Monday, September 1, 2008

ये दर्द का सैलाब है...


एक मां के हाथ में दुधमुंहा बच्चा, खुद वो गर्दन तक पानी में डूबी, बच्चे को अपने सर से ऊपर किए हुए पानी में चलती जा रही। जहां तक नजर जाती सिर्फ पानी ही पानी। साथ में घर के या इसी त्रासिदी से जूझते लोग। सब चलते जा रहे। इस आस के साथ कि शायद कोई नाव मदद को आए और बचा ले। तभी उस मां का पैर गड्ढे में जाता है और पल भर के लिए पानी उस के सर के ऊपर तक आजाता है। पर वो मां है, उसने अपने बच्चे को पानी में नहीं डूबने दिया। अभी भी उसका बच्चा पानी के ऊपर था। हमारे कैमरामैन ने पूरा फोकस उस बच्चे और निरीह मां के ऊपर कर दिया। रूह तक कांप रही थी इन तस्वीरों को देख कर, सीधे बाढ़ प्रभावित इलाके महिपालगंज से। एक झटके में मां अपने सर को पानी से बाहर निकालती है। हम उसके हौसले की दाद दे रहे थे कि तभी उस महिला का पैर फिसला, अपने को संभालने के लिए उसका हाथ पानी के अंदर गया और बच्चा बिलबिलाते हुए पानी के अंदर। पल भर के लिए ही, बच्चा पानी में रहता है और फिर उस ममता की जीती जागती पवित्र रूह ने अपने बच्चे को तुरंत ऊपर की ओर कर दिया। बच्चा रो रहा है और यहां ऑफिस में हम सब की आंखें नम हैं। मैंने अपने सहयोगी से कहा कि visuals को slow motion में कर दो, अब तस्वीरें स्लो करके दर्शकों को दिखाई जा रही हैं। मेरे सीनियर का गला भर आया वो अपना मुंह अपने हाथ से ढक कर पूरे PCR(Production Control Room) में माहौल को गमगीन कर गए।
हमें ये एहसास बार बार मार डाल रहा था कि क्या इतनी देर पानी में रहने के बाद ये जिंदा बच पाएंगे। और जब रात होगी और काल बनी कोशी अपने प्रचंड रूप में पुकारेगी तब क्या ये बच पाएंगे। अभी तो दिन है कुछ किया भी जा सकता है पर रात में क्या होगा। दूर-दूर तक सिर्फ काला-मटमैला पानी, कोई ओर क्षोर नहीं, खाने को दाना भी नहीं जगह जगह से लाशें बहती हुई आ रही हैं, ऊपर से चोर-डाकुओं का डर। इस समय जिसके पास नाव है वो राजा है। और ये राजा कोई और नहीं चोर-डाकू हैं। औरतों के साथ बलात्कार भी हो रहा है। ये सारी बातें और उन तस्वीरों ने आंखों से आंसूओं की धारा बहा दी। मैंने अपने एंकर से कहा कि इन तस्वीरों को फिर से बता दो। लेकिन एंकर कुछ नहीं बोली। वो भी तो अपने रूंधे हुए गले से कुछ भी कह नहीं पा रही थी। बाद में उसने मुझसे कहा कि तुम लोग तो वहां खड़े रो लिए पर हम तो रो भी नहीं सकते थे, लोग हमारी आवाज सुन लेते।


अब दूसरी घटना और भी बेहद मार्मिक। एक मां अपनी बगल में दो बच्चों को दबाए बाढ़ के उफनते पानी को चीरते हुए आगे बढ़ रही थी। साथ में कुछ और लोग भी थे। धीरे-धीरे सब चलते जा रहे थे किसी को पता नहीं था कि आखिर इस बाढ़ का अंत कहां है, पर बचने के लिए चलना तो जरूरी था। पानी का एक तेज बहाव उनकी तरफ आया। सबने संभलने की कोशिश की। मां ने भी अपने आप को बचाने के लिए एक पेड़ की टहनी को पकड़ लिया और उस बहाव से जूझने लगी। पर जिस हाथ से टहनी पकड़ी थी उसकी बगल में दबा बच्चा तो उस बहाव की भेंट चढ़ गया। वो बच्चा तो बह गया किसी को पता तक नहीं चला कि एक जिंदगी ने चलते चलते यूं ही दम तोड़ दिया। उस मां को ऐसा सदमा लगा कि तभी से उनकी आवाज़ चली गई। ये बात है १९६२ की, जब कि बिहार में बाढ़ ने कई माओं की कोक उजाड़ी थी, और ये जो मां थी आज हमारे इस शो को एकंर कर रही लड़की की नानी थीं। ऑफिस में जो सुन रहा था सब की आंखें नम हो चलीं थीं।

आपका अपना
नीतीश राज


दुआ-ओ...ऊपर वाले कर रहम

‘मैंने घर में अपनी पत्नी को जब ये वाक्या बताया तो पूरा सुनने के बाद वो मेरे पास से उठ कर चली गई। हम दोनों की आंखें नम थी। दोनों एक दूसरे को इस बेचारगी के हाल में देख नहीं सकते थे’।

17 comments:

  1. शब्द नही मिल रहे , बस आँखें नम हैं....

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  2. आपने संजीदगी से विवरण दिया है ! सिर्फ़
    दुआओं के कुछ नही कर सकते ! यहाँ लिखने को
    कुछ भी शब्द नही हैं ! ईश्वर रहम कर ग़रीबों पर ...!

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  3. बहुत हृदय विदारक दृश्य देखने को मिले हैं....जो वहां हो रहा है वो किसी दुश्मन के साथ भी न हो...इश्वर कहाँ है?
    नीरज

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  4. samvedna par bazar kis had tak havi hai....saari ghatna ka sabse dardnak pahlu yahi hai ki aap sabse romanchak drishya ko filmane ki baat joh rahe the....jai ho bazarvaad ki

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  5. क्या कहें? जु़बान चिपक गई है।

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  6. हताशा ,विवशता क्रोध ओर आंसू सब है.....कही ओर किसी देश में होता तो कितना बड़ा अभियान चलाया जाता ...इसे भी दुखद ये है की कुछ लोग अब भी वहां लूट पाट कर रहे है .....दबंग लोग रस्ते में ही खाने का सामान लूट रहे है....क्या वाकई सरकार इतनी विवश है ?क्या वाकई crisis मनेजमेंट नाम की कोई चीज़ नही है इस देश में ....?

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  7. बहुत बड़ी मानवीय त्रासदी है। दुखद।

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  8. ऑंखें बस छलक-सी गई। पूरे हादसे से रूबरू होने वालों पर न जाने क्‍या बीतती होगी।

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  9. पूरा इतवार टीवी के पर्दे पर इस विनाशलीला को देखते गुजरा। एक महिला को दस दिन के बाद गीली खिचड़ी का एक हिस्सा मिला उसने एक कौर खुद खाया और दूसरा बड़े प्यार से अपनी बकरी को खिलाया। शायद अब उसके घर परिवार में उस के आलावा उसका कोई नहीं बचा था।
    ऍसी त्रासदियाँ ही हमारे चक्षु खोलती हैं कि विकास के नाम पर हम ६० सालों में कहाँ पहुँचे हैं?

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  10. सच में बहुत दर्दनाक और मार्मिक है ये सब। और ये देखा भी नही जाता है, वहां के लोग कैसे जूझ रहे होंगे सोच कर भी दिल कांप जाता है। हे भगवान कहां सो रहे हो अब तो जाग जाओ।

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  11. "गणपति बब्बा मोरिया अगले बरस फ़िर से आ"
    श्री गणेश पर्व की हार्दिक शुभकामनाये .....

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  12. Oh ! Bhai mai ekk hi baat sochta hun kya BHAGAWAN itni beraham ho sakata hai ?

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  13. Bahut hi darknak hai.

    Suresh Pandit

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  14. इतनी सुविधाएं, तकनीक, साधन होने के बावजूद गरीब का जीवन इतना सस्ता और उपेक्षित क्यों है?

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पोस्ट पर आप अपनी राय रख सकते हैं बसर्ते कि उसकी भाषा से किसी को दिक्कत ना हो। आपकी राय अनमोल है, उन शब्दों की तरह जिनका कोईं भी मोल नहीं।

“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”