाले रेनेडी सिंह की बॉल गोलपोस्ट पर जा लगी और मिस हो गई। पर सुब्रतो पाल ने सीरीया के अयान की गेंद को रोक कर मामला फिर से पटरी पर ला दिया।


दिल्ली के छेत्री ने भारत को लीड दिला दी वहीं सीरीया के अहमद हज की गेंद को कमाल की गोलकीपरिंग का नमूना दिखाते हुए उसे बाएं हाथ से रोक दिया। और फिर भारत के डयास ने कोई गलती नहीं की बढ़त को और आगे बढ़ाने में।


यदि ये गोल सीरीया नहीं कर पाता तो वो मैच हार जाता। इस बार गोलकीपर कप्तान बलहउस ने हिट ली और गोल। भारत के मेहराजुद्दीन अब जीत का गोल दागने गए पर चूक गए। वहीं सीरीया के अब्दुल फतह ने गोल दाग दिया और स्कोर बराबर होगया।


अब बारी थी स्डन डैथ की। भारत की तरफ से अनवर ने गोल दाग दिया और जोश की लहर पूरे स्टेडियम में गूंज गई। निडर और कूल लग रहे भारत के गोलकीपर ने जाकर गोलपोस्ट संभाला और सीरीया के अलाटोउनी ने किक ली और उस ऊपर उठती बॉल को सुब्रतो पाल ने गोलपोस्ट के ऊपर से बाहर का रास्ता दिखा दिया। और भारत जीत गया।


मैन ऑफ द मैच के अवॉर्ड से भारत के गोलकीपर सुब्रतो पाल को नवाजा गया और मैन ऑफ द टूर्नामेंट बाइचंग भूटिया को दिया गया।


दिल्ली के खचाखच भरे अंबेडकर स्टेडियम में चक दे गूंज उठा। देख कर अच्छा लगा कि चलो भारतीय फुटबॉल के भी चाहने वाले हैं वो अभी मरी नहीं है यानी अभी इसे आगे बढ़ना है।

आपका अपना

नीतीश राज

Saturday, August 15, 2009

रात की काली चादर, वो घुप अंधेरा और वो कमरा और उसमें टिमटिमाती बत्तियां-3

अब आगे...
हमने टाइगर बीयर ऑर्डर की और उसी काउंटर पर एक कौना पकड़ लिया और हल्के-हल्के कदमों से थिरकते रहे पर सिर्फ जब कि कोई हमें देखता तब वर्ना पब कल्चर।
हमारे दोस्तों में जिनके साथ उनकी बैटर हाफ थीं वो लगे थिरकने। उस पब में धीमी लाइट पर लाउड म्यूजिक और टेबल चेयर लगा हुआ था। लग ऐसा रहा था कि रात 9 बजे तक वो रेस्टोरेंट कम बार रहता होगा और फिर पब में तब्दील हो जाता होगा।

पब में अधिकतर १६ से लेकर २५ साल के रहे होंगे अधिक से अधिक ३० के पार का कोई नहीं होगा हमें चंद को छोड़कर। अधिकतर नई जमात की पौध लग रहे थे। चहरे पर बाल आए नहीं थे और मजा लेने में लगे थे कॉकटेल का। ऐसा लग रहा था कि सब के पास इफरात पैसा हो। एक शख्स सिर्फ खड़ा-खड़ा हिल रहा था और उसने इतने टाइट कपड़े पहने थे कि लड़कियां भी पीछे रह जाएं। मैं उसे कतई डांस नहीं कहता वो दो पैग अंदर करता चुसकियां ले-ले कर और फिर लग जाता हिलने। उनके साथ जो बंदियां थी वो डांस कर रहीं थीं।

वहीं दूसरी तरफ १८-१९ साल के एक लड़के और लड़की मैं कॉम्पटीशन हो गया। भरे गिलास को सर पर रख कर कौन अधिक देर तक डांस कर सकता है? यहां म्यूजिक शुरू हुआ ‘....नशा शराब में होता तो नाचती बोतल....’। वहां लगे वो दोनों डांस करने और लड़की ने राजस्थानी फोक डांस करना शुरू किया तो लड़का उसी तर्ज पर उसको फॉलो करता रहा। दोनों बहुत अच्छा डांस कर रहे थे सभी उन्हें ही देख रहे थे। जब लोग ताली के साथ उन दोनों का हौसला बढ़ाने लगे तो एक लड़का और लड़की जो कि बहुत देर से कोने में रसपान कर रहे थे डिस्टर्ब हुए और खाने खाते वक्त यदि कंकड़ आ जाए तो जैसा बुरा मुंह कोई बना सकता है उस मुंह के साथ दोनों उनको देखने लगे। गाना खत्म होते होते लड़की का भरा जाम उसके सर से सरका और झट से उसने उसे कैच किया और वहां लड़की की जीत में तालियां और तेजी से बज उठीं।

उस शो के खत्म होते के साथ ही सभी अपने-अपने काम में लग गए और वो जोड़ा सड़ा सा मुंह हटाकर अच्छे मुंह के साथ एक दूसरे के मुंह से.....। मैंने गौर किया तो थोड़ी देर तक तो मुझे ये ही समझ नहीं आया कि उस लड़की ने पहना क्या हुआ है। मैंने ज्यादा दिमाग खर्च नहीं किया क्योंकि अब उन दोनों के पास से आंख हटा ही लेना बेहतर था क्योंकि दोनों के हाथ अब हदें पार करने लग गए थे। वो भी समझ गए और थोड़ा डार्क में चले गए। वहां पता चल रहा था कि कोई है पर कौन है और क्या कर रहा है ये पता नहीं चल रहा था।

तभी एक जोड़ा मेरे सामने से गुजरा यदि रेलवे स्टेशन पर दोनों होते तो कोई शायद उन्हें भीख में कपड़े ही दान कर देता। लड़के ने और लड़की ने दोनों ने शायद सिर्फ दिखाने के लिए ही कपड़े पहने थे। कुछ ऐसे लोग भी थे जो कि पूरे कपड़े पहने हुए थे पर उन्होंने शायद २१-२२ को पार कर लिया था। मैं दंग था।

मेरी बीयर खत्म होने वाली ही थी और तभी बार बंद कर दिया गया। अब किसी को दारू नहीं मिलेगी। मैंने अपने दोस्त से पूछा कि पेमेंट कर दी? उसने बताया कि क्रैडिट कार्ड बारटेंडर के पास ही पड़ा हुआ है। तब मैंने देखा कि करीब ४५-५० कार्ड रखे हुए थे एक ग्लास के ऊपर और उनके नीचे आपका बिल। जब बिल आया तो मैंने यूं ही जानने के लिए ये देखा कि एक बीयर की कीमत क्या पड़ी है। जो एक बीयर बाहर शायद ३०-४० की मिल जाएगी वो २५० की पड़ी।

हम चलने को तैयार हो रहे थे। वो टाइट कपड़े वाला बंदा अभी भी हिल रहा था साथ ही चुसकियां ले रहा था और उसकी बंदी अभी भी डांस कर रही थी पसीने में तरबतर। सर पर ग्लास बैलेंस करने वाले दोनों हाथ में हाथ डाले कर अपनी चेयर से अपने दोस्तों के साथ खड़े हो गए। तभी उन लोगों को क्रॉस किया उन दोनों ने जो कॉर्नर में रसपान कर रहे थे। लड़का रुका और बार टेंडर से कुछ कहने लगा। मुझे लड़की को देखने का मौका मिला मैं जानना चाहता था कि उसने क्या पहना है। पर अब भी निराश ही हुआ क्योंकि लाइट और डिम कर दी गई। मेरे दोस्त ने मेरा हाथ पकड़ा और बाहर की तरफ खींचने लगा।

पब कल्चर में हमारा इंट्रो उस पब की रीत या रिवाज नहीं था। ऐसा नहीं था कि ये उनकी कर्टसी थी वो तो हमारे उस फ्रेंड का कमाल था जिसने उसमें हमें एंट्री दिलाने के बाद उसके मालिक जो कि उसका दोस्त था उससे स्पेशल ट्रीटमेंट मांगा था। जो कि ये पार्टी उस जोड़े के लिए उसकी तरफ से गिफ्ट हो जाए। ये बात मुझे वहां से निकलते वक्त पता चली थी जब कि उस पब का मालिक हमें छोड़ने नीचे तक आया। उसने मेरे दोस्त के आइडिए की तारीफ की और मुझे उस बात का पता चला। मैंने वहां पर उसका और उसके दोस्त यानी पब के मालिक का शुक्रिया अदा किया और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया।

दुकानें लगभग बंद हो चुकी थी एक पान की दुकान खुली थी जो कि बंद होने ही वाली थी उसमें से एक मालबोरो लाइट लेकर सुलगाई और पान मसाला लेकर आगे बढ़ गया। पार्किंग में पहुंचा तो सिगरेट के चंद कश ले चुका था काफी दिनों के बाद पी थी सिगरेट। सिगरेट की बदबू बीयर की बदबू पर भारी पड़ती है और उपर से पान मसाला तो कोई एक बार में ये नहीं जान सकता कि मैंने थोड़ी बीयर पी रखी है। चारों तरफ नजर दौड़ाई तो कोई पुलिस वाला मौजूद नहीं, दूर-दूर तक नहीं। मैंने सिगरेट फेंकी और गाड़ी में बैठ गया।

थोड़ी देर में ही मेरी गाड़ी घर के रास्ते पर दौड़ चली। पान मसाला खाते हुए मेरे दिमाग में कई सवाल दौड़ रहे थे। क्या पब से हमारी नई जेनरेशन के कदम बहक तो नहीं रहे। जितने भी फैशन शो में पारदर्शी कपड़े देखे हैं मैंने यहां पर देखे। शायद उस लड़की ने भी इतना पारदर्शी पहन रखा था और इतना छोटा कि सब कुछ दिख रहा था। वो सारे कपड़े शायद यहां पर चलते हैं। कुछ इतना पीजाते हैं कि फिर उनको गाड़ी तक पहुंचाने के लिए भी बाउंसर की जरूरत पड़ती है। ऐसा सिर्फ लड़कों के साथ ही नहीं लड़कियों के साथ भी होता है। सही जगह पर दिमाग ना लगा कर वो नई पौध अपना आगे आने वाला कल ही खराब कर रही है। पर शायद पब में आने वाली नेक्स्ट जेनरेशन का कितना हिस्सा होगी शायद कुछ फीसदी और ये ही नेक्स्ट जेनरेशन नहीं है। गाड़ी घर की पार्किंग में लगाकर मैंने मोबाइल देखा तो समय रात के ३.४० बजा रहा था, घर की डोर बैल बजाने के लिए उठा हाथ वापस नीचे आगया और सोने के लिए मैंने वापिस गाड़ी का रुख किया।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, August 14, 2009

रात की काली चादर, वो घुप अंधेरा और वो कमरा और उसमें टिमटिमाती बत्तियां-2

अब उससे आगे...
मुझे रास्ता पता नहीं था तो मैं अपने उस दोस्त की कार के पीछे लग लिया जिसने पब का आइडिया दिया था। वो शूमाकर का भाई था पिछले जन्म में शायद, इतनी तेज गाड़ी मैंने कभी नहीं चलाई। जिमखाना से हम साकेत करीब १० मिनट के अंतराल में ही पहुंच गए। पर हमारे बाकी साथी १०-१५ मिनट बाद पहुंचे। हमने गाड़ी लगाई और हमारी नजर वहां रास्ते पर मौजूद पुलिस के दस्ते पर पड़ी जिन्होंने पब के ठीक २० मीटर की दूरी पर ही बैरियर लगा रखा था और वो चैक कर रहे थे कि कोई पी-कर तो ड्राइव नहीं कर रहा। अब सोचने वाली बात थी कि पब में से कोई सूफी तो निकलेगा नहीं पर चलो देखा जाएगा जब वापसी करेंगे।

हम सब साथ-साथ चल दिए पब की ओर। ऐसा लग रहा था कि सब हमें रास्ता देते जा रहे हैं जैसे कि कोई वीवीआईपी आ रहे हों। हम धड़ धड़ाते हुए ऊपर चढ़ने लगे। तभी नीचे ही खड़े चार बॉक्सरों ने हमें अंदर जाने से रोक दिया। हमने उसे आगे किया जिसने पब के मालिक से बात की थी उसने अपना रिफरेंस दिया और खबर वॉकी टॉकी के जरिए ऊपर तक पहुंचाई गई। करीब एक मिनट के अंतराल के बाद हमें ग्रीन सिग्नल मिल गया।

हमने जैसे ही ऊपर जाने के लिए सीढ़ी पर पैर रखा कि तभी लाइट चली गई, म्यूजिक बंद और इमरजैंसी लाइट ऑन और ऊपर भी ८-१० बॉक्सर। हमने फिर से उसी ग्रीन सिग्नल को आगे कर दिया। पर यहां पर एक बॉक्सर ने हमारे उस दोस्त को अपनी मंगेतर के साथ आगे बुलाया जिसकी सगाई हुई थी। वो आगे आया और फिर उसने हमें पीछे लाइन से ऐसे खड़ा किया जैसे कि एक साथ सभी गेट के अंदर चले जाएं।

दरवाजा खुला और एक स्पॉट लाइट हमारे दोस्त और उसकी मंगेतर के ऊपर पड़ी। टिमटिमाती लाइट के बीच खचाखच भरे उस कमरे में तालियों और कॉगरेट्स की आवाज़ गूंज गई। यहां हमने भी हाथ उठाकर तालियां बजाई अब लाइट हमारे ऊपर भी थोड़ी पड़ रही थी हम कमरे में दाखिल हो चुके थे और हमारे पीछे दरवाजा बंद और फिर कान फाड़ू म्यूजिक बजने लगा। वेलकम टू पब कल्चर।

हम पब में घुस चुके थे और म्यूजिक इतना तेज बज रहा था कि आंख से इशारा करके ही हम बात कर पा रहे थे। वो पब स्क्वेअर में बना हुआ था पर बीच में उन्होंने बार बना रखा था तो कुछ वो यू आकार का बन गया था। बार टेंडर्स ड्रिंक देने में लगे हुए थे और लोग थिरक रहे थे।

मैं पहली बार किसी पब में आया था तो मैं उत्सुक्ता वश सभी चीजें देख लेना चाहता था। मेरी नजर काफी बारिकी से एक-एक चीज को देख रही थी। कौन कितना पी रहा है और कौन वहां पर बने रहने के लिए सिर्फ दिखावा कर रहा है....कौन कैसे और कितना डांस कर रहा है....कौन थिरक रहा है और कौन हिल रहा है....कौन मटक रहा है....कौन पी कर टुल हो चुका है.... कौन किसको ताक रहा है....किसने क्या पहना है....कितने उम्र वाले हैं यहां पर और किस ग्रेड से उनका ताल्लुक हैं।
(क्रमश:)
आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, August 13, 2009

रात की काली चादर, वो घुप अंधेरा और वो कमरा और उसमें टिमटिमाती बत्तियां।

जब मेरे दोस्त का फोन आया तो मैं ऑफिस में काम के बीच में फंसा मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था। एक ही शहर में, एक ही दफ्तर में होकर भी महीनों हो जाते हैं मिले कुछ दोस्तों से।
हाल-चाल जानने के बाद उसने पूछा, ‘कब फ्री होगा और रात में क्या कर रहा है’।
‘9 तो बज ही जाएंगे और जहां तक सवाल रहा रात का, तो फ्री होते के साथ ही मुल्ला की दौड़ मस्जिद यानी मेरी घर।
‘तो ठीक है, भाभी को कह देना कि आज तू लेट आएगा’।
‘क्यों’?
‘अपनी सगाई की पार्टी दे रहा हूं, जिसे बैचलर पार्टी भी मान लेना....हा...हा...हा’।
मैंने थोड़ा जल्दी फ्री होना मैनेज कर लिया। एक घंटे से भी ज्यादा ट्रैफिक की पों...पों... के बीच बिताने के बाद रात 9 बजे के करीब मैं करोल बाग से जिमखाना पहुंचा। उसके अधिकतर दोस्तों को मैं पहचानता था और उनमें से एक-दो को छोड़ दें तो सभी अपने बैटर हाफ के साथ थे। हम सब में आपस में परिचय के कारण ज्यादा फॉरमेलिटी में समय बर्बाद नहीं हुआ और हम अपनी-अपनी सीट थाम, हाथ में जाम लेकर बैठ गए।

अब बस इंतजार था तो उसका जिससे हम मिलने आए थे। वो भी आईं और थोड़ी देर के लिए सब कुछ बदल गया। उसके आने की खबर पाते ही सब ने अपने-अपने कपड़े ठीक किए और सब के चेहरे और शरीर पर फॉरमेलिटी का लबादा चढ़ गया। पर थोड़ी ही देर में सब के पैरों के तले से जमीन सरक गई, सब की आंखें फटी की फटी रह गई। उस लड़की को हम सब जानते थे वो हमारे साथ ही काम करती थी।

ये दोनों....कब....कहां....कैसे....अरे विश्वास ही नहीं हो रहा....पर तुम कैसे....तुम ने कभी बताया नहीं...अरे...नहीं...ओह...आई कॉन्ट बिलीव दिस। ऐसी ही लाइन थोड़ी देर तक वहां हर किसी के मुंह से निकल रही थी। अब हमें पता चला कि क्यों वो ये राज नहीं खोल रहा था। क्योरोसिटी की हद हो चुकी थी सबने पूछा कि कैसे हुआ ये सब और हमें बताया क्यों नहीं?

दोनों ने खुलकर अपनी बात रखी और कैसे मिले और कैसे दाल गली। सब बताया और साथ में ये भी बताया कि कहीं कुछ बिगड़ ना जाए इस कारण से किसी को बताया नहीं गया। अब इस पार्टी में कोई भी गैर नहीं था किसी को अपनाने की बात नहीं थी दोस्तों के अंदर, सब अपने थे।

दिल्ली का जिमखाना क्लब बहुत बड़ा है। हम ड्रिंक जोन में थे और जैसे ही हमने एक दरवाजा खोला तो कान फाड़ू म्यूजिक को पीछे छोड़ते हुए दिल में उतर जाने वाले संगीत की महफिल जो कि मध्म रोशनी में चल रही थी वहां पहुंच गए। यहां बाहों में बाहें डाले जोड़े एक दूसरे में समा रहे थे। हम वो हॉल भी क्रॉस कर गए और फिर गलियारे में से होते हुए एक ऐसे हॉल में दाखिल हुए तो सफेद चादर से ढकी हुई काफी टेबल लगी हुई थी और खाने की भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। वहां पर हमने बफे में खाना खाया पर किसी ने भी शायद लगता नहीं कि भर पेट खाना खाया होगा। हम में से अधिकतर तो ढाबे पर बैठकर बटर चिकन और तंदूर की रोटी पाड़ने वाले हैं और खास तौर पर दो पैक के बाद तो ढाबे का खाना ही भाता है। उस कॉनटिनेंटल फूड में रोटी की जगह रस के आकार की ब्रेड थी अब रोटी खाने वाले तो.....। आधे भरे, आधे से ज्यादा खाली पेट के साथ वहां से हम निकल पड़े।

बाहर आते के साथ लगा कि अभी तो रात शुरू हुई है चलो मस्ती करने चलें। पर कहां? ये सवाल हमारे सामने था। इंडिया गेट जाने से हम कतरा रहे थे, साथ ही कटवारिया सराय के पास के जंगल या फिर जेएनयू के जंगल में बारिश के मौसम में जाने से भी सब बचना चाह रहे थे। तो जाएं कहां? क्या रात भर यूं हीं सोचते रहेंगे या फिर कहीं चलेंगे। रास्ते में कार रोककर सब बाहर निकले और सिगरेट सुलगा ली। तभी एक दोस्त ने कहा चलो साकेत।

‘साकेत! वहां पर क्यों? क्या है वहां पर’? दुल्हन ने सवाल दाग दिया। जिसने रास्ता दिखाया अब जवाब भी उसे ही देना था। पब!!!!! क्या पब! जी हां पब। हुर्रे, चलो पब चलते हैं, डांस करेंगे। पर क्या एंट्री इस समय मिलेगी। ‘ये एक वाजिब सवाल है’। किसी की पीछे से आवाज़ आई। मैं तो एंट्री क्या पब के ‘प’ तक भी कभी नहीं पहुंचा था तो मैं सिर्फ मूक दर्शक की तरह सुन रहा था। फिर किसी ने कहा, ‘चलो देख लेंगे उस पब में तो मेरा मालिक से भी जुगाड़ है’। एक ने कहा, ‘पहले फोन करके पूछ लो वर्ना कुछ और सोचेंगे’। वो फोन करने में लग गया और उसकी तरफ से हरी झंडी मिलते के साथ ही हम सब अपनी-अपनी कार में बैठ निकल पड़े।
(क्रमश:)

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, August 7, 2009

ये इबादत नहीं है...शक्ति प्रदर्शन का एक जरिया है।

कल रात 11 बजे जब मैं ऑफिस में था तब एक खबर आई कि दिल्ली में दो आतंकवादियों को धर दबोचा गया है। पहली नजर में लगा कि 15 अगस्त से पहले तो गिरफ्तारी लाजमी है ही और वैसे भी खुफिया तंत्र ने दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस से पहले अलर्ट जारी कर रखा है। फिर ख़बर में अपडेट हुआ कि दोनों को दरियागंज से पकड़ा गया है और दोनों आतंकी दिल्ली में अपने मोड्यूल से मिलने आए थे। दोनों आतंकी हिजबुल के थे और जम्मू-कश्मीर के रहने वाले और पाक में ट्रैनिंग लेकर के दिल्ली आए थे। दोनों के पास से एक-47, कारतूस, हैंड ग्रेनेड मिले थे यानी देखा जाए तो दोनों दिल्ली के किसी भी हिस्से में कोहराम मचा सकते थे और साथ ही मुंबई 26/11 जैसी वारदात को अंजाम दे सकते थे।

इस खबर के आने के लगभग 10-15 मिनट के बाद ऑफिस से गए हुए एक साथी का फोन आया कि आईटीओ पर पूरा जाम लगा हुआ है। एक बाइक पर ४-४ लड़के, किसी भी टू व्हीलर पर ३ से कम तो कतई नहीं निकले हुए हैं। मुझे पता था कि वो सब कहां जा रहे हैं मैंने तुरंत उनको बताया कि आज शब-ए-रात है और सारे मुसलमान इबादत के लिए जामा मस्जिद जाते हैं साथ ही इनकी तादाद कुछ ज्यादा ही होती है तो बेहतर ये कि पंगा मत लेना क्योंकि भीड़ पागल होती है और भीड़ के लिए कोई कानून नहीं होता है।

मेरे साथी ने जवाब दिया कि ट्रैफिक, जाम, इबादत और हुड़दंग में अंतर करना उन्हें आता है। ये हुड़दंग है, ये शक्ति प्रदर्शन है जिसे चाह रहे हैं ये लोग उल्टा-सीधा कहकर आगे निकल जा रहे हैं। इनकी तादाद भी इतनी ज्यादा है कि कोई पंगा क्या कुछ बोल नहीं सकता। पुलिस सिर्फ देख रही है और कुछ कर नहीं पा रही है उसमें भी सोने पर सुहागा दो हवलदार खड़े होकर ट्रैफिक संभाल रहे है बाकी सब बैठे हुए हैं। मैं भी सहमत था कि सच कायदे कानून को तो मानना चाहिए। खासकर टू व्हीलर पर ४-४ लोग बैठें हुए बिना हेल्मेट के हजारों लोग घूम रहे हैं क्यों। जब ऑफिस खत्म करके मैं भी गया तो ये ही हाल था हजारों की तादाद में आईटीओ पर कानून की धज्जियां पुलिस हेडक्वाटर के सामने ही उड़ाई जारही थीं। हमारे साथ आ रहे एक साथी की कार में भी कुछ लड़के बाइक से उतरकर जबर्दस्ती घुसने की कोशिश कर रहे थे। ये तो शुक्र है कि मौके पर पुलिस पहुंच गई वर्ना कुछ और ही होता।

मैंने तुरंत काउंटर किया कि याद है, कुछ दिन पहले कावड़ियों के कारण भी इसी तरह हम लोग त्रस्त थे, कितनी परेशानी होती थी। वो भी सहमत था मेरी बात से। मैं सोच में पड़ गया कि क्यों हमें जरूरत पड़ती है अपने धर्म को दिखाने के लिए शक्ति प्रदर्शन की। क्यों जरूरत पड़ती है हमें लाउडस्पीकर की और उस पर चीख-चीख कर लोगों को अपने अल्लाह का नाम दूसरों को जबर्दस्ती सुनाने की। क्यों हमें जरूरत पड़ती है लगातार, बार-बार घंटी बजाने की। लोग कहते हैं कि भगवान चीखने से नहीं साधना से मिलता है। तो क्या हमारा धर्म के नाम पर ये शक्ति प्रदर्शन ठीक है?

आपका अपना
नीतीश राज

(दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस के जज्बे को सलाम करना चाहूंगा कि दरियागंज जैसे इलाके से इतनी सफाई से दो आतंकी पकड़ लेना और वो भी इबादत की रात में एक कामयाबी ही कहूंगा। वर्ना यदि थोड़ी सी भी चूक हो गई होती तो बाटला जैसा इल्जाम फिर लग सकता था।)

Saturday, July 18, 2009

सावधान! एनएच २४ से जरा बचके(जनहित में जारी)

ये सभी लोगों को एक हिदायत के रूप में लिख रहा हूं कि जो भी सुबह-सुबह या फिर शाम को एनएच२४ के जरिए दिल्ली का रास्ता तय करते हैं वो २१ जुलाई की सुबह तक सावधान! क्योंकि कांवड़ियों की वजह से २० जुलाई की शाम और २१ जुलाई की सुबह तक जाम लगे रहने का अंदेशा बना हुआ है। जो भी गाजियाबाद के रास्ते दिल्ली जाना चाहते हैं वो एनएच २४ की जगह आनंद विहार वाला रास्ता लें। हो सके तो हर दिन ऑफिस जाने के अपने समय से कम से कम आधा-पौन घंटे पहले घर से निकलें। शाम को आते समय ले सकते हैं एनएच २४ का रास्ता पर जितना हो सके उपयोग ना करें। नोएडा वालों के लिए भी थोड़ी हिदायतें हैं कि एनएच २४ पर ज्यादा भीड़ ना हो तो ट्रकों के रास्ते में फेरबदल किए जाएंगे और वो ट्रक नोएडा के रास्ते होते हुए गाजियाबाद के रास्ते पर जाएंगे तो वहां पर भी जाम लग सकता है शाम के वक्त जैसे परसों लगा था।
२० जुलाई को भोलेनाथ शिव शंकर जी का जलाभिषेक है तब तक ध्यान रखें। वैसे दुआ तो ये ही है कि कोईं भी जाम में ना फंसे। पर हमारा फर्ज है कि हम हिदायत तो जरूर बरतें।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, July 14, 2009

ऐसा है हमारा कानून और ऐसे हैं हमारे कानून के रखवाले, शर्म आती है।

पहले फिल्मों में देखता था ये सब अब इसे सामने देख रहा हूं। डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, एक्टर सब कहते फिरते थे कि फिल्में हमारे समाज का आइना होती हैं और मैं विश्वास नहीं करता था पर आज मानने को मजबूर हूं।
जज तक ने कहा कि ये अभियुक्त दोषी ठहराए जा सकते थे पर सबूतों के अभाव में ऐसा करना संभव नहीं। तो क्या जज के हाथ भी बंधे हैं।

एक घटना है परसों की और दूसरी घटना है बरसों पहले घटी थी पर नतीजा कल आया। दोनों ही हरकतें शर्मनाक हैं। फिल्मों में दिखाते थे कि कानून पर कैसे भारी पड़ते हैं नेता, ये बात सच साबित होगई है। दूसरा, कैसे पुलिस और गुंडों-बदमाशों में होती है साठगांठ। कुछ पुलिसवाले ही होते हैं बदमाशों के इनफोर्मर। कैसे बदले जाते हैं दिए हुए बयान और कोर्ट में खुद कई पुलिसवाले कैसे मुकर जाते हैं अपने दिए हुए बयान से।
याद आता है एक छात्र जो कि अपने अध्यापकों के ऊपर चिल्ला रहा था, कह रहा था कि शिक्षकों के नाम पर कलंक हो।


प्रोफेसर सब्बरवाल हत्याकांड के सभी आरोपी बरी। क्यों?

सभी ने देखा था वो हादसा टीवी पर, पर अंधेकानून को नहीं दिखाई दिया, प्रमाण के अभाव में छोड़ दिए सभी आरोपी। जज तक ने कहा कि ये अभियुक्त दोषी ठहराए जा सकते थे पर सबूतों के अभाव में ऐसा करना संभव नहीं। तो क्या जज के हाथ भी बंधे हैं। बेटा फरियाद करता रहा कि पिता के हत्यारों को सज़ा मिले पर कानून इस बार अंधे के साथ-साथ बहरा भी निकला।

अगस्त २००६, उज्जैन के माधव कॉलेज के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट के हेड प्रोफेसर सब्बरबार को कथित तौर पर अभियुक्तों कॉलेज कैंपस में क्रूरता से पीटा था और पिटाई में गंभीर चोट के शिकार प्रो।सब्बरबाल ने अस्पताल में दम तोड़ दिया था। याद आती है वो व्हील चेयर जिसमें प्रो।सब्बरबाल को बैठाकर अस्पताल लेजाया जा रहा था, सभी न्यूज चैनलों ने इस को काफी अहमियत से दिखाया था।

याद आता है एक छात्र जो कि अपने अध्यापकों के ऊपर चिल्ला रहा था, कह रहा था कि शिक्षकों के नाम पर कलंक हो। क्यों कह रहा था वो ऐसा क्योंकि अध्यापकों ने उसे फेल नहीं कर दिया था ब्लकि कॉलेज में छात्रसंघ के चुनाव में धांधली के लगे आरोपों के कारण अध्यापकों ने चुनाव टाल दिए थे। वो युवक बीजेपी की यूथ विंग एबीवीपी का अगुवा था। शायद ही कभी किसी अध्यापक ने अपने छात्र से ऐसे संबोधन सुने होंगे। सारे न्यूज चैनलों ने गोला लगा-लगाकर बार-बार दिखाया था इसे। तो क्या कोर्ट को ये सब नहीं दिखाई दिया। कोर्ट ने ये बात कैसे मान ली कि जब ये हादसा हुआ तो ये ६ अभियुक्त वहां पर मौजूद नहीं थे।

सरकारी वकील पर उठ रही हैं उंगली उसके पीछे का कारण ये है कि जब मध्यप्रदेश में इस केस की सुनवाई होनी थी तब वहां के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पहले ही इसे हादसा घोषित कर दिया था। बीजेपी के हैं तो क्या बीजेपी के युवा छात्रसंघ का साथ नहीं देंगे क्या। साथ नहीं देंगे तो ये बात मुख्यमंत्री साहब भी जानते हैं कि फिर सत्ता में आना उनके लिए मुंगेरीलाल के सपनों की तरह हो जाएगा। कहा जा रहा है कि सरकारी वकील ने इस केस में कई कमियां छोड़ रखी थी। दूसरी बात पुलिस पहले दिए हुए अपने बयान से कोर्ट में मुकर गई। जब ये हादसा हुआ था तो २००६ था उसके बाद अभियुक्तों को पकड़ा गया था तो इतने समय से उनको जेल में क्यों रखा गया। कोर्ट ने भी इस बारे में चुप्पी नहीं तोड़ी। क्यों? वर्ना सवाल तो ये ही खड़ा होता है कि पुलिस ने इन लोगों को किस आधार पर पकड़ा जब सबूत ही नहीं था। चार दिन के अंदर प्रो। सब्बरबाल के बेटे हिमांशु सुप्रीम कोर्ट में अपील करने जा रहे हैं। पर इस फैसले से कि ६ के ६ सभी अभियुक्त बाइज्जत बरी कर दिए गए सबको हैरानी जरूर हुई है। और इस बात का पता भी चलता है कि कहां-कहां तक कौन-कौन आपस में मिला हुआ है।
यदि शिकायत करेंगे तो पुलिसवाले बदमाशों को आपका पता दे देंगे और फिर वो आपको आपके जीने के अधिकार से महरूम कर देगा और आप मरहूम कहलाए जाएंगे।


मुंह खोलोगे, मरोगे।

जी हां, यदि आप किसी की कंप्लेंट करने जा रहे हैं तो संभल जाइएगा। शिकायत करनी भी हो तो पर्दे के पीछे से कीजिएगा, किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि आप कौन हैं। क्योंकि आज कल रक्षक ही भक्षक बने हुए हैं। पता नहीं कब कौन पुलिसवाला जाकर उस गिरोह को बता दे कि आप हैं शिकायतकर्ता। और फिर वो गिरोह समय देखकर आपको आपके जीने के अधिकार से महरूम कर दे और आप मरहूम कहलाए जाएं।

दिल्ली के अशोक विहार में एक शख्स पार्क में चल रहे सट्टे के धंधे की शिकायत करने पुलिस थाने गया। वहां पर और लोगों के साथ मिलकर शिकायत लिखवाई जो कि पहले भी कई बार लिखवाई जा चुकी थी पर हुआ कुछ नहीं था। इस बार कुछ ऐसा हुआ जो कोई सोच भी नहीं सकता था। तीन पुलिसवालों ने इस शिकायत को जगजाहिर कर दिया और भी किस के सामने उनके जिनके खिलाफ शिकायत हुई थी। इस बात से साफ जाहिर हो गया कि पुलिसवालों की साठगांठ थी गोरखधंधा चलाने वालों से।

फिर क्या था रात के अंधेर में जब वो अपनी राशन की दुकान बंद करके आ रहा था तो उस शख्स को तलवार से काट दिया गया। मृतक के दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। कोई अमीर आदमी नहीं था जिसे मारा गया। यतीम हो चुके बच्चों का क्या था कसूर? वैसे तो चार लोगों को नामजद कराया गया है पर माना जा रहा था कि उसने काटने वाले सिर्फ चार नहीं थे दर्जन थे। उन तीन पुलिसवालों को फिलहाल तो सस्पेंड कर दिया गया है।

क्या अब किसी गलत काम की शिकायत करना भी गुनाह है? क्या किसी पर भी अब विश्वास नहीं किया जा सकता खासकर कि कानून से जुड़े लोगों पर? दोनों वारदातों के बाद तो कानूनवालों पर शर्म आई और अपने कानून पर भी।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, July 11, 2009

दोस्त के पिता का इंतकाल और निगमबोध घाट का हादसा

उसका जवाब होता कि, सिर्फ वो सांस ही खुद ले सकते हैं।
सुबह-सुबह पता चला कि हमारे साथ काम करने वाले एक सहयोगी के बाबूजी की हालत नाजुक है। वैसे भी उसके पिताजी काफी दिन से बीमार चल रहे थे। उनकी किडनी जवाब दे चुकीं थी उपर से वो डायबेटिक भी थे। काफी दिन से उनका इलाज गंगाराम और एम्स में इलाज चल रहा था। बार-बार खून चढ़ाया जाता और बदला जाता, पहले तो उनका हर रोज डायलिसिस होता था पर फिर थोड़ा अंतराल के बाद होने लगा। अब तो आते-आते उनके शरीर के कई हिस्सों में दर्द होने लगा था। जब भी कोई उससे पूछता कि तुम्हारे पिताजी कैसे हैं? उसका जवाब होता कि, सिर्फ वो सांस ही खुद ले सकते हैं। तो उसके जवाब ही पूरी तबीयत बयान कर देते हैं। साथ में ये वो जरूर जोड़ता कि वो दिमाग से अब भी बहुत पक्के हैं, वहां कमजोरी की कोई झलक नहीं दिखती यानी यार्दाश्त हमसे भी अच्छी।
मैं निगम बोध घाट देर से पहुंचा, पर वक्त पर पहुंचा। उसके पिताजी अपनी अंतिम यात्रा के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके थे। मेरा सहयोगी अंतिम चक्कर लगा कर मुखाग्नि देने को झुक चुका था।
हम में से कुछ ने तो सुबह ही ये मान लिया था
कि शायद ही अब वो बचें। पर जहां तक हमारी बात थी तो हमें उसकी छुट्टी की आदत पड़ चुकी थी। वो एक-दो दिन की छुट्टी करता और फिर ऑफिस ज्वाइन कर जाता। हमें इस बार भी ऐसा ही लग रहा था। पर पता नहीं कैसे बातों ही बातों में एक सहयोगी के मुंह से निकल भी गया कि अरे अब तो वो लंबी छुट्टी पर गया। ये महज सुबह का इक्तेफाक भर था पर शाम का सच बन गया।
मैं निगम बोध घाट देर से पहुंचा, पर वक्त पर पहुंचा। उसके पिताजी अपनी अंतिम यात्रा के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके थे। मेरा सहयोगी अंतिम चक्कर लगा कर मुखाग्नि देने को झुक चुका था। मैं हाथ जोड़कर कायदे अनुसार उस सेज पर एक लकड़ी रख ऑफिस से ही आए एक दूसरे साथी के पास खड़ा होगया। वो अपने रीति-रिवाज के साथ उस काम को अंजाम देने में लगा था जिसे इस धरती पर सबसे बड़ा(कड़ा या भारी) माना जाता है। हम सब शून्य में ताक रहे थे और पुजारी, हवा में हम रुकावट ना बनें, हमें वहां से हटाने में लगे थे।
सभी कोने में खड़े हो गए और फिर अंकल जी के बारे में बात शुरू हो गई।मैं उसके पास पहुंचा तो उसने कहा कि आज १० तारीख है, मुझे भी याद है ये तारीख क्योंकि पिछले महीने ही उसने और मैंने पार्टी का प्रोग्राम बनाया था और कल तक सब ठीक था और आज...। यहां हम बात कर रहे थे और उधर ‘कपाल क्रिया’ का वक्त आ गया। सहयोगी ने जा कर इस काम को भी पूरा किया और वापस आ कर बैठ गया। जब भी कपाल क्रिया होती है तब उसके बाद घी डाला जाता है। वहां पर अधिकतर को इस बारे में नहीं पता था। मेरा सहयोगी गया और चला आया पर पंडित जी ने नहीं बताया कि क्या करना होता है। घी का पूरा एक कैन वहां पर रखा हुआ था पर उसका इस्तेमाल नहीं किया गया। एक दो हमारे से बड़े भी खड़े थे उनमें से एक ने कहा कि जाकर देखो तो घी कुछ है या नहीं। तो छोटे ने जाकर देखा और पाया कि घी वैसा का वैसा ही रखा हुआ था। उसने वेदी पर पूरा घी डाल दिया।
जिसे जहां से लूटने का मौका मिल रहा है वो वहां लूटने में लगा है।
वक्त आ गया था कि जब हम अपने अजीज को
वहां जलती हुई और चिताओं के साथ नित्य अकेला छोड़ चलें। जैसे ही शमशान घाट से बाहर निकल कर पार्किंग में आए तो मेरे होश उड़ गए। आज मैं कार से नहीं बाइक से आया क्योंकि शाम को जाम में एक बार फंसे तो रात कब हो जाएगी पता नहीं चलेता। मेरी बाइक की डिक्की टूटी हुई थी और उसमें रखा सामान गायब था। कहीं रास्ते में बारिश ना आजाए और मेरे को रुक कर अपने पर्स को पन्नी में डाल कर डिक्की में ना रखना पड़े तो ये काम मैंने घर पर ही कर लिया था। अलबत्ता जब मेरे साथियों ने पूछताछ की तो किसी ने बताया कि बंदर डिक्की तोड़ गया है और वो बटुआ लेकर भागा है। थोड़ी मशक्कत के बाद मेरा बटुआ मुझे मिल गया जो-जो चीज बटुए में थी वो भी मिल गई। हां, करीब ५०० का चूना लग गया पर ये बहुत बढ़िया रहा कि मेरे कार्ड मुझे मिल गए वर्ना बहुत दिक्कत होती। वो लोग भी जानते हैं कि जिसका भी पर्स मारेंगे वो कुछ कहेगा नहीं क्योंकि गम में आया है। तो थोड़ा सावधान रहिएगा।
इसे कहते हैं कलयुग। एक पंडा शव के ऊपर पड़ने वाले घी की चोरी करना चाहता था और वहीं दूसरी तरफ गम में डूबे लोगों को चूना लगाया जा रहा था। इल्जाम लगाया जा रहा है कि बंदर बटुआ लेकर भागा। बंदर को और कोई समान नहीं मिला डिक्की में से, देखिए ये भी एक अलग बात है कि बंदर को भी इतना ज्ञान हो गया है कि ये दुनिया सिर्फ पैसों से ही चलती है।
जिसे जहां से लूटने का मौका मिल रहा है वो वहां लूटने में लगा है। यहां मैं कमाना जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा क्योंकि कमाते तो मजदूर लोग हैं लूटते तो लुटेरे हैं। शुरू से अंत तक लुटिए, अब अंतिम पड़ाव पर भी आपको चैन नहीं। हम सब उसके घर आगए और प्रार्थना की, भगवान वो जहां भी हों उनकी आत्मा को शांति दीजिएगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, July 1, 2009

मैं तो चला अपने मेहमान के स्वागत में और आप.....।


बीती रात के बाद सुबह और फिर शाम को फुहार पड़ने के बाद सभी के मुंह से निकल रहा था 'बरसो राम धड़ाके से...'।

बड़े
दिनों से जिसका इंतजार था वो मेहमान पिछली रात घर पर आई।
छम छम करते हुए किसी के आंगन में तो किसी के घर की छत पर अपने कदमों की आहट से सभी को चकित कर गई। अपनी इस अदा से सब को बता गई कि देखो मैं तुम्हारे पास आ चुकी हूं अब घबराने की बात नहीं है। पर ऐसा नहीं था कि वो मेहमान हर समय के लिए आ गई थी। नहीं, वो तो सभी को अपना बना कर और खुद दूसरे की हो कर, राहत की रात देकर, रात की थोड़ी देर की मुसाफिर कुछ देर रुक कर चली गई। पर जाते-जाते फिर आगे आने के वादे के साथ। और वो आई फिर सुबह आई और फिर शाम को भी आई।

जी हां, दिल्ली में हमारी प्यारी बरखा रानी आखिरकार आ ही गईं। सुबह की फुहार के बाद तो ये लगा कि मानसून की दस्तक हो गई है। पर जैसे ही दिन चढ़ने लगा तो लगा नहीं कुछ फैसले जल्दबाजी में नहीं करने चाहिए। जहां सुबह खुशगंवार थी वहीं दोपहर होते-होते उमस से सराबोर हो चुका था दिन। पर शाम होते-होते हमेशा ही गलत जानकारियों के लिए प्रसिद्ध मौसम विभाग ने भी अपना फरमान का पर्चा जारी कर दिया कि अगले २४ से ४८ घंटों तक दिल्ली यूं ही सुबह-शाम भीगती रहेगी। साथ ही ये भी कह दिया कि दिल्लीवासियों के लिए खुशखबरी है कि मानसून पहुंच चुका है। पर शाम होते-होते तो उमस का बोलबाला हो चुका था। पर शाम घिरते के साथ ही फुहारों ने फिर से दिल्ली को भिगोना शुरू कर दिया। रास्ते में आते हुए मैंने बहुत लोगों को देखा कि वो बाइक पर पैदल, साइकिल पर खुश होकर भीगते हुए चले जा रहे थे। किसी को भी इस बात की परवाह नहीं थी कि वो गीले या भीग जाएंगे। शायद इसी बात का तो सभी इंतजार कर रहे थे।

बीती रात के बाद सुबह और फिर शाम को फुहार पड़ने के बाद सभी के मुंह से निकल रहा था 'बरसो राम धड़ाके से...'। पर जब तके दो-तीन घंटों की लगातार बारिश नहीं होगी तो इस चिपचिपी गर्मी से थोड़ी निजात नहीं मिलेगी। वैसे तो सभी जानते हैं कि ये चिपचिपाहट अभी जाने वाली नहीं है या यूं कहें कि अभी तो शुरूआत ही है। वैसे देखा जाए तो हर साल की तरह दिल्ली में इस बार भी मानसून ने समय पर ही दस्तक दी है।

दिल्ली के बाद लगता है कि मॉनसून देश के कोने-कोने में पहुंचने को तैयार हैं। दक्षिण भारत और दिल्ली के बाद अब पूरे देश में मॉनसूनी हवाएं बदलों के साथ पहुंच चुकी हैं। अनुमान है कि अगले 24 से 48 घंटे में दिल्ली के साथ-साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, और जेके में बारिश तपती धरती के ताप को कम करेगी।

वैसे, अभी तो हम इस मेहमान की आवभगत में लगे ही हुए हैं पर हां थोड़े दिन बाद हम अगले साल का वादा लेकर इस मेहमान को बड़े ही प्यार से रुखसत करेंगे। पिछले साल के कोशी के कोप के बारे में सोच कर ही दिल दहलता है। २६ जुलाई, २००५ को याद करते ही रूह कांपती है। पर छोड़ो अभी तो ये जश्न मनाने का वक्त है मेहमान के स्वागत का वक्त है। मैं तो चला अपने मेहमान के स्वागत में और आप.....आप भी दिल से स्वागत कीजिएगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, June 4, 2009

अपनी मां का क़त्ल, २४ वार, तब तक मारा जब तक मर नहीं गई वो। क्या नैतिक पतन हो रहा है महिलाओं का?

क्या हवस-वासना के आगे हम अंधे हो जाते हैं? क्या हवस इतनी बड़ी चीज होती है कि कोई उस पर काबू नहीं रख पाए? ‘लस्ट’ याने काम भोग की इच्छा करना और यदि इस इच्छा के बीच में कोई आए तो उस को रास्ते से हटा देना। क्यों बरसात के समय में जानवरों के इलाकों में जाने की मनाई होती है। उसका कारण है कि जानवर जब संभोग करता रहे तो गर कोई उसे इस बीच तंग करे तो वो हमला कर देता है। क्या इंसान फिर से जानवर की तरह ही बनता जा रहा है?

एक मां सारे कष्टों को सहते हुए अपने बच्चों को अपना रूप देने की कोशिश करती है, सही इंसान बनाने की कोशिश करती है। पर क्या गलती हो गई थी उस मां से, जिसने अपनी बेटी को वो करने से रोका जो कि मां को गलत लगा था। शायद उस मां ने भी सोचा होगा कि बस बहुत हो चुका, अब आगे नहीं। बेटी को गलत करने से रोकना ही होगा। मां ने रोका और बेटी ने मां पर तब तक वार किए जब तक की वो मर नहीं गई।

एक, दो, तीन नहीं दर्जन से ज्यादा ब्वॉयफ्रेंड थे साक्षी के। वो अधिकतर अपने घर पर ही उनको बुलाती थी जब कि परिवार वाले घर पर नहीं होते थे। ऐसे ही उसने अपने एक ब्वॉयफ्रैंड को बुलाया और दोनों लिप्त हो गए उस कांड में जिसे की उसकी मां सत्संग से थोड़ा जल्दी वापस आने पर देख नहीं सकी। पर हवस-वासना की आग ने बेटी और उस लड़के से वो करवा दिया जो वो होश में नहीं कर सकते थे। पहले सर पर बीयर की बोतल, फिर सर पर प्रैस से चोट, फिर चाकू और पेचकस से वार। पूरा कमरा खून से लथपथ। उसके बाद लूटपाट की प्लानिंग। पुलिस ने अब तक ये ही जानकारी दी है। पर वहीं दूसरी तरफ पिता और पड़ोसियों की मानें तो ये कि साक्षी पढ़ने में अच्छी थी साथ ही अब वो पढ़ा भी रही थी। और कभी भी कोई शिकायत किसी के सामने नहीं आई थी।

क्या ये मानें कि २६ साल की जवान लड़की गर घर में अविवाहित होगी तो ऐसा होना स्वाभाविक है? क्या ये नारी का नैतिक पतन है? इस एक वाक्ये के कारण ही नहीं कई और भी वाक्ये सामने आए हैं पिछले कुछ समय में जो इस सवाल पर सोचने को मजबूर करते हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, May 11, 2009

क्या हो गया है सचिन को? शुरुआत में तो लगा था कि वाह! मास्टर ब्लास्टर इस बार तो ब्लास्ट करने के लिए तैयार हैं। पर क्या होगया सचिन को एकदम से ब्रेक लग गए। आईपीएल सीजन 2 में सचिन ने 9 मैच खेले हैं और 226 रन बनाए हैं जिसमें से एक बार नॉट आउट भी रहे। पहले तीन मैचों में तो सचिन का जलवा देखने लायक था। पहले तीन मैचों में ही सचिन ने दो हॉफ सेंचुरी जमाई। पहले ही मैच में 49 गेंदों पर नाबाद 59 रन बनाए जिसमें 7 चौके शामिल थे। चेन्नई को बड़ी ही आसानी से मात दे दी थी। हैदराबाद के खिलाफ दूसरे मैच में टीम 12 रन से भले ही हार गई पर सचिन ने 3 छक्के और 2 चौकों की मदद से महज 27 गेंदों पर 36 रन बनाए। कोलकाता के खिलाफ तो कमाल ही कर गए मास्टर। ऐसा ब्लास्ट किया कि मजा ही आगया। महज 45 गेंद में 4 छक्के और 6 चौकों की मदद से 45 गेंद पर 68 रन की पारी खेली जो कि अभी तक सचिन की इस सीजन में सर्वश्रेष्ठ है।
फिर तो लगता है जैसे कि सचिन को नजर ही लग गई। किंग्स के खिलाफ 01, कोलकाता के खिलाफ 34, बैंगलोर के खिलाफ 11, हैदराबाद के खिलाफ 02, दिल्ली के खिलाफ महज 15, फिर बैंगलोर के खिलाफ 00। मतलब-
पहले तीन मैचों में- 59+36+68=163
बाकी के 6 मैचों में- 01+34+11+02+15+00=63
तो एकदम से अचानक सचिन को क्या होगया। कहां चली गई फॉर्म। माना की बैगलोर को हराकर टीम ने फिर से अपने आप को सेमीफाइनल की दौड़ में रखा है पर लगता है कि सचिन पर कप्तानी हावी होने लग गई है। जब भी थोड़ी सी टेन्स हालात होते हैं सचिन को नाखुन चबाते जरूर देखा जा सकता है चाहे वो मैदान में हों या फिर बाहर।

आजकल ये मुद्दा गर्माया हुआ है कि क्या हो गया है सचिन को? सब इस बारे में ही बात करते नजर आजाएंगे। पर सचिन को कुछ भी नहीं हुआ है। जहां तक सवाल रहा जयसूर्या का तो वो अभी ८ मैचों में सिर्फ १७१ रन बना पाए हैं। तो सचिन को कुछ नहीं हुआ है बस देखना ये है कि सचिन कब फॉर्म में वापस आ पाते हैं और उसका इंतजार सब को रहेगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, January 9, 2009

वो सफर, जो मुझे हमेशा याद रहेगा। मेरी पहली हवाई यात्रा-2।

आगे...
...इतने बड़े ग्राउंड में अपने प्लेन को ढूंढने की असमंजस में मैं इधर-उधर ताकने लगा। कई बस आजा रही थी इतनी देर में ये तो जान गया था कि ये जगह एयरपोर्ट है ना कि कोई बस अड्डा। लेकिन क्या करूं याद आ रही थी बस अड्डे की जहां पर कोई ना कोई जरूर आवाज़ लगाता रहता है, मैं ये ही सोच रहा था कि कोई आवाज़ लगाए कि मुंबई-मुंबई, कोलकाता-कोलकाता,बैंगलोर-बैंगलोर...और मैं पैदल ही वहां का रुख कर लूं। लेकिन ये जगह है इतनी बड़ी कि पैदल ढूंढना भी बहुत मुश्किल है। दिमाग में सिर्फ और सिर्फ ये ही सब घूम रहा था और लगातार दौड़ रहा था पर पैर थे कि जम से गए थे। सुबह के 5.45 बज रहे थे। ठंड भी बहुत थी लेकिन अब तो पसीना आने लगा था। साथ ही वहां पर अभी तक सिर्फ मैं ही अकेला खड़ा हुआ था तो और घबराहट हो रही थी कि कहीं देर तो नहीं होगई। लेकिन तभी वहां पर टाई पहने एक लड़का आया। उसके हाथ में वॉकी टॉकी भी था और उसने मुझे बताया कि अभी बस आएगी और आपको आपके प्लेन तक ले जाएगी।
अब आई सांस में सांस। लेकिन अब दूसरी चिंता सताने लगी और वो चिंता हमेशा ही गलत समय पर आती है वो है लघुशंका की। अब समझ में नहीं आ रहा था कि कहां फारिग होऊं। ग्राउंड स्टाफ कहां जाता है इसका तो पता नहीं था पर यदि जाऊं और बस फिर छूट जाए तो क्या होगा। इसी द्वंद में फंसा हुआ था कि बस आगई और कुछ सह यात्री भी आगए। बस थोड़ी देर रुक कर तकरीबन 15 यात्री को लेकर बस प्लेन की तरफ चल दी। लघुशंका का निवारण तो अब प्लेन में जाकर ही होगा। ये प्लेन होगा हमारा, बस नहीं रुकी, तो ये होगा, ये भी नहीं। करते-करते तकरीबन आधा किलोमीटर घूमने के बाद हम अपने प्लेन तक पहुंचे। या तो मेरे प्रेशर का मामला था या पता नहीं क्या, पर तुरंत मैं बस से उतर कर सीढ़ियों के पास तक जा पहुंचा और मेरे टिकट को आधा फाड़कर चैकर ने आधा मुझे पकड़ा दिया। ऊपर पहुंचा तो दो ऑटियों ने मेरे इस्तकबाल किया और अंदर की तरफ इशारा किया। पहले बिजनेस क्लास पड़ा और तुरंत ही तकरीबन 186 सीटों का इकॉनमी क्लास। अब कहां बैठूं? कुछ दिन पहले ही एक अंग्रेजी मूवी देखी थी कि एयरहोस्टेस खुद बताती हैं कि कहां बैठना है। पर यहां तो ऐसा नहीं था। मैंने तुरंत बोर्डिंग पास पर नजर डाली तो उसमें सीट नंबर लिखा हुआ था 12A। याने समझते देर नहीं लगी कि मुझे कहां बैठना है।
अरे, ये क्या मुझे तो खिड़की के बगल वाली सीट मिली है। कहीं ए नंबर की सीट कोई और तो नहीं होती, पर ऐसा नहीं था और पूरे इत्मीनान के साथ बैठ गया। बैठते ही लघुशंका की शंका का निवारण करने की इच्छा जाग्रित हुई और मैं चल दिया बाथरुम की ओर। मैं जिस से बड़ी देर से त्रस्त था उस से निजात पा लिया। थोड़ी ही देर में मेरी सीट के आगे लगी स्क्रीन पर जो कि मेरे आगे वाले की सीट की बैक थी उस पर संदेश आने लगे। अधिकतर फिल्मों में देखा है कि पहली बार सफर करने वाले को बेल्ट लगाने में बड़ी दिक्कत होती है पर मुझे नहीं हुई। सीढ़ियां हटा ली गईं थी। एयरहोस्टेस जो कि उदघोषिता भी थी उसने सूचना दी कि थोड़ी देर में फ्लाइट उड़ने के लिए तैयार है और उदघोषणा बंद होगई।
धीरे-धीरे विमान बड़ी आवाज़ करते हुए सरकने लगा और रनवे तक पहुंच गया। विमान थोड़ा रुका और मैंने धरती को जी भरकर पास से देखा क्योंकि मेरे बगल में तो कोई था नहीं लेकिन जो भी सहयात्री आजू-बाजू थे वो अपने दोनों हाथ जोड़कर बैठे हुए थे। उनमें से कुछ पढ़ भी रहे थे और कुछ सिर्फ सामने शून्य में देख रहे थे। मैं अपने बगल में बांयी और की विंग को देखने लगा। विमान रनवे पर चल दिया फिर तेज आवाज़ के जरिए दौड़ने लगा। बस एक छोटे से हल्के झटके के साथ मैं आसमान की तरफ बढ़ गया। धरती पीछे और नीचे छूटती जा रही थी और मैं लगातार नीचे देखता जा रहा था। पर ये क्या, प्लेन की लेफ्ट विंग नीचे की तरफ क्यों झुक रही है। मेरा तो कलेजा मुंह को ही आ रहा था और मैं नीचे देखने से डरने लगा। साथ ही मैं दूसरी तरफ झुकने लगा। ऐसा लगा कि कहीं नीचे ही ना गिर जाएं। वो एहसास बड़ा ही खतरनाक था। लग रहा था कि खड़ा हो जाऊं क्योंकि प्लेन एक तरफ काफी झुक गया था और ठीक मेरे नीचे दिल्ली या फिर उसके आसपास के इलाके रहे होंगे। यदि कोई बाईचांस मुझे देख रहा होता तो वो पहचान जाता कि ये मेरी पहली हवाई यात्रा है। मेरी हवाईयां उड़ी हुई थी।
थोड़ा ऊपर जाकर विमान ठीक से चलने लगा। एहसास हो रहा था कि जैसे चढ़ाई में कुछ दिक्कत हुई है और अब वो समतल सड़क पर ठीक से चलने लगा है। पर लगता था कि बीच-बीच में सड़क में बहुत गड़्ढ़े हैं और प्लेन में काफी आवाज़ हो रही थी। लेकिन ऊपस से धरती को देखना का सुख मुझे बहुत ही प्रफुल्लित कर रहा था। साथ ही लग रहा था कि गूगलअर्थ में जो चित्र उभरते हैं वो सचमुच में ही काफी सही और जीवंत लगते हैं।

'बादलों के ऊपर जहां और भी हैं। ऐसा लग रहा था।'

नीचे धरती, उसके ऊपर बादल, उसके ऊपर हमारा विमान और हमारे विमान के ऊपर सिर्फ और सिर्फ साफ आसमान। सूरज ऊगने की फिराक में धीरे-धीरे ऊपर उठते हुए। बड़ी ही मनमोहक तस्वीर उभरकर सामने आ रही थी। थोड़ी देर बाद नाश्ता आया और पता चला कि हवाई ब्रेकफास्ट कैसा होता है। उस समय हम समुद्र तल से 10700 मीटर की ऊंचाई पर थे और बाहर हवा का तापमान था -46 डिग्री, जी हां, शून्य से 46 डिग्री नीचे। मैं अपने इयरपीस पर गाने सुनता हुआ जा रहा था। चलचित्र और गानों की व्यवस्था भी अंदर थी उसी स्क्रीन पर जहां पर पहले संदेश आ रहे थे। सिर्फ पौने दो घंटे में मैं मुंबई पहुंच गया। पूरी उड़ान के वक्त मैं एक अलग एहसास होता रहा जो कि बिल्कुल अलग था।
जाने में तो वक्त का पता ही नहीं चला। शाम को एक शो करना था शो करके अगले दिन दोपहर की फ्लाइट पकड़कर दिल्ली वापिस हो लिया। लेकिन इस बार की फ्लाइट में कोई दिक्कत नहीं हुई। ऊपर ऐसा लग रहा था कि जैसे सड़क सुधार दी गई हैं जो भी ऊबड़-खाबड़ रास्ते थे वो पाट दिए गए हैं। लेकिन जैसे ही दिल्ली के करीब पहुंचे और उतरने के लिए उदघोषणा हुई सब ने तैयारी कर ली पर ये क्या, प्लेन तो हवा में ही उड़ा जा रहा है। क्या हुआ कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं। कैप्टन ने बताया कि अभी नीचे ट्रैफिक है तो इंतजार कीजिए। अब लगा प्लेन राउंड-राउंड घूमने और यहां मेरी हालत खराब होने लगी। उस समय ऊंचाई ज्यादा नहीं थी और लेफ्ट साइड पूरी तरफ झुक जाती तो लगता कि अब गिरे और तब। जब कोई हवाई यात्रा के सफर पर जाता था और उसके साथ ऐसी कोई घटना होती थी तो हम बहुत चहकते हुए कहते थे कि पैसे तो दो घंटे के लिए दिए थे और ढ़ाई घंटे की मौज ली है, मजा बहुत आया होगा। अब पता चलता है कि क्या हालत होती है जब हवा में अटके रहते हैं तो। 15 मिनट के बाद हमारी फ्लाइट नीचे उतर गई पर अंतरराष्ट्रीय रनवे पर। और वहां से घरेलू रनवे तक हम विमान में दौड़ते हुए आए जिसकी गति लगभग 30 कि.मी. थी।
पर जो कुछ भी था फ्लाइट में आनंद आ गया बस एक बात थी कि बाईं तरफ प्लेन जब झुकता है तो कलेजा मुंह को आता है।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, January 7, 2009

वो सफर, जो मुझे हमेशा याद रहेगा। मेरी पहली हवाई यात्रा।

मेरी पहली हवाई यात्रा कुछ ऐसी रही जिसकी कल्पना भी मैं नहीं कर सकता था और वो हो भी गई यूं ही अचानक। अभी हाल फिलहाल में ही मुंबई हमले के बाद जब कि ये खबर आ रही थी कि अब आतंकवादियों के निशाने पर है एयर रूट याने कि हवा के जरिए आक्रमण। ऑफिस में काम कर रहा था कि तभी हुजूरेवाला ने आदेश के स्वर में पूछा कि कल कौन सी शिफ्ट है। यही, जो आज कर रहा हूं। तो कल तुम्हारी ये शिफ्ट नहीं है। फिर कल सुबह तुमको मुंबई जाना है अपना रिक्रुजेशन भर दो सुबह की ही फ्लाइट है। बहुत दिनों के बाद ये कुछ ऐसा फरमान था जो कि अच्छा लगा। वाह! ऐसे फरमान तो रोज आएं तो सुभानअल्लाह।
जब तक कि एयरपोर्ट के दरवाजे पर नहीं पहुंच गया तब तक मुंह कलेजे को आ रहा था। लग रहा था पता नहीं ऑफिस में कब, कौन से दोस्त रूपी दुश्मन मज़ा बेकार कर दे। क्योंकि कुछ ने तो बहुत प्रयास किए थे, पर भला हो फरमान वाले का कि उस फरमान पर कोई डोरे ना डाल सका। लेकिन कई बार तो ये लगता रहा कि पूरे दिन ये खबर चली है कि अब वायु आक्रमण ही करेंगे आतंकवादी इस लिए लगता है कि ऑफिस के वो लोग जो कि बाज कि तरह ऐसे असाइनमेंट पर नजरें गड़ाए बैठे रहते हैं उन्होंने इस बार मेरे पर नजरें गड़ा दी, और मुझे बनाया है बलि का बकरा। लगातार जगते हुए मुझे करीब २२ घंटे हो चुके थे साथ ही इस सोच के बावजूद मेरी आंखों में नींद का नामो निशान नहीं था। लगातार जगते हुए मुझे करीब २२ घंटे हो चुके थे पर इस खुशी के आगे आंखों में नींद का नामो निशान नहीं था।
दिल्ली एयरपोर्ट पर जैसे ही गाड़ी ने छोड़ा तो लगा कि अब तो पहली बार हवाई यात्रा हो ही जाएगी। लेकिन परेशानी ये थी कि इस से पहले मैं कभी भी एयरपोर्ट नहीं आया था। दो-चार बार दोस्तों को छोड़ने आया था तो बस ये पता था कि यहां पर छोड़ते हैं और इस जगह के आगे आप नहीं जा सकते। मैंने एक हाथ में टिकट रख लिया और गेट पर पहुंचा और लाइन में लग गया। एक सिक्योरिटी गार्ड ने मेरे हाथ में ई-टिकट देखकर उसने कहा कि आप चाहें तो वहां(दूसरे गेट) से भी एंट्री कर सकते हैं। मैं उस राह हो लिया। मेरा आईडी कार्ड और टिकट चैक करने के बाद मैंने पहली बार किसी भी एयरपोर्ट पर पहली बार कदम रखा।
अंदर तो मैं आ गया था पर सबसे बड़ी बात ये लग रही थी कि अब आगे क्या। क्या करना हैं, मुझे कहां जाना होगा? कुछ भी तो पता नहीं था, पर सुना था कि कोई बोर्डिंग पास लेना होता है सिर्फ इस टिकट से काम नहीं चलता। पर ये मिलेगा कहां? तो देखा कि सामान की चैकिंग भी हो रही थी। तो क्या पहले सामान की चैकिंग करवाऊं या कि बोर्डिंग पास लूं। दिमाग का फैसला था कि टिकट ले लिया जाए। वहीं पास में एंट्री काउंटर था जहां पर मैंने पूछा कि क्या ये एयर इंडिया का काउंटर है तो उन्होंने कहा कि पहले आप को यहां से टिकट पर स्टैंप लगवानी होगी फिर आप को वहां जाना होगा और उसका काउंटर वो है किसी में भी लाइन में लग जाइए। वहां से निकलकर बोर्डिंग पास की राह पर चल दिया। इस के बाद मैंने सामान की को रखवाना ही उचित समझा। सामान जहां पर कि बैंड लग रहे थे जैसे पहुंचा तो उसने कहा कि नहीं आप इसे अपने साथ ले जा सकते हैं क्योंकि इसे हम हैंडबैग की तरह ही समझते हैं। ओ.के.। अब बोर्डिंग पास काउंटर की तरफ मैं बढ़ गया, तो किस लाइन में लगूं इकॉनमी या फिर बिजनेस क्लास में? इस ई-टिकट पर तो कुछ भी नहीं लिखा। या कुछ इनीसिएल बनें हों तो मुझे पता नहीं। लाइन में दो शख्स ही थे तुरंत मेरा नंबर आ गया। लेकिन हैंड बैग पर उस शख्स को मैंने एक कार्ड सा लगाते हुए देखा जो कि एयर इंडिया का ही था। मैंने भी उसे अपने बैग के साथ लटका लिया। तुरंत बोर्डिंग पास मिल गया। अब तो मेरा जाना पक्का हो ही गया। काउंटर पर ही बता दिया गया था कि वहां से एंट्री होगी। एक लाइन थी मैं भी लग गया। तुरंत चार-पांच आदमी लाइन से चैक होते-होते वहां पर बढ़े जा रहे थे जहां पर कि हैंड बैग चैक किये जा रहे थे। ये गार्ड सिर्फ आईडी प्रुफ और बोर्डिंग पास चैक कर रहे थे। मेरे आईकार्ड और बोर्डिंग पास चैक होगया और जैसे ही मैंने आगे बढ़ने की कोशिश की तभी मुझे एक गार्ड ने रोक दिया।
मुझे लगा कि जरूर से ही कोई बात होगी। पता चला कि नहीं आगे वालों की चैकिंग नहीं हुई है तो मुझे और मेरे पीछे की जनता को रोक दिया गया। मैं देख रहा था कि एक ट्रे में सब मोबाइल और पर्स तक निकाल के रख रहे हैं साथ ही जैकेट भी। मैंने भी पूरी तैयारी कर ली। जैसे ही आगे जाने का आदेश हुआ तुरंत सब चीजें ऐसे रखी जैसे कि रोज आना जाना लगा रहता है, साथ में बैग भी रख दिया। मशीन के अंदर से चैक होता बैग आगे गया। साथ ही मेरे को भी एक ऑफिसर ने चैक किया बारिकी से फिर मैं आगे बढ़ गया। अब सब चैक पूरे हो चुके थे और जो मैंने बैग में कार्ड लटकाया था उस पर सिक्योरिटी चैक की मुहर भी लग चुकी थी। फिर वही समस्या कि जाना कहां है याने कि अब क्या?
देखा कुछ लोगों को एक महिला बड़े ही प्यार से बात करते हुए साथ ही खड़े पुरुष महोदय चैकिंग करते हुए बैग पर लटके उस कार्ड और बोर्डिंग पास की उन्हें आगे भेज रहे थे। लेकिन आगे कहां? अरे वहां पर खड़े हैं विमान तो! ओह हो! मतलब कि चलो जल्दी से लघुशंका भी जाना है हरदम गलत समय पर ही लगती है। मैं हीरो की तरह उस दरवाजे की तरफ बढ़ा। महिला को कार्ड दिखाया तो महिला ने देखा और मुझे दिशा निर्देश देते हुए बताया कि आपको मुंबई के लिए प्लीज उस गेट से जाना होगा। मैं इतने देर में समझ चुका था कि मामला कुछ गड़बड़ है और साथ ही ऊपर लगे प्लाजमा में इस फ्लाइट का नंबर भी नहीं था। ओह हो मुंबई के लिए वो काउंटर है ओ. के.। थैंक्स। कहते हुए मैं आगे बढ़ गया। उस काउंटर पर जैसे ही पहुंचा मेरा सभी सुरक्षा तंत्रों को चैक करने के बाद उस मोटे से आदमी ने मुझे अंदर जाने कि इजाजत दे दी। मैं ये ही सोच रहा था कि बैंगलोर जाने वालों की अगवानी के लिए महिला और मुंबई जाने वालों के लिए ये भैंसा, सांड। इसी सोच में वहां खड़ी बस निकल गई। लगा कि अब तो फ्लाइट जरूर से छूट जाएगी। अब इतनी विशाल जगह पर अपने प्लेन को कहां ढूंढूंगा।
जारी है...
हमें तो आदत रही है ट्रेन और बस की। जहां पर आप खुद के जिम्मेदार स्वंय हैं। यदि गाड़ी छूटी तो टिकट बेकार। पर प्लेन के सफर में ऐसा नहीं होता। ये बात हमको बाद में पता चली कि बोर्डिंग पास लेने के बाद तो ये एयरलाइंस की जिम्मेदारी बन जाती है कि वो हमें पुकार लगा-लगा के बुलाए और हमें बैठाए। पर हम जैसे अनाड़ी की हालत उस पैसेंजर बस के छूटने के बाद क्या हुई और हवाई सफर आखिर कटा कैसा। अपने तमाम अनुभव अगली पोस्ट में।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”