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Monday, September 14, 2009

क्यों नहीं 26/11 मुंबई हमले पर पाक मंत्री की ललकार के जवाब में वन-टू-वन करते पी चिदंबरम।


हाल ही में पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्री रहमान मलिक ने इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलेआम भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम को ओपन डिबेट के लिए ललकारा। मुंबई हमलों पर बोलते हुए रहमान मलिक ने साफ तौर पर ये कहा कि 26/11 के मसले पर भारत पाकिस्तान पर दोष मढ़ना बंद करे। सबसे बड़ी बात उसमें ये कही गई कि भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम के साथ वो भारत में कहीं पर भी, पाकिस्तान या फिर किसी भी मुल्क में ये डिबेट कर सकते हैं।

चिदंबरम को चैलेज देने के अलावा भी रहमान मलिक सच से पर्दा उठाते ही रहे। जैसे, भारत ने मुंबई हमलों पर 9 फरवरी को भेजी हमारी दरख्वास्त का जवाब 20 जून को जाकर दिया जो कि बहुत देर से था और जवाब मराठी में भेजा। (कोई भी राष्ट्र किसी को जवाब अपनी क्षेत्रिय भाषा में क्यों देगा, ये इल्जाम कितना सच है ये तो मलिक जी ही बेहतर जानते हैं।) भारत ने चार्जशीट दाखिल करने में 90 दिन से भी ज्यादा का वक्त लिया वहीं हमने महज 76 दिन में इस कवायद को पूरा कर लिया। भारत कभी किसी को मास्टरमाइंड बताता है तो कभी किसी और को। हमने जकीउर रहमान लखवी को गिरफ्तार किया तो भारत हाफिज सईद को मास्टरमाइंड बताने लग गया। (क्योंकि दोनों ही इस साजिश में शामिल थे।) वहीं भारत समझौता एक्सप्रेस मामले पर सबूत साझा नहीं कर रहा जो कि बहुत अहम है। आप हमारे कोर्ट का सम्मान करो और हम आपके कोर्ट का सम्मान तो करते ही हैं। इस पर कितना सच था और कितनी बातों पर सच का पर्दा पड़ा रहा, ये हम सब बेहतर जानते हैं।

ये सारी बातें तब कही गई हैं जब कि भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम अमेरिका दौरे पर थे और अमेरिका को पाक की नियत से रूबरू कर रहे थे। पाक मीडिया ने दोनों खबरों को खूब उछाला और साथ ही भारतीय मीडिया ने भी इन खबरों को दिखाया। फिर क्या वजह है कि इस बारे में पी चिदंबरम की तरफ से या फिर भारत की तरफ से कोई भी जवाब नहीं आया। क्यों?

सबसे ज्यादा बात जो खल रही है कि एक तरफ तो कोई ये कह रहा है कि कहीं भी बात करने के लिए तैयार हैं और हम उस पर प्रतिक्रिया भी नहीं दे रहे। क्यों? कब तक पाकिस्तान गलती करते हुए भी हर बात पर हेकड़ी जमाता रहेगा। गलती करके हमें ही ललकारता रहेगा और हम शांत रहकर उन बातों का जवाब बहुत गहन विचार करके ही देते रहेंगे। कब तक इन मामलों पर भी राजनीति होती रहेगी। क्यों सामने आकर कोई भी इस बारे में जवाब नहीं दे रहा है।
अभी थोड़े दिन पहले ही भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भारत को पाकिस्तानी तालिबान की तरफ से मुंबई हमलों की तर्ज पर हमले की आशंका से आगाह किया था। उस पर रहमान मलिक का जवाब था,
"There was a statement from the PM of India that they knew there might be Bombay-like attacks replicated in India by the Pakistani Taliban. Prime Minister Sir, you are the chief executive, whatever information you have, it must have come from your Intelligence agencies, why didn't you share it with us? Why were you holding this information before the Bombay attacks? Why didn't you tell us? We are two countries we could have investigated it together. I am still ready, let’s meet."

रहमान मलिक की इतनी बातों के बाद कोई भी ये सोचने पर मजबूर हो सकता है कि भारत सिर्फ इल्जाम लगाता रहता है लेकिन कार्रवाई करने से बचता है। इसका मतलब ये हुआ कि भारत गुमराह करने की पॉलिसी अपना रहा है। पर ये पूर्ण सत्य नहीं है।

भारत कैसे अपने इंटैलिजेंस सीक्रेट किसी दूसरे देश और वो भी पाकिस्तान जैसे दुश्मन राष्ट्र के साथ शेयर कर सकता है। कैसे-कैसे करके हमारी इंटैलिजेंस एजेंसी खबरों को इक्ट्ठा करती हैं उस पर यदि भारत ये बात भी शेयर करने लग गया तो शायद जो लोग इस काम में लगे हुए हैं उनकी जान सलामत नहीं रहे। लेकिन हां, भारत ये कर सकता था कि उस तथ्यों के पुलिंदों में से कुछ तथ्यों को पाकिस्तान भेज कर ये साबित जरूर कर सकता था कि हां हमारे पास एविडेंस है, सबूत हैं।

जानते हैं कि पाक उस पर कार्रवाई नहीं करता और गर करता भी तो पहले से ही वहां से आतंकी संगठनों को हटा दिया गया जाता। आतंकवादियों को हटाने या पकड़ने के लिए पाक का एक भी सिपाही मारा नहीं जाता। आर्मी इधर होती है तो बम उधर फटता है। क्या इस के पीछे की नीतियां समझ में नहीं आती?

चीन से मिलकर पाकिस्तान की भारत के ऊपर अपना रुतबा कायम करने की कोशिश असर नहीं दिखा पाएगी। माना कि भारत हथियारों और ताकत के मामले में चीन से पीछे है पर हथियारों कि गुणवत्ता में पीछे नहीं है। भारत के पास लेटेस्ट तकनीक के हथियार हैं और वही चीन के पास हथियारों की तादाद ज्यादा है पर वो बहुत पुराने हैं। भारत का एक हथियार उनके चार के बराबर है। पर ये सत्य है कि कई जगहों पर हम चीन के पासंग भी नहीं है। जहां तक पाकिस्तान की बात की जाए तो भारत उनसे हर क्षेत्र में कहीं ज्यादा आगे है।

ध्यान तो इस बात का रखना है कि भारत में मौजूद गद्दार भारत की जमीन को नुकसान नहीं पहुंचा सकें। साथ ही उन अलगाववादियों को भी ये सोचना चाहिए कि चाहे चीन दागे या फिर पाकिस्तान, गोली, बारूद और बम की आंखें नहीं होती वो दोस्त और दुश्मन में फर्क करना नहीं जानती। यदि भारत की जमीं पर बम फटेगा तो यहां मौजूद दोस्त-दुश्मन सब के शरीर छलनी होंगे। बेहतर है कि भारत को एकजुट रहने दो और खुद भी मिल कर रहो और दुश्मनों का मिलकर मुकाबला करो।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, August 28, 2009

11 दिन के बीते पन्ने

आखिरकार दो दिन के इंतजार के बाद हमारे कंप्यूटर के डॉक्टर साहब आए और फिर आते ही बेचारे को इंजेक्शन। पर इस बार एक ही इंजेक्शन में ठीक। जो 1 जीबी की रैम लगाई गई थी उसमें ही प्रोब्लम थी। जैसे ही बदली गई रैम कंप्यूटर जी दुरुस्त। बहरहाल, इस बीच कुछ मुद्दे ऐसे उठे जिन पर लिखने की काफी इच्छा कर रही थी। साथ ही वो मुद्दे ऐसे थे जिनको मैं अपने ब्लॉग पर सहेजना जरूर चाहूंगा। क्योंकि उनमें से कुछ घटनाएं ऐसी थी जो शायद कभी दोबारा नहीं होंगी।

शाहरुख को अमेरिका में एक एयरपोर्ट पर करीब दो घंटे तक रोके रखा गया, जसवंत सिंह की किताब पर बवाल, खेमों में बंटी बीजेपी, मोदी ने जसवंत की किताब पर लगाया बैन पर दूसरे बीजेपी शासित राज्यों के सीएम ने किया इनकार, बीजेपी से निकाले गए जसवंत सिंह और सुध्रींद्र कुलकर्णी, और वहीं दूसरी तरफ किताब पर अरुण शौरी के तीखे तेवर, अब यशवंत सिन्हा का भी आडवाणी पर निशाना। वसुंधरा राजे का नया मोर्चा, खेल की खबरों में ऐशेज में ऑस्ट्रेलिया हारा और खिसका चौथी रैंक पर वहीं भारत दूसरी पायदान पर, ओलंपियन और ब्रान्ज मेडलिस्ट मुक्केबाज विजेंद्र कुमार वर्ल्ड के दूसरे नंबर के बॉक्सर बन गए और ऐसी ही बहुत सी खबरें थीं जिनपर लिखना चाहते हुए भी मैं लिख नहीं पाया था।

सबसे पहले बात शाहरुख खान की।

बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान आजादी के दिन एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए यूएस जाते हैं और वहां पर किंग खान को दो घंटे तक रोक कर पूछताछ की जाती है। बकौल शाहरुख उनसे पूछताछ उनके नाम में जुड़े ‘खान’ के कारण की गई। वहां शाहरुख के साथ ऐसा हुआ यहां देश में लोग आगबबूला हो गए। अंबिका सोनी ने तो यहां तक कह दिया कि अमेरिकन सेलिब्रिटिज जब भारत आएं तो उनके साथ भी ऐसा ही बर्ताव हो। पर वहीं सलमान खान सामने आए और फिर शुरू हुई खान वॉर। सल्लू ने कहा ये तो होता ही रहता है इसमें कोई नई बात नहीं है। पर अब उसी फजीहत से बचने के लिए सल्लू आने वाली फिल्म ‘वॉन्टेड’ के प्रमोशन के लिए अमेरिका नहीं जा रहे हैं।

शाहरुख ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सब सवालों के जवाब भी दिए। जब ये बात सामने आई तो शाहरुख ने कहा कि नेवार्क एयरपोर्ट के अधिकारियों का रवैया ठीक नहीं था पर जो हुआ सो हुआ अब इस बात को तूल नहीं देना चाहिए। फिर पहले तूल क्यों दिया गया? इस पर एस पी महासचिव और अमिताभ बच्चन के मुंह बोले भाई अमर सिंह बीच में कूद पड़े और कहा कि ये तो आने वाली फिल्म को लेकर शाहरुख खान का पब्लिसिटि स्टेंट है।

बीजेपी में किताब पर कलह।

शिमला में बीजेपी की चिंतन बैठक से पहले जसवंत की लिखी किताब पर उठी चिंता को दूर किया गया और उन्हें निष्कासित कर दिया गया। 30 साल की बफादारी एक फोन पर ही खत्म कर दी गई। आज तक भारतीय इतिहास में हम ये पढ़ते आए हैं कि भारत को आजादी महात्मा गांधी ने दिलवाई। आजादी में योगदान पंडित नेहरू और सरदार पटेल ने देश को एकजुट किया पर ये हमारे हीरो हैं। साथ ही जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग की और आजादी के साथ विभाजन के दर्द का विलेन उन्हें माना गया। पर जिन्ना को हीरो और पंडित नेहरू और सरदार मोदी को विलेन के कठघरे में लाकर जसवंत सिंह ने खड़ा कर दिया। यहीं से बवाल की शुरूआत हुई। मोदी ने किताब में सरदार पटेल के बारे में गलत लिखने पर गुजरात में बैन कर दिया। वहीं कुछ और बीजेपी शासित राज्यों में बैन नहीं लगाया गया। और ये टकराव सामने आया जो कि मोदी के खिलाफ खड़ा नजर आया। सुध्रींद्र कुलकर्णी को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। किताब और कई मुद्दों पर अरुण शौरी ने पार्टी नेतृत्व पर निशाना साधा और संघ को अपना चाबुक चलाने के लिए कहा।

जसवंत सिंह ने हाल ही में कहा था कि उन्होंने आडवाणी को बचाया। उसी बात को ब्रजेश मिश्र और यशवंत सिन्हा दोनों ने आगे बढ़ाया। वहीं राजनाथ और आडवाणी के फरमान को दरकिनार करते हुए वसुंधरा राजे आज भी पद पर कायम हैं। कुछ भी हो आगे आने वाले दिनों में संघ का प्रभुत्व बीजेपी पर भारी पड़ेगा। जैसे कि पहले हुआ करता था। अभी जल्द ही कुछ और फेरबदल देखने को मिल सकता है।

नाक कट गई ऑस्ट्रेलिया की

इंग्लैंड से एशेज सीरीज 2-1 से हारकर ऑस्ट्रेलिया चौथे नंबर पर पहुंच गया। टेस्ट रैंकिंग में वो कभी चौथे पायदान पर लुढ़क जाएगा शायद ऐसा कभी ऑस्ट्रेलिया ने नहीं सोचा होगा। ये इतिहास में पहली बार हुआ है कि ऑस्ट्रेलिया के एक ही कप्तान ने दो बार अपने कार्यकाल में एशेज गंवाई हो। 2005 के बाद 2009 ने ऑस्ट्रेलिया की शर्मनाक हार हुई। वहीं इंग्लैंड के ऑलराउंडर एंड्रयू फ्लिंटॉफ को उनकी टीम ने एक खूबसूरत विदाई दी। विवादित खिलाड़ी फ्लिंटॉफ को हम भारतीय तो युवराज के कारण ही याद रखेंगे जब कि 20-20 में युवी से फ्लिंटॉफ नहीं भिड़े होते तो ब्रोड को युवी 6 छक्के नहीं मार पाते।

डीडीसीए में जिस्मफरोशी

सहवाग के इल्जामों की झड़ी अभी रुकी नहीं थी कि कीर्ती आजाद ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि दिल्ली के क्रिकेट में लड़कियां सप्लाई की जाती है। मतलब साफ था कि यदि किसी खिलाड़ी को चुना जाना है तो उसे कीमत अदा करनी होगी और वो कीमत लड़की के रूप में देनी होगी। युवराज ने भी आरोप लगाए कि उनके साथ भी छोटे स्तर पर भेदभाव हो चुका है और ये सब उनको सहना पड़ा है। पर ये पता नहीं कहा तक सच है क्योंकि योगराज के बेटे के साथ यदि नाइंसाफी हो सकती है तो फिर किसी के साथ भी हो सकती है।

कुछ और खबरों के अलावा ये वो खबरें थीं जिन पर मैं लिख नहीं सका पर हां इतिहास के पन्नों को फिर से पलट कर देखने की इच्छा हो उठी क्योंकि कुछ बातें तो जसवंत सिंह ने सही कहीं हैं पर मैं उनकी हर बात से इत्तेफाक नहीं रखता। मैंने इसके पीछे काफी रिसर्च की है। जिन्ना यदि इतने ही सेकुलर थे या फिर इतने ही बड़े आजादी के नेता थे तो कहीं पर भी उनका जिक्र क्यों नहीं आता। क्यों सिर्फ पाकिस्तान में ही वो जाने जाते हैं। क्यों 1927 के बाद ही उनकी तरफ से ये पहल हुई कि मुस्लमानों के लिए एक अलग राष्ट्र होना चाहिए थे। सुभाष चंद्र बोस क्या बंगालियों के लिए लड़ रहे थे। इतिहासकार कहते हैं कि यदि बोस गायब नहीं हुए होते तो शायद भारत 1945 में ही आजाद हो गया होता। तो जिन्ना को हीरो बनाने के पीछे क्या कारण है। और सबसे बड़ा सवाल जिन्ना के दादा हिंदू थे फिर भी हिंद राष्ट्र से क्यों जलन थी जिन्ना को। कौन थे ये कायदे आजम। भारत के इतिहास के पन्नों पर लिखी आजादी के वो अनछपे पन्नों के बारे में लिखने की कोशिश में।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, July 24, 2009

आखिर आ ही गई अक्ल

१८ जुलाई २००९ को मैंने यूपी में हाल ही में उठे उस बवंडर के बारे में एक पोस्ट ‘ये रेप की राजनीति है यूपी वालों, मायवती की दोगली नीति।’ लिखी थी जिसमें जिक्र किया गया था कि राजनीति का, जो उठी है रेप से। मैंने उस लेख के जरिए कई सवाल खड़े किए थे ‘.....इज्जत की कीमत तो आप २५ हजार दे रही हैं पर उस कीमत को चुकाने के लिए ५ लाख खर्च कर रही हैं। हेलिकॉप्टर से डीआईजी जगह-जगह जाते हैं और खर्च करते हैं करीब ५ लाख सिर्फ फ्यूल में। क्या ये बेहतर नहीं होता कि उस जिले के वरिष्ठ अधिकारी उस पीड़ित परिवार को मुआवजा दे देते……’।

अब सरकार ने ये फैसला किया है कि अब जिस जिले में रेप जैसा कुकर्म होगा तो उस जिले के वरिष्ठ अधिकारी को ही जलील होने के लिए और साथ ही पैसे पहुंचाने के लिए पीड़ित के परिवार वालों के पास जाना होगा। ये फैसला आने वाले दिनों के लिए काफी अच्छा है। क्यों हर बार एक प्रदेश के डीआईजी रैंक के अफसर को अपने ही डिपार्टमेंट के कुछ नाकारा लोगों की नाकामी की कीमत के एवज में अपनी गर्दन झुकानी पड़े। अब जो होगा नाकाम वो ही जाएगा शर्मिंदा होने के लिए। जो भी हुआ अच्छा हुआ अब फिजूलखर्ची तो रुकेगी ही और शायद खुदा ना करे कि कोई रेप का पीड़ित हो पर यदि कोई होता है तो ज्यादा से ज्यादा मुआवजा मिल सके।

कौन कहता है कि ब्लॉग नहीं पढ़े जाते, क्या मालूम हमारी पोस्ट को पढ़कर ही किसी ने ये बात आगे रखी हो। विभाग के अधिकारियों को ज्ञान मिलने के बाद ये फैसला ले लिया गया हो। हो तो कुछ भी सकता है।

आपका अपना
नीतीश राज

Sunday, July 19, 2009

अंग्रेजों की नीति अपना रहा है अमेरिका, भारत-पाक को लड़ाकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है।

किसी भी देश का कोई प्रतिनिधि यदि किसी देश का दौरा करता है तो सबसे पहले माना ये जाता है कि दोनों देशों के बीच संबंध मधुर होंगे और साथ ही कुछ नई राह खुलेंगी। कुछ समझौतों भी हो सकते हैं साथ ही कुछ नए प्रोजेक्ट पर भी चर्चा होगी। और यदि वो देश आतंकवाद का शिकार रहा है तो फिर आतंक से निपटने की बात भी होगी।

जब अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत के दौरे पर मुंबई पहुंची तो लगा कि भारत-अमेरीका के रिश्तों में ये एक अच्छी शुरूआत होगी। अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति के पद से चूक चुकीं हिलेरी ने भारत में आकर रिश्तों को आगे तो बढ़ाया पर इस रिश्ते पर सवाल भी खड़ा कर दिया।

हिलेरी क्लिंटन ने मुंबई में 26/11 आतंकवादी हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी साथ ही उसकी तुलना अमेरिका में हुए 9/11 हमलों से कर दी। ताज होटल के कर्मचारियों के जज्बे की तारीफ और बहादुरी की तारीफ की “....मैं आपके जज्बे को सैल्यूट करती हूं...मैं सलाम करती हूं मुंबई के साहस को ...”। हिलेरी वहां मौजूद थी जहां आंतकवादियों ने क़हर बरपाया था। ताज होटल की लॉबी में वो उस जगह पर मौजूद थीं, जहां 26/11 की याद में 'ट्री ऑफ लाइफ' बनाया गया था।

एक तरफ तो हिलेरी ने देशवासियों को ये याद दिला दिया कि अमेरिका भारत के साथ है आतंकवाद की लड़ाई में। पर दूसरी तरफ ट्री ऑफ लाइफ के पास खड़ीं हिलेरी ने पाकिस्तान की तारीफ में कसीदे भी पढ़ दिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी आतंकवाद को खत्म करने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं। सिर्फ वो यहीं पर नहीं रुकी उन्होंने ये भी कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ ठोस कदम उठा रहा है। यहां इस बात का हवाला देने का क्या मतलब। क्या वो यहां पर पाक की पैरोकार बन कर आईं हैं। शायद नहीं क्योंकि उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये कह दिया था कि वो सिर्फ भारत-अमेरिका के रिश्तों पर ही बात करेंगी। तो फिर पाकिस्तान की तारीफ करने का क्या मतलब? या वो भारत में अमेरिका का स्टेंड साफ कर रहीं थी कि अमेरिका क्या सोचता है?

हाल ही में जरदारी ने कहा था कि अमेरिका पर 9/11 हमलों के बाद पाकिस्तान के लिए ही पाक टुकड़ों पर पलने वाले आतंकवादी खतरे का सबब बन चुके हैं। हिलेरी जी को शायद ये नहीं पता कि पाकिस्तान भारत सियालकोट सीमा पर अपने बंकर खड़े कर रहा है। यदि अफ्गानिस्तान का मामला या यूं कहें कि गृह युद्ध की नौबत नहीं होती स्वात, बलुचिस्तान, लाहौर में तो पाकिस्तान अपनी सीमा से सेना कम नहीं करता

इस सब बातों को देखकर लगता है कि अमेरिका फिर दोतरफा चाल चल रहा है। एक तरफ तो भारत के साथ मिलकर आतंकवाद खत्म करने की बात कर रहा है वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान को भी क्लीन चिट देने में लगा हुआ है। इस कूटनीति को भारत को समझना चाहिए और हो सके तो कुछ मुद्दों पर अमेरिका का हस्ताक्षेप बर्दाश्त नहीं करना चाहिए।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, May 19, 2009

सरकार में रहने का सुख भोगना चाहते हैं मुलायम और मायावती, इसलिए कह रहे हैं सरकार में हमें भी ले लो, प्लीज़.....।

कांग्रेस को एक तरह से पूर्ण बहुमत मिला नहीं कि सभी छोटी पार्टियां लगी हुई हैं कि हमें भी गठबंधन में ले लो। सरकार में रहने का सुख भोगना चाहते हैं अब सभी। जनता ने कांग्रेस को बहुमत के करीब पहुंचा कर ये तो साबित कर दिया है कि अब क्षेत्रिय पार्टियों को काम करना ही पड़ेगा।

इस पूरे चुनाव के दौरान और चुनाव से पहले मायावती के निशाने पर गर कोई था तो पार्टी के रूप में कांग्रेस और शख्स के रूप में राहुल गांधी। कांग्रेस के लिए मायावती का हर रैली में ये कहना था कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश सरकार को पैसा मुहैया नहीं करा रही है, कांग्रेस झूठी पार्टी है और पता नहीं क्या-क्या। चुनाव के दौरान ही मायावती ने राहुल पर निशाना साधते हुए कहा था कि गरीबों के घर में सो जाने से कोई गरीबों के दर्द को नहीं समझ सकता और राहुल के गांवों के हर दौरे पर मायावती के निशाने पर ही राहुल गांधी होते थे। आज एक रैली में माया पलट गईं और कहने लगीं कि बिना शर्त के वो समर्थन देने को तैयार हैं क्योंकि मनमोहन सिहं ने उन्हें छोटी बहन कहा था। छोटी बहन तो संजय दत्त ने भी कहा था तो क्या उस पार्टी के साथ चलना चाहेंगी आप? नहीं। जवाब सभी जानते हैं।

आखिरकार मायावती को एकदम से हुआ क्या जो कांग्रेस की इतनी बुराई करती थी वो एकदम से कैसे सरकार के साथ चलने लगी है। जो वो कांग्रेस के पीछे हाथ धोकर पड़ गई कि सरकार में हमें भी ले लो प्लीज।
इस सब के पीछे एक बहुत बड़ी चाल है मायावती की। मायावती अब उत्तर प्रदेश से एसपी को खत्म करना चाहती हैं। इसलिए वो सरकार का हिस्सा बनना चाहती हैं क्योंकि यदि देखें तो राज्य में तो खुद माया काबिज हैं पर यदि केंद्र में भी हिस्सेदारी हो जाएगी तो अमर-मुलायम से वो पिछले सारे हिसाब बराबर कर सकेंगी।

लखनऊ में मायावती ने किया क्या है? एक अपनी महत्वाकांक्षी योजना में करोड़ों रु लगाए जा रही हैं। दूसरी तरफ मुलायम सरकार में बना लोहिया पार्क आज पानी को तरस रहा है। उस पार्क में कोई पानी भी देने वाला भी नहीं है। अरे अपनी लड़ाई में एक दूसरे का सर फोड़ो जो करना है करो पर जनता का तो भला रहने दो। पूरे शहर को नीला ही नीला कर दिया पोस्टरों से अखिलेश दास गुप्ता के पोस्तरों से। हर जगह नीली लाइट क्या है ये। विकास के नाम पर क्या किया?????

वहीं यदि देखें तो बार-बार दुत्कार दिए जाने के बाद भी अमर सिंह राष्ट्रपति को समर्थन पत्र देने अकेले ही पहुंच गए। अरे तुम समर्थन नहीं चाहोगे तो भी हमें तो आता ही है समर्थन देना। भई, यदि सरकार को बाहर से समर्थन देंगे तो भी तो सरकार के साथ तो रहेंगे ही कोई इतनी आसानी से हाथ तो नहीं डाल पाएगा। गर कोई डालने की हिम्मत करेगा तो जिस चीज में हम माहिर हैं हम वो करेंगे। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मम्मी... मम्मी चिल्लाने लगेंगे अपने बचाव में। मम्मी कुछ तो ध्यान देंगी ही। यदि सरकार में शामिल नहीं होंगे तो मायावती जरूर से जेल में डलवाकर चक्की पिसवाएंगी। तो ये तो एसपी की मजबूरी है कि उसे हर हाल में, कैसे भी सरकार में शामिल होना होगा। पहलवानी के जोश में पूर्व पहलवान मुलायम सिंह ने लगता है कि कुछ काम ऐसे कर रखे हैं जो कि भविष्य में उनकी सेहत के लिए सही नहीं है।

वहीं कुछ ऐसे भी दल हैं जो कि लड़े तो एनडीए के साथ और अब सरकार में शामिल होने के लिए यूपीए गठबंधन में रास्ते खोज रहे हैं। हर बार पलटू राजनीति में माहिर अजित सिंह ये ही कर रहे हैं। जिगरा तो नीतीश कुमार के जैसा होना चाहिए था जो एनडीए के साथ चुनाव तो नहीं लड़े पर जब से उनके साथ आए तो उनके साथ ही हैं। बशर्ते कि नीतीश कुमार ने बिहार में बहुत काम किया पर इस मसले पर जनता का उल्लू खींचा।

सारी दुनिया कह रही थी कि तीन देवियां सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाएंगी। पर एक देवी के सामने सभी देवियां फीकी पड़ गईं। ये राजनीति है कुछ भी करा सकती है। वैसे कांग्रेस को नकारों की फौज खड़ी करने से बचना चाहिए। साथ ही इन सभी को सबक भी सिखाना चाहिए चाहे वो लालू-मुलायम-पासवान ही क्यों ना हों।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, May 18, 2009

जनता है ये सब जानती है....

चुनवा हो गए और जनता ने चुन लिए हैं अपने नेता। साथ ही बता दिया है कि जनता के लिए कौन से मुद्दे हैं जिनपर वो वोट देती है। इस बार के चुनावों में जनता ने अपने आपको वोट दिया। जिसको चाहा उसको ही संसद की राह दिखाई। जनता विकास देखना चाहती है, अव वो ठगा जाना नहीं चाहती, अब वो नहीं डरती। जिनसे डरती थी उनको इस बार वोट नहीं दिया।
जनता ने कर दिखाया वो काम जो कि कानून की मोटी-मोटी किताबें और धाराएं नहीं कर सकी क्योंकि कानून ने बांध रखी है आंख पर पट्टी। जनता ने पूरा पत्ता साफ कर दिया उन बाहुबलियों का जो कल तक अपने आप को नेता कहते थे, जिनके ऊपर चलते थे कई मकद्दमें, पर हुए नहीं थे फैसले जनता ने एक उंगली से ही कर दिया फैसला, और कर दिया उन सभी का सूपड़ा साफ।

उत्तर प्रदेश हो या फिर बिहार या फिर महाराष्ट्र सभी जगह से ये भाई लोग हारे। हर कोई हारा चाहे कितना बड़ा हो या फिर कितना ही भारी। पर फिर भी 150 दागी उम्मीदवार पास होने में कामयाब हो ही गए, जिसमें बीजेपी से 42, कांग्रेस से 41, समाजवादी पार्टी से 8 दागी संसद में पहुंच गए हैं।

उत्तर प्रदेश में जनता ने काफी उलटपलट कर दिया। गाजियाबाद के डीपी यादव का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफी रसूख है पर इस बार वो भी काम नहीं आया और जनता ने उन्हें भी टिकट देने से इनकार कर दिया। वैसे भी राजनीति में डीपी यादव के अब चंद ही दिन बाकी रह गए थे तो जनता ने इस बार बता दिया कि वो दिन भी पूरे हो गए। अतीक अहमद को अपना दल ने प्रतापगढ़ से टिकट दिया था पर ना तो अतीक का ना ही अपना दल का और ना ही इन दोनों का प्रताप कुछ काम आया।
मुख्तार अंसारी को बीएसपी ने वाराणसी से दिया था टिकट। बीजेपी के विधायक कृष्णानंद राय के कत्ल के आरोप में गाजीपुर जेल में बंद हैं मुख्तार अंसारी। इस बार जनता ने मुख्तार को संसद के अंदर का नहीं जेल के अंदर का टिकट काट कर दे दिया। मुख्तार के बड़े भाई अफजाल अंसारी को टिकट तो मिल गया पर गाजीपुर से जीत नहीं।
उन्नाव की लोकसभा सीट इसलिए इस बार काफी चर्चा में रही क्योंकि यहा की प्रत्याशी कांग्रेस की अनु टंडन के प्रचार के लिए सलमान खान गए थे। अनु टंडन का मुकाबला था वहां के डॉन अरुणशंकर शुक्ला उर्फ अन्ना का। लेकिन जनता ने डॉन को नहीं सीधी सादी अनु टंडन को संसद का टिकट दे दिया।

बिहार में इस बार सब को पता था कि नीतीश कुमार की मेहनत रंग लाएगी। नीतीश कुमार ने बिहार में लोगों के अंदर से भय गायब किया है। तो जनता ने भी इस का जवाब देते हुए राज्य से साले साहब साधु यादव, तसलीमुद्दीन, मुन्ना शुक्ला, रामा सिंह, प्रभुनाथ सिंह जैसे आपराधिक तत्वों को हरा कर नीतीश का साथ दिया है। पूर्णिया से बाहुबलि पप्पू यादव की पत्नी रंजीता रंजन सुपौल से और मां पूर्णिया से बुरी तरह हारी। सीवान से शहाबुद्दीन की बेगम हिना, आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद और डॉन सूरजभान की पत्नी वीणा नवादा से अपने पति के कर्मों के कारण इन्हें हार का मुंह देखना पड़ा।

जनता ने लेकिन इस बार ये दिखा दिया कि यदि वो चाहे तो क्या नहीं कर सकती है। पर अभी जनता को और जागरुक होना होगा। नामचीन बाहुबलियों को और उनके मंसूबों को तो जनता ने हरा ही दिया है पर फिर भी यदि देश को सुरक्षित रखना है तो इन दागियों को संसद का टिकट पाने से सिर्फ जनता ही रोक सकती है।

वहीं दूसरी तरफ जनता ने इस बार जितने भी सौदेबाज थे उतनों को हराकर साबित किया है कि वो स्थाई सरकार बनाना चाहती है। जितनी भी छोटी पार्टियां चंद सीटें जीतने के बाद सौदे करती है उन्हें जनता ने सिरे से नकार दिया। जनता ने कहा 'NO TO THEM'. चाहे वो लालू हों या फिर पासवान या फिर मुलायम-अमर की जोड़ी या फिर माया या लेफ्ट की कोई नई चाल। ऐसा हुआ कि कुछ गढ़ से ही कुछ का तो पत्ता साफ हो गया।

जनता है ये सब जानती है...पब्लिक है....।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, May 16, 2009

सारे आंकड़े फास, बीजेपी का सूपड़ा साफ, कांग्रेस के हाथ सरकार

इंतजार की घड़ी खत्म हुई और कांग्रेस इतनी बड़ी जीत के साथ सामने आएगी शायद ही किसी ने सोचा हो। और बीजेपी को ज़ोर का झटका ज़ोर से ही पड़ा। बीजेपी का हाल ये होगा ऐसा भी किसी ने सोचा नहीं होगा। सबसे ज्यादा खराब स्थिति भी गर सोची जा रही थी तो बीजेपी को १३० सीटों से कम कोई नहीं सोच रहा था। बीजेपी के दिग्गज कह रहे थे कि इस बार तो बीजेपी यूपी में अपना परचम फिर से लहराएगी पर ऐसा हो ना सका। इस बार तो बीजेपी सबसे खराब स्थिति के नंबर को भी नहीं पकड़ पा रही। पीएम इन वेटिंग का वेट और बढ़ गया। नहीं चला आडवाणी जी का जादू और शायद अब वो कभी पीएम नहीं बन पाएंगे। आडवाणी जी का सुनहरा सपना टूट गया। आखिरकार ये साबित हो गया कि देश पर नहीं चला लौह पुरूष जादू। गुजरात को छोड़ दें तो मोदी अपनी साख के मुताबिक कहीं पर भी आंकड़े नहीं बटोर पाए। इस बार के चुनाव के नतीजों के बाद यदि ये सोचा जाए कि बीजेपी को फिर से जुगत लगानी होगी अपना नया पीएम इन वेटिंग ढूंढने में। मोदी का गढ़ है गुजरात पर मोदी देश के नेता नहीं हैं, नतीजे तो ये ही कहते हैं।

कांग्रेस के लिए सबसे खराब स्थिति में भी १४० का आंकड़ा छूने की बात कही जा रही थी। यहां तो कांग्रेस २०० के आंकड़े के पार जा पहुंची। यहां पर सिपाहासलार की भूमिका में सोनिया पर जनता ने विश्वास किया। पीएम मनमोहन सिंह के कामों पर जनता ने मोहर लगाई। लोगों ने राहुल गांधी के जज्बे को पहचाना। पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अपने नेताओं पर भरोसा किया और जनता को साथ चलने के लिए राजी किया। जब ही तो यूपी में राहुल की मेहनत रंग लाई या यूं कहें देश में उनको पहचान मिली। राहुल के साथ युवा जुड़े और देश को आगे बढ़ाने की राह पर निकल चले। दिल्ली में शीला दीक्षित के काम को लोगों ने ७-० से जीता दिया। दिल्ली और पंजाब में टाइटलर और सज्जन कुमार को हटाना अच्छा रहा। इससे सिखों का वोट मनमोहन सिंह और कांग्रेस को मिला। राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, यूपी, दिल्ली, महाराष्ट्र, केरला, आंध्र प्रदेश सभी जगह कांग्रेस ने बढ़त बनाई।

कांग्रेस ने जो दो-तीन गलती पिछली बार की थी उससे उनको सबक लेना होगा। शिवराज पाटील को हटाना फायदेमंद रहा पर ये ध्यान में रखना होगा कि कहीं फैसले लेने में ज्यादा देर ना हो जाए। नटवर सिंह को विदेश मंत्री के पद से हटाना भी सही फैसला था। पर इस बार थोड़ा सोच-समझकर चलना होगा वर्ना जनता सब जानती है।

तीसरे मोर्चे को काफी नुकसान हुआ सीट और पैसे दोनों मामलों में। अब इनकी दादागीरी नहीं चलेगी। पासवान-लालू लोग खरीद-फरोख्त का धंधा नहीं कर सकेंगे, सौदेबाजी नहीं कर सकेंगे। ये अच्छा हुआ कि नीतीश कुमार के काम को लोगों ने पहचाना और वोट दिया और उनकी पार्टी को जीता दिया। पर नीतीश कुमार को अभी फैसला करना होगा कि वो किस करवट बैठेंगे।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, May 2, 2009

जो जैसा बोएगा, वैसा ही काटेगा, समझे वरुण

5 मार्च को पीलीभीत में वरुण गांधी ने एक ऐसा भाषण दिया था जिसने उन्हें एक बार में ही पहचान दिला दी। वर्ना संजय गांधी के नाम की छाप और फिर मेनका गांधी की छाया वरुण के नाम पर हमेशा हावी रही। वरुण गांधी के बारे में पिछले पांच साल में तो कोई किस्सा या कोई भी खबर सुनी नहीं गई थी। वहीं यदि गौर करें तो राहुल गांधी पूरे पांच साल के दौरान कई बार सुर्खियों में आए। उसके पीछे सत्ता में होना भी माना जा सकता है। पर फिर भी बीजेपी ने राहुल के तोड़ के रूप में वरुण को ही चुना। दोनों एक ही परिवार से, दोनों में एक जैसा जोश। पर यहां पर ये जोश थोड़ा अलग, एक में जोश थोड़ा ठहराव लेकर और दूसरे का जोश थोड़ा उबाल लेकर। बीजेपी ने इस उबाल को पहचाना और वरुण को खड़ा करने की कोशिश की राहुल के खिलाफ।

पर उस वक्त बीजेपी और वरुण दोनों धड़ाम से गिर पड़े जब पीलीभीत में ही एक सभा के दौरान कुछ अन्य नेताओं के साथ वरुण का मंच गिर पड़ा। जो जहां था वहीं सहम कर रह गया। कुछ देर तक तो लोगों को ये समझ में नहीं आया कि आखिर हुआ क्या? पर वरुण को समझते देर नहीं लगी। जमीन पर पैर लगते ही जेल से लौटने वाले वरुण नाम के इस नेता को ये एहसास हो गया कि वो मंच से गिर पड़ा हैं। वरुण ने तुरंत अपने को संभाला और फिर चढ़ गया मंच के उस हिस्से पर जो अभी दुर्रुसत था। साथ के लोगों को और फिर जनता को भी संभाल लिया। कुछ भी हो मार्च से मई तक के उतार चढ़ाव, जेल, कोर्ट ने वरुण को नेता बना दिया।

क्या कहेंगे इसको किस्मत। जिस जगह ने उसे सराखों पर बैठाया उसी जगह पर वरुण धड़ाम से गिर पड़े। वरुण ने भी कभी सोचा नहीं था पर ये हुआ और शायद ये एहसास भी हुआ हो कि जो जैसा बोता है वैसा ही काटता भी है, चाहे आज या फिर कल।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, April 29, 2009

राजनीति, अब लॉन्ग टेनिस का ग्राउंड बन चुकी है।

हम सब लॉन्ग टेनिस के बारे में जानते हैं और कुछ तो इस खेल पर हाथ आजमा भी रहे होंगे। जो इस खेल के बारे में ना जानते हों उन्हें ये बता दूं कि आजकल हमारी राजनीति में कुछ इसी तरह का खेल चल रहा है। इस खेल के बारे में थोड़ा ध्यान से वर्ना समझ नहीं पाएंगे और जब समझ नहीं पाएंगे तो हार आपकी निश्चित है। पहला खिलाड़ी चारों तरफ से घिरे स्टेडियम में ठसा-ठस भीड़ के सामने हाथ में रैकेट लेकर मैदान में खड़ा होता है और दूसरे छोर पर दूसरा खिलाड़ी सामना करने के लिए तैयार। पहला खिलाड़ी गेंद को दूसरे खिलाड़ी के पाले में जान लगाकर फेंक देता है। ऐसा करने पर कई बार पहले वाले खिलाड़ी की आवाज़ हलक से बाहर भी आ जाती है। स्टेडियम में बैठे उस खिलाड़ी के दीवाने जोश में भर जाते हैं। वहीं दूसरा खिलाड़ी भी अपनी पूरी ताकत के साथ गेंद को फिर से पहले वाले के पाले में फेंक देता है। पहला खिलाड़ी और दम लगाता है, दूसरा खिलाड़ी उससे भी ज्यादा दम लगाता है, उनके दीवाने जोश से उछलने लगते हैं। गेंद एक दूसरे के पाले में फेंकने लगते हैं। अब दूसरे खिलाड़ी के दीवाने ज्यादा दम लगाने और दिखाने के चक्कर में हलक की आवाज़ स्टेडियम के बाहर तक चली जाती है। इधर की आवाज़-उधर की आवाज़, इधर का जोश-उधर का जोश। इस जोश से भरी आवाज़ के जोश में कई बार दीवानों के साथ-साथ खिलाड़ी भी होश खो बैठते हैं। कई बार इसी कारण से बाहर वालों को दिक्कत होने लग जाती है और गेम को गेम की तरह खेलने का आग्रह लेकर आसपास-पड़ोस के लोग उन्हें समझाकर चले जाते हैं।

आजकल हमारी राजनीति उस खेल की तरह चल रही है जिसे खासतौर पर भारत में तो एक लड़की के कारण ज्यादा पहचाना जाने लगा। और उसी बाला से बला के गुण सीख कर हमारे नेता उसे मंच पर आजमा रहे हैं।

आजकल हर दिन ये सुनने को मिलता कि किसी नेता ने दूसरे नेता के लिए कुछ कह दिया, थोड़ा सा दम लगाकर। अब गेंद उस दूसरे नेता के पाले में चली गई। उसने थोड़ा ज्यादा दम लगाकर गेंद पर गाली लपेटकर पहले वाले नेता के पाले में फेंक दी। और फिर सिलसिला शुरु होगा। वार पर पलटवार हो गया और फिर उस पलटवार पर भी पलटवार हो गया।

पहले आडवाणी जी ने शुरुआत की तो फिर मनमोहन जी ने भी जवाब दिया। बात कुछ ज्यादा होचली तो आस पास के लोग भी जुड़ गए। सोनिया गांधी फिर राहुल-प्रियंका सब हाथ धोकर पीछे पड़ गए आडवाणी के। आडवाणी जी सकपका गए, बोलने लगे कि क्या मैंने कुछ गलत कहा या बिलो द बेल्ट हिट किया। आडवाणी जी को बचाने के लिए इस बार अटल जी नहीं हैं तो राजनाथ जी जब तक पाला संभालते तब तक मोदी जी कूद पड़े। अब मोदी ने कुछ बोला तो जवाब प्रियंका ने दे दिया। इतने कद्दावर नेता को गेंद सीधे सर पर लगी कि इतनी पिद्दी सी प्रियंका कैसे जवाब दे सकती है। तो फिर गेंद को प्रियंका के पाले में फेंक दिया। इधर राहुल ने जवाब देना शुरु ही किया कि सबने कहा बच्चे की बात हम नहीं सुनते, ये खेल बच्चे नहीं खेलते। प्रियंका जो छोटी थी उसे सबने गंभीरता से लिया। गंभीर प्रियंका ने गंभीरता से जवाब दिया।

लॉन्ग टेनिस का मैच तो शुरु हुआ था और खत्म होगया चाहे वहां पर पांच सेट चले हों। ज्यादा हल्क से आवाज़ निकलने लगे तो आस-पड़ोस वाले समझाकर चले भी गए। पर राजनीति के खेल में गेंद के रूप में गाली, आरोप एक दूसरे पर लगते रहे और बढ़ते भी रहे। जो इन्हें शांत कराने आते वो इनके साथ ही जुड़ते चले गए और लगता नहीं कि इस चुनाव के ख़त्म होने तक ये दौर रुकेगा। सच, ये खेल बच्चों का नहीं है पर बड़ों को ये बात समझते हुए इस खेल को भी बड़ों की तरह ही खेलना चाहिए, ‘छोटों’ की तरह नहीं।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, April 22, 2009

अब बोल दिया सो बोल दिया, अब क्यों डर रहे हो आडवाणी जी। बिलो द बेल्ट तो आपने हिट किया ही था।

अब बोल दिया सो बोल दिया, अब डरना क्यों? ये तो नहीं लग रहा कि कहीं कुछ ज्यादा तो नहीं बोल दिया। कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे कि चुनाव के समय में इतने नीचे नहीं गिरना चाहिए था। बार-बार पीएम को कमजोर नहीं कहना चाहिए था। अब भई बार-बार किसी को फटकारते रहेंगे तो कभी ना कभी तो दूसरा फट ही पड़ेगा। जब दूसरा फट ही पड़ा है तो अब आप क्यों घबरा रहे हैं। क्यों? हर दिन कभी किसी चैनल पर तो कभी किसी अखबार में पीएम के बारे में आपको सफाई देते सुना जा सकता है।
मैंने तो सिर्फ मनमोहन सिंह को कमजोर प्रधानमंत्री कहा था। मैंने तो सिर्फ ये कहा था कि मनमोहन सिंह ने पीएम के पद के स्तर को कम किया है। मैंने तो सिर्फ ये कहा था कि वो सारे निर्णय सोनिया गांधी से पूछ कर लेते हैं। मैंने तो सिर्फ ये कहा था कि अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री यदि कोई हुआ है तो वो सिर्फ मनमोहन सिंह हैं। अब आडवाणी जी किसी को आप बार-बार ये सब कहते रहेंगे तो कौन चुप रहेगा। अब जब आपकी पोल पट्टी खुलने लगी तो नाराज़ बैठे हुए हैं और लगे हैं सभी से पूछने कि भई, क्या मैंने बिलो द बेल्ट हिट किया था?
जब आडवाणी जी चुप नहीं हुए और अपनी सभी रैलियों में उनका टेपरिकॉर्डर बजने लगा तो फिर कांग्रेस ने आडवाणी पर चौतरफा हमला करना शुरू कर दिया। अब ढाल के रूप में कोई सामने तो आया नहीं, तो लगे हैं रोने। आपकी एक के बाद एक गलतियां गिनाई जाने लगी तो लगा कि कहां पंगा ले लिया, मेरा गिरेबान तो ज्यादा मैला है। इस देश के हिंदुओं को तो छोड़िए, मुसलमानों के लिए भी जिन्ना किसी विलेन से कम नहीं था। आप पाकिस्तान जाते हैं तो लग जाते हैं उनकी तारीफ के गुणगान करने। तो जब भी इस मुद्दे पर आपको घेरा जाएगा तो संघ आपके साथ नहीं खड़ा होगा। बाबरी मस्जिद विध्वंश में आपकी भूमिका सब जानते हैं पर यहां पर दो धड़े हैं। हिंदु आपके साथ हो सकते हैं पर मुसलमानों के लिए तो आप विलेन ही हैं। तो जब-जब ये वाक्या सामने आएगा आपके वोट बैंक पर असर तो पड़ना ही है। कांधार मामले पर आपने अपना पल्ला झाड़ लिया पर उसमें भी आप फंस गए। उस समय आप गृहमंत्री थे और आपको इस बारे में जानकारी ही नहीं दी गई ये कोई पचा ही नहीं पा रहा है और यदि सच में नहीं दी गई तो आपकी पार्टी ही आप पर विश्वास नहीं करती। तो हर तरफ से आप फंस गए।
बेहतर तो ये है कि आप जब भी दूसरे पर हमला करें तो ये साथ में ध्यान रखें कि आप कितने पानी में हैं। अफजल गुरु के मामले में आप भी कठघरे में आते हैं जिसका जिक्र मैंने अपनी पिछली पोस्ट में किया है। १९९९ से लेकर २००४ तक आपने किसी भी राष्ट्रपति के पास पड़े माफीनामे पर कार्रवाई नहीं की उसके पीछे की वजह ये थी कि पहली बार ही यदि कुछ फैसले ले लेते तो हमेशा किसी वोट बैंक से आपको हाथ धोना पड़ता।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, November 15, 2008

क्या केक ऐसे काटा जाता है, नहीं, राज ठाकरे आपने तो केक चीरा है

कुछ लोग करतूत ही ऐसी करते हैं जिसे की कोई हजम नहीं कर सकता। 14 जून 2008 याने की इस साल का ही वीडियो सामने आया है जिसमें राज ठाकरे का जन्मदिन मनाया जा रहा था। इस वीडियो में दिख रहा है कि कैसे कोई किसी से कितनी नफरत कर सकता है कि अपने निजी जश्न में भी वो उसपर वार करने से नहीं चूकता। ये है राज
ठाकरे के दिल में उत्तर भारतीयों के खिलाफ नफरत।

जन्मदिन का वीडियो या फिर नफरत का

वीडियो में दिख रहा है कि एक ऐसा केक काटा जा रहा है जिसपर लिखा था-भैया। भैया, इसका मतलब किसी को समझाने कि जरूरत नहीं है। भैया का मतलब होता है बिहार- यूपी के लोग।
सबसे ज्यादा एतराज केक को काटने में है। जिस तरह से केक को काटा गया उसे शायद हम में से कोई भी ये नहीं कह सकता कि वो केक काटा गया। साफ दिखता है कि केक काटा नहीं गया उसे चीरा गया। सीधे-सीधे राज ठाकरे ने केक को पहले बाएं से दाएं और
फिर दाएं से बाएं चीर दिया जिसपर लिखा था भैया। 40 सेकेंड के वीडियो में ये सब दिखाया गया है।
केक पर वैसे तो नाम ही लिखा जाता है उस शख्स का जिसका कि जन्मदिन होता है। उस केक पर लिखा था भैया, लेकिन क्या राज ठाकरे को भैया के नाम से जाना जाता है या उन्हें कोई राज ठाकरे के नाम से पुकारता है जिसे कि एमएनएस के लोग गाली की तरह इस्तेमाल करते हैं। तो ये बात तो यहीं पर खारिज हो जाती है कि राज ठाकरे को भैया के नाम का केक गिफ्ट किया गया।

राज की बहन या फिर कार्यकर्ता

फिर राज ठाकरे को कोई भैया कहकर बहन पुकारती हो और उसने ये तोहफे के तौर पर भेंट किया हो। बात तुरंत कहते के साथ ही सामने आई। एमएनएस की महिला शाखा की सचिव रीता गुप्ता राज ठाकरे की बहन के रूप में सामने आई। जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने साफ कहा कि ये तो बड़ा ही पर्सनल वीडियो था इसे कैसे कोई सामने ला सकता है। साथ ही वो राज ठाकरे को भैया कहकर पुकारती हैं। तो उन्होंने गिफ्ट किया था अपनी ब्रेकरी में बना केक राज के जन्मदिन पर।
चलिए ये बात तो साफ हो गई कि केक बहन ने दिया था। पर केक काटने का तरीका सही था। रीता गुप्ता जी बार-बार इस सवाल को घुमा जाती। क्योंकि कोई जंगली भी इस तरीके से केक को नहीं काटता। मुझे सबसे ज्यादा आपत्ति सिर्फ इस बात से ही है।

वीडियो पर सियासत

राज ठाकरे के तहलका मचाने वाले इस वीडियो को जारी करने वाले शख्स है किशोर समरीते। किशोर समरीते मध्यप्रदेश के लांजी क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के विधायक है। सवाल ये है समरीते के पास ये वीडियो कहां से आया.. समरीते इसका खुलासा नहीं करना चाहते। उनका कहना है कि उनके एक दोस्त ने उन्हें ये वीडियो दिया है। सवाल ये भी है छह महीने पुराने इस वीडियो को अचानक प्रेस को क्यों दिया। माना जा रहा है कि समरीते अपनी सियासत चमकाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपना रहे है
राज ठाकरे के इस केक मामले पर सियासत भी गरमा गई है। जहां सभी पार्टी इस की निंदा कर रही हैं। वहीं राज ठाकरे को लालू प्रसाद यादव ने फिर से मेंटल करार दे दिया है।

सही मायने में तो राज ठाकरे ने इस केक को केक माना ही नहीं है। ये है राज ठाकरे की नफरत उत्तर भारतीयों के लिए। लेकिन राज ठाकरे का अपने जन्मदिन को मनाने का तरीका बड़ा ही अनोखा और विचित्र लगा। तो राज ठाकरे इस तरह मनाते हैं अपना जन्मदिन और फैलाते हैं नफरत की आग।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, October 31, 2008

राज ठाकरे, तुम्हारे कारण ही तो पैदा हुए हैं राहुल राज जैसे हमलावर

मुंबई में जब सभी की निगाहें अटकी पड़ी थी कि शुक्रवार के काले दिन के बाद बाजार किस करवट बैठेगा तब मुंबई की एक बेस्ट बस में 23 साल का एक युवक चढ़ा और चंद मिनटों में सारी बस पर हावी हो गया। क्या सोच कर आया था वो युवक राहुल राज, क्या चाहता था वो, किसी को तब तक पता नहीं चल पा रहा था। आवाज और भाषा से लग रहा था कि वो मराठी नहीं है, और उसके हाथ में हथियार लहरा रहा था। बेस्ट की डबल डेकर बस में वो बार-बार चिल्ला रहा था कि उसे राज ठाकरे से मिलना है। कोई उस की बात पुलिस और मीडिया से कराए। बार-बार सिर्फ एक ही बात कि उसे राज ठाकरे से मिलवाओ, फोन पर पुलिस और मीडिया से बात कराओ। बताया जाता है वो राज ठाकरे के खिलाफ नारे भी लगा रहा था।

राहुल राज एक अनाड़ी हमलावर

राहुल राज ने सभी को ये बताया कि वो किसी को कोईं भी हानि नहीं पहुंचाएगा। कंडेक्टर को उसने पकड़ा कि मोबाइल से पुलिस और राज ठाकरे से बात कराओ। युवक बेचैनी में कभी इधर तो कभी उधर जा रहा था। बस के सारे यात्री डर और सहम चुके थे। फिर बाद में उसने अधिकतर यात्रियों को बस से जाने दिया। इस बीच कंडेक्टर ने पुलिस को सूचित किया। करीब 50 मीटर दूर पर ही था थाना, पुलिस तुरंत मौके पर पहुंच गई। पुलिस के सामने उसने 10 और 50 के नोट पर लिख कर संदेश दिया कि वो राज ठाकरे से मिलना चाहता है। कई जगह ये बात भी सामने आई कि उस पर लिखा था कि वो पटना से आया है राज ठाकरे को मारने लेकिन इस की असलियत क्या है किसी को पता नहीं चल पाई है, पर हां, वो राज ठाकरे से मिलना जरूर चाहता था। पुलिस अपने काम पर लग चुकी थी। पुलिस ने पूरी बस को घेर लिया और जब राहुल बस के अगले हिस्से में जाता तो पुलिस पीछे से चढ़ने की कोशिश करती और जब वो पीछे आता तो आगे से चढ़ती। राहुल राज दूसरी स्टोरी पर चला गया। इस बीच उसने पुलिस को डराने के लिए और ये दिखाने के लिए की उसके पास असली हथियार है उसने जमीन पर एक फायर किया। जब तक राहुल बस के ऊपरी हिस्से तक पहुंचता तब तक पुलिस ने हवा में दो फायर किए। जवाब में राहुल ने भी दो फायर हवा में किए। पुलिस बस के अंदर घुस चुकी थी लेकिन तभी हड़बड़ाए राहुल से एक गोली चली जो कि एक यात्री के पैर में लग गई। पुलिस ने फायर खोल दिया। राहुल को तीन गोली लगी और पुलिस का ये अभियान खत्म हुआ। बेस्ट की एक बस को अगवा करने की कोशिश को नाकाम कर दिया गया।

पुलिस की अपनी थ्यौरी

पूरे मामले में महाराष्ट्र पुलिस की पीठ ठोंकी गई और साथ ही पूरे मामले पर सियासत भी शुरू होगई। पुलिस ने अपने काम को सराहया और अपने कदम को सही भी ठहराया। पुलिस का कहना था कि यदि किसी भी कारण से उस शख्स की बंदूक से निकली गोली किसी भी यात्री को मार डालती तो पूरी दुनिया एक सुर में ये इल्जाम लगाती कि पुलिस को पहले ही उस शख्स को गोली मार देनी चाहिए थी। तो यदि पुलिस कुछ सही भी करती है तो भी उस पर इल्जाम लग जाता है। वैसे, पुलिस को आतंकवाद से लड़ने के लिए महाराष्ट्र में ये हिदायत है कि यदि कोई भी बंदुक से जवाब दे तो पुलिस भी फिर गोली का जवाब गोली से दे सकती है, और ये ही काम पुलिस ने भी किया। किसी के चेहरे पर ये नहीं लिखा है कि वो आतंकवादी नहीं है।

दो मंत्रियों की सोच में अंतर

वहीं महाराष्ट्र के गृहमंत्री का मानना है कि पुलिस ने जो भी किया वो ठीक है। जो भी नियम और कानून तोड़ेगा उसको हम ऐसे ही सबक सिखाएंगे। पर राज ठाकरे और एमएनएस के मामले में शायद वो ये सब भूल जाते हैं। राज ठाकरे ने पाबंदी के बावजूद मीडिया में अपनी सुरक्षा को कम किए जाने पर इंटरव्यू दिया है। वहीं, इस घटना के बाद सरकार ने राज ठाकरे को जेड श्रेणी की सिक्योरिटी वापस दे दी है। पर क्या महाराष्ट्र के ये बड़बोले गृहमंत्री और उप मुख्यमंत्री राज ठाकरे की जमानत रद्द करवाएंगे, या फिर कुछ भी कार्रवाई होगी। शायद नहीं। वहीं दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री का कहना है कि यदि पुलिस चाहती तो राहुल राज को पकड़ा जा सकता था। लेकिन ये मुंबई पुलिस की नाकामी है कि वो ऐसा करने में नाकाम रही और राहुल को मार गिराया। ये बातें दो मंत्रियों ने कहीं हैं और दोनों ही ऊंचे पद पर आसीन हैं। तो क्या कारण है कि दो मंत्रियों की राय एक नहीं हो पा रही है?

एनकाउंटर पर सियासत

राहुल राज के एनकाउंटर पर राजनीति भी गरमा गई, सब सियासत चमकाने लगे। एक के बाद एक दल ने राज्य सरकार पर साधा निशाना। सभी एक सुर में राज ठाकरे और उसकी पार्टी पर पाबंदी लगाने की मांग करने लगे। राज्य सरकार पर भी इसी बहाने निशाना साधा गया। अब तो शिवसेना को भी लगने लगा कि आखिर मुंबई में ये क्या हो रहा है। इस प्रकरण के बाद से शिवसेना बैकफुट पर दिखी। दो दिन तक राहुल राज के घर पर आने जाने वाले नेताओं का जमघट लगा रहा। कभी सीबीआई से जांच की मांग की जाती तो कोई जांच आयोग गठित करने की मांग करता। राहुल राज के घर के बाहर दिन भर लोगों को तांता लगा रहा, वहां नारेबाजी चलती रही। इसी बहाने अमर सिंह अमिताभ और राज ठाकरे का मसला फिर से उछालने से बाज नहीं आए। अमर सिंह ने लालू यादव और पासवान पर निशाना साधा। कुछ नेताओं ने राष्ट्रपति शासन की मांग भी कर दी महाराष्ट्र में।

एनकाउंटर या हत्या?

राहुल राज का एनकाउंटर हुआ है या हत्या? इस बारे में कई सवाल खड़े हो रहे हैं। गर पुलिस चाहती तो उस नौसिखिए हमलावर को थोड़ी देर में ही पकड़ भी सकती थी। लेकिन शायद पुलिस ने ये कोशिश नहीं की। 15 मिनट के इस ड्रामे में क्या पुलिस को कोई भी मौका नहीं मिला कि वो राहुल के पिस्तौल वाले हाथ पर निशाना लगा सकें। क्या पुलिस उस के पैरों पर गोली नहीं चला सकती थी। क्या जरूरत पड़ी थी कि उसके शरीर पर एक साथ तीन गोलियां मारने की, क्या एक गोली से काम नहीं चल सकता था। उसके दोनों हाथ पर गोली मारी जा सकती थी। या पुलिस बिहारी या उत्तर भारतियों से इतना ज्यादा कुपित होगई है कि इस एपिसोड को खत्म करने के लिए उसने एक नौजवान की गोली मारकर हत्या कर दी। क्यों नहीं ये ही रणनीति ये आतंकवादी या किसी डॉन के साथ करते।

चिता जली पर सवाल बाकी

इस से दुखद पहलु क्या हो सकता है कि एक जवान बेटे का शव बाप के कंधे पर शमशान जा रहा हो। जिस दिन पूरे देश में दीए जलाकर रोशनी की जा रही थी उस दिन राहुल की चिता जली और उस बाप के ऊपर क्या बीती होगी जब दीवाली के रोज उसने अपने जवान बेटे की चिता को मुखाग्नि दी होगी। चिता तो जल गई है पर सवाल अभी बाकी हैं। मुंह बाए खड़े हैं कुछ सवाल जिनके जवाब कुछ तो राहुल की चिता के साथ जल गए और कुछ उस चिता की चिंगारियों से उठ खड़े हुए हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

ये क्षेत्रवाद की आग है, जो राजनीतिक गलियारे से लेकर आम लोगों तक डर और नफरत का रूप ले चुकी है

कहां जा रहे हैं आप लोग? जी, घर जा रहे हैं। घर? कहां रहते हैं आप लोग, यहां क्या काम के सिलसिले में आना हुआ था या काम करते हैं। जी, हम सभी यूपी के हैं और गोरखपुर जा रहे है। यहां काम करने के लिए आए थे, पर अब घर जा रहे हैं।
ये सुनने के बाद तुरंत सीन बदल जाता है। तकरीबन १०-१२ लड़के धुनाई करने लगते हैं चारों की। चारों कभी हाथ जोड़ते हैं कभी माफी मांगते हैं मुंबई में आने की, लेकिन वो लोग नहीं मानते। वो चारों इस बात का भी वास्ता देते हैं कि अब जो हम जा रहे हैं तो वापिस नहीं आएंगे। अपने और भाईयों से भी कह देंगे कि मुंबई से वापिस चले आओ, सभी को बोलेंगे कि मुंबई नहीं जाना है।
पर कोई इस बात से पिंघलने वाला नहीं था। मारा-पीटा गया सभी को मुर्गा बनाया गया काफी देर तक ये नाटक चलता रहा। इस बीच धर्मदेव को काफी चोट लग चुकी थी। वो तीनों उन से गुहार लगाने लगे कि हमें छोड़ दो नहीं तो इस की मौत हो जाएगी। लेकिन उन दरिंदों ने एक नहीं सुनी और उनको छोड़ने की जगह और यातना देने लगे।
धर्मदेव तो मर गया लेकिन उसके उन तीनों साथियों को पुलिस अपने साथ थाने ले गई। तीनों को बैठाकर रखा गया। एक दम से पूरे देश में जैसे कि इस खबर ने हड़कंप मचाना शुरू कर दिया। मायावती ने केंद्र से हस्ताक्षेप की मांग की औऱ मुआवजे का एलान भी कर दिया। वहीं मुलायम सिंह और अमर सिंह ने अपने-अपने पासे फेंक दिए। केंद्र ने अफरातफरी में महाराष्ट्र सरकार से इस हादसे की रिपोर्ट मांगी। तुरंत जवाब भेजा गया “ये कोई भी प्रांतीय या क्षेत्रवाद का मुद्दा नहीं है, सीट को लेकर दो गुटों में कहासुनी के बाद मारापीटी हुई और जिसमें एक की जान चली गई”।
क्या ये जवाब सच लगता है? दीवाली की रात को मुंबई में कौन सी ऐसी लोकल थी जिसमें कि इतने ज्यादा यात्री थे कि सीट को लेकर मार पिटाई हो गई? इतनी देर तक ये ड्रामा चलता रहा, तो कहां थी रेलवे पुलिस? इस सवालों को उठाते पर तभी हमें भी इस खबर को ‘टोन डाउन’ करने के लिए कहा गया। इसके पीछे सोच ये थी कि कहीं इन खबरों से कुछ चुनिंदा लोगों को तो फायदा होता है लेकिन नुकसान पूरे देश का होता है। तुरंत उत्तर भारतीय शब्द को हटा दिया गया। कहीं पर भी इस बात का जिक्र नहीं किया गया कि धर्मदेव कहां का रहने वाला है।
पर तभी खबर आई कि धर्मदेव के भाई को शव नहीं सौंपा गया और फिर उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया पुलिस के द्वारा। पहले की मार ही नहीं भूले थे उसके साथी और दोस्तों को इस अत्याचार ने और डरा दिया। दोस्तों और साथियों ने कह दिया कि इस से तो बेहतर है थोड़ा कम कमाएंगे लेकिन रहेंगे अपने मुल्क में। धर्मदेव के पिता ने २० लाख के मुआवजे की रकम लेने से मना कर दिया और कहा कि मैं ‘२० लाख देता हूं मुझे राज ठाकरे दे दो’। इस बात से पता चलता है कि उत्तर भारतीयों के मन में भी राज ठाकरे ने घृणा की राजनीति आखिरकार भर ही दी है। ये नफरत की आग सब झुलसा देगी। ये एक बाप की आह थी जो राज ठाकरे को कहीं का भी नहीं छोड़ेगी।
उसके एक साथी शिव ने तो रोते-रोते कह दिया कि वो सब इस हादसे के बाद वापस अपने ‘मुल्क’ चले जाएंगे। इस मुल्क शब्द ने मुझे थोड़ा झकझोर दिया। क्या मुंबई गैर मुल्क हो गया है?
धर्मदेव की मौत हो गई।
धर्मदेव तो चला गया पीछे छोड़ गया वो दहशत जो कि हर उत्तर भारतीय के मन में पैदा होगई है। हर उस गैर परांतीय के मन में एक अनजाना डर बैठा गई है उसकी मौत, जो कि शायद दूर होने के लिए काफी वक्त की दरकार करे।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, October 23, 2008

राज्य सरकार ने राज ठाकरे को पिटने से बचाने के लिए खेला ये खेल

राज ठाकरे को पुलिस ने पकड़ा, किसके कहने पर सरकार के कहने पर। सरकार ने पहल करके ये बताना चाहा कि बहुत हो चुका अब इस बड़बोले शख्स को जेल की हवा खिलानी ही होगी। कानून ने एक तरफ तो न्याय का चाबुक चलाया और दूसरी तरफ चाबुक शरीर पर लगने से पहले ही पकड़ भी लिया। वहीं दूसरी तरफ कानून की वो देवी जो कि आंखों पर पट्टी बांधे रखती है वो फिर किसी तरह से जागी और फिर चाबुक चमड़ी उधेड़ने के लिए उठा लेकिन शरीर पर पड़ने से पहले ही चाबुक पकड़ लिया। हिम्मत के आगे कानून जीता, हिम्मत हारी।
ये कोई पहेली नहीं है ये है कल्याण कोर्ट की कहानी। राज ठाकरे के खिलाफ सरकार ने जो प्लान बनाया था वो काफी अच्छा था। पर सरकार भी ये जानती थी कि यदि इस शख्स को लोगों तक पहुंचने दिया तो ये राज्य सरकार के लिए ठीक नहीं होगा। तो खेल खेला गया। एक ऐसा खेल जिससे दिखाने के लिए काम भी हो जाए और राज ठाकरे भी पिटने से भी बच जाए।
सरकार को राज ठाकरे ने रत्नागिरी में चैलेंज किया था कि अगर हिम्मत है तो पकड़ के दिखाओ और फिर देखना कि महाराष्ट्र कैसे जलता है। राज्य सरकार काफी दिनों से ये धमकियां सुन रही थी। और इस बार तो दबाव भी केंद्र से बन गया था(सीएम देशमुख ने कहा कि राज्य सरकार पर कोई दबाव नहीं था, वहीं शिवराज पाटील ने कहा है कि गृहमंत्रालय ने चिट्ठी लिखी थी और फोन पर खुद उन्होंने बात की थी। सच्चा कौन?)।
तभी राज्य सरकार को पता चला, राज ठाकरे के खिलाफ जारी हो चुका है एक गैर जमानती वारंट। राज्य सरकार तुरंत हरकत में आगई। यदि जमशेदपुर पुलिस राज ठाकरे को अपने साथ ले गई तो फिर राज्य में राजनीति कौन करेगा। कौन मारेगा-पीटेगा उत्तर भारतीयों को, जिनकी तादाद मुंबई-ठाणे में ज्यादा हैं। पता नहीं कहीं जमशेदपुर ले जाते हुए कोई भी सुरक्षा में चूक होगई और राज ठाकरे को बिहारियों के साथ झारखंडियों ने मिलकर पीट दिया या फिर कुछ ऊंच-नीच हो गई तो फिर अलगाव को नहीं रोका जा सकेगा। राज्य सरकार ने घोड़े दौड़ाए और ३००-३५० किलोमीटर दूर बैठे राज ठाकरे को रात के २.३० बजे के करीब गिरफ्तार कर लिया गया।
खबर फैली हर जगह उत्पात होना ही था और हुआ भी। लेकिन इस बार सिर्फ महाराष्ट्र में ही उत्पात नहीं हुआ। इस चिंगारी की आग पटना तक गई। वहां पर स्टेशन पर तोड़फोड़ की गई। बहरहाल ये बात बाद में।
कोर्ट में राज की पेशी होती है। सुरक्षा कारणों से देरी होती है और फिर बांद्रा कोर्ट से राज को जमानत मिल जाती है। पर राज्य सरकार ने पूरा इंतजाम कर रखा था। अब बारी थी कल्याण कोर्ट की। कल्याण कोर्ट में एक दूसरे मामले में राज को पेश किया जाना था पर देरी की वजह से एक पूरी रात मानपाड़ा थाने की हवालात में काटनी पड़ती है राज ठाकरे को। हर पुलिसकर्मी जेल में बैठे उस ढ़ोंगी के वक्तव्य सुनता रहता है और जी हुजूरी करता रहता है। रात कट जाती है फिर सुबह पेश किया जाता है पर अदालत में खड़ी उस देवी के आंखें में पट्टी है साथ ही वो पट्टी कान के ऊपर से निकलती है इसलिए ना वो किसी का दर्द सुन सकती है और ना देख सकती है। अदालत ने अपना काम किया इतना तेज चाबुक मारा, कि दीवाली भी जेल में काटने का इंतजाम कर दिया, ५ नवंबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया। फिर शरीर पर लगने से पहले ही पकड़ भी लिया, कोर्ट ने सिर्फ १५००० के निजी मुचलके पर जमानत भी दे दी। साथ ही देखा कि रेलवे पुलिस खड़ी है राज ठाकरे को पकड़ कर लेजाने के लिए और इतनी देर हो चुकी है कि वकील चाहे कुछ भी करें तब भी रात तो हवालात में काटनी ही होगी। और राज ठाकरे कमजोर भी दिख रहे हैं। तुरंत २४ तक हर मामले में अदालत ने राज ठाकरे को अंतरिम राहत दे दी। यानि की अब जब भी कार्रवाई होगी वो होगी २५ को याने कि जमशेदपुर कोर्ट से जारी वारंट का इलाज मिल गया। और शनिवार को कोर्ट में इस याचिका के खिलाफ पहले ही अर्जी डाली जा चुकी है। तो राज ठाकरे राज्य सरकार की राजनीति की वजह से राजशाही ठाठबाट पाते रहेंगे।
राजनीति इसे ही कहते हैं मेरे दोस्त। राज्य सरकार ने अपना उल्लू भी सीधा कर दिया और साथ ही राज की मुश्किल भी हल कर दी। वर्ना यदि राज ठाकरे को महाराष्ट्र छोड़कर जाना पड़ता तो क्या होता राज ठाकरे का इसका अनुमान सब लगा सकते हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, October 18, 2008

एक घर की राजनीति, राहुल गांधी और सोनिया गांधी, 'बड़ा कौन'?

उत्तर प्रदेश में कुछ दिनों पहले एक बात देखने को मिली। एक मां और बेटे के बीच लोकप्रियता का अंतर। उत्तरप्रदेश में सोनिया गांधी को ज्यादा जाना जाता है या फिर राहुल गांधी को? ये सवाल काफी दिनों से खड़ा हो रहा था जब से पिछली बार राहुल का नाम कांग्रेस के कुछ चाटुकारों ने प्रधानमंत्री के पद के लिए सुझाया था। कई बार एक और नाम सामने आया वो था प्रियंका गांधी का। कई बार तो ये लगता रहा कि प्रियंका गांधी यदि पार्टी की बागडोर संभाल लें तो राहुल का क्या होगा? शायद लोग राहुल को उस नेता के चश्में से ना देखें या फिर भावी प्रधानमंत्री के रूप में उनको ना भी सोचें। लोगों को राहुल गांधी को याद रख पाने में भी दिक्कत हो 'शायद'। यदि प्रियंका राजनीति में उतर जाएं तो कहीं राहुल का हाल क्यूबा के नए राष्ट्रपति राउल कास्त्रो जैसा ना हो जाए। सारी दुनिया जानती है कि राउल कास्त्रो में बहुत गुण थे लेकिन अपने बड़े भाई फिदेल कास्त्रो के सानिध्य में रहकर उनकी पूछ उतनी नहीं हुई जितनी की होनी चाहिए थी। राउल कास्त्रो की ही कई नीतियों के कारण ही क्यूबा को कई राजनीतिक फायदे हुए। राउल और फिदेल की रणनीतियों में बहुत अंतर था। राउल नई सोच का समर्थन करते थे जबकि फिदेल परंपरावादी थे। शायद इसलिए प्रियंका गांधी राजनीति में अभी तो नहीं आ रही हैं।
तो क्या राहुल को लोग अभी तक अपने जहन में नहीं बैठा पाए हैं या राहुल की पहुंच लोगों तक अभी हो ही नहीं पाई है। जबकि राहुल गांधी जहां भी जाते हैं सुरक्षा को धत्ता बैठाते हुए कहीं पर भी, किसी से भी मिलने लगते हैं।
रायबरेली में होने वाली जनसभा के कारण ये तो पता चल गया कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी में कौन कितने पानी में है। कांग्रेस की अध्यक्ष और महासचिव के अंतर के बारे में जानने का लोगों को मौका भी मिला। माना ये भी कि सोनिया गांधी के मुकाबले अभी लोग राहुल गांधी को सचमुच नहीं पहचानते और ना ही उतना जानते। जबकि राहुल गांधी पिछले कई सालों से भारत खोज में जुटे हुए हैं और जगह-जगह जाकर अपनी हाजिरी लगा रहे हैं। बावजूद इसके राहुल गांधी को लोग अभी उतना नहीं पहचानते हैं।
जहां एक तरफ माया ने अपनी माया दिखाते हुए धारा १४४ लगवा दी, वहीं सोनिया से मिलने लालगंज में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। ऐसा पहली बार हुआ है कि सोनिया का इतना असर देखने को मिला। इससे पहले कभी भी इतना तो असर नहीं ही देखा गया। वहीं यदि नजर डालें तो हाल ही में राहुल गांधी अपने परिवार के द्वारा उत्तर प्रदेश में गोद लिए हुए गांव में गए। हर जगह काफी चर्चा हुई राहुल की मेहनत की। राहुल ने वहां जाकर मजदूरी की, मिट्टी ढोई। बच्चों से हाथ मिलाए, लोगों से मिलते रहे, बात करते रहे, उनके साथ खाना खाया, चाय पी, लोगों की कुटिया में घुसकर लोगों से मिले और साथ ही गंदे कुर्ते में ही पूरे दिन रहे। लेकिन तभी गांव की एक महिला सामने आती है और लोगों से पूछती है कि ये गोरा सा लड़का कौन है? एक तरफ तो वो लोगों से मिल रहे थे। ऐसा भी नहीं कि पिछले दिनों उस गांव में चर्चा नहीं रही होगी कि कौन आ रहा है। फिर भी उस ग्रामीण महिला के सवाल से बहुत कुछ जाहिर होता है। उस महिला से लोगों ने पूछा, कि क्या इंदिरा गांधी को जानती हो, वो बोली हां। सोनिया गांधी को जानती हो, वो बोली हां, तो ये उसी सोनिया गांधी के लड़के हैं, राहुल गांधी । तो ये अंतर है राहुल और सोनिया में। उस ग्रामीण महिला को भी पता है कि सोनिया कौन है। शायद ये कहा जा सकता है कि राहुल को जुम्मा जुम्मा चार दिन हुए हैं राजनीति में राजनीतिन करते हुए और सोनिया पुरानी खिलाड़ी हो चली हैं इस फील्ड की।
ऐसा नहीं है कि इंदिरा गांधी की तरह पूरी पावर ना पाते हुए भी पीछे से ही सही उस ‘पावर’ का उपयोग करती सोनिया गांधी ने कई चाल ऐसी चली कि जो इस चुनाव में कांग्रेस के लिए हार का सबब बन सकती हैं। जैसे देश की अंदरुनी सुरक्षा, सबसे कमजोर गृहमंत्री को बचाना, नटवर सिंह को विदेश मंत्रालय देना, ए के एंटनी को रक्षा मंत्री बनाना जो कि देर से निर्णय लेने के लिए जाने जाते हैं(जैसा कि हाल ही में स्टोल्ट वेलोर जहाज में फंसे भारतीय के मामले में) महंगाई पर रोक ना लगा पाना, आदि। ऐसे कई मुद्दे हैं जिसके कारण वो घिरी हुई हैं। कई को तो वो ठीक कर सकतीं थी पर कई मुद्दों को उन्होंने ठीक किया ही नहीं।
शायद लोगों को बहू ज्यादा याद है पोते से। या यूं कहें कि सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री के पद को ठुकरा कर जो राजनीतिक चाल चली थी वो इतनी कामयाब हो गई कि लोग उस अवसर को आज भी अपने जहन में बैठाए हुए हैं। उस चाल ने उनका कद बढ़ा दिया और लोग ये मानने लगे हैं कि सोनिया गांधी वो ही महिला हैं जो कि एक ऐसे पद को ठुकरा चुकी है जिसके लिए हर पार्टी के लोग दल बदल करते रहते हैं और सब के सामने लड़ने से भी नहीं हिचकते।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, October 6, 2008

“अमर सिंह ने बाटला वालों पर ठेला अपना दोष, कहा, मुझे तो बाटला वालों ने बरगलाया”

“वर्दी पहने हुए जो भी मरा है और ‘अगर’ वो शहीद है चाह आतंकवादी की गोली से मरा हो चाहे पुलिस वालों ने अपनी गोली से उसे अपनी जान बचाने के लिए मार दिया हो। संदेह इस लिए होता है कि पांच दिन पहले उसे उसके पद से हटा दिया गया था। हमने उसके परिवार के लिए भी 10 लाख रुपये देने की घोषणा की है और वो हम दे भी रहे हैं”।

सहारनपुर में एक बार फिर से समाजवादी पार्टी के महासचिव ने अपना मुंह खोला और फिर वो ही राग अलापा जो कि बाटला जाकर अलापा था। अमर सिंह को इस शहादत पर सियासत चमकाने में बड़ा ही रास आ रहा है। लेकिन पूरे देश को ये समझ में नहीं आ रहा कि अमर सिंह को इस शहादत में सियासत क्यों दिखती है।
अमर सिंह ने ये बात कही कि इंस्पेक्टर शर्मा को पद से हटा दिया गया था। वैसे ये बात वो कह तो गए लेकिन शायद भूल गए कि तबादले को पद से हटाना नहीं कहते। बहरहाल दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत ने तुरंत बयान दिया,
“औपचारिक रूप से हम ये बताते हैं कि इंस्पेक्टर शर्मा का तबादला नहीं हुआ था, ये कोरी बकवास है”।

यहां पर दिल्ली पुलिस ने भी गलत किया कि जब पहले दिन से ये बयान आ रहा था तो तब ही इस पर क्यों नहीं साफ कर दिया गया।
अब अमर सिंह जी का क्या जवाब होता। ये जानने के लिए तुरंत अमर सिंह से फोन पर बात की गई कि आखिर अब आप क्या कहते हैं। दिल्ली पुलिस खुद कह रही है कि नहीं, ऐसी, कोई भी बात नहीं है, सब बकवास है तबादला हुआ ही नहीं।
अमर सिंह ने तुरंत पलटी मारी, पल भर में अपना रंग बदला और जो कहा वो बताता है कि ये राजनेता किसी गैर के क्या, अपनों के भी नहीं होते।
“मुझे बाटला हाउस पहुंचने पर वहीं के लोकल लोगों ने ही ये जानकारी दी थी कि शहीद इंस्पेक्टर शर्मा जी का तबादला हो चुका था”....लेकिन मैंने जब भी कुछ कहा है तो ‘अगर’ शब्द का इस्तेमाल जरूर किया है।

क्या अमर सिंह को शर्म नहीं आनी चाहिए। बिना सोचे समझे कैसे ये सवाल खड़े कर सकते हैं? ये जानते हुए भी कि ये एक ऐसा विषय है जो कभी भी एक चिंगारी के कारण बवंडर मचा सकता है। सच, अब लगने लगा है कि किसी को भी हम वोट करें पर इन जैसे नेताओं की जमात को तो कतई नहीं। तुरंत ही बाटला हाउस वालों का साथ छोड़ दिया। साफ-साफ कह दिया कि बाटला हाउस वालों ने ही तो बताया था और मुझे क्या पता। एक दिन पहले जाकर मरहम लगाते हैं और दूसरे दिन कुरेद देते हैं ऐसे लोगो में से एक हैं अमर सिंह।
सहारनपुर में ही एक बात दोहराने से अमर सिंह नहीं भूले कि, ‘10 लाख का चेक हमने भेज दिया है शर्मा जी के परिवार को’। शायद याद दिलाना पड़ेगा कि वो चेक वापस हो चुका है। क्योंकि चेक के अंकों में दस लाख की जगह पर एक शून्य छूट गया था और वो एक लाख बन गया था पर शब्दों में दस लाख ही लिखा हुआ था। क्या किसी ने भी ये गौर करने, या फिर रीचैक करने की कोशिश नहीं की। जब कि मामला ऐसा हो तब भी। एक पार्टी के महासचिव से ऐसी तो उम्मीद नहीं की जा सकती। यहां बात और, कि जब आप इस शहादत पर सवाल उठा ही रहे हैं तो १० लाख का चेक देने की ये नौटंकी क्यों की जा रही है?
अंत में, अमर सिंह से ये पूछना चाहता हूं, कि क्या आतंकवादियों का कोई धर्म होता है? दूसरा, क्या ये काफी नहीं है कि आतंकवादी, सिर्फ और सिर्फ आतंकवादी ही होता है? क्यों हम मजहब की दीवार को खड़ा करते हैं जब भी ऐसा कोई वाक्या होता है? देश की सुरक्षा किसी भी मजहब से क्या बड़ी होती है? इन सवालों का जवाब शायद ही किसी नेता के पास हो।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, July 29, 2008

"सुषमा स्वराज चुप रहो..."

कैसा है ये मेरा देश? एक तरफ लोग मर रहे हैं और दूसरी तरफ इन्हीं मरे लोगों पर हमारे द्वारा चुने लोग सियासी चाल चल रहे हैं ये हमारे देश के नेता। सवाल उठता है कि क्या ये ही होती है राजनीति? कोई भी दीन-इमान नहीं। ये देश के राजनेता हैं, हमारे नेता हैं या फिर सिर्फ किसी पार्टी के। राजनीति मैं कोई अपना नहीं होता, सिर्फ होता है तो दल, उनकी अपनी पार्टी। अब तो पार्टी भी अपनी नहीं। उस पार्टी के लिए वो कुछ भी कर सकते हैं। कितने ही झूठे आरोप दूसरों पर लगा सकते हैं। जब से विश्वास मत मनमोहन सरकार ने हासिल किया है तभी से आरोपों का दौर चल निकला है। धमाकों के बाद तो ये और तेज होगया। सूरत अब भी बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है। इसकी शायद किसी को परवाह नहीं। वो तो राजनीति करने में लगे हैं। हर दिन वहां से जिंदा बम मिल रहे हैं। सूरत में विस्फोटकों से भरी कार मिलने के बाद एक चैनल पर केंद्र सरकार के नुमाइंदे और राज्य सरकार के प्रवक्ता कुत्ते-बिल्ली की तरह एक घंटे तक लड़ते रहे। एक दूसरे पर आरोपों की झड़ी लगाते रहे। वैसे तो ये आए दिन चल ही रहा है लेकिन अब इसको आगे बढ़ाया बीजेपी की वरिष्ठ नेता सुष्मा स्वराज ने। सुष्मा तो दो कदम आगे ही निकल गईं और केंद्र सरकार को इस घिनौनी वारदात का सरगना ही बता दिया।

सुष्मा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'जहां तक इन दो घटनाओं का सवाल है बैंगलोर और अहमदाबाद का मुझे इसमें एक साजिश की गंध आती है और ये बात मैंने कल भी कही थी एक पब्लिक मीटिंग में, और आज भी दोहराना चाहती हूं, कि मुझे इसमें एक मेजर कॉन्सपिरेसी की बू आती है कि ये कैश फोर वोट स्कैंडल से ध्यान बटाने के लिए और अमेरिका परस्ती के कारण जो मुस्लिम वोट इन से छिटक गया है उस को भाजापा का कृतिम भय दिखाकर अपने खेमें में लाने के लिए की गई साजिश है और मुझे लगता है कि इस साजिश का जल्दी ही पर्दाफाश होगा।' फिर आगे कहती हैं, 'दो राज्यों को टारगेट बनाया जाए और दोनों में एक तरह से ब्लास्ट हों और विश्वास मत के चार दिन बाद हों, विश्वास मत जीतने के 4 दिन के अंदर-अंदर दो राज्य सरकारें और दोनों राज्य बीजेपी शासित हों और दोनों जगह पर सीरियल ब्लास्ट हों, कहीं 18 तो कहीं 24 इसके कोई मायनें हैं कि नहीं और इसलिए जो मैंने बात कही है circumstancial avidence से प्रूव होती है।' तो ये है वक्तव्य बीजेपी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज के।

सुष्मा जी ने अपने ब्यान में केंद्र को उन 50 लोगों का क़ातिल करार दे दिया जिनकी इन ब्लास्ट में मौत हुई। क्या ये सच हो सकता है? किस आधार पर वो ये सब कह गईं इस राष्ट्र की जन्ता से? क्या उनके पास कोई भी ऐसे सबूत हैं जिससे ये केंद्र सरकार नंगी हो सके। इस देश की जनता ये जानना चाहती है। आप के माध्यम से बीजेपी ने पूरे दम के साथ इस खून खराबे की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर थोपी है। यदि आप के पास सबूत हैं और आप नहीं बता रहीं हैं तो फिर आप भी इन्हीं लोगों की श्रेणी में आजाती हैं। और यदि सबूत नहीं है तो चुप हो जाइए सुष्मा जी।।।।। यहां पर अभी सियासत का ये सियासी खेल मत खेलिए। सवाल तो ये भी उठता है कि क्या ऐसे काम आप और आपकी पार्टी ने किए हैं जब वो सत्ता में थी? या जब भी बीजेपी पर कोई भी मुसीबत आती है तो बीजेपी इस तरह से ही निपटती थी इन मुसीबतों से? शायद बीजेपी ही करती थी ऐसा। याद है देश को वो रथयात्रा जो कि एक विध्वंस पर जाकर खत्म हुई थी।

बिना किसी बात के दूसरों पर झूठे आरोप लगाना ही सियासत है। पर शवों पर राजनीति के इस खेल को खेल कर ये राजनीतिक पार्टियां देश की राजनीति को गरक में ले जा रही है। देखना तो अभी ये है कि ऐसे और कितने घिनौने खेल ये लोग हमारे साथ खेलते हैं और राजनीति में लिप्त 'ये' कितने नीचे जाते हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, July 15, 2008

“WE MUST SHOOT THEM” इनको गोली मार देनी चाहिए

नेताओं को जो राजनीति के नाम पर अपनी रोटी सेकते रहते हैं उनको गोली मार देनी चाहिए। वैसे हर नेता सेकता है, इसलिए अब ये इच्छा कभी-कभी मन में जोर मारने लगी है। ये राजनेता कोई और काम तो कर नहीं सकते सिर्फ राजनीति कर सकते हैं वो भी औछी राजनीति। आज सुबह अखबार में एक साथ कई ऐसी घटना पढ़ने को मिली। तब से ही इन नेताओं की छोटी और औछी राजनीति का शिकार होकर रह गया हूं।
सबसे पहले बात, उस लड़के ‘जीवन’ की जो पात्र ही काल्पनिक है। लेकिन उस के पीछे पड़े हुए हैं ये नेता। कौन नहीं है इस काल्पनिक पात्र के पीछे। कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, मुस्लिम लीग, चर्च के बड़े पादरी सभी चाहते हैं कि जीवन का नामोनिशान मिटा दिया जाए। अब आप को बताता हूं कि ये पात्र आखिर है कौन। जिसके पीछे मंदिर, मस्जिद, चर्च सब एकजुट होगए हैं।
इस पात्र का नाम जैसे मैंने बताया जीवन है, इस का उल्लेख कक्षा सात के पाठ्यक्रम की समाजशास्त्र (भाग-१) नामक पुस्तक में किया गया है। इसमें छोटी सी कहानी दी हुई है, जो की काफी नैतिक है, कुछ इस तरह से है वो कहानी(सार में):----
जीवन के माता-पिता उसका दाखिला करवाने के लिए स्कूल जाते है। प्रधानाचार्य उनका प्रवेश फार्म भरते हैं बेटे का नाम पूछते हैं। “जीवन।” ’पिता का नाम?’ “अनवर रशीद”। ‘बच्चे का धर्म क्या है?’
‘कुछ भी लिखने की आवश्यकता नहीं है कोई धर्म नहीं लिखिए’।
”जाति?” ‘इसकी भी आवश्यकता नहीं है’।‘जब ये बड़ा हो जाएगा और किसी धर्म को अपनाने की इच्छा जाहिर करेगा तो?’
अगर ऐसा होता है तो वह अपनी पसंद का धर्म अपना सकता है।‘
आप भी समझ गए होंगे कि किस बात पर ये बखेड़ा है। सिर्फ अंत के इन दो सवालों पर ही धर्म के ये ठेकेदार इस अध्याय को पाठ्यक्रम से हटवाना चाहते हैं। वहीं लेकिन ये सरकार भी अड़ी हुई है जिसने कि अब तक कोई भी फैसला नहीं लिया है। लेकिन पता नहीं इन नेताओं का कब थूक कर चाट लें।
अब दूसरी बात, राज ठाकरे ये बहुत अच्छी तरह से समझ गए हैं कि बिना जाति, धर्म, भाषा की राजनीति किए मुंबई(महाराष्ट्र) में पैर जमाए नहीं रह सकते। पहले बच्चन पर निशाना, उत्तर भारतियों पर निशाना, अब अंग्रेजी स्कूलों पर राज ठाकरे का तुगलकी फरमान। चेतावनी दी गई है कि पहली कक्षा से ही अनिवार्य रूप से मराठी पढ़ाई जाए। साथ ही कहा गया है कि यदि एक महीने की भीतर ये नहीं किया गया तो स्कूलों पर उनकी पार्टी के गुंडे मराठी सिखाएंगे। जो कि नामुमकिन है। इनके जितने भी गुंडें हैं, उन को पकड़ कर यदि मराठी की पहली-दूसरी क्लास का टेस्ट ले लिया जाए और वो पास कर लें तो पूरा देश मराठी बोलेगा। लेकिन इन सब बातों से मराठियों के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में कुंठा भरती जा रही है। जो कि कभी भी फूट सकती है। एक अलग फरमान में नंबर प्लेट, होर्डिंग, बोर्ड, नेमप्लेट भी मराठी में होने चाहिए नहीं तो उनकी गुंडा पार्टी अपने तरीके से ये सब करवाएगी।
जबकि चैलेंज है ये मेरा राज ठाकरे को कि यदि वो मुंबई की बारिश की समस्या का हल ढूंढ ले तो जानें। लेकिन सारी मुंबई जानती है कि बरसात की समस्या ऐसी है कि जो किसी भी हाल में खत्म नहीं की जा सकती, इसलिए मुद्दे कुछ ऐसे उठाए जाएं जिसमें कुछ करना ना पड़े सिर्फ गुंड़ों को काम मिलता रहे क्योंकि खुद राज ठाकरे की सोच भी तो गुंड़ागर्दी वाली है। यदि इस समस्या का हल निकल जाए राज ठाकरे तो मुंबई का बच्चा-बच्चा मराठी बोलेगा सिर्फ तुम्हारी पार्टी मनसे ही नहीं।
अब तीसरी बात, क्या आडवाणी जैसे नेता को ये शोभा देता है कि वो किसी नेता को दलाल कहें। और वो भी उस जैसे नेता को जिसको कुछ दिन पहले आपने भाई कहा था। याने भाई का भाई क्या कहलाया? मतलब आप क्या कहलाए? खुद सोचिए। क्या आप को ये सब बातें शोभा देती हैं। मेरे हिसाब से तो नहीं।
वैसे नेताओं की जात ही कुछ ऐसी होती है कि जो देश के बारे में नहीं व्यक्ति विशेष के बारे में सोचते हैं। लेफ्ट को भाजापा फूटी आंखें नहीं सुहाती थी लेकिन अब लाल कंपनी भगवा के साथ हो चली है। वहीं दूसरी तरफ बुश को दुश्मन मानते हुए
माया के साथ चलने से भी कोई गुरेज नहीं। व्यक्ति विशेष की राजनीति छोड़ो देश के बारे में सोचो।


आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”