आप भी हमसफर बनें

Tuesday, June 30, 2009

मैं तो चला अपने मेहमान के स्वागत में और आप.....।


बीती रात के बाद सुबह और फिर शाम को फुहार पड़ने के बाद सभी के मुंह से निकल रहा था 'बरसो राम धड़ाके से...'।

बड़े
दिनों से जिसका इंतजार था वो मेहमान पिछली रात घर पर आई।
छम छम करते हुए किसी के आंगन में तो किसी के घर की छत पर अपने कदमों की आहट से सभी को चकित कर गई। अपनी इस अदा से सब को बता गई कि देखो मैं तुम्हारे पास आ चुकी हूं अब घबराने की बात नहीं है। पर ऐसा नहीं था कि वो मेहमान हर समय के लिए आ गई थी। नहीं, वो तो सभी को अपना बना कर और खुद दूसरे की हो कर, राहत की रात देकर, रात की थोड़ी देर की मुसाफिर कुछ देर रुक कर चली गई। पर जाते-जाते फिर आगे आने के वादे के साथ। और वो आई फिर सुबह आई और फिर शाम को भी आई।

जी हां, दिल्ली में हमारी प्यारी बरखा रानी आखिरकार आ ही गईं। सुबह की फुहार के बाद तो ये लगा कि मानसून की दस्तक हो गई है। पर जैसे ही दिन चढ़ने लगा तो लगा नहीं कुछ फैसले जल्दबाजी में नहीं करने चाहिए। जहां सुबह खुशगंवार थी वहीं दोपहर होते-होते उमस से सराबोर हो चुका था दिन। पर शाम होते-होते हमेशा ही गलत जानकारियों के लिए प्रसिद्ध मौसम विभाग ने भी अपना फरमान का पर्चा जारी कर दिया कि अगले २४ से ४८ घंटों तक दिल्ली यूं ही सुबह-शाम भीगती रहेगी। साथ ही ये भी कह दिया कि दिल्लीवासियों के लिए खुशखबरी है कि मानसून पहुंच चुका है। पर शाम होते-होते तो उमस का बोलबाला हो चुका था। पर शाम घिरते के साथ ही फुहारों ने फिर से दिल्ली को भिगोना शुरू कर दिया। रास्ते में आते हुए मैंने बहुत लोगों को देखा कि वो बाइक पर पैदल, साइकिल पर खुश होकर भीगते हुए चले जा रहे थे। किसी को भी इस बात की परवाह नहीं थी कि वो गीले या भीग जाएंगे। शायद इसी बात का तो सभी इंतजार कर रहे थे।

बीती रात के बाद सुबह और फिर शाम को फुहार पड़ने के बाद सभी के मुंह से निकल रहा था 'बरसो राम धड़ाके से...'। पर जब तके दो-तीन घंटों की लगातार बारिश नहीं होगी तो इस चिपचिपी गर्मी से थोड़ी निजात नहीं मिलेगी। वैसे तो सभी जानते हैं कि ये चिपचिपाहट अभी जाने वाली नहीं है या यूं कहें कि अभी तो शुरूआत ही है। वैसे देखा जाए तो हर साल की तरह दिल्ली में इस बार भी मानसून ने समय पर ही दस्तक दी है।

दिल्ली के बाद लगता है कि मॉनसून देश के कोने-कोने में पहुंचने को तैयार हैं। दक्षिण भारत और दिल्ली के बाद अब पूरे देश में मॉनसूनी हवाएं बदलों के साथ पहुंच चुकी हैं। अनुमान है कि अगले 24 से 48 घंटे में दिल्ली के साथ-साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, और जेके में बारिश तपती धरती के ताप को कम करेगी।

वैसे, अभी तो हम इस मेहमान की आवभगत में लगे ही हुए हैं पर हां थोड़े दिन बाद हम अगले साल का वादा लेकर इस मेहमान को बड़े ही प्यार से रुखसत करेंगे। पिछले साल के कोशी के कोप के बारे में सोच कर ही दिल दहलता है। २६ जुलाई, २००५ को याद करते ही रूह कांपती है। पर छोड़ो अभी तो ये जश्न मनाने का वक्त है मेहमान के स्वागत का वक्त है। मैं तो चला अपने मेहमान के स्वागत में और आप.....आप भी दिल से स्वागत कीजिएगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, June 29, 2009

इससे सिर्फ हमें परेशानी हुई, फायदा पता नहीं किस का हुआ

शनिवार को जब मेट्रो स्टेशन पहुंचा तो घड़ी सुबह के 7.40 बजा रही थी। ऑफिस के लिए थोड़ा लेट हो चुका था, सोचा कि जल्दी से ट्रेन मिलजाए तो बेहतर। जहां तक मुझे पता था कि एक 7.41 पर और यदि ये छूट गई तो दूसरी 7.50 पर है। याने कि 10 मिनट की और देरी। रविवार का दिन होने की वजह से स्टेशन पर भीड़ नहीं थी कुल 30-35 लोग होंगे। स्टेशन के बाहर मूवमेंट देखी थी, एक दो चैनल की ओबी वैन भी पहुंची हुईं थी, तो सोचा कि शायद ओपनिंग वगैरा होगी तो वीआईपी आ रहा होगा, पुलिस-सेना के जवान भी दिखे, कुछ स्कूली बच्चे भी थे।

स्टेशन की डिस्पले प्लेट बता रही थी कि ट्रेन 6 मिनट के अंदर स्टेशन पर पहुंचेगी। पर 6 मिनट गुजरने के बाद भी समय 6 मिनट ही लगा रहा पर फिर 12 मिनट हो गया। फिर अचानक ही स्टेशन के बाहर कुछ आवाज़ आई। लगा जैसे कि दो-चार पटाखे फूटे हैं फिर धुंआ-धुंआ। मेरे को समझते देर नहीं लगी कि ये मॉक ड्रिल चल रही है। और फोर्स वगैरा इसी मॉक ड्रिल का ही हिस्सा है। थोड़ी देर में एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड की गाड़ियां, हॉर्न के साथ बड़े अफसरों की गाड़ियां भी पहुंच गई। मैं सोच रहा था कि चलो इसके जरिए लोगों को ये तो पता चलेगा कि कभी आपात स्थिति आ जाए तो क्या करना होगा। ये सब नजारा मैं प्लेटफॉर्म से देख रहा था, सभी यात्री भी देख रहे थे। तभी मेरी नज़र स्टेशन की डिस्पले पर पड़ी जिसमें अभी तक 15 मिनट लिखा आ रहा था वहां पर लिखा आ गया कि मॉक ड्रिल के कारण ट्रेनें लेट हो सकती हैं। ये जब लिखा आया तब तक 20-25 मिनट बीत चुके थे। फिर एनाउंसमेंट हुई कि आज मॉक ड्रिल के कारण ट्रेनें लेट हो सकती हैं। फिर डिस्पले हुआ कि मॉक ड्रिल के कारण अभी ट्रेनें नहीं चलेंगी असावधानी के लिए खेद है। एनाउंसर भी बार-बार ये ही एनाउंस करने लगा। फिर एनाउंसमेंट हुई कि जल्दी से प्लेटफॉर्म खाली कर दीजिए, ये भी मॉक ड्रिल का हिस्सा है।

अब यहां से शुरू होती है परेशानी। पता ये चला कि अब ये मॉक ड्रिल एक घंटे तक तो चलेगी ही। मतलब साफ था कि मैं और लेट होने जा रहा हूं। मैंने तुरंत ऑफिस फोन करके इसकी जानकारी दे दी। जब हम प्लेटफॉर्म से बाहर निकल रहे थे तो कुछ लोग मेट्रो कर्मचारी से भिड़ गए। यदि ये मॉक ड्रिल का पहले से पता था तो ये एनाउंसमेंट पहले से होनी चाहिए थी जिससे समय बेकार नहीं जाता। पर पुलिस ने किसी की एक नहीं सुनी और सबको आपातकालीन रास्ते से बाहर निकाल दिया। कुछ नौजवान लड़के-लड़कियां तो बेचार गेट पर सुरक्षाकर्मियों से अनुरोध करते नज़र आए कि आज उनकी परीक्षा है और सेंटर पर ९।३० तक पहुंचना है तो कैसे पहुंचेंगे ऊपर से टिकट का किराया भी ले लिया है। पैसे वापस करने के नाम पर कुछ नहीं दे रहे हैं। ऐसे में वो बेचारे जाएं तो जाएं कहां?

सबसे बड़ी बात मुझे देखने में ये लगी कि मॉक ड्रिल बस मॉक ही होती है। इसमें कई खामियां नज़र आईं। जब आर्मी ने ये बात साफ कर दी कि स्टेशन के बाहर तीन ग्रेनेड से हमला किया गया है, तो फिर लोगों को स्टेशन से बाहर क्यों भेजा जा रहा है? जहां पर सबसे ज्यादा खतरा है साथ ही ये भी कहा जा रहा है कि बाहर ही हो सकता है कोई और आतंकवादी।

दूसरी कि जब लोगों को बाहर निकाला जा रहा था तो मैं एक साइड हो गया और काउंटर के पास खड़ा हो गया। कई बार फिर मैंने आपातकाल रस्ते से जाने की कोशिश की पर मुझे रोक दिया गया। तकरीबन १५ मिनट के बाद जब किसी का मेरी तरफ कोई ध्यान नहीं गया तो एक अधिकारी को बुलाकर मैंने कहा कि आपका ये अभ्यास बेकार है। उन्होंने तुरंत पूछा कि क्यों, और साथ ही वो मेरे से पूछताछ भी करने लग गए। मैने बताया कि १५ मिनट से मैं यहां पर आपकी आंखों के सामने खड़ा हूं पर किसी ने भी ये जरूरत नहीं समझी कि वो मुझसे पूछे कि मैं कौन हूं, क्यों खड़ा हू?

बाहर पहुंचा तो वो ही बच्चे अपने टिकट वापसी के पैसे का अनुराध कर रहे थे। उन बच्चों का कहना भी सही है जहां पर ये मेट्रो स्टेशन बना हुआ है वो बस स्टैंड से लगभग दो किलोमीटर दूर है। एक बार तो पैदल चल कर आया जा सकता है पर दूसरी बार वापस जाने के लिए तभी पैदल चलना बहुत मु्श्किल है ऊपर से ये गर्मी।

जब स्टेशन के बाहर निकला तो देखा कि काफी मीडिया वालों की तादाद बढ़ चुकी थी। एक अफसर अपने लोगो पर गुस्सा हो रहा था क्योंकि कई गाड़ियों के ड्राइवर गाड़ी खाली छोड़कर यहां-वहां चले गए। अधिकारी ने कहा कि यदि ऐसे गाड़ी कोई छोड़ कर जाता है तो आतंकवादी गाड़ी को लेकर भाग सकता है। यहां पर भी ढीलापन।

जहां पर आग लगी है उसको बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड की गाड़ी भी पहुंची। पर ये क्या, पाइप किस रास्ते से अंदर लाया जा रहा है शायद गलत रास्ता पकड़ लिया। पानी शुरू तुरंत नहीं किया गया क्योंकि पाइप छोटी पड़ गई।

इतनी दिक्कत के बाद सवा-डेढ़ घंटे के बाद ये ऑपरेशन खत्म हुआ। यदि लोगों को पता होता तो कोई मेट्रो की तरफ कूच नहीं करता। मेरी राय तो ये है कि लोगों को पहले बताया जाना चाहिए था कि ऐसा कुछ होगा। जिससे कि जो जानना या देखना चाहता वो भी आ सकता था। ट्रेन के कारण गंतव्य तक पहुंचने में लेट नहीं होते। काफी वोलेन्टियर मिल जाते हैं इन कामों के लिए। दूसरा ये कि यदि करना ही था तो वीक डे में करते तो पता चलता कि ३०-३५ की जगह जब १५०-२०० लोगों को हेंडल करना पड़े तो क्या होता है। तीसरा, यदि ड्रिल की बात मेट्रो कर्मचारियों को पहले से पता थी तो एक निर्धारित समय के बाद से किसी भी यात्रियों को टिकट बांटने ही नहीं चाहिए थे। चौथा, इतने लूज प्वाइंट के बाद तो पुलिस अधिकारियों को अपनी सेना के बारे में जरूर सोचना चाहिए जो कि बहुत आलसी ढंग से इस ड्रिल में लगी हुई थी।

जब मैं अपनी गाड़ी लेने जा रहा था तो मुझसे कई लोगों ने पूछा कि ऐसे समय में हमें क्या करना चाहिए। मैंने उन्हें जवाब तो ये दिया कि पुलिस और आर्मी जैसे संचालित करें उस समय तो वैसा ही करना चाहिए। पर मेरा दिमाग कुछ और जवाब देना चाह रहा था। जब भी कभी ऐसा हो तो सबसे पहले ....भागो....किसी ने भी हमें ये नहीं बताया कि हम क्या करें। हमें रोक के रखा, हमारा समय खराब किया और हमें ही नहीं पता कि ऐसे समय में क्या करें।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, June 26, 2009

नहीं रहे किंग ऑफ पॉप, माइकल जैक्सन का निधन


कह सकते हैं कि आज पॉप का एक युग खत्म हो गया। पॉप के बेताज बादशाह माइकल जैक्सन अब हमारे बीच नहीं रहे। काफी दिन से बीमार चल रहे माइकल को आज रात करीब सवा तीन बजे अपने घर पर दिल का दौरा पड़ा जिसके बाद उन्हें अस्पताल में दाखिल करा दिया गया। पर माना ये जा रहा है कि जब डॉक्टर की टीम उनके घर पर पहुंची तब वो अपनी अंतिम सांस ले चुके थे। इधर जैसे-जैसे ये ख़बर उनके चाहनेवालों को लगी वो उकला मेडिकल सेंटर पर जमा होने लगे। इमरजेंसी वार्ड को पुलिस ने चारों ओर से घेर लिया पर चाहनेवालों की भीड़ है कि वो कम ही नहीं हो रही है। हर जगह कोने-कोने में देखे जा सकते हैं उनके चाहनेवाले। साथ ही शुरुआत में पुलिस ने लॉस एंजिलिस में जैक्सन के घर की तरफ जाने वाले रास्ते को बंद कर दिया है जो कि बाद में खोल दिया गया।


संगीत और माइकल का साथ


माइकल का दूसरा नाम भी था और वो था पॉप संगीत। आज भी सब मानते हैं कि ये विवादास्पद सिंगर सिर्फ म्यूजिक के लिए ही बना था। माइकल ने संगीत की दुनिया में एक छत्र राज किया। साथ ही इस पॉप के सरताज को वैको जैको के नाम से भी जाना जाता था। जैक्सन ने लोकप्रियता का वो रिकॉर्ड कायम किया, जिसे शायद ही कोई तोड़ पाए। इस शख्स ने की आवाज ने संगीत की पहचान बदल दी। माइकल जैक्सन ने नाच और गाने के मतलब को ही बदल दिया। अलग अंदाज में रहने वाले शख्स काला चश्मा, लंबे बाल, और अनोखे अंदाज वाले शख्स ने दुनिया को अपना दीवाना बना दिया। इक्यावन साल की उम्र और ना जाने कितने मुकाम। कामयाबी का जो सिलसिला ग्यारह साल की उम्र में शुरू हुआ, वो बस आगे चलता ही गया। अस्सी और नब्बे के दशक में तो सिर्फ और सिर्फ माइकल ही माइकल का नाम था। भारत में भी माइकल का जलवा काफी देखा जाता रहा, भारत में भी बहुत चाहनेवाले हैं।
जैक्सन के थ्रिल को दुनिया भर में पहुंचाया उनके एल्बम थ्रिलर ने। जरा सोचिए। 1982 में इस एल्बम की 10 करोड़ से भी ज्यादा कॉपियां बिकीं। सबसे ज्यादा बिकने वाले और गिनीज बुक में अपना नाम दर्ज करवा चुके इस एलबम की लोकप्रियता में आज भी कोई कमी नहीं आई है। ऐसा नहीं है कि यहीं आकर रुक जाती है जैक्सन की कामयाबी की दास्तान-डेंजरस, थ्रिलर, ऑफ वॉल, बैड, हर एलबम अपने में ही कामयाबी का एक मुकाम है। उनके बेहतरीन गीतों में आई वॉंट यू बैक, डोंट स्टॉप टिल यू गेट एनफ़, बिल्ली जीन, बैड, ब्लैक और व्हाइट, अर्थ सॉंग शामिल हैं।
माइकल अगले महीने अपना अंतिम शो लंदन के -टू-एरीना में 10 कंसर्ट की एक श्रृंखला पेश करने वाले थे और उसके टिकट कई महीने पहले ही बिक चुके थे। 2001 के बाद ये पहला लाइव शो होता। माइकल जैक्सन वर्ष 2006 में 'वर्ल्ड म्यूज़िक अवॉर्ड्स' के दौरान अपने प्रशंसकों के बीच आए थे और तब उन्होंने अपने गाने 'वी आर वर्ल्ड' की कुछ पंक्तियाँ गाकर सुनाई थीं। उन्होंने अपना आख़िरी वर्ल्ड टूर 12 साल पहले किया था. 1996-97 में उन्होंने दुनिया के 58 शहरों में 82 लाइव शो किए थे।


माइकल और वो दिन


जितना बड़ा नाम, उतना बड़ा संघर्ष। 1958 में अमेरिका के इंडियाना प्रांत के गैरी के एक ग़रीब घर में पैदा हुए माइकल जोसेफ जैक्सन नौ भाई बहनों में सातवें नंबर पर थे। जैक्सन के जीवन को अगर करीब से देखें, तो इस कामयाब जिंदगी के पीछे ऐसी-ऐसी मुश्किलें हैं, जो पहाड़ों तक को हिला कर रख दे। क्या मालूम है आपको कि जैक्सन दीवालिया भी हुए। जैक्सन ने अपने जीवन में अथाह संपत्ति देखी, तो एक वक्त ऐसा भी आया, जब खबर उनके दीवालिया होने तक की आई। जैक्सन पर उन्हीं दिनों एक म्यूजिक कंपनी ने करोड़ों डॉलर के मुआवजे का दावा भी ठोक दिया था।
किंग ऑफ पॉप के चाहने वालो को 1993 में गहरा धक्का लगा था, जब उनपर बाल उत्पीड़न के आरोप लगे थे। कोर्ट के चक्कर, पुलिस का जोर और दुनिया भर के ताने। लेकिन माइकल अडिग रहे और आखिरकार 2005 में उन्हें दुर्व्यवहार के आरोपों से बरी कर दिया गया।
खबरें ये भी आईं कि जैक्सन को स्किन कैंसर हो गया। वो कई दूसरी गंभीर बीमारियों से भी जूझते रहे। लेकिन जैक्सन ने इस बात से हमेशा इंकार किया कि वो बीमार हैं।


अंतिम पल

माइकल जैक्सन ने तो दुनिया को अलविदा कह दिया और उनके चाहनेवाले स्तब्ध हैं। कहीं गम है तो कहीं गम में भी खुशी ढूंढी जा रही है। कुछ इतने गमगीन हो गए हैं फूट-फूट कर रो रहे हैं और वहीं दूसरी तरफ उनके चाहनेवाले नाच गा कर उनको अलविदा कर रहे हैं। ये ही है पॉप के बादशाह को सच्ची श्रद्धांजलि।


आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, June 24, 2009

क्या सिर्फ लुटना लिखा है इनकी किस्मत में?

जिससे प्यार किया, उसने ही रेप किया। वो लड़की अपनी शादी छोड़ अपने प्यार के पास आई नई जिंदगी बसाने के लिए पर उस प्यार ने उसकी अस्मत को किया तार-तार। प्रेमी इतना जालिम निकला कि अपने दो दोस्तों से भी उसके शरीर को नुचवाता रहा। एक दिन नहीं, दो दिन नहीं, पांच महीने तक वो हर रोज़ यूं ही लुटती रही। पांच महीने बाद भी वो शख्स जिससे हुई थी सगाई, आज भी अपनी मंगेतर के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए तैयार है। ये घटना है राजकोट, गुजरात की।

क्या करे वो नारी वो तो दूसरों पर भी विश्वास नहीं कर सकती और अपने उसे मजबूर कर रहे हैं कि वो उन पर विश्वास ना करे।

फिर राजकोट, गुजरात। इसमें भी जानने वालों ने ही लूटा विश्वास। प्रेमिका नाबालिग और प्रेमी उसे भगा लेजाने के लिए उतावला। लड़की ने घऱ की खातिर भागने से कर दिया मना तो लड़के ने अपने दोस्तों और एक महिला की मदद से उसे कर लिया अगवा और १७ दिन तक करता रहा बलात्कार। लड़का, उसके दोस्त और वो महिला अब पुलिस की गिरफ्त में।

सूरत, गुजरात। यहां भी जाननेवाले ही बन गए भक्षक। १७ साल की नाबालिग स्कूली छात्रा के साथ तीन दरिंदों ने किया कार में लगातार तीन घंटों तक सामूहिक बलात्कार। लड़की रोती रही, चीखती रही पर दया नहीं आई। लड़की को चुप रखने के लिए उसके बनाए कई एमएमएस। तीनों पुलिस की गिरफ्त में, मेडिकल जांच के दौरान लोगों ने की थी उनकी जमकर पिटाई।

मुंबई। १९ साल की छात्रा के साथ उसके ७ जाननेवालों ने किया गैंगरेप। सभी आरोपी लगभग १९-२० साल के। सातों ने किया दरिंदों की तरह कई घंटों तक रेप और फिर बनाया उसका एमएमएस ताकि लड़की अपनी जुबान ना खोले। तीन आरोपी गिरफ्त में चार अब भी फरार।

फिर मुंबई। २ जुलाई तक अभिनेता शाइनी आहूजा जेल में और उसके बाद गारंटी के साथ वो जमानत पर रिहा भी हो जाएंगे। फिर शुरू होगी शाइनी की वो ही ‘पेज 3’ वाली जिंदगी। आरोप है कि शाइनी ने अपनी नौकरानी के साथ मुंह काला किया और मुंह काले होने के सबूत भी पुलिस को मिल गए हैं। पर पत्नी ने एक नया शगूफा छोड़ दिया है कि आदमी नहीं औरत भी बलात्कार करती है, सच तो है पर इस केस में कितना सच, कोई कह नहीं सकता।

दिल्ली। यहां भी एक नौकरानी ने अपने मालिक पर बलात्कार का इल्जाम लगाया। मेडिकल जांच में रेप की पुष्टि होने के बाद मेडिकल व्यवसायी को गिरफ्तार कर लिया गया है। आरोपी का कहना है कि नौकरानी एक गेंग के साथ मिलकर उसे ब्लैकमेल कर रही है।

कुलगाम, कश्मीर। अब एक शिक्षक की घिनौनी करतूत। अपनी ही साली के साथ उसने पहले रेप किया फिर मोबाइल से उसका एमएमएस बनाया और फिर लोगों में बेचा। इन सारी करतूत ने उसको पहुंचा दिया सलाखों के पीछे। वो परिवार आज अधर में खड़ा है एक तरफ उसकी बड़ी बेटी है जो अपने बच्चे के साथ खड़ी है और दूसरी तरफ छोटी बेटी अपने आंचल को हटाने के लिए इंसाफ मांग रही है।

दिल्ली। रक्षक ही बन गए भक्षक। एक महिला ने लगाया चार सिपाहियों और एक एसएचओ के खिलाफ रेप का आरोप। महिला के मुताबिक पहले महिला को मारा पीटा गया और फिर उसके साथ बलात्कार किया गया। पति सट्टा का काम करता था और उसे ढूंढती पुलिस आई थी और फिर महिला को थाने लेगई थी और फिर उसके साथ रेप हुआ। पर मेडिकल जांच में कुछ नहीं निकला और पति-पत्नी से पूछताछ में कई जगह विरोधाभास कमेंट सामने आए। वैसे जांच कमेटी बना दी गई है और दिल्ली पुलिस इस केस को अपनी नाक का प्रश्न बना चुकी है। अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है और लगता भी नहीं की होगी।


नोएडा/दिल्ली। चार महीने तक स्वेच्छा से महिला एक ब्लू लाइन बस मालिक के साथ रहती रही, इस आश्वासन में कि एक दिन वो शादी करेगा। पर एक दिन उस बस मालिक ने मना कर दिया और उस महिला को कैद करके उसके साथ बलात्कार करता रहा। बस मालिक पर केस दर्ज पर वो फरार। पति से अनबन के बाद वो महाराष्ट्र से अपने दो बच्चों के साथ भागकर दिल्ली आई थी तभी नौकरी की तलाश के बीच इस बस मालिक की प्रेमिका बन गई थी और साथ रहने लगी थी। पर उसे क्या पता था कि वो जहां शादी के सपने संजो रही है वो शख्स उसे रखैल बनाकर रख रहा था।

इंदिरापुरम/गाजियाबाद। दो लड़कों ने अपने पड़ोस में रहने वाली एक महिला के साथ रेप किया और फिर उसका एमएमएस बनाया और फिर उसे ८ महीने तक ब्लैकमेल करते रहे और खेलते रहे उसकी अस्मत के साथ।

रेप...रेप...रेप...हर जगह सिर्फ और सिर्फ ये ही आवाज सुनाई दे रही है। और ये आवाज़ कुछ ही दिन से आ रही है। क्या हो गया है इस समाज को। शर्मसार हूं इन घटनाओं से और आप भी होंगे और आपको होना भी चाहिए। जिस देश में हम नारी की पूजा करते हैं उसके लिए घर, घर से बाहर हर जगह अपने ही अपनों को छल रहे हैं। क्या करे वो नारी वो तो दूसरों पर भी विश्वास नहीं कर सकती और अपने उसे मजबूर कर रहे हैं कि वो उन पर विश्वास ना करे। क्या करे वो लड़की जो कि अपने ही घर में सुरक्षित नहीं है। शिक्षक ही ऐसे कर्म कर रहा है कि वो क्या शिक्षा देगा। रक्षक ही बना हुआ है भक्षक। अनपढ़ क्या, पढ़े लिखों ने भी उनको अपना शिकार बनाया है। क्या करे वो लड़की जो बाहर भी नहीं निकल सकती, घर के पड़ोस में भी सुरक्षित नहीं, अपने दोस्तों, अपने प्रेमी, घर में भी किसी पर विश्वास नहीं कर सकती। क्या सिर्फ लुटना लिखा है इनकी किस्मत में?

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, June 18, 2009

अगर मुंबई जैसा हमला होता तो यूपी पुलिस महीने भर तक कामयाब नहीं होती।

1950-60,1970-80 के दशक में कई फिल्में आई थीं जिसमें हीरो राह भटक कर अपनी जिंदगी की राह ऐसी जगह पर ले जाता था जो उसे आम जिंदगी से दूर ले जाती है। एक ऐसी जगह जहां की राह तो आसान है पर वहां से वापसी मुश्किल। जब वो छुपते-छुपाते, भागते हुए अपने घर या फिर कहीं पैसे लेने या फिर किसी अपने के पास जाता है तो उसके आने की खबर पुलिस को मुखबिर पहले से ही दे चुका रहता है। फिर शुरू होता है चूहे-बिल्ली का खेल, चोर आगे और पुलिस पीछे। फिर हीरो एक घर से दूसरे घर छलांग लगाकर भागता है, सीटी बजाकर अपने घोड़े को बुलाता है और पुलिस की आंखों में धूल झोंक जंगल में कहीं दूर निकल अपने अड्डे तक पहुंच जाता है।

चित्रकूट, बांदा, हमीरपुर, कौसांबी, इलाहाबाद, फतेहपुर के जवान तैनात और एसटीएफ, पीएसी और एसओजी के लगभग ५०० से ज्यादा जवान उस गांव को घेर लेते हैं।

ठीक उसी फिल्मी अंदाज में तीन दिन पहले(१६ जून, २००९) भी हुआ। एक डाकू अपने कुछ साथियों के साथ एक गांव में अपने संबंधियों से मिलने के वास्ते आता है। मुखबिर पहले से ही इस बात की खबर पुलिस तक पहुंचा देता है क्योंकि उस डाकू के सर पर पचास हजार का इनाम। पुलिस रात से ही घात लगा कर बैठ जाती है। सुबह -१० बजे जब वो अपने रिश्तेदार के पास पहुंचता है तो पुलिस फिल्मी अंदाज में उस को ललकारती है और फिर गोलियों की आवाज़ से पूरा गांव गूंज उठता है।

उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के इतिहास में अब तक का सबसे लंबा एनकाउंटर।

दोनों ओर से मोर्चाबंदी के बीच गांव में पहले से ही उस इनामी डाकू के हमदर्द मौजूद उसे पुलिस से बचाते हैं। पर इस बीच-बचाव में मौके का फायदा उठाते हुए वो सटीक निशानेबाज डाकू फिर से पुलिस को वो आघात देता है जिस के कारण वो मई २००८ से पुलिस की हिट लिस्ट के पहले नंबर पर शुमार हो गया था जब उसने एसओजी के एक जवान को मौत के घाट उतार दिया था। पुलिस के आला अफसर मुठभेड़ को अंजाम देने में लग जाते हैं। पर वो चतुर डकैत उनको घेर लेता है तो अपने आला अफसरों को बचाने में दो कांस्टेबल शहीद हो जाते हैं। पुलिस उसे जिंदा पकड़ने की कोशिश कर सकती थी पर अब पुलिस उसे कभी भी बर्दाश नहीं कर सकती थी। पुलिस के लगभग १०० जवान उस गांव में मौजूद उस एनकाउंटर को अंजाम देने में जुट जाते हैं और साथ ही नजाकत को समझते हुए आधा दर्जन जिलों की पुलिस चित्रकूट, बांदा, हमीरपु, कौसांबी, इलाहाबाद, फतेहपुर के जवान तैनात हो जाते हैं और एसटीएफ, पीएसी और एसओजी के लगभग ५०० से ज्यादा जवान उस गांव को घेर लेते हैं। पीएसी के कंपनी कमांडर बेनी माधव सिंह और दो सिपाहियों शमीम और गनर इकबाल शहीद हो गए। इतना ही नहीं पीएसी के आईजी एके गुप्ता और बांदा के डीआईजी सुशील कुमार सिंह जख्मी हो गए।

वो १३-१४ फीट ऊंची छत थी जो कि वो ऐसे ही कूद गया वो भी गोलीबारी के बीच।

एक दिन यानी २४ घंटे कब-कब में गुजर जाते हैं पर पुलिस इधर-उधर भागती रहती है पर उसे कोई भी कामयाबी नहीं मिलती। पुलिस के और दस्ते आस-पास के जंगल को घेरने के लिए जाते हैं। दूसरे दिन पुलिस का एक कांस्टेबल शहीद और आईजी, डीआईजी समेत एक दर्जन से ज्यादा पुलिसवाले घायल। जबकि पहले दिन के बाद पुलिस ने कहा था कि अगली सुबह वो डाकू नहीं देख पाएगा।

अगर कहीं मुंबई जैसा हमला हो जाता तो शायद यूपी पुलिस तो कुछ भी नहीं कर पाती।

दूसरा दिन, ४८ घंटे तक इस एनकाउंटर को चलते हुए हो जाता है। जबकि पुलिस आधुनिक हथियार के साथ वहां पर तैनात और बाद में पता चलता है कि वो डाकू गिरोह के साथ नहीं एकेला है। उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के इतिहास में अब तक का सबसे लंबा एनकाउंटर।


चित्रकूट के राजापुर थाने के जमौली गांव के एक मकान में छुपकर डाकू घनश्याम केवट पूरे दो दिन से पुलिस से लोहा ले रहा था। पुलिस ने जहां-जहां पर वो मौजूद हो सकता था उस जगह को हथगोलों से बर्बाद कर दिया था। कई घर तबाह कर दिए गए। पुलिस बिल्कुल उसके नजदीक तक पहुंच गई और इस बार अपने एक और जवान को खो बैठी।


५०वां घंटा-फिल्मी स्टाइल से दूसरी मंजिल की छत से एक शख्स कैमरे में कैद होता है जो खुद डाकू घनश्याम केवट था। दूसरी मंजिल की छत पर मौजूद वो शख्स जुड़ी हुई दूसरी छत पर उतरता है और फिर वहां से नीचे कूद जाता है। उस छत से वो ऐसे कूदता है जैसे की सिर्फ कोई छोटी सी हर्डल हो पर वो १३-१४ फीट ऊंची छत थी जो कि वो ऐसे ही कूद गया वो भी गोलीबारी के बीच। फिर देखते ही देखते वो वहां से फरार हो गया। बिल्कुल फिल्मी अंदाज में वो वहां से लगभग १००० पुलिसवालों की आंखों में धूल झौंक कर भाग निकलता है।


ये सब हो रहा था एडीजी बृजलाल की आंखों के सामने क्योंकि इस ऑपरेशन की कमान अब मौके पर पहुंचकर उन्होंने खुद संभाल ली थी। नन्हू उर्फ घनश्याम केवट जंगल की तरफ भाग गया लेकिन पुलिस का घेराबंद इतना सख्त था कि फिर से जंगल में उसे घेर लिया गया। पहली गोली उसे जांघ पर लगी और दूसरी सीने पर और और इस तरह यूपी-एमपी पुलिस के ज्वाइंट ऑपरेशन ने दो दर्जन मामलों में नामजद डाकू नन्हू उर्फ घनश्याम केवट को खत्म कर दिया।
ऑपरेशन तो खत्म हो गया। पर इस एनकाउंटर ने उठा दिए हैं कई सवाल---
) पुलिस के पास पूरा असला और वहीं डाकू के पास सिर्फ एक हाईरेंज राइफल फिर भी तीन दिन लग गए।
) करीब १००० पुलिसवाले और वो एक डाकू तो क्या एनकाउंटर इतनी देर तक ही चलना चाहिए था।
) पुलिस के जवानों को ट्रेनिंग की सख्त कमी दिखी। हमारी पुलिस को पता ही नहीं है कि कैसे ऐसी घटना से पार पाएं। वर्ना एक डाकू इतनी देर तक किसी भी पुलिस के सामने नहीं रुक सकता था।
) क्या इस एनकाउंटर के समय सिर्फ घनश्याम डाकू ही वहां पर अकेला था कहीं ऐसा तो नहीं कि वो पूरे अपने गिरोह के साथ हो और सिर्फ अपनी जान गंवा कर अपने साथियों की जान बचा ली हो।


सबसे बड़ा सवाल उठा है पुलिस की कार्यप्रणाली पर। अगर कहीं मुंबई जैसा हमला हो जाता तो शायद यूपी पुलिस तो कुछ भी नहीं कर पाती। वो कसाब और उसके साथी एक महीने तक यूपी एसटीएफ से नहीं खदेड़े जाते और वो इनको चकमा देकर भाग जाते। और अंत में एडीजी बृजलाल ने माना कि देरी उनसे हुई और उनके पास रॉकेट लॉन्चर नहीं था।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, June 17, 2009

धोनी के हाथ में कमान नहीं

आधी रात तक टीवी के आगे आंख गड़ाए रखना, मैच के जुनून के कारण घर में सभी से झगड़ा करके टीवी के सामने डटे रहना, एक भी गेंद नागा जाने नहीं देना। हर गेंद पर विश्लेषण करते रहना और लग रहा था कि टीम इंडिया यदि कैसे भी 125-130 तक दक्षिण अफ्रीका को रोक दे तो फिर जीत हाथ में होगी। हुआ भी वो ही भारत ने उनको रोक तो दिया और यदि डीविलियर्स के साथ भारतीय गेंदबाजों ने चूक ना की होती तो ये स्कोर और भी शायद कम होता। पर 131 का टारगेट ठीक था और लग रहा था कि टीम जीत जाएगी। टीम इंडिया की बैटिंग आई तो लगा कि दोनों ओपनर पिछली हार से सबक ले चुके है। 6 ओवर तक बिना विकेट खोए टीम इंडिया का स्कोर 47 रन हो चुका था। अब लगा कि 84 गेंद पर 83 रन जीत के लिए टीम इंडिया को चाहिए थे तो जीत के भरोसे के साथ अधिकतर लोग सो गए पर सुबह ने उनके अरमानों पर पानी फेर दिया।

सुबह सबको पता चला कि भारत 12 रन से हार गया। मुझे याद है कि जब मैंने मैच देखना बंद किया था ठीक उसके एक रन के बाद ही गंभीर आउट हो गए। और भारत ने मात्र 22 रन के अंतर पर अपने 5 विकेट खो दिए। जिसमें गंभीर,रैना, रोहित, कप्तान धोनी, सुपर हीरो यूसुफ पठान सब पवेलियन लौट चुके थे। हाइलाइट्स देखने के बाद लगा कि ये कैसा गेम खेली है टीम इंडिया। रैना ने पिछले तीनों मैच में ऐसी ही गैर जिम्मेदाराना शॉट खेलकर अपना विकेट खो दिया। कप्तान धोनी ने फर्राटा दौड़ लगाने के बाद अपना विकेट गंवा दिया। यदि युवराज पूरी तरह से फिट होते तो शायद वो रन हो जाता वर्ना वो रन किसी भी कीमत पर नहीं था। साथ ही साथ धोनी ने ये भी देखना उचित नहीं समझा कि उनके सहयोगी अपनी क्रीज से एक कदम भी नहीं आगे बढ़े हैं और धोनी सुपरफास्ट तरीके से आधी क्रीज पार कर गए और आउट होकर चलते बने। आईपीएल के हीरो यूसुफ पठान तो कैच प्रैक्टिस कराके चलते बने। और इस तरह भारत ने महज 22 रन के अंदर आधी टीम लौट गई। दिल पे लेने वाले अधिकतर आहत हुए। तो क्या कारण था कि टीम इंडिया टी-20 में इस बार क्यों हारी?

धोनी मान रहे हैं कि जब टीम का सलेक्शन हुआ तब ही काफी खिलाड़ी 100 फीसदी फिट नहीं थे
सुपर 8 में सुपर फ्लॉप, आईसीसी वर्ल्ड टी 20 में इस बार भारत ने 5 मुकाबले खेले और सिर्फ 2 में ही जीत हासिल की वो भी उन टीमों के साथ जो शायद इस टूर्नामेंट की सबसे कमजोर टीमें थी। 2007 में टीम इंडिया ने सुपर 8 में तीन मैच खेले थे और दो में जीत दर्ज की थी पर इस बार 2009 में टीम इंडिया ने फिर 3 मैच खेले और तीनों में हार का मुंह देखना पड़ा।

अब बात सामने आती है क्यों ऐसा हुआ? क्यों टीम इंडिया सुपर 8 में अपने सारे मैच हार गई? क्यों टीम इंडिया को इस वर्ल्ड कप की सबसे फेवरेट टीम माना जा रहा था पर फिर भी वो हर क्षेत्र में फेल रही? क्यों टीम इंडिया के खिलाड़ी इस वर्ल्ड कप में पर्फोर्म नहीं कर पाई? क्या हुआ जो कि एकजुट टीम बिखरी हुई नजह आई? पहली बार ऐसा क्या हुआ कि कप्तान और कोच आमने-सामने आकर खड़े हो गए? क्यों इस बार चयनकर्ता और बोर्ड एक ही सुर में बोलते हुए कोच के पीछे पड़ गए उस कोच के पीछे जिसे वो अब तक का सबसे बेहतरीन कोच मान रहे थे?

तो क्या है इन सब के पीछे की बात। पहली बात तो ये कि टीम इंडिया को फेवरेट क्यों माना जा रहा था क्योंकि भारत पूर्व चैंपियन था। वर्ना भारत ने पिछले वर्ल्ड कप 2007 से 2009 वर्ल्ड कप तक सिर्फ 5 मैच 20-20 टीम की तरह खेले और उसमें 3 में हार मिली। पिछले वर्ल्ड कप का जादू टीम इंडिया नहीं दिखा सकी। पिछली बार ये सभी देशों के लिए एक नया फॉरमेट रहा पर भारत के पास मजबूत, चुस्त, फुर्तीले, जवान, जोशीले, खिलाड़ी थे जिन्होंने अपने जोश के कारण टीम को जीत दिला दी। और साथ ही पिछला वर्ल्ड कप धोनी ने एक चैलेंज की तरह लिया था पर इस बार ऐसा नहीं था। 'हमारे सारे खिलाड़ी टूर्नामेंट से पहले बुरी तरह थके हुए थे' कोच ने कहा। कप्तान ने इससे अलग कहा, नहीं हम थके नहीं थे पर बाद में पलट गए कि हम थके जरूर थे पर उतने नहीं जितना श्रीलंका सीरीज से पहले। अब धोनी मान रहे हैं कि जब टीम का सलेक्शन हुआ तब ही काफी खिलाड़ी 100 फीसदी फिट नहीं थे। अरे, धोनी साहब हार गए तो अब सब बोलने लगे।

वर्ल्ड कप 2007 से 2009 वर्ल्ड कप तक सिर्फ 5 मैच 20-20 टीम की तरह खेले और उसमें 3 में हार मिली।

यदि देखा जाए तो भारत के खिलाड़ी हर जगह दूसरी टीम के साथ चैक मेट किए गए। जिस खिलाड़ी को शॉट पिट गेंदें खेलने में दिक्कत होती थी तो दूसरी टीम ने इस पर खूब होमवर्क किया और उस खिलाड़ी को कोई दूसरी गेंद नहीं फेंकी गई। रोहित और रैना आईपीएल में मजबूत दिखे पर यहां पर बुत बन कर ही रह गए खासकर कि रैना जिनसे शॉट पिच गेंदें खेली ही नहीं गई। सुपर 8 में तीन में से दो बार रैना इस गेंद का ही शिकार बनें। वहीं धोनी ने बाद में खुद कबूला कि हां वो 100 फीसदी नहीं दे पाए। जहां तक गेंदबाजी की बात है तो दूसरी टीम के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होने वाले ईशांत शर्मा को कुछ यूं मार्क किया गया कि ईशांत को बांग्लादेश के खिलाफ सिर्फ दो विकेट मिले और अब तक खेले 8 मैचों में सिर्फ 4 विकेट का उनका कैरियर रहा। वहीं ईशांत के कारण ही आरपी सिंह बाहर बैठे जो कि पिछली बार टीम विनर साबित हुए थे। सेलेक्टर को इस बात पर ध्यान रखते हुए ईशांत को और ट्रेनिंग देनी चाहिए। हर कीमत पर फील्डिंग भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती नजर आई। खुद धोनी ने इस बार रन आउट और स्टंपिंग छोड़ी। साथ ही युवराज के घुटने की चोट इतनी ज्यादा थी कि वो झुक नहीं पा रहे थे। इंग्लैंड से भारत सिर्फ ३ रन से हारा था उसका कारण यदि सीनियर खिलाड़ियों को माना जाए तो वो कम नहीं है। सरासर वो धोनी की गलती थी कि आरपी सिंह के 1 ओवर होते हुए भज्जी को ओवर दिया गया और भज्जी ने 10 रन उस ओवर में दे दिए। साथ ही अंतिम गेंद पर यदि युवराज थोड़ा झुक जाते और अपने पैर के नीचे से गेंद को नहीं निकलने देते तो शायद वो चौका नहीं होता पर अनफिट युवी वो चौका नहीं रोक सके और भारत 3 रन से हार गया।

कोच ने इल्जाम लगाया कि थकी हुई टीम उनको मिली वर्ल्ड कप से पहले मिली थी। वहीं सेलेक्टर कहते हैं कि आईपीएल से नुकसान नहीं हुआ और दूसरे देशों को तो फायदा हुआ फिर गैरी कैसे कह रहे हैं। सेलेक्टर ऐसा कैसे कह सकते हैं। दूसरे देश के खिलाड़ी अनुभव लेकर अपनी टीम के साथ जाकर मिल गए पर वहीं टीम इंडिया के खिलाड़ी साथ होकर भी साथ नहीं थे। हम आईपीएल में आपस में ही लड़ रहे थे, कोई ये तो बताए कि हम टीम की तरह न्यूजीलैंड के दौरे के बाद कब खेले? पिछले 12 महीने में भारत ने 11 महीने क्रिकेट खेली है। क्यों झूठ कहने पर तुले हुए हैं बोर्ड और चयनकर्ता।


जून 2008 में किटप्लाई कप
जून-जुलाई 2008 में एशिया कप
जुलाई-अगस्त 2008 में भारत का श्रीलंका दौरा
अक्टूबर-नवंबर 2008 में भारत के दौरे पर ऑस्ट्रेलिया
नवंबर-दिसंबर 2008 में इंग्लैंड का भारत दौरा
जनवरी-फरवरी 2008 में भारत का श्रीलंका दौरा
फरवरी-अप्रैल 2009 में भारत का न्यूजीलैंड दौरा
18 अप्रैल से द.अफ्रीका में आईपीएल
5 जून से आईसीसी वर्ल्ड टी-20
अब 26 जून 2009 से वेस्टइंडीज दौरा

तीसरा सबसे बड़ा कारण है इस कप के शुरूआत में ही धोनी की सहवाग संग लड़ाई। इसने टीम को खेमों में बांट दिया। कप्तान को आकर मीडिया के सामने, दुनिया के सामने बयान देना पड़ा। वहीं, दूसरी तरफ धोनी ने अपना कूल टेंप्रामेंट खो दिया और मीडिया के साथ वाकयुद्ध में उलझ गए जो कि सरासर गलत था खासकर कि किसी भी टूर्नामेंट से पहले। इससे साफ पता चलता था कि धोनी टीम पर अपना वर्चस्व कायम रखना चाहते थे और वहीं टीम में गुट बनने लगे थे। युवराज, गंभीर, रैना सब अलग-थलग रहे पूरे टूर्नामेंट के दौरान। वहीं उपकप्तान के नाम पर गंभीर के नाम का सुझाव देना भी किसी संशय को जन्म देता है। युवराज का उपकप्तान बनते ही युवी का मीडिया से पीसी में कहना कि हम अभ्यास आपसे(मीडिया से) पूछ कर नहीं करेंगे और हम जानते हैं कि हमें कब प्रैक्टिस करनी है, कल के नतीजे बता देंगे कि हमें प्रैक्टिस करनी चाहिए थी या नहीं। अगले दिन इंग्लैंड से हार गई टीम। और टीम के कुछ खिलाड़ी हार के बाद हंसते हुए दिखाई दिए कैमरे पर। जब युवी पीसी में ये बात कर रहे थे तब दूसरी तरफ वहीं धोनी प्रैक्टिस कर रहे थे इससे साफ लगता है कि धोनी के हाथ में कमान नहीं रह गई है।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, June 15, 2009

धोनी तूने ये क्या किया, भारत को आईसीसी वर्ल्ड टी-२० से बाहर किया।

....और भारत हार गया। पूर्व चैंपियन भारत सेमीफाइनल की रेस से बाहर होगया। इंग्लैंड ने 3 रन से दी मात। काश! भारतीय कप्तान अब होने वाले दर्द को पहले समझे होते तो बेहतर होता, पर जबतक समझते तब तक बहुत देर हो गई।
धोनी ने कहा कि वो दबाव में युवराज को नहीं भेजना चाहते थे।

गलतियों का पिटारा बने कप्तान

हार का ठीकरा कई गलतियां कर बैठे धोनी, सारी रणनीति बेकार होगई, इस बार ऐसा लगा कि धोनी में वो जीत की भूख कहीं खत्म हो गई है, वो आग जिसके कारण पिछला टी 20 वर्ल्ड कप जीता था। कहां गई धोनी की टीम को साथ लेकर चलने की काब्लियत। कहां काफुर हो गया वो कूल एटिट्यूड जिसके कारण माही जाने जाते थे। कई गलतियां की इस बार के टी 20 में कप्तान साहब ने।

ये धोनी तुझे हुआ क्या?

हंसता हुआ, लंबे बाल वाला वो लड़का जब भी कीपिंग करता तो दुश्मन देश के जनरल के मन को भी लुभा जाता। जब से कप्तानी संभाली धोनी के ऊपर सीनियर्स को दरकिनार करने का इल्जाम लगता रहा। इसी कारण से जब सहवाग की बात सामने आई तो कोई भी धोनी पर यकीन नहीं कर पा रहा था। जब ध्यान मैच और प्रैक्टिस पर होना चाहिए था तब वो टीम की एकता परेड कराने में जुटा हुए थे। क्योंकि धोनी को अपने नाम को बचाने की चिंता जयादा सताने लगी थी। धोनी ने शायद कहीं ना कहीं क्रिकेटरों का विश्वास खोया है जिसका एहसास धोनी को भी हो गया है।
रवींद्र जडेजा को चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करने का मौका क्यों दिया गया?

ड्रेसिंग रूम में राजनीति! और अपनों ने डुबोई लुटिया

टीम में बने रहने के लिए गुटबाजी करना तो धोनी की आदत बन गई और आरपी सिंह के मामले में तो वो सेलेक्टर से दो-चार भी हो लिए। वहीं जब सहवाग की छुट्टी हुई तो उपकप्तान कौन हो इस पर चर्चा शुरु हुई। सीनियर भज्जी, युवराज को छोड़कर धोनी ने गौतम गंभीर का नाम सामने रखा। वेस्टइंडीज से मैच खेलने से ठीक पहले इस तरह की राजनीति, क्यों?
टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी का फैसला क्या इसलिए भी लिया गया क्योंकि धोनी ने हाल ही में प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये बयान दिया था कि भारतीय टीम दबाव में बहुत अच्छा प्रदर्शन करती है। पर पहले गेंदबाजी भारत ने की और हमेशा की तरह ईशांत शर्मा कोई कमाल नहीं कर सके। अभी तक ईशांत ने टी-20 में 8 मैच खेले हैं और 4विकेट लिए हैं। हमारे पेसर में सबसे घटिया प्रदर्शन गर किसी का है तो वो ईशांत ही हैं। तेज गेंद डालने की फिराक में स्विंग भी हाथ से निकल रही है और विकेट भी हाथ में नहीं आरहे।

सबसे सफल गेंदबाज आरपी से अंतिम ओवर नहीं कराया गया क्यों? क्यों??

वहीं रवींद्र जडेजा को चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करने का मौका क्यों दिया गया? जहां पर जाकर जडेजा ने ३५ गेंद की मदद से सिर्फ २५ रन बनाए जिसमें १ ही चौका शामिल था। २०-२० के मुकाबले में १० गेंद खाली जाने का मतलब समझ सकता है कोई। चौथे नंबर पर सचिन, वेंगसरकर, अजहरुद्दीन, युवराज जैसे खिलाड़ी खेलते रहे हैं। ये वो क्रम है जिस पर टीम का पूरा दारोमदार होता है। युवराज हमेशा से ही इस नंबर पर खेलते रहे हैं और इस करो या मरो के मुकाबले में हमारे सबसे महत्वपूर्ण क्रम के साथ ही ये फेरबदल क्या सोच कर किया गया?

वैसे भी धोनी कहते रहे हैं कि टीम इंडिया दबाव में बहुत अच्छा प्रदर्शन करती है, यदि ये बात सही थी तो फिर धोनी खुद क्यों दबाव में ठीक प्रदर्शन तक नहीं कर पाए। बाद में धोनी ने कहा कि वो दबाव में युवराज को नहीं भेजना चाहते थे। क्या नहीं लगता कि धोनी अपनी ही बातों से मुकरने लगे हैं। यदि धोनी चाहते तो जडेजा की जगह पर यूसुफ को भेज सकते थे।

खुद का प्रर्दशन हुआ धुंआ-धुंआ

ईशांत और आरपी बैटिंग में बिग जीरों हैं। ईशांत ने तो अब तक सिर्फ ३ रन बल्ले से बनाए हैं और ८ मैच में महज़ ४ विकेट लिए हैं।
आरपी सिंह को इरफान पठान की जगह खिलाया गया। आरपी ने प्रदर्शन भी सही किया महज ३ ओवर में १३ रन देकर १ सफलता भी ली। सबसे सफल गेंदबाज से अंतिम ओवर नहीं कराया गया क्यों? क्यों?? ईशांत और आरपी बैटिंग में बिग जीरों हैं। ईशांत ने तो अब तक सिर्फ ३ रन बल्ले से बनाए हैं। वहीं इरफान पठान बल्ले से तो ईशांत से काफी ठीक हैं। फिर क्यों ये फेरबदल किया गया।

ये कहानी रही दोस्तों की पर वहीं खुद के प्रदर्शन ने धोनी को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। आईसीसी वर्ल्ड २००९ में धोनी का प्रदर्शन-बांग्लादेश- 26 रन-21गेंद पर, आयरलैंड 14 रन-13 गेंद, वेस्टइंडीज 11 रन-23 गेंद, इंग्लैंड 30 रन-20 गेंद। करो या मरो मुकाबले में कप्तान क्रीज पर हो और टीम हार जाए। इसका क्या मतलब लगाया जाए? चौदहवें ओवर में मैदान पर पहुंच थे कप्तान तब जीत के लिए चाहिए थे ३९ गेंद पर 69 रन पर दो धुरंधर क्रीज पर थे और स्कोर नहीं पा सके, इतनी खराब बल्लेबाजी कि एक छक्का भी धोनी से नहीं लगा। एक कप्तान के लिए इससे शर्मनाक क्या हो सकता है कि उस के क्रीज पर रहते हुए मैच हार जाए। पर फिर भी ना तो बैटिंग ऑर्डर में फेरबदल की गलती मानी और ना ही टीम पर चढ़ी थकान।

चलते-चलते

इंग्लैंड की तरफ से बल्लेबाजी में बोपारा के ३७, पीटरसन के २७ गेंद पर ४६ रन, मैस्क्रेनेस ने नाबाद २५ रन बनाए। पर साथ ही भारत ने १६ रन एक्स्ट्रा दिए जिसमें १४ रन वाइड से गए। भज्जी ने ३, जडेजा ने २, आरपी और जहीर ने १-१ विकेट लिए। जिसमें आरपी से पूरा स्पैल भी नहीं कराया गया।
भारत की तरफ से नहीं चले रोहित और रैना। पता नहीं क्यों शॉट पिच बॉल से इतना क्यों घबराता है रैना, इंडीज के खिलाफ भी इसी तरफ आउट और इतने निर्णायक मैच में भी फिर से वही गलती। गंभीर टिके पर वो लय और आग नहीं दिखी जो दिखनी चाहिए थी। अंदर की राजनीति का शिकार गंभीर सिर्फ २६ रन पर अपना विकेट मैस्क्रेनेस के ओवर में ब्रोड के हाथों में देकर वापिस हो लिए। जडेजा ने अपना पूरा जोर लगा लिया पर गेंद ने उनके बल्ले को चूम कर बाउंडरी पार करने से मना कर दिया और धोनी के साथ मिलकर जडेजा ने टीम इंडिया को सेमीफाइनल की रेस से बाहर कर दिया। युवराज नहीं चाहते थे कि जडेजा के आउट होते ही उस खिलाड़ी के साथ साझेदारी करनी पड़े जिससे खट्टास मैदान और मैदान के बाहर दिखती है। पर हुआ ऐसा ही तो युवराज विकेट कीपर फोस्टर के ग्लब्ज से अपना स्टंप उखड़वाकर चलते बने। और फिर ना तो धोनी और ना ही यूसुफ पठान कुछ कर सके और भारत ने लगातार दूसरा मैच लॉर्ड्स में गंवा दिया।

मैच से एक दिन पहले युवी ने कहा था कि हम जानते हैं कि हमें कब अभ्यास करना है और कब नहीं ये आप मीडिया वालों से पूछकर हम फैसला नहीं करेंगे। हमने देख लिया युवी की आज युवराज नाम के उस सुपर फील्डर के पैर के नीचे से बॉल चली गई और वो फील्डर झुक कर बॉल रोक तक नहीं पाया। खूब मस्ती की गई है और आगे करोगे भी ये हम जानते हैं।

पर इतना याद रखो युवराज-धोनी, जब हॉकी टूटी थी और भारत की टीम ओलंपिक के लिए क्वालिफाई नहीं कर पाई थी तब कुछ चुनिंदा लोगों ने हॉकी में लग चुके जंग और गिल के तानाशाह रवैये को खत्म करने का बीड़ा उठाया था कहीं तुम्हार साथ भी ऐसा ना हो। होटल के कमरों में बंद चारदीवारी का सच जब तक अंदर है तब तक ही सुरक्षित है जिस दिन बाहर आगया तो वो तूफान तुमको यूं निगल जाएगा कि दुनिया को पता भी नहीं चलेगा।

आपका अपना
नीतीश राज

Sunday, June 14, 2009

रेप करोगे तो ऐसे ही पिटोगे, भीड़ ने जमकर धुना बलात्कारियों को, न्याय का नया रूप।

दिल खुश होगया, मज़ा आगया। आप सोच रहे होंगे कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं। बताता हूं, जैसे ही मेरी नजर उस फुटेज पर पड़ी तो लगा कि ये क्या हो रहा है। भीड़ कैसे पागलों की तरह उस लड़के को पीट रही है। क्या कारण है कि पीट रही है क्या किया है उन लड़कों ने। ये पुलिसवाला कुछ कर क्यों नहीं पा रहा है, सिर्फ देख रहा है। अरे इस पुलिसवाले ने तो बंदूक भी निकाल रखी है पर लोगों को काबू क्यों नहीं कर पा रहा है। आखिर क्या कारण है।

गुस्सा भी क्या चीज है, कभी इतना गलत काम करवा जाता है कि जिंदगी भर खुद को उस घृणत कृत्य के लिए आप खुद को माफ नहीं कर सकते। पर कभी-कभी सही काम भी करवा जाता है ये गुस्सा।
लोग पहुंचे गए मुंह पर कपड़ा बांधकर और जैसे ही वो तीनों सामने पड़े तो लोग बेकाबू हो गए और फिर शुरू हुआ उन तीनों को पीटने का दौर

सूरत में हुई एक शर्मनाक हरकत जिसने बिगाड़ दी शहर की सूरत। तीन मनचले सुबह के समय पर निकले तफरी के लिए। उसमें से दो पुलिसवालों की औलाद। ट्यूशन पढ़ने गई नाबालिग लड़की और उसके दोस्त को गाड़ी में बहला फुसलाकर बैठा लिया। वो लड़की नाबालिग, सिर्फ 17 साल की। उन तीनों ने दो घंटे तक उस लड़की को नोचा, काटा, खाया, नहीं सुनी उसकी आवाज़, नहीं सुनी उसकी चीख और दो घंटे तक कार में करते रहे बलात्कार। लड़की के जिस्म को निचोड़ने के बाद फेंक कर चल दिए। लेकिन उस से पहले उन रईसजादों ने मोबाइल से उस लड़की की अश्लील वीडियो भी खींच ली। लड़की ने पुलिस से शिकायत की और मैडिकल रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि भी हो गई।

पुलिस महकमा हरकत में आया और तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया। इस बीच सूरत के पुलिस कमिश्नर का तबादला भी कर दिया गया और मामले की सुनवाई फास्ट ट्रेक कोर्ट में करवाने का फैसला भी हो गया। पुलिस उन तीनों आरोपियों को मेडिकल जांच के लिए लेगई। बस फिर क्या था लोग खासे नाराज़ थे और उन्हें लग रहा था कि इन तीनों को बचाया जाएगा क्योंकि ये पुलिसवालों के बच्चे हैं। इसलिए लोग पहुंचे गए मुंह पर कपड़ा बांधकर और जैसे ही वो तीनों सामने पड़े तो लोग बेकाबू हो गए और फिर शुरू हुआ उन तीनों को पीटने का दौर। तीनों पिटाई से बाप-बाप करते रहे और पुलिस लोगों को बंदूक दिखाकर रोकने की कोशिश। पर लोग कहां रुकने वाले थे औरतों ने भी जमकर लात मारी। ना तो पुलिस का डंडा काम आया ना ही बंदूक लोगों ने तबियत से की धुनाई। अस्पताल में जिसे भी पता चला उसने ही अपने हाथ-पैर सब साफ कर लिए। लोगों ने तीनों को घेर करके मारा पुलिस यहां बचाती तो वहां से पड़ता और वहां से बचाती तो यहां से पड़ता। जब लोगों को तसल्ली होगई तब जाकर पुलिसवाले हालात को काबू में कर सके और तीनों को ले जा सके।

पहले तो बलात्कार, फिर नाबालिग से रेप, घंटों रेप, सड़क पर फैलाई दहशत, कार में किया रेप, फिर खींचा वीडियो इतना सब काफी था उन लड़कों को पीटने का कारण साथ ही पुलिसवालों की औलाद तो धुनाई तो तबियत से होनी ही थी। ऐसे ही न्याय से इस तरह के गंदे काम करने वालों से छुटकारा मिल सकता है आम जनता को। इसे ही कहते हैं भीड़ का कानून पर ये तब तक ही ठीक है जब तक की ये सही काम के लिए हो वर्ना ये ही ताकत गुंडागर्दी को भी जन्म देती है।

आपका अपना
नीतीश राज

Saturday, June 13, 2009

धोनी गलतियों का पिटारा मत बनो, एक ही हारे हो, राजनीति ना करो तो जीत सकते हो कप।

1983 में कपिल के रणबांकुरों ने इसी लॉर्ड्स के मैदान पर वेस्टइंडीज की धुरंधर टीम को मात देकर वर्ल्ड कप जीता था। उस दिन कपिल देव ने विवियन रिचर्डस का कैच लपका था आज उसी मैदान पर सिमोन्स ने उसी तरह गंभीर का कैच पकड़ा। सुपर 8 के अपने पहले ही मुकाबले में चैंपियन भारत हार गया। कप्तान धोनी की कप्तानी नहीं चली और ना ही काम आई युवराज की शानदार पारी। भारत ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया। फैसला तब गलत साबित होने लगा जब भारत के तीन बल्लेबाज महज 29 रन पर पवैलियन लौट गए। गौतम गंभीर 14 रन, रोहित शर्मा और सुरेश रैना 5 रन।

कप्तान-उपकप्तान से आस, पर कप्तान ने किया निराश

फिर क्रीज पर थे कप्तान और उप कप्तान। दोनों से टीम को बहुत उम्मीदें थीं। पर कप्तान धोनी बल्ले से कुछ भी कमाल नहीं दिखा सके और महज 11 रन बनाकर पवैलियन लौट गए। इन 11 रन को बनाने के लिए धोनी ने गेंद खेली 23 और इस 11 रन में धोनी किसी भी गेंद को बाउंड्री के पार नहीं पहुंचा सके। वहीं दूसरी तरफ मैच से पहले उपकप्तान बने युवराज सिंह ने लाज बचा ली। युवी ने 43 गेंद का सामना करते हुए 67 रन की पारी खेली। इस पारी में 6 चौके और 2 छक्के शामिल थे। एडवर्डस ने अपनी ही गेंद पर कैच लपककर युवी की पारी को समाप्त किया।

नहीं दिखा यूसुफ पठान का जलवा

यूसुफ पठान का जलवा वैसा नहीं दिखा जैसा आईपीएल में दिखा था। जैसी उम्मीद यूसुफ से थी उसके पासंग भी नहीं फटके यूसुफ मियां। कई बार सिर्फ बल्ला घुमाते नजर आए। जब पठान से उम्मीद थी कि वो 2-4 छक्के मार कर टीम के स्कोर को मजबूती की तरफ ले जाएंगे वहीं पर वो विफल रहे। 23 गेंद पर 31 रन जिसमें 3 चौके और 1 छक्का। इरफान भी कोई कमाल बल्ले से नहीं कर पाए। पर अंत में भज्जी ने हाथ जमाते हुए महज़ 4 गेंदों पर 3 चौकों की मदद से नाबाद 13 रन बनाए।
टीम इंडिया ने युवराज के आउट होने के बाद अंतिम 20 गेंदों पर सिर्फ 23 रन जोड़े जो कि हार का एक मुख्य कारण बने। वेस्टइंडीज की तरफ से ब्रावो ने 4 और एडवर्डस ने 3 विकेट झटके और किसी अन्य गेंदबाज को कोई भी सफलता नहीं मिली। भारत की पूरी टीम पर ये दो गेंदबाज ही भारी पड़े।

इंडीज की बैटिंग, शुरूआती झटके के बाद कमाल

154 रन का पीछा करते हुए वेस्टइंडीज को शुरुआत में ही इरफान ने फ्लेचर को आउट कर दिया। पर दूसरी तरफ गेल जमे रहे और भारत की मुश्किलें बढ़ाते रहे। यूसुफ पठान ने जब जहीर के हाथों केच लपकवाकर गेल को 22 के स्कोर पर आउट किया तो लगा कि टीम जीत सकती है पर ये दिन टीम इंडिया के लिए नहीं था। सिमोन्स और ब्रावो ने सारे गेंदबाजों को पीटा। ब्रावो ने सब गेंदबाजों को धुना। सिमोन्स को ओझा ने इरफान के हाथों कैच आउट किया। 5 चौकों की मदद से 37 गेंद पर सिमोन्स ने 44 रन बनाए। वहीं ब्रावो ने सिर्फ 36 गेंद पर शानदार नाबाद 66 रन बनाए, इसमें 4 चौके और 3 छक्के शामिल थे। ब्रावो बने मैन ऑफ द मैच। भारत की तरफ से भज्जी ने क्रिस गेल के सामने ओवर मेडिन डाला।

ना चला बल्ला, ना चली कप्तानी, कीपिंग में भी कांपे हाथ

बल्लेबाजी के ऑर्डर में फेरबदल, क्या होगया धोनी को? इस महत्वपूर्ण मुकाबले से ठीक पहले धोनी ने बल्लेबाजी क्रम में फेरबदल किया। अभ्यास मैच और लीग मुकाबलों में धोनी ने 3 नंबर पर बल्लेबाजी की, तो क्या वजह थी कि इस महत्वपूर्ण मुकाबले में धोनी ने फेरबदल किया और रैना को 3 नंबर पर भेजा। धोनी ने कीपिंग में भी गलती की। सिमोन्स को रन आउट करने का मौका धोनी ने गंवा दिया और साथ ही ब्रावो का कैच छोड़ना ये काफी भारी पड़ा। धोनी के दिमाग में क्या चल रहा है ये बता पाना तो मुश्किल है लेकिन उसकी बानगी देखने को मिली जब कि धोनी ने वीरू के जाने के बाद पूछा गया कि कौन हो टीम इंडिया का उपकप्तान। तो धोनी ने युवराज की जगह गंभीर का नाम लिया। ऐसा क्यों? क्या धोनी अपने ऊपर कोई भी सीनियर टीम में नहीं चाहते। पर अभी पूरा वर्ल्ड कप बाकी है धोनी यदि सब को साथ लेकर चलें तो ये कप हमसे कोई नहीं छीन सकता।

इस मैच की हार से ये भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्टेडियम में भारतीय प्रशंसकों का दिमाग इतना खराब हुआ कि उन्होंने भारत के खिलाफ वेस्टइंडीज के लिए नारे लगाने लगे। वैसे आज इस मैच को देखने के लिए वो शख्स भी लॉर्ड्स के स्टे़डियम में मौजूद था जिसे पूरा भरोसा है कि टीम इंडिया ये कप किसी और को नहीं लेने देगी। सचिन तेंदुलकर भी स्टेडियम में मौजूद थे शायद निराश होंगे कि भारत इतनी बुरी तरह से हार गया।


आपका अपना
नीतीश राज

Friday, June 12, 2009

स्क्रीप्ट की डिमांड के नाम पर और करते रहो 'किस' और बहकाते रहो दुनिया को, पर कुछ रिएल मत करो।

वाह भई, चित भी मेरी पट भी मेरी। हम तो करेक्टर के हिसाब से काम करते हैं। यदि स्क्रीप्ट में ये डिमांड है कि हमें अपने पार्टनर के साथ कोई अंतरंग सीन देना है तो हम वो भी करने के लिए तैयार हैं पर ये डिमांड स्क्रीप्ट की होनी चाहिए। हमें लगना चाहिए कि ये फिल्म की डिमांड है। आप भी जानते हैं यदि बीच का सीन होगा तो वहां पर साड़ी पहनकर तो हम जाएंगे नहीं। यदि कोई एक प्रेमिका की भूमिका में है या फिर पत्नी की भूमिका में है तो फिल्म की स्क्रीप्ट के हिसाब से ही काम करना होगा। हमारी कोशिश ये होती है कि कैसे भी हम फिल्म में वो फील लेकर आएं की देख कर लगे कि हां ये रिएल है। ये बात आपको आज कल के अधिक्तर एक्टर कहते सुनते नजर आजाएंगे।

सही बात है कि रिएल का संबंध रील से होता है। इसलिए कई निर्देशक आज भी इसी फिराक में रहते हैं कि कैसे भी जिंदगी के हर कौण को दर्शाती फिल्म बनाई जाए। उस फिल्म में ये सीन अच्छे भी लगते हैं और ये भी दर्शाते हैं कि इनकी उपयोगिता थी फिल्म में, इन सीन की जगह थी फिल्म में। फिल्म को चलाने के लिए जबरन ठांसे नहीं गए हैं। इन फिल्मों में कोई भी हीरो एक साथ 20-25 गुंडों को मारता नजर नहीं आएगा।

कब तक हमारे एक्टर दोहरी जिंदगी पर मुहर लगाते रहेंगे। कब तक अपनी हवस/वासना को पूरा करने के लिए ये ढोंग करते रहेंगे। अपने चेहरे पर नकाब ओढ़े रहेंगे हमारे अदाकार। एक उदाहरण के तौर पर देखें तो, जी हां, पुरानी फिल्मों में किस सीन के लिए दो फूलों को जोड़ दिया जाता था या फिर कैमरा पैन कर दिया जाता था किसी सुंदर जगहों पर। पुरानी फिल्मों में एक हीरो 100 गुंडों की फौज को खत्म कर देता था जबकि गुंडों के पास हथियार होते थे। याने वो फिल्में काल्पनिक चरित्रों पर बनती थीं अधिकतर फिल्में जिन में मारधाड़ होती थी वो रील में रिएल का मिश्रण नहीं होती थीं। आज की फिल्मों में भी किस सीन होते हैं पर यहां फूल नहीं 'स्मूच' को पांच मिनट तक दिखाया जाता है, बहाना है रील में रिएल के तड़के का। पर वहीं दूसरी तरफ एक हीरों आज भी 20-25 गुंडों पर भारी पड़ता है और उन्हें खत्म कर देता है। क्या ये सचमुच संभव है? क्या ये रिएल है? कहीं तो रिएल हो, या तो वो किस रिएल हो सकता है या फिर एक हीरो 20-25 गुंडों पर भारी पड़ सकता है।
20वीं मंजिल से हीरो कूद जाता है, या खुदा हीरो सही सलामत, पर दूसरी मंजिल से विलेन कूदता है तो हाथ-गोड़ तुड़वा बैठता है। अच्छा समझ में आया विलेन का पाप का घड़ा भर गया होगा। किस रिएल कर रहे हो तो फाइट सीन भी रिएल करो। फिर देखते हैं कि गुलाम में हीरो आमिर खान विलेन पर कितना भारी पड़ता है।


अरे, अपनी हरकतों के नाम पर लोगों को बरगलाना बंद करो। यदि है हिम्मत तो काम करो हॉलीवुड के हीरो-हीरोइन की तरह, उदाहरण तो देते हो हर बात पर तो उनके जैसा काम भी करो। वो जो काम करते हैं तो उसके पीछे लॉजिक देने की कोशिश करते हैं। यदि वो दूसरी मंजिल से छलांग लगा रहे हैं और पीछे तार से उनको पकड़ा हुआ है तब भी वो ये दिखाएंगे कि छलांग मारने पर उनको लगी है। पर हमारे हीरो 10वीं मंजिल से छलांग लगाने के बाद भी ठीक से खड़े हो जाएंगे। उनको देखा-देखी कई बच्चे अपनी जान गंवा चुके हैं या फिर अपाहिज हो चुके हैं।

लव सीन देते हुए तो सबसे बड़ा झूठ सामने आता है। कोई पति-पत्नी कितनी देर फोरप्ले करेंगे, उस पर विराम तो लगना है ही तो क्या हमारे अदाकार उन सीन्स को करने का कलेजा रखते हैं। क्या अभी तक कोई हीरो या हीरोइन ने अपने प्राइवेट पार्टस किसी भी मूवी में दिखाए हैं सेक्स के दौरान। सेक्स सीन करेंगे तो मिलेगा 'ए' सर्टिफिकेट और फिर फिल्म चलेगी नहीं तो सिर्फ 17-18 स्मूच सीन से ही काम चलाते हैं। यदि रिएल्टी का शौक चढ़ आया है तो लो अपने फैसले मत बनो प्रोड्यूसर-डायरेक्टर के हाथ की कठपुतली। वैसे हर बात के लिए स्क्रीप्ट का हवाला पर जहां फंसने वाली बात आए तो डायरेक्टर का हवाला। 'ए' सर्टिफिकेट ना दे दिया जाए उसके लिए प्रोड्यूसर और डायरेक्टर एडी चोटी का जोर लगा देते हैं। याद आता है कि अभी हाल ही में रिलीज हुई राज में कंगना रनाउत के एक शॉट में बाथरूम में नेकेड सीन दिया तो कोहराम मच गया। बाद में पता चला कि कंगना ने Body coloured thin skin tight ड्रेस पहन रखी थी। ए सर्टिफिकेट के डर के कारण फैशन के लिए भी मधुर भंडारकर को दिल्ली तक के चक्कर लगाने पड़ गए थे। सब जानते हैं कि यूए सर्टिफिकेट मिल जाएगा तब भी कोई फर्क तो पड़ना नहीं है।

वहीं दूसरी तरफ हॉलीवुड में एक डायरेक्टर अपनी पत्नी को सेक्स सीन समझाता है और वो भी दूसरे एक्टर के साथ कि कैसे इस सीन को अंजाम देना है। वो अदाकारा एक मूवी के लिए लगभग 85 करोड़ लेती हैं और वहीं एक्टर 130 करोड़ के करीब चार्ज करते हैं। हमारे यहां पर इतने में मूवी बन जाती है।

क्या हमारा समाज इतना परिपक्व हो गया है कि वो सेक्स सीन्स को हजम कर सके। मुझे लगता है कि समाज तो हजम कर जाएगा क्योंकि जब बॉलीवुड की मूवी हजम कर जाते हैं तो अपने देश के अदाकारों को हजम क्यों नहीं कर पाएंगे। पर असल बात ये है कि कितना सोचा जाता है किसी फिल्म में रिएल इनपुट के नाम पर? सिर्फ अधिक से अधिक जिस्म दिखा दो और कुछ नहीं, अभी किस करने पर ज्यादा जवाब नहीं देना होता है तो उसकी छूट मिली हुई है।

बस प्रेमी सैफ किस अभिनेत्री को किस कर रहे हैं उससे करीना को एतराज नहीं होना चाहिए और करीना किस को किस कर रही हैं इससे सैफ को कोई मतलब नहीं होना चाहिए। फिर तो गाड़ी चलने दो स्क्रीप्ट की डिमांड के नाम पर और करते रहो किस, बरगलाते रहो दुनिया को पर कुछ रिएल मत करो।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, June 11, 2009

नस्लवाद तो कहीं है पर क्या कोई तुम्हारे घर के सामने पे... करेगा तो तुम चुप बैठोगे?

कहीं और ले गई। समय का चक्र दोनों की जिंदगी के साथ चलता रहा और फिर समय की हवा ने उन दो जिंदगियों को जवानी की दहलीज पर एक बार फिर एक ही शहर में लाकर खड़ा कर दिया। पर वो तो हवा का झौंका था एक को शहर के इस कोने और दूसरे को शहर के दूसरे कोने पर फेंक दिया। फिर समय ही दोनों को वापिस एक छत के नीचे लेकर आया और तब से लेकर आजतक दस साल पीछे मुड़ कर दोनों ने नहीं देखा। पहले से ही वो मेरे बहुत करीब था, दोस्त था पर कब भाई बन गया पता ही नहीं चला।

कल उसका फोन आया कि उसका जाना तय हो गया है। फोन पर ही पता चल रहा था कि वो बहुत खुश है। मैंने मुबारकबाद दी और पूछा कि मियां, आखिर जा कहां रहे हो? उसने बोला जिसकी तैयारी मैं इतने समय से कर रहा था। मैंने सोचा कि जो ये विदेश जाने की तैयारी कर रहा था लगता है कि इसको बाहर नौकरी मिल गई है। उसने बताया कि नतीजा आ गया है और अगले महीने की 10 तारीख को वो 'मेलबर्न' जा रहा है। वहां की यूनिवर्सिटी में एडमिशन हो गया है और करीब एक साल का कोर्स है।

चिंता तो अब शुरू होती थी। मैंने पूछा कि क्यों जा रहा है वहां अभी तो सिचुएशन वैसे भी बड़ी टेंस है? आए दिन देख और सुन रहे हैं कि नस्लवाद के जहर के कारण कोई ना कोई भारतीय वहां पर पिट रहा है। कभी किसी का सामान छीन लिया जाता है तो कभी किसी की गाड़ी फूंक दी जा रही है। घर में भी घुसकर वो लोग मारपीट कर रहे हैं। जिसका भी मन चल रहा है किसी को भी पीटने लग रहा है। कोई पीट रहा है तो दूसरे जो जानते भी नहीं हैं वो भी पटीने लग जाते हैं। साथ ही पुलिस और सरकार का रवैया भी संतोषजनक नहीं है।

कई तर्क उसने मुझे दिए और उन तर्कों के बीच कई जवाब। उसने कहा कि क्या यहां पर अपने देश में ऐसा नहीं हो रहा है? तो मेरा जवाब था कि यहां नस्लभेद के कारण ऐसा नहीं हो रहा है। वो बोला, हर जगह पर लूटपाट की वारदातें होती हैं लेकिन यदि कोई तुम से तुम्हारा सामान छीनने लगे तो क्या तुम यूं ही दे दोगे। नहीं। पर वहां पर भारतीय यहां से कैसे-कैसे करके तो जा रहे हैं उस पर कोई सामान छीनने लगे तो मारपीट तो होनी ही है। वहां के गुंडे कुछ भारी पड़ रहे हैं अब सरकार भी कह रही है कि वो सुरक्षा देगी भारतीयों को। ऑस्ट्रेलिया के स्टूडेंट को लगता है कि भारतीय कहीं कम पैसों में वो काम कर लेते हैं जो कि वो इतने कम पैसों में नहीं करते। जैसे कि दिल्ली में बिहारी कम पैसों पर काम करके उत्तरप्रदेश, हिमाचली और दिल्ली के लोगों के दुश्मन बने हुए हैं। भारतीय वहां पर कम पैसों पर काम करते हैं और वहां की नागरिकता लेकर वहीं ठहर जाते हैं, जैसे कि मुंबई में राज ठाकरे ने उठाया था बाहर के लोगों का मुद्दा।

दूसरी बात, जहां पर 4 स्टूडेंट को रहने के लिए जगह दी गई हो वहां पर 10-12 स्टूडेंट रहते हैं, क्यों? जब छड़े रहेंगे तो रात में शोर भी होगा ही, बाहर अंडरवियर में चले आते हैं, कहीं पर खड़े होकर पेशाब करने लग जाते हैं, लड़कियों को देखकर फब्तियां कसते हैं, तो कभी ना कभी वहां के लोगों का गुबार निकलेगा ही ना। उसने मुझ पर ही सवाल दाग दिया कि यदि तुम्हारे घर के पीछे या फिर पार्क में कोई सरेआम 'पेशाब' करने लगे तो क्या करोगे?

ये सब बातें करने के बाद मैं खुद सोचने पर मजबूर हो गया कि क्या जो ऑस्ट्रेलिया में हो रहा है वो सही है? जहां तक मैने सोचा या यूं कहूं कि जिस नतीजे पर मैं पहुंचा वो ये था कि चाहे जो भी गलतियां भारतीय वहां पर कर रहे हों पर उस कारण से मारपीट करना वाजिब नहीं है वो गैरकानूनी है। यदि हम अपनी काब्लियत की बदौलत कोई नौकरी पाते हैं और कम पैसों पर काम करने का पैमाना तो सबका अलग-अलग होता है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के प्रति व्यक्ति आय अलग-अलग हैं। हम कम पैसों में भी काम कर सकते हैं आप नहीं कर सकते तो ये आपकी प्रोब्लम है हमारी नहीं। हम उसी डिग्री के लिए ज्यादा खर्च करते हैं जिसे आप काफी कम पैसों पर पा लेते हैं।

वैसे ऑस्ट्रेलिया में सीनियर्स से बात हुई है वो कह रहे हैं कि थोड़ी बहुत दिक्कतें तो आती ही रहतीं थीं पर अब कि बार वो कुछ ज्यादा ही सामने आगईं हैं। कोई डरने की बात नहीं है बाकी ऑस्ट्रेलिया में सब ठीक है। हमारी तो यही दुआ है कि जल्द ही ये नस्लवाद का काला चक्र खत्म हो।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, June 10, 2009

उपकप्तान तो आउट, Now Mind it Captain Dhoni

आईपीएल सीजन-2 में जब-जब दिल्ली डेयरडेविल्स का मुकाबला किसी टीम से होता तो हर बार चर्चा का विष्य होते वीरू और गंभीर, हर बार बोला जाता कि पता नहीं क्या हो गया है हमारी सलामी जोड़ी को। बार-बार ये दुआ की जाती रही कि दोनों ओपनर फॉर्म में आजाएं। पर किसी को क्या पता था कि सहवाग की जिस तूफानी पारी का इंतजार सभी को था वो इस वर्ल्ड टी-20 में हम नहीं देख पाएंगे। कंधे की चोट सहवाग को इंग्लैंड से सीधे ऑपरेशन टेबिल पर ले गई। अब लगभग दो महीने के लिए तो वो टीम में वापसी नहीं ही कर सकते। सच लग रहा है कि हमारी इस सलामी जोड़ी को कहीं ना कहीं तो नजर लग गई है।

सहवाग को चोट इतनी बुरी लगी कि वो बल्ला तक ठीक से नहीं पकड़ पा रहे थे। प्रैक्टिस सेशन के दौरान वीरू को कंधे में चोट लगी थी। वैसे यदि देखें तो ये सहवाग के लिए ये वक्त किस बुरे सपने से कम नहीं है। दो महीने बाद 31 साल के सहवाग के लिए वापसी कोई आसान बात नहीं होगी। लेकिन ये बात तो सही है कि इस खबर से उन धुरंधर गेंदबाजों ने राहत की सांस ली होगी जिनको वीरू के खिलाफ गेंदबाजी करनी होती थी।

जब सहवाग को इतनी गहरी चोट लगी हुई थी तो बोर्ड ने ये बात छुपा के क्यों रखी। क्यों बोर्ड ये बताने से कतराता रहा कि वीरू पूरी तरह से फिट नहीं हैं? इसका खामियाजा पूरी टीम को उठाना पड़ा। धोनी और वीरू के बीच की खाई बढ़ती चली गई और फिर वो इतनी बढ़ी कि धोनी ने पूरी टीम की एकता परेड करा दी जो कि अब तक दिखावा थी या एकता ये समझ में नहीं आपाई है। वहीं दूसरी तरफ जब धोनी से मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वीरू के खेलने के बारे में पूछा गया तो धोनी का जवाब था 'नो कमेंट', बोर्ड से पूछें। थोड़ी ही देर में बीसीसीआई ने एक प्रेस रिलीज जारी किया जिसमें वीरू को पूरे वर्ल्ड टी-20 से चोट के कारण आउट कर दिया गया।

वैसे सहवाग की जगह पर दिनेश कार्तिक को इंग्लैंड भेजा जा रहा है। कार्तिक के जाने से भारत के लिए दूसरे कीपर की समस्या भी खत्म हो गई। और जहां तक सवाल है रोहित शर्मा का तो रोहित ने सहवाग की जगह पर ओपनर के रूप में पहले दो अभ्यास मैच में न्यूजीलैंड के खिलाफ 31, पाकिस्तान के खिलाफ 80 और पहले मैच में बांग्लादेश के खिलाफ 36 रन बनाए थे।

टीम इंडिया के लिए वीरू का जाना एक बहुत बड़ा झटका है। अभी तक भले ही सहवाग की कमी नहीं अखरी हो पर जैसे-जैसे टूर्नामेंट अपने अंजाम तक पहुंचता रहेगा टीम को वीरू की कमी खलेगी। वीरु का जाना धोनी के लिए किसी कड़े इम्तिहान से कम नहीं है। धोनी को उपकप्तान की गैर मौजूदगी में अपनी रणनीति फिर से बनानी होगी। साथ ही क्या रोहित और युवराज मिलकर भी सहवाग की खाली जगह को भर पाएंगे? ये सवाल धोनी के लिए एक पहेली जरूर रहेगा।


आपका अपना
नीतीश राज

Friday, June 5, 2009

बैड टी, अखबार और चुस्कियां लेती खबरें

कुछ बातों और चीजों की आदत सी पड़ जाती है। मस्लन रात के काम और दो-चार पैग के हैंगोवर को मिटाने के लिए सुबह उठते के साथ ही गर्मा गर्म चाय और साथ में दिमाग को पटरी पर लाने के लिए अखबार। सुबह यदि ये दोनों चीज ना मिलें तो लगता है कि दिन की शुरूआत अभी हुई नहीं और जो हुई है वो अधूरी-अधूरी सी है। सुबह से ही ये दोनों मेरे दिन भर की जरूरत बन जाती हैं।

काले हरफों पर दिन भर आंख यूं गड़ी रहती है, ना जाने,
क्यों ये लगता है, इन अक्षरों में मेरी महबूबा रहती है।

पर ये महबूबा बने हरफ जब सच्चाई बताते हैं तो महबूबा जैसा ही दर्द देते हैं। लगता है कि इसके रंग से ही अखबार को भी काला कर दूं। पिछले दिनों कई ख़बरें ऐसी आई जिसने ये सोचने पर मजबूर किया कि क्या कोई कानून इन लोगों के खिलाफ नहीं बनना चाहिए जो ये ग़लत काम कर रहे हैं।

ख़बर-बिहार में एक हॉल्ट को हटाने पर दो ट्रेनें फूंकी गई, एक स्टेशन को जला दिया गया। श्रमजीवी एक्सप्रेस की दो बोगियां जलाई गईं। रेलवे ट्रैक उखाड़ दिए गए।

गांवों के लोगों ने इस काम को यूं अंजाम दिया जैसे कि कूड़े या कचड़े को जलाया गया हो। इस काम को अंजाम देने के बाद वो अपने आप को किसी हीरो से कम नहीं समझ रहे होंगे पर मेरे लिए वो विलेन से भी बदत्तर हैं। उन लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं था कि उनकी इस करतूत से कितना नुकसान हुआ होगा राष्ट्रीय संपत्ति को। वो हॉल्ट इस लिए बंद किया गया था क्योंकि उस जगह से कोई भी आमदनी रेलवे को नहीं हो रही थी। तो लंबी दूरियों की ट्रेन को क्यों रोक कर ईंधन, समय को बर्बाद किया जाए। वैसे भी अधिकतर ट्रेन राजगीर से पटना के बीच ११ जगहों पर रुकती है जबकि दोनों स्टेशनों के बीच महज दूरी है ९९ किलोमीटर। याने कि हर ९ किलोमीटर के बाद ट्रेन रुकेगी। सुपरफास्ट ट्रेनें हर ९ किलोमीटर के बाद रूकती हैं बिहार में।

भई, क्यों जला दी आपने ट्रेन? तो एक शख्स दूसरे का मुंह तकता है कि भई क्यों जला दी। अरे, तू भाग रहा था तो मैं भी तेरे पीछे-पीछे भाग लिया। मुझे क्या पता तू किस लिए भागा। कोई अलग जवाब देता कि लोगों ने जला दी हमें क्या मालूम। कौन लोग? नहीं पता। फिर पीछे से कुछ दस-बारह लोग सामने आएंगे और बातों को घुमाने लगेंगे। वो कौन? किसी राजनीतिक पार्टी के मुंह बोले भाई लोग।

ख़बर-ऑस्ट्रिया के शहर वियना में गुरुद्वारे में फायरिंग, संत रामानंद और गुरू निरंजन दास पर हुआ हमला। संत गुजर गए और गुरूजी घायल। हमलावर गिरफ्तार।

धीरे-धीरे शाम तक देश में ये ख़बर फैलने लगती है। पंजाब में कुछ जगहों पर सेना तैनात और कुछ जगहों पर एहतियातन कर्फ्यू लगने लगता है। पर रात गहराती है वहीं दंगाई सड़कों पर। सबसे पहले जालंधर फिर फिरोजपुर, धीरे-धीरे पंजाब के और शहर और फिर हरियाणा जलने लगता है। हर जगह ट्रकों, बसों, में आग लगा दी जाती है। जलांधर कैंट स्टेशन पर हिमगिरी एक्सप्रेस आग के हवाले। घर लूट लिए गए, हाईवे की सभी दुकानें लूट ली गईं। २४-२५-२६ मई तीन दिन में पंजाब में चारों तरफ हाहाकार मच जाता है। क्या है ये सब? क्या लोगों के अंदर से कानून का ख़ौफ़ निकल गया है।

पहली बात दोनों घटनाओं में लोगों ने राष्ट्रीय संपत्ति को हानि पहुंचाई। क्यों? क्योंकि ऐसा कोई कानून नहीं जिसके तहत कोई कार्रवाई इन लोगों पर हो सके। भीड़ है भीड़ पर कोई कानून नहीं लागू होता। दूसरे देश में रंजिश की वहज से कत्ल हो जाता है तो भी यहां पर जिस शख्स की दुकान लूटी गई जिसके घर जलाए गए, उन्होंने क्या बिगाड़ा था। उसकी दुकान या घर लूट लेने से क्या बदला पूरा हो गया? ऐसा नहीं है।

क्या मिल जाता है इन लोगों को ऐसा करके। टैक्स मैं भरता हूं मेरी जरूरतें पूरी हो नहीं पाती फिर भी टैक्स भरता हूं। उन ट्रेनों, बसों में मेरा भी हिस्सा था जिन्हें फूंक दिया गया, मेरे पैसों को फूंक दिया गया? क्या है किसी के पास जवाब।

पंजाब के उन इलाकों में जहां दंगाइयों ने दुकान लूटी, घर लूटे काफी समय तक कोई भी लूटपाट की घटना वहां नहीं होगी। क्योंकि वो दंगाई नहीं लुटेरे थे जिन्होंने बहती गंगा में हाथ धोए हैं।

जब भी ऐसी खबरें पढ़ता हूं तो चाय मुंह का स्वाद सुबह-सुबह ही कसेला कर जाती है।

आपका अपना
नीतीश राज

Thursday, June 4, 2009

अपनी मां का क़त्ल, २४ वार, तब तक मारा जब तक मर नहीं गई वो। क्या नैतिक पतन हो रहा है महिलाओं का?

क्या हवस-वासना के आगे हम अंधे हो जाते हैं? क्या हवस इतनी बड़ी चीज होती है कि कोई उस पर काबू नहीं रख पाए? ‘लस्ट’ याने काम भोग की इच्छा करना और यदि इस इच्छा के बीच में कोई आए तो उस को रास्ते से हटा देना। क्यों बरसात के समय में जानवरों के इलाकों में जाने की मनाई होती है। उसका कारण है कि जानवर जब संभोग करता रहे तो गर कोई उसे इस बीच तंग करे तो वो हमला कर देता है। क्या इंसान फिर से जानवर की तरह ही बनता जा रहा है?

एक मां सारे कष्टों को सहते हुए अपने बच्चों को अपना रूप देने की कोशिश करती है, सही इंसान बनाने की कोशिश करती है। पर क्या गलती हो गई थी उस मां से, जिसने अपनी बेटी को वो करने से रोका जो कि मां को गलत लगा था। शायद उस मां ने भी सोचा होगा कि बस बहुत हो चुका, अब आगे नहीं। बेटी को गलत करने से रोकना ही होगा। मां ने रोका और बेटी ने मां पर तब तक वार किए जब तक की वो मर नहीं गई।

एक, दो, तीन नहीं दर्जन से ज्यादा ब्वॉयफ्रेंड थे साक्षी के। वो अधिकतर अपने घर पर ही उनको बुलाती थी जब कि परिवार वाले घर पर नहीं होते थे। ऐसे ही उसने अपने एक ब्वॉयफ्रैंड को बुलाया और दोनों लिप्त हो गए उस कांड में जिसे की उसकी मां सत्संग से थोड़ा जल्दी वापस आने पर देख नहीं सकी। पर हवस-वासना की आग ने बेटी और उस लड़के से वो करवा दिया जो वो होश में नहीं कर सकते थे। पहले सर पर बीयर की बोतल, फिर सर पर प्रैस से चोट, फिर चाकू और पेचकस से वार। पूरा कमरा खून से लथपथ। उसके बाद लूटपाट की प्लानिंग। पुलिस ने अब तक ये ही जानकारी दी है। पर वहीं दूसरी तरफ पिता और पड़ोसियों की मानें तो ये कि साक्षी पढ़ने में अच्छी थी साथ ही अब वो पढ़ा भी रही थी। और कभी भी कोई शिकायत किसी के सामने नहीं आई थी।

क्या ये मानें कि २६ साल की जवान लड़की गर घर में अविवाहित होगी तो ऐसा होना स्वाभाविक है? क्या ये नारी का नैतिक पतन है? इस एक वाक्ये के कारण ही नहीं कई और भी वाक्ये सामने आए हैं पिछले कुछ समय में जो इस सवाल पर सोचने को मजबूर करते हैं।

आपका अपना
नीतीश राज

भारत ने पाकिस्तान को धो डाला, 20-20 में जमाई पाक पर जीत की हैट्रिक

पूर्व टी-20 चैंपियन भारत अपना पहला अभ्यास मैच न्यूजीलैंड से हार चुका था। लेकिन दूसरे अभ्यास मैच में अभ्यास अच्छा हुआ। पाकिस्तान के साथ इस अभ्यास मैच में फील्डिंग छोड़ कर भारत का स्तर एक चैंपियन की तरह ही दिखा।
पाकिस्तान ने टॉस जीत कर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया। मैच की शुरुआत में तो लगा कि पाकिस्तान इस बार कुछ गजब कर के ही मानेगा। लेकिन पहले ही ओवर में प्रवीण कुमार ने ओपनर हसन को बिना खाता खोले क्लीन बोल्ड कर दिया। भारत के प्रशंसकों में खुसी की लहर दौड़ गई। पर दूसरे ओवर से चौथे ओवर तक खुश होना पाकिस्तान के खेमे में लिखा था। कामरान अकमल के साथ 17 साल के अहमद शहजाद ने हर ओवर की गेंदों को बाउंडरी पार पहुंचाना शुरू कर दिया। देखते-देखते महज चार ओवर में पाक का स्कोर 45 पहुंच गया।
अब खुश होने की बारी भारत की थी। कामरान अकमल को रैना ने शानदार फील्डिंग का नमूना दिखाते हुए रन आउट कर दिया। पांचवें ओवर में ही ईशांत की आखरी गेंद पर शहजाद ने लंबी शॉट खेलने में चूक कर दी और फिर रैना ने एक आसमान चूमती गेंद को लपककर पाक खेमें में सनसनी फैला दी। पर अभी तो कहर बाकी था। अगले ओवर में पठान की पहली ही गेंद पर कप्तान धोनी ने शानदार कैच लपककर शाहिद आफरीदी को बिना खाता खोले पवैलियन लौटा दिया।
कप्तान यूनिस खान और शोहेब मलिक ने टीम को संभालने की कोशिश की पर मलिक ने ओझा की एक गेंद में चूक कर दी और धोनी ने कोई गलती नहीं की। यूनिस खान ने कुछ शानदार शॉट खेले पर हरभजन सिंह की फिरकी में फंस कर वो क्रीज से नहीं निकलना चाहते हुए भी आगे निकल आए और धोनी ने वापसी का मौका नहीं दिया। मिसबाह और यासिर अराफात ने मिलकर स्कोर को 113 से 158 तक पहुंचा दिया वो भी सिर्फ 25 गेंदों में। भारत के सामने जीत का लक्ष्य था 159।
भारत बिना सहवाग के खेल रही थी। तो ओपनिंग की बागडोर संभाली रोहित शर्मा और गंभीर ने। शुरूआत से ही दोनों ने हाथ दिखाने शुरू कर दिए। गेंदबाज ये समझने में दिक्कत महसूस करने लगे कि गेंद डालें तो कहां? इस मैच में रोहित शर्मा ने ही गेंद को हवा में बाऊंड्री के पार पहुंचाया। रोहित ने महज 53 गेंदों में 80 रन बनाए जिसमें 9 चौके और दो शानदार छक्के शामिल थे। आमेर ने शहजाद के हाथों 16वें ओवर में भारत के 140 के आंकड़े पर रोहित को कैच आउट करवा दिया। तब भारत को जीत के लिए 18 रन की दरकार थी। जिसे गंभीर और धोनी ने मिलकर 18 गेंद रहते ही हासिल कर लिया। गंभीर ने 5 चौकों की मदद से 47 गेंद पर 52 रन बनाए और वो धोनी के साथ अंत तक नाबाद रहे। आखिर एक ओपनर तो फॉर्म में लौटा।
20-20 फॉर्मेट में ये भारत की पाकिस्तान पर लगातार तीसरी जीत थी।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”