Thursday, August 28, 2008

टीम इंडिया ने रच दिया इतिहास

भारत ने पहली बार वन डे में श्रीलंका से श्रीलंका में सीरीज जीती है। 23 साल भारत ने रचा है इतिहास। अब तक श्रीलंका के साथ भारत ने श्रीलंका में 5 सीरीज खेली हैं जिसमें से दो श्रीलंका के नाम और दो ड्रॉ रही हैं। पांचवीं सीरीज पर कब्जा जमाकर भारत ने रच दिया इतिहास। ये दो देशों के बीच की सीरीज थी वैसे कई और टूर्नामेंट भारत ने श्रीलंका में अपने नाम पहले किए हैं। लेकिन दो देशों की सीरीज में पहली बार भारत को ये गौरव हासिल हुआ।
इस जीत में सबसे बड़ा योगदान सुरेश रैना और कप्तान धोनी का रहा। सुरेश रैना को शानदार बल्लेबाजी और दो सुपर कैचों के लिए मैन ऑफ द मैच चुना गया। सुरेश रैना ने जबरदस्त 76 रन का योगदान दिया मात्र 78 गेंद में। जिसमें 6 चौके और एक शानदार छक्का शामिल था। कोहली के साथ मिलकर रैना ने दो विकेट के बाद टीम को संभाला। कोहली 7 चौकों की मदद से 54 रन बनाने के बाद तुषारा का शिकार बने। कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने कप्तानी पारी खेली। रैना के साथ मिलकर 143 रन की साझेदारी ने भारत की नैया पार लगा दी। धोनी ने 80 गेंद पर 71 रन का योगदान दिया। भारत ने श्रीलंका के सामने 259 का लक्ष्य रखा। इस बीच श्रीलंका के लिए सिर्फ एक खुशखबरी थी कि चमिंडा वास ने युवराज का विकेट चटकाकर 400 विकेट पूरे किए। तुषारा ने कमाल की गेंदबाजी की और 5 विकेट झटके।
जयशूर्या ने आते के साथ ही हाथ दिखाने शुरू कर दिए। ऐसा लग रहा था कि वो जल्दी से जल्दी मैच जीतने की फिराक में हैं। पर मुनाफ ने दूसरे छोर पर खड़े बर्नापुरा का विकेट झटक लिया। पटेल ने संगकारा का भी विकेट झटक लिया। फिर तो कप्तान जयवर्द्धना की कोशिशें भी श्रीलंका को हार से नहीं बचा पाई। थोड़ी बहुत कोशिश तुषारा ने की पर जहीर खान की गेंद पर रैना ने शानदार कैच लपक भारत की जीत पर मुहर लगा दी। भज्जी ने फिर गेंद से कमाल दिखाया 3 विकेट झटके।
धोनी ने दिखा दिया की वो एक शानदार कप्तान हैं। पहला वन डे हारने के बाद धोनी ने मेंडिस की तारीफ की थी और फिर दूसरे मैच से उसे धोनी ने पढ़ लिया। पूरी टीम को दिया मूलमंत्र 'पीटो मेंडिस को, मारो मुरली को'। रणनीति कामयाब रही और टीम पर छाया एम फेक्टर का खौफ खत्म हो गया। हम सीरीज जीत चुके हैं और साथ ही अब चयनसमीति ये सोचने पर मजबूर होगई है कि क्या धोनी को टेस्ट टीम की भी कप्तानी दे देनी चाहिए? वैसे हर जगह आवाज़ उठ चुकी है।


आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, August 27, 2008

महंगाई ने किया घर के बजट का बंटाधार-व्यंग्य

हाय रे महंगाई, मार डाला। अब ये हर जगह सुनाई देने लगा है। हर गृहणी को हर रोज सबसे बड़ी लड़ाई लड़नी पडती है मैन्यू के लिए, कि आखिरकार बनाएं क्या। कोई सब्जी सस्ती हो ही नहीं रही। कब तक दालों से काम चलाएं। पर वो भी तो आसमान छूने लगी हैं। राशन का बजट भी इस बार महंगाई को देखते हुए बढ़ाया था पर ये महंगाई दर की तरह काबू से बाहर। मियां जी की अलग आफत, रोज-रोज ऑफिस में नाना प्रकार के पकवान ले जाते थे पर अब चुनिंदा सब्जियों से गुजारा कर रहे हैं। नौबत ये आन पड़ी है कि दाल तक ऑफिस का सफर तय करने लगी है। पर दाल भी तो सस्ती कहां रह गई। अब सोचते हैं कि खाएं क्या?

महीने की शुरुआत में ही वेतन नौ दो ग्यारह। खुशी तो पहले ही दिन होती है फिर तो महीना खींचने की औपचारिक्ता ही शेष रह जाती है। शुरू के पांच दिन में ही पूरे महीना का हिसाब तय हो कर वेतन पर ग्रहण लग जाता है। पर देनदारों की लंबी सूची खत्म होने का नाम ही नहीं लेती है। फिर से वो ही जद्दोजहद, 25 दिन बाद का इंतजार।

अपने देश में ‘अतिथि देवो भव’ लेकिन महंगाई अभी कहलवा रही है ‘प्रभु अभी मतो भव’। इस महंगाई में ये हाल है कि ना बाबा ना अभी कुछ दिन तो ‘नो टू गेस्ट’। फिर भी गर मेहमान आजाएं तो और मुसीबत। क्या बनाएं क्या ना बनाएं। फिर मेहमाननवाजी भी तो करनी ही है।

कल मार्केट गया तो दो चार सब्जी लेने के बाद ही जेब में कुछ बचा नहीं। पर सोचा की हरी मिर्च ले लूं। पांच की हरी मिर्च देना।
‘ये क्या दे रहे हो भाई, कुछ डालो तो’। पलटकर बोला, ‘70 रु. किलो है’। ‘मैने पांच की मांगी है दो की नहीं’। ‘ये पांच की ही है बोलो तो सात की कर दूं-100 ग्राम’।
सोचा दो और देने पड़ेंगे, चलो अभी तो ये ही दो। अब चटनी भी महंगी हो गई।
पहले कहा जाता था कि गरीब अपना पेट “नमक की रोटी और प्याज” से भर लेता है। वो भी बेचारा अब प्याज और रोटी खाने के लिए तरस रहा है। आज प्याज की कीमत 18रु. किलो. है, जिसमें गिनती की 18 प्याज भी नही चढ़ती। अब गरीब खाए क्या? रोटी नमक के साथ खाए या फिर दाल के चार दाने डालकर नमकीन पानी के साथ। दिन का बीस रु. कमाने वाला क्या अफोर्ड कर पाएगा 18रु. किलो. की प्याज? आज जब सब्जी लेने जाओ तो दस बार सोचना पङता है कि जाने को तो चले जाएंगे लेकिन जा कर लाएंगे क्या? हमसे ज्यादा हाल तो उनका बुरा है जो दिन के ४०-५० रुपये ही कमा पाते हैं।

नोट-ऐसा नहीं की मेहमाननवाजी का आप मौका ही ना दें। भई, अतिथि देवो भव, मेहमान सराखों पर। सभी का स्वागत है।

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, August 26, 2008

क्या ट्रॉफियों के ऊपर भारी पड़ेंगे ये पदक?

बीजिंग ओलंपिक 2008 तो हो गए। भारत ने तीन पदक जीतकर अपने लिए तो इतिहास भी रच दिया। पर एक सवाल यहां मेरे जहन में उठ रहा है। क्या एक पदक किसी ट्रॉफी के बराबर होता है या फिर ऊंचा या फिर....? क्या ये तीन पदक उन करोड़पति ट्रॉफी पर भारी पड़ पाएंगे? एक बार 1983 में ये हमें मिली जिस पर पूरे देश को नाज है। पर एक बार सपना दिखाकर कहीं छूट गई। पिछले साल एक बार और ऐसा कमाल हुआ और फिर से एक नई ट्रॉफी देश में आगई। पर अब, क्या ये तीन पदक उस भ्रम को तोड़ पाएंगे, जो आज की युवा पीढ़ी संजोए रखती है और साथ ही उनका परिवार, जो कि भेड़ चाल में आंख मूंदे चले जा रहे हैं। इस देश में क्रिकेट को धर्म की तरह पूजा जाता है। एक-एक खिलाड़ी की कीमत करोड़ों में लग रही है, 45 दिन खेलकर के करोड़ों कमा जाते हैं। और वहीं दूसरी तरफ ओलंपिक में कामयाबी हासिल करने के बाद भी क्या वो इतना कमा पाएंगे जितना कि ये क्रिकेटर कमा जाते हैं।
भारत के लिए इस बार का ओलंपिक कुछ ज्यादा ही अहम रहा। तीन पदक भी मिले,108 साल के इतिहास में पहली बार तीन पदक(वैसे ओलंपिक को शुरू हुए 112 साल)। पहला व्यक्तिगत गोल्ड पदक अभिनव बिंद्रा के नाम, गोल्ड पाते हुए बेशक अभिनव बहुत सहज दिखे हों पर देश बिल्कुल सहज नहीं था। पहली बार किसी ने एकल प्रतियोगिता में पदक जीता था, वो भी गोल्ड मेडल। जहां भारत की झोली में स्वर्ण पदक सिर्फ हॉकी में ही आए, जिसको लाने का गौरव पूरी टीम को जाता है वहां पर एक खिलाड़ी के द्वारा लाया ये पदक हमारे लिए कहीं पर भी उन 8 गोल्ड मेडल से कम नहीं है।

मुक्केबाजी में पहली बार पदक मिला चाहे वो कांस्य ही क्यों ना हो। स्वर्ण का सपना तो टूट गया विजेंदर, अखिल और जितेंदर का, पर स्वर्णिम अक्षरों में नाम जरूर लिखवा लिया विजेंदर ने। बॉक्सिंग में पहली बार देश को कोई भी पदक हाथ लगा और पहली बार तीन खिलाड़ी क्वार्टर फाइनल तक पहुंचे, अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रर्दशन।
1952 के बाद कुश्ती में पदक। सुशील कुमार से कोई इतनी उम्मीद नहीं लगाए बैठा था। लेकिन उसने अपना नाम भी के एन जाधव जी के साथ स्वर्णिम अक्षरों में लिखवा लिया।

सारा देश गौरवान्वित महसूस कर रहा है। पर क्या ये गौरव कुछ दिन तक ही रहेगा या फिर इसकी गूंज दूर तलक भी जाएगी, लंदन तक? क्या क्रिकेट का जो जुनून देश के सर चढ़कर बोलता है, वैसा ही जुनून इनका भी देश के सर चढ़कर बोलेगा? यदि सरकार नहीं सुधरी तो नहीं बोलेगा। विजेंदर को जिस होटल में ठहराने की बात थी वो भी जब कि वो देश का नाम रोशन करके आया हो। उससे तो नहीं लगता कि सरकार जागेगी। किसी भी क्रिकेटर को रुकवाया गया होता तो पता चलता साफ ठहरने से मना कर दिया होता। ये सरकार के नुमाइंदे दलाल है और दलाली के सिवा कुछ नहीं कर सकते।

बहुत कुछ तो युवाओं पर भी निर्भर करता है। अब ये उदाहरण ही ले लीजिए। रीएलिटी शो क्या शुरू हुए लाखों की तादाद में युवा वर्ग आगे आया। इनमें से आगे वो आए जो कि काम चोर थे, आलसी थे, निकम्मे थे या फिर दिन में ही जागते हुए ख्याली पुलाव बनाने वाले, मिनटों में अमीर बनने का सपना देखने वाले थे। अधिकतर युवाओं को ये भी नहीं पता था कि जिस जगह वो जा रहे हैं वहां पर ट्रैनिंग की भी जरूरत होती है। कुछ को तो मुगालते ने ही मार डाला था कि वो अमिताभ, अक्षय, शाहरुख या फिर आमिर, सलमान, सैफ की तरह दिखते हैं। वो ही हाल लड़कियों का था लेकिन ये बात खुद ऑर्गेनाइजरों ने भी मानी की जितनी लड़कियां वहां पर पहुंची थी उसमें अधिकतर सोच कर आईं थी और जानती थीं कि वो किस लिए यहां पर आई हैं। क्या ये युवा वर्ग तैयार है इतनी मेहनत के लिए जितनी की ये मुक्केबाज, पहलवान, शूटर और क्रिकेटर करते हैं। ये पहलवान तो एक कमरे में 12 एक साथ रहते हैं। अभिनव एक हॉल में 10-12 घंटे बंद रहकर शूटिंग की प्रैक्टिस किया करते थे। क्या इतना अभ्यास करने के लिए वो तैयार हैं तो फिर हम भी लंदन में करिश्मा दिखाने के लिए तैयार है।

ये सोती हुई सरकार यदि नहीं जागी तो देश के युवाओं की मेहनत पर पानी फिर जाएगा। 1980 तक ओलंपिक में चीन पहले 10 देशों की सूची में नहीं आता था। और 2008 में चीन 51 गोल्ड के साथ नंबर 1 पर है और हमारा नंबर 50वां है। क्या हम ये सोच सकते हैं कि आने वाले 28 साल बाद हम पहले नंबर पर होंगे या फिर पहले 5 देशों में शुमार हो पाएंगे? क्या क्रिकेट को छोड़कर इन खेलों पर भी ध्यान दिया जाएगा?

आपका अपना
नीतीश राज
(अपनी राय के साथ-साथ इन दो सवालों के लिए आप वोट भी कर सकते हैं।)

Friday, August 22, 2008

'विजेंदर तुम जीत गए हो'

जैसी उम्मीद थी वैसा ही हुआ। सब जानते थे कि कोरया क्यूबा के नंबर वन बॉक्सर है और साथ ही पैन अमेरिकन चैंपियन भी। कोरया से मुकाबला काफी टफ रहेगा। ये तो विजेंदर की किस्मत है कि उसका मुकाबला नंबर वन खिलाड़ी से था। नहीं तो दूसरे सेमीफाइनल में दोनों खिलाड़ी विजेंदर से रैंकिंग के मामले में और खेल में भी पीछे हैं। विजेंदर का बाऊट ही क्यूबा के चैंपियन से पड़ गया नहीं तो शायद एक मुकाबला हम और देखते और वो होता स्वर्ण के लिए।
आज के मुकाबले में दो सेट विजेंदर ने और दो सेट कोरया ने जीते। लेकिन विजेंदर ८-५ से हार गया। पर विजेंदर का प्रभाव ऐसा था कि क्यूबा के बॉक्सर को काफी डिफेंसिव होकर खेलना पड़ा। कोरया ने इस ओलंपिक में अपने राउंड में १७,१८,९ अंक बटोरे। इन नंबरों से ही पता चलता है कि कोरया कितना एग्रेसिव होकर खेलते हैं। लेकिन आज के मुकाबले में तो हाल ये था कि यदि तीसरे राउंड में विजेंदर ने अखिल का दांव नहीं अपनाकर अपने ही दांव से खेलता तो शायद मुकाबला और कड़ा हो सकता था। पहले राउंड में तो कोरया ने अंक बटोरे वहां पर उनकी सराहना करनी होगी लेकिन विजेंदर ने तीसरे राउंड में अंक दे दिए। एक समय ऐसा आया कि तीन अंक लगभग एक साथ ही कोरया ने झटक लिए। क्योंकि वहां पर विजेंदर ने अपना चेहरा कवर नहीं कर रखा था। वो उसी स्टाइल में था कि कोरया एक अंक बटोरने की कोशिश में उसे मौका देगा और ये अंक बटोर लेगा लेकिन यहां पर कोरया कि फुर्ती ने विजेंदर की सोच को धोखा दे दिया। विजेंदर के द्वारा अपनाया अपने गुरु अखिल का दांव ही उसे हार की कगार पर ले आया। साथ ही कोरया कई जगह गलतियां भी कर रहे थे जिसके चलते अंतिम राउंड में विजेंदर को २ प्वाइंट मिले। लेकिन मुकाबला काफी रोचक रहा।
इन भिवानी के शेरों ने कमाल कर दिया। बॉक्सिंग में भारत का इससे पहले ऐसा इतिहास नहीं रहा। तीन बॉक्सर क्वार्टर फाइनल में। जिसमें से एक को कांस्य पदक मिला। "जिससे लगता है कि हारा नहीं विजेंदर, वो तो विजेता है, कांस्य पदक विजेता"
बीजिंग ओलंपिक में भारत ने इतिहास भी रच दिया। ओलंपिक के इतिहास में भारत ने इस बार ३ पदक जीते जो कि १९५२ में दो पदक जीतने के बाद के क्रम को आगे बढ़ाते हैं। लेकिन इतना बड़ा अंतराल आगे ना हो। हर ओलंपिक में हमारा प्रदर्शन बेहतर हो। अब इंतजार है दो कांस्य विजेताओं का जो कि सोमवार को भारत आ रहे हैं। शायद स्वर्ण पदक विजेता से भी बेहतर स्वागत होगा इनका।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, August 15, 2008

"अखिल की जीत से रोया वर्ल्ड चैंपियन"


ऑफिस में सब गदगद हो गए। सबके चेहरे पर जैसे खुशी की एक अनोखी लहर दौड़ रही थी। भई बात ही कुछ ऐसी थी। सच पूछो तो वो चार राउंड और आठ मिनट ऐसे लग रहे थे कि जैसे कि किसी ने मेरे सर पर पहाड़ रख दिया हो। इतना टेंस में शायद ही खेलों को लेकर के कभी होता हूं। ओलंपिक्स में भारतीय मुक्केबाजों का अब तक का सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस है। इससे पहले कभी भी दो मुक्केबाज क्वार्टर फाइनल तक नहीं पहुंचे है। और अभी तीसरे मुक्केबाज से हमें उम्मीद है कि वो क्वार्टर फाइनल में जगह बना लेगा। वीरेंदर और अखिल तो क्वार्टर फाइनल में पहुंच चुके हैं लेकिन जितेंद्र को अपने गुरु की राह पर चलते हुए क्वार्टर फाइनल में जगह बनानी है।
बैटम वेट में अखिल ने वर्ल्ड चैंपियन सर्गी वोडोप्यानोव को हराकर अपने चैंपियन बनने के दावे को और पुख्ता किया है। इस उल्टफेर की उम्मीद तो खुद रूस के सर्गी को नहीं थी लेकिन जब ये फैसला हुआ तो वर्ल्ड चैंपियन भी रो दिया। पहले राउंड में अखिल 2 के मुकाबले 1 प्वाइंट से पीछे था। यहां हमारा दिल हो रहा था कि बस अगले राउंड में तो अखिल वापसी कर ही लेगा। सारे ऑफिस में खुसुर-पुसुर हो रही थी कि क्या जीत पाएगा अखिल। दूसरे दौर में भी अखिल 3-4 से सर्गी से पीछे रहा। दिल की धड़कनें तेज होने लगी। अब थोड़ी थोड़ी शांति छाने लगी थी ऑफिस में। तीसरा दौर शुरु हुआ और यहां पर दुआओं का दौर। लेकिन इस में भी वर्ल्ड चैंपियन ने अखिल को आगे आने नहीं दिया। अखिल को देखते ही लग रहा था कि वो अब भूखा हो चला है जीत के लिए। वो लंबे पंच तक मारने में लग गया। तीसरा राउंड समाप्त और प्वाइंट में अखिल 7-8 से पीछे। बस अब सर पर इतना भार लगने लगा कि दिल कह रहा थी जीत हो लेकिन जल्द ही ये मैच भी। फैसले की घड़ी बड़ी ही असहज बना रही थी।
चौथे राउंड में अखिल एक जुझारु मुक्केबाज़ की तरह वर्ल्ड चैंपियन पर पिल पड़ा। देखने में मजा आने लगा। लग रहा था कि भूखा शेर अपने शिकार पर झपट रहा है। लेकिन सर्गी भी कहां हार मानने वाला था। इस राउंड में एक समय ऐसा आया कि सर्गी 9 के मुकाबले 7 अंक से आगे हो गया। लेकिन अखिल अब विरोधी पर कहर बन कर टूट पड़ा मैच मे कर ली वापसी। अखिल को इल्म था कि करोड़ों लोगों की आस को वो यूं ही नहीं तोड़ सकता और लगा कि ये दिन अखिल के नाम ही बना है। दो स्ट्रेट पंच ने पासा पलट दिया और स्कोर 9-9 होगया। अब लगा कि एक प्वाइंट और मिल जाए तो अखिल जीत जाए। लेकिन प्वाइंट था कि मिल ही नहीं रहा था जबकि अखिल के मुक्के हिला रहे थे सर्गी को। हर मुक्के पर लग रहा था कि ये प्वाइंट अखिल को मिला लेकिन स्कोर देखते तो बराबर। अखिल जबर्दस्त सटीक, आक्रमक और तकनीक का परिचय दे रहा था। लग रहा था कि अब प्वाइंट मिला, अब प्वाइंट मिला, अब मिला और देखते देखते ही मैच खत्म। चारों राउंड की समाप्ति पर स्कोर बराबर।
फैसला 5 सदस्यीय जज के पैनल को करना था और दिल की धड़कन थोड़ी थमने लगी। दिल और आंखों को ये विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वर्ल्ड चैंपियन के साथ भिड़ने वाला ये शख्स भारतीय है। ये वो ही मुक्केबाज है जो कि एक साल से अपनी क्लाई के इलाज से जूझ रहा था। और फैसले से पहले ही अखिल जब दूसरे खेमें से हाथ मिलाने गया और सर्वी पस्त सा दिखने लगा तो लग गया कि जीत गया है हमारा अखिल। हमारे अखिल ने हमें आजादी के इस मौके पर ये तोहफा दिया है। ऑफिस में सब एक साथ खुशी से चीख पड़े और जब देखा कि सर्गी रो रहा है तो थोड़ा ठिठके कि सर्गी ने रैफरी से हाथ छुड़ा लिया और रोने लगा। हम यहां खुशी से झूम गए। अखिल ने जीत के बाद कहा कि वो गोल्ड से नीचे कुछ नहीं सोच रहे।
( "It will be a tough fight, but I am here to win the gold। I am ready to face the world champion because I want to be the No. 1 in the world. I will show this on August 15," said Akhil.(cout AFP) अखिल ने ये बात पिछली जीत के बाद कही थी)
वैसे भी अखिल ने पिछले कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता। एशियन ओलंपिक क्वॉलिफाइंग टूर्नामेंट में भी नंबर वन बॉक्सर रहा अखिल। अखिल ने फिर से जगाई है उम्मीद कि बीजिंग में फिर से सुनाई दे हमारा राष्ट्रगान, जन गण मन....।

आपका अपना
नीतीश राज

(स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई)
फोटो साभार- गुगल, रॉयटर्स,एएफपी
कोट साभार- एएफपी

Thursday, August 14, 2008

खबरें ये भी हैं, जो आपके सरोकार की हैं

क्या आप सोच सकते हैं कि ये बारिश जो कि कवियों के लिए कविता है और शायरों के लिए शायरी किसीकी जान भी ले सकती है। बारिश जब अपना कहर बरपाए तब नदियां उबलने लग जाती हैं और फिर होते हैं हादसे। देश जहां आजादी की 61वीं सालगिरह मना रहा है वहीं ठीक एक दिन पहले कई मां के लाल उनसे दूर होगए। कर्नाटक में मैंगलोर के पास एक स्कूल बस नदी में गिर गई जिसमें ग्यारह लोगों की जान चली गई। इन ग्यारह लोगों में से 7 बच्चे हैं। 25 लोगों को बचा लिया गया है, इनमें 20 बच्चे हैं। जिस रोड पर ये हादसा हुआ वो गुरुपुर नदी के साथ-साथ थी। बीती रात से ही जोरदार बाऱिश के कारण नदी का पानी सड़क पर आगया। मैंगलोर में भामी हिरिया मिडिल स्कूल के बच्चों को लेकर एक मिनी स्कूल बस जा रही थी। बस में 28 बच्चे थे और साथ में कुछ लोग ऐसे भी थे जो कि कोई सवारी नहीं मिलने के कारण उस में चढ़ गए थे, लेकिन शायद किस्मत उन के साथ खेल खेल चुकी थी। उस समय वहां तेज़ बारिश हो रही थी और पानी सड़क पर भर गया था। सड़क पर पानी इतना था और बारिश भी ज्यादा हो रही थी कि बस का ड्राइवर रास्ता भटक गया। पानी इतना ज्यादा था कि सड़क और नदी में फर्क कर पाना उस ड्राइवर के लिए मुश्किल होगया। बस, हादसा हो गया, चंद पलों में बस नदी में बह गई।
वहां पर मौजूद लोगों को हर जगह से चीखें ही सुनाई दे रही थी। लोग जहां दखते वहां पर उन्हें एक हाथ दिखाई देता मदद के लिए। जितने भी हाथ हिलते दिखते मानो जैसे कह रहे हों कि बचा लो मुझको। आस पास के लोगों ने समझदारी दिखाई और लगभग 10 बच्चों को तत्काल बचा लिया गया और अब तक 20 बच्चे बचा लिए गए हैं। ज्यादातर बच्चों की उम्र दस से बारह साल के बीच है। घायल बच्चों का बैंगलोर के वेनलॉक अस्पताल में इलाज चल रहा है। बारिश की वजह से वहां पर और बसें नहीं चल रही थी। बसों के अभाव और बारिश की वजह से जो लोग इस बस में चढ़ गए थे उनके लिए ये सफर आखिरी बन गया।



खबर नंबर 2

क्या आप ने कभी सोचा है कि नारे भी किसी की जान ले सकते हैं। हां, ये सच है कि नारे भी जान लेते हैं। ये मैं इसलिए लिख रहा हूं कि मैंने देखा की कहीं पर भी इस बात की ज्यादा चर्चा नहीं हुई। कई अखबारों ने तो हद ही कर दी कि इस खबर को छोटे से कॉलम में जगह देकर छोड़ दिया गया। वीएचपी ने देश भर में अमरनाथ की आग को सुलगाते हुए चक्का जाम का आहवान 13 अगस्त को किया था। इस जाम ने दो लोगों की जान ले ली। ये दो जानें थी जो कि बच सकती थी लेकिन वो बच नहीं पाई। दोनों ही हादसों में लगा कि जिंदगी क्या इतनी सस्ती हो सकती है।
ये दो घटनाएं कानपुर और अंबाला की हैं। अंबाला में तो उस बेटे के ऊपर पहाड़ टूट पड़ा जब कि उसका बीमार पिता उसी की गोद में बिना इलाज के ही दम तोड़ गया। बेटा चिल्लाता रहा, अपने पिता की जिंदगी की भीख मांगता रहा, चीख-चीख कर कहता रहा जाने दो हमें लेकिन ये सियासत के ठेकेदार टस से मस नहीं हुए। वो अपने बीमार पिता को अस्पताल नहीं ले जा सका, और उस शख्स का पिता जिंदगी की ये जंग हार गया। वो पिता जिंदगी जीना चाहता था, वो जिंदगी से लड़ रहा था लेकिन उसे क्या पता था कि मौत के रूप में ये जाम उसकी जीने की इच्छा पर भारी पड़ेगा। बेटा अपने पिता को बार-बार चूम रहा था और लोगों से गुहार कर रहा था। लेकिन उस बेचारे की नहीं सुनी गई और उसके ऊपर से पिता का साया उठ गया। जब तक मदद मिलती तब तक तो देर हो चुकी थी।
फिर प्रवीण तोगड़िया ने आकर बयान दिया कि उस बीमार आदमी को उठाकर हमारा आदमी ले गया। लेकिन उनसे कोई तो पूछे कि समय की कीमत समय निकल जाने के बाद कुछ नहीं रहती। जब वो चीख रहा था पुकार रहा था तब क्यों नहीं सुनी उस की पुकार। क्या जाम ही है हर चीज का हल। काम धाम कुछ करते नहीं हो और बन बैठे हो देश के ठेकेदार। शर्म आनी चाहिए, शर्म।
कानपुर में एक लड़के को करंट लग गया और अस्पताल लेजाते वक्त जाम ने उसकी भी जान ले ली। वो अपना हक चाहता था, वो जीना चाहता था लेकिन वो इस लड़ाई को जीत नहीं पाया। डेढ़ घंटे तक वो इस जाम में फंसा रहा और जिंदगी से लड़ता रहा। डेढ़ घंटे का समय काफी लंबा होता है। उसकी गाड़ी वीएचपी की जाम में ऐसी फंसी कि उसकी जिंदगी को ही खत्म करगई।
वहीं वीएचपी के कार्यकर्ता इस देश की सरकार से ये पूछते रहे कि देशभक्ति की कीमत जान देकर क्यों चुकाई जाती है? यहीं पर हम भी इनसे सवाल पूछ रहे हैं कि क्या किसी की जिंदगी की कीमत इतनी कम होती है कि वो यूं ही कोईं भी ले सकता है। इन बेचारों को राजनीति से कोई मतलब नहीं, शायद उन्हें ये भी नहीं पता कि अमरनाथ की आग में देश क्यों जल रहा है, लेकिन इन सियासतदारों को तो अपनी राजनीति चमकानी है और इसके लिए एक दो लोगों की जान क्या मायने रखती हैं।


आपका अपना
नीतीश राज

(62वें जश्न पर सबको बधाई)

Tuesday, August 12, 2008

खेल खेल में गई जान

चंडीगढ़ में कहीं खुशी मनाई जा रही थी तो कहीं पर गम पसर गया। अभिनव बिंद्रा को स्वर्ण पदक अभी मिल कर भी नहीं हटा था कि खेल खेल में ही 19 साल का मोहित ना जाने कहां खो गया। एक न्यूज चैनल पर वो तस्वीरें हिला देने वाली थी। देखने से ही लग रहा था कि भगवान कह रहा हो कि जा तुझे एक मौका और दिया लेकिन जवानी के जोश में वो आगे बढ़ता चला गया और ना जाने पानी में कहां खो गया। पानी का बहाव ही इतना तेज था कि उसे ढूंढने के सारे प्रयास विफल रहे।

चंडीगढ़ में 16 सेक्टर के रोज गार्डन में तीन दोस्त पिकनिक मनाने गए थे। तीनों ही हम उम्र थे और तीनों बारिश का लुत्फ लेना चाहते थे। लेकिन तभी एक हादसा हो गया। मोहित नाम का लड़का पता नहीं क्यों इतनी मस्ती में उतर आया कि उसको ये इल्म भी नहीं रहा कि पानी की रफ्तार उसकी सारी ताकत से कहीं ज्यादा है। उस पानी की रफ्तार में मस्ती करना उस को भारी पड़ गया। पहले तो वो वहां पर पानी के साथ खेल रहा था। पास में लगी लोहे की चैन को पकड़कर पानी की तेज धारा से लड़ते हुए अटखेलियां कर रहा था कि तभी उस के पैर पानी के बहाव को सहन नहीं कर पाए और उखड़ गए लेकिन चैन पर उस की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वो सिर्फ झूल गया। इस बार तो वो बच गया। बचने के बाद उसने सब को हाथ हिलाया जैसे कह रहा हो कि मैं सुरक्षित हूं। मुझे लगता है कि ये ही एक अवसर था उसके पास जब कि भगवान ने उसे मौका दिया था कि अब भी वक्त है संभल जा। लेकिन वो नहीं संभला और फिर लोहे की उस चैन को पकड़कर पानी के बीचों बीच खड़ा होगया। पर इस बार उसके हाथों की पकड़ ने उस का साथ नहीं दिया। थोड़ी देर तक तो वो पानी के बहाव को सहन करता रहा। पानी का बहाव इतना तेज था कि वो वहां पर ही गिर गया। लेकिन जांबाजी दिखाने के चक्कर में कभी वो पानी में समा जाता तो कभी पानी के ऊपर आजाता। उसके दोस्तों ने जो कि इस बहाव से बाहर खड़े थे उसका खेल मान रहे थे। जब उसने अपने को बचाने के लिए हाथ उठाया और आवाज़ लगाई तो वो पानी की तेज आवाज में कही डूब गई। और तभी उसका एक हाथ उठा और फिर दूसरे हाथ की पकड़ लोहे की जंजीर से छूट गई और वो बहता हुआ जाने लगा। फिर उसने कोशिश की पेड़ की शाखा को पकड़ने की जो कि पानी के ऊपर लटक रही थी। उसने वो पकड़ी भी लेकिन पानी का बहाव ही इतना तेज था कि वो पकड़ कायम नहीं रह सकी और वो बहता हुआ पानी में डूब गया। ये पानी वहां के एक चौड़े नाले की तरफ जाता है। जहां पर पुलिस ने बचाव का काम जारी रखा लेकिन उसका कोई भी पता नहीं चल पाया।शायद तबतक बहुत देर होचुकी थी। पुलिस को उसके दोस्तों ने ही बुलाया जब कि वो उसे खोज पाने में नाकामयाब रहे।

इस जगह पर मैं एक बात बताना चाहूंगा कि ये तस्वीरें वहां पर मौजूद एक कैमरामैन ने खींची थी जो कि बारिश की कुछ तस्वीरें और साथ में बारिश में खेलते हुए लोगों के कटवेज लेने कि लिए उस रोज गार्डन में गया था। वो इस सब तस्वीरों को कैमरे में कैद कर रहा था और पास में खड़े एक शख्स की आवाज़ आ रही थी कि ये गिर जाएगा और ऐसा ही हुआ। शायद उस आदमी को भी नहीं पता होगा कि ऐसा भयानक हादसा हो जाएगा। साथ ही, मोहित जो डूब गया शायद ये स्टंट भी इसी चक्कर में करने चला गया कि कैमरे में उस की तस्वीरें कैद हो रही हैं। वो कैमरे की तरफ बार-बार देख कर हाथ भी हिला रहा था, पर अब वो तस्वीरें ही बची हैं जो कि एक कैमरे में कैद हैं, वो नहीं।

आपका अपना

नीतीश राज

(ये शायद ठीक से पब्लिस नहीं हुआ इस कारण से दोबारा डाला है।)

क्या पांडव फिर कभी एक साथ खेल पाएंगे, मुझे लगता है ‘नहीं’

श्रीलंका से सीरीज गवांने का दुख तो है पर उस से ज्यादा है पांडवों का नहीं चलना। सब से ज्यादा उम्मीदें इन से ही थीं और ये ही नहीं चले। अब एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं क्योंकि जो होना था वो होगया। हम सीरीज हार गए। पर सवाल ये हैं कि क्या ये पांडव हीं हैं इस हार के सबसे बड़े दोषी? क्या ये हीं हैं जो हैं हार के गुनहगार? भई, सबसे ज्यादा अनुभव इन के पास ही था। जब टीम देश से रवाना हो रही थी तो कप्तान कुंबले ने कहा था कि मेंडिस की काट हमारे अनुभवी बल्लेबाज ढूंढ निकालेंगे। लेकिन मेंडिस ने तो रिकॉर्ड ही बना दिया। पहली सीरीज में सबसे ज्यादा विकेट लेने का कीर्तिमान हासिल कर लिया।
कुंबले जी के दो अरमान थे कि सचिन इस टूर में लारा का रिकॉर्ड तोड़ दें लेकिन
सचिन ने तो अरमानों पर ऐसा पानी फेरा कि अब कभी कुंबले अरमान ही नहीं करेंगे, और वो भी खासतौर पर सचिन से। दूसरा अरमान था कि सीरीज हम बेहतर अंतर से जीतें। लेकिन यहां पर पूरी टीम ने और बाकी बचे अनुभव ने लुटिया डूबो दी। कुंबले अब कहते फिर रहे हैं कि बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले....।
जहां तक सचिन की बात है तो सचिन एक लेजेंड हैं। उनके ऊपर पिछले समय में भी कई आरोप लगे लेकिन जब उन्होंने वापसी कि तो सबके मुंह बंद होगए। सचिन क्रिकेट मे गॉड की भूमिका रखते हैं खासकर भारत के लिए तो और ब्रैडमैन से उनकी तुलना यूं ही नहीं की जाती। लेकिन क्या सचिन की चोटें और उम्र अब उन पर हावी होने लगी हैं। दबाव जो कि धोनी की तरफ से उन पर आया है वो भी कुछ कम नहीं है। यहां पर बीसीसीआई को एक सलाह है कि एक-दो सीरीज बांग्लादेश और कीनिया के साथ रखकर सचिन का रिकॉर्ड बनावा दें और फिर सचिन को कहें की गुरू अब क्या बुढापे में भी खेलोगे, संन्यास ले लो। वैसे सचिन की किस्मत मैं ये नहीं था कि विदेशी धरती पर वो रिकॉर्ड बनाए। ऑस्ट्रेलिया के साथ होने वाली 4 टेस्ट मैचों की सीरीज में शायद वो ये रिकॉर्ड बना लें। पहला टेस्ट बैंगलोर में चिन्नास्वामी स्टेडियम में 9 अक्टूबर से 13 अक्टूबर तक होगा। भगवान ने चाहा तो इसी मैदान पर हम सचिन को ये कीर्तिमान हासिल करते देखेंगे।
दादा, द्रविड़ और लक्ष्मण तो पहले से ही निशाने पर हैं और अब इस प्रदर्शन ने तो और भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। वहीं द्रविड़ ने 4 मैच में 179 रन बनाए जिसमें सर्वाधिक 68 रहे और मैदान में सिर्फ 4 कैच में उनका योगदान रहा। दादा ने 4 मैच में 132 रन बनाए, सर्वाधिक 35 रन और 2 कैच लपके। वहीं लक्ष्मण ने 4 मैच में 215 रन बनाए, सर्वाधिक 61 नाबाद और 4 कैच लपके। ये आंकड़े हैं पूरी सीरीज के। लेकिन कप्तान साहब ने तो कमाल कर दिया जहां दूसरी टीम के गेंदबाज कमाल कर गए, वहीं कुंबले ने 4 मैच में सिर्फ 11 विकेट लिए और सर्वश्रेष्ठ रहा 30 पर 3 विकेट। बल्ले से मात्र 29 रन चार मैचों में। इनसे अच्छा तो भज्जी का प्रदर्शन रहा जिन्होंने सीरीज में 20 विकेट झटके और बेस्ट रहा 102 पर 6 विकेट, एक मैच में 10 विकेट भी लिए और 77 रन भी बनाए।


क्या लगता है कि इन आंकड़ों के साथ ये 5 पांडव फिर वापसी कर पाएंगे, मुझे तो नहीं लगता कि वापसी संभव हो पाएगी। इनमें से जो भी खिलाड़ी एक सीरीज के लिए बाहर हुआ तो उस को मान लेना चाहिए कि अब टीम इंडिया में वापसी के दरवाजे उसके लिए बंद हो गए और हो सके तो फिर उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए।

आपका अपना
नीतिश राज

क्या पांडव फिर कभी एक साथ खेल पाएंगे, मुझे लगता है ‘नहीं’

श्रीलंका से सीरीज गवांने का दुख तो है पर उस से ज्यादा है पांडवों का नहीं चलना। सब से ज्यादा उम्मीदें इन से ही थीं और ये ही नहीं चले। अब एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं क्योंकि जो होना था वो होगया। हम सीरीज हार गए। पर सवाल ये हैं कि क्या ये पांडव हीं हैं इस हार के सबसे बड़े दोषी? क्या ये हीं हैं जो हैं हार के गुनहगार? भई, सबसे ज्यादा अनुभव इन के पास ही था। जब टीम देश से रवाना हो रही थी तो कप्तान कुंबले ने कहा था कि मेंडिस की काट हमारे अनुभवी बल्लेबाज ढूंढ निकालेंगे। लेकिन मेंडिस ने तो रिकॉर्ड ही बना दिया। पहली सीरीज में सबसे ज्यादा विकेट लेने का कीर्तिमान हासिल कर लिया।
कुंबले जी के दो अरमान थे कि सचिन इस टूर में लारा का रिकॉर्ड तोड़ दें लेकिन सचिन ने तो अरमानों पर ऐसा पानी फेरा कि अब कभी कुंबले अरमान ही नहीं करेंगे, और वो भी खासतौर पर सचिन से। दूसरा अरमान था कि सीरीज हम बेहतर अंतर से जीतें। लेकिन यहां पर पूरी टीम ने और बाकी बचे अनुभव ने लुटिया डूबो दी। कुंबले अब कहते फिर रहे हैं कि बहुत निकले मेरे अरमान फिर भी कम निकले....।
जहां तक सचिन की बात है तो सचिन एक लेजेंड हैं। उनके ऊपर पिछले समय में भी कई आरोप लगे लेकिन जब उन्होंने वापसी कि तो सबके मुंह बंद होगए। सचिन क्रिकेट मे गॉड की भूमिका रखते हैं खासकर भारत के लिए तो और ब्रैडमैन से उनकी तुलना यूं ही नहीं की जाती। लेकिन क्या सचिन की चोटें और उम्र अब उन पर हावी होने लगी हैं। दबाव जो कि धोनी की तरफ से उन पर आया है वो भी कुछ कम नहीं है। यहां पर बीसीसीआई को एक सलाह है कि एक-दो सीरीज बांग्लादेश और कीनिया के साथ रखकर सचिन का रिकॉर्ड बनावा दें और फिर सचिन को कहें की गुरू अब क्या बुढापे में भी खेलोगे, संन्यास ले लो। वैसे सचिन की किस्मत मैं ये नहीं था कि विदेशी धरती पर वो रिकॉर्ड बनाए। ऑस्ट्रेलिया के साथ होने वाली 4 टेस्ट मैचों की सीरीज में शायद वो ये रिकॉर्ड बना लें। पहला टेस्ट बैंगलोर में चिन्नास्वामी स्टेडियम में 9 अक्टूबर से 13 अक्टूबर तक होगा। भगवान ने चाहा तो इसी मैदान पर हम सचिन को ये कीर्तिमान हासिल करते देखेंगे।
दादा, द्रविड़ और लक्ष्मण तो पहले से ही निशाने पर हैं और अब इस प्रदर्शन ने तो और भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। वहीं द्रविड़ ने 4 मैच में 179 रन बनाए जिसमें सर्वाधिक 68 रहे और मैदान में सिर्फ 4 कैच में उनका योगदान रहा। दादा ने 4 मैच में 132 रन बनाए, सर्वाधिक 35 रन और 2 कैच लपके। वहीं लक्ष्मण ने 4 मैच में 215 रन बनाए, सर्वाधिक 61 नाबाद और 4 कैच लपके। ये आंकड़े हैं पूरी सीरीज के। लेकिन कप्तान साहब ने तो कमाल कर दिया जहां दूसरी टीम के गेंदबाज कमाल कर गए, वहीं कुंबले ने 4 मैच में सिर्फ 11 विकेट लिए और सर्वश्रेष्ठ रहा 30 पर 3 विकेट। बल्ले से मात्र 29 रन चार मैचों में। इनसे अच्छा तो भज्जी का प्रदर्शन रहा जिन्होंने सीरीज में 20 विकेट झटके और बेस्ट रहा 102 पर 6 विकेट, एक मैच में 10 विकेट भी लिए और 77 रन भी बनाए।
क्या लगता है कि इन आंकड़ों के साथ ये पांडव फिर वापसी कर पाएंगे, मुझे तो नहीं लगता कि वापसी संभव हो पाएगी। इनमें से जो भी खिलाड़ी एक सीरीज के लिए बाहर हुआ तो उस को मान लेना चाहिए कि अब टीम इंडिया में वापसी के दरवाजे उसके लिए बंद हो गए और हो सके तो फिर उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए।

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नीतिश राज

खेल खेल में मौत

चंडीगढ़ में कहीं खुशी मनाई जा रही थी तो कहीं पर गम पसर गया। अभिनव बिंद्रा को स्वर्ण पदक अभी मिल कर भी नहीं हटा था कि खेल खेल में ही 19 साल का मोहित ना जाने कहां खो गया। एक न्यूज चैनल पर वो तस्वीरें हिला देने वाली थी। देखने से ही लग रहा था कि भगवान कह रहा हो कि जा तुझे एक मौका और दिया लेकिन जवानी के जोश में वो आगे बढ़ता चला गया और ना जाने पानी में कहां खो गया। पानी का बहाव ही इतना तेज था कि उसे ढूंढने के सारे प्रयास विफल रहे।
चंडीगढ़ में 16 सेक्टर के रोज गार्डन में तीन दोस्त पिकनिक मनाने गए थे। तीनों ही हम उम्र थे और तीनों बारिश का लुत्फ लेना चाहते थे। लेकिन तभी एक हादसा हो गया। मोहित नाम का लड़का पता नहीं क्यों इतनी मस्ती में उतर आया कि उसको ये इल्म भी नहीं रहा कि पानी की रफ्तार उसकी सारी ताकत से कहीं ज्यादा है। उस पानी की रफ्तार में मस्ती करना उस को भारी पड़ गया। पहले तो वो वहां पर पानी के साथ खेल रहा था। पास में लगी लोहे की चैन को पकड़कर पानी की तेज धारा से लड़ते हुए अटखेलियां कर रहा था कि तभी उस के पैर पानी के बहाव को सहन नहीं कर पाए और उखड़ गए लेकिन चैन पर उस की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वो सिर्फ झूल गया। इस बार तो वो बच गया। बचने के बाद उसने सब को हाथ हिलाया जैसे कह रहा हो कि मैं सुरक्षित हूं। मुझे लगता है कि ये ही एक अवसर था उसके पास जब कि भगवान ने उसे मौका दिया था कि अब भी वक्त है संभल जा। लेकिन वो नहीं संभला और फिर लोहे की उस चैन को पकड़कर पानी के बीचों बीच खड़ा होगया। पर इस बार उसके हाथों की पकड़ ने उस का साथ नहीं दिया। थोड़ी देर तक तो वो पानी के बहाव को सहन करता रहा। पानी का बहाव इतना तेज था कि वो वहां पर ही गिर गया। लेकिन जांबाजी दिखाने के चक्कर में कभी वो पानी में समा जाता तो कभी पानी के ऊपर आजाता। उसके दोस्तों ने जो कि इस बहाव से बाहर खड़े थे उसका खेल मान रहे थे। जब उसने अपने को बचाने के लिए हाथ उठाया और आवाज़ लगाई तो वो पानी की तेज आवाज में कही डूब गई। और तभी उसका एक हाथ उठा और फिर दूसरे हाथ की पकड़ लोहे की जंजीर से छूट गई और वो बहता हुआ जाने लगा। फिर उसने कोशिश की पेड़ की शाखा को पकड़ने की जो कि पानी के ऊपर लटक रही थी। उसने वो पकड़ी भी लेकिन पानी का बहाव ही इतना तेज था कि वो पकड़ कायम नहीं रह सकी और वो बहता हुआ पानी में डूब गया। ये पानी वहां के एक चौड़े नाले की तरफ जाता है। जहां पर पुलिस ने बचाव का काम जारी रखा लेकिन उसका कोई भी पता नहीं चल पाया।शायद तबतक बहुत देर होचुकी थी। पुलिस को उसके दोस्तों ने ही बुलाया जब कि वो उसे खोज पाने में नाकामयाब रहे।
इस जगह पर मैं एक बात बताना चाहूंगा कि ये तस्वीरें वहां पर मौजूद एक कैमरामैन ने खींची थी जो कि बारिश की कुछ तस्वीरें और साथ में बारिश में खेलते हुए लोगों के कटवेज लेने कि लिए उस रोज गार्डन में गया था। वो इस सब तस्वीरों को कैमरे में कैद कर रहा था और पास में खड़े एक शख्स की आवाज़ आ रही थी कि ये गिर जाएगा और ऐसा ही हुआ। शायद उस आदमी को भी नहीं पता होगा कि ऐसा भयानक हादसा हो जाएगा। साथ ही, मोहित जो डूब गया शायद ये स्टंट भी इसी चक्कर में करने चला गया कि कैमरे में उस की तस्वीरें कैद हो रही हैं। वो कैमरे की तरफ बार-बार देख कर हाथ भी हिला रहा था, पर अब वो तस्वीरें ही बची हैं जो कि एक कैमरे में कैद हैं, वो नहीं।

आपका अपना
नीतीश राज

Monday, August 11, 2008

112 साल में पहली बार


1896 में पहली बार ओलंपिक शुरु हुए थे तब से, 112 साल में पहली बार भारत के एक लाल ने देश का सर ऊंचा कर दिया है। स्वर्ण पदक जो कि एकल प्रतियोगिता मैं आजतक देश को नहीं मिला, झोली में डाल कर रच दिया इतिहास। सारे देश में आवाज़ गूंज रही है अभिनव बिंद्रा इज़ किंग। अभिनव बिंद्रा ने जीता है स्वर्ण पदक, ओलंपिक के इतिहास में भारत के हाथ व्यक्तिगत स्पर्धा में पहली बार किसी ने ये कामयाबी हासिल की है और स्वर्ण पदक जीता है। 10 मीटर एयर राइफल में अभिनव ने चक दिया गोल्ड। जबकि अभिनव को कड़ा मुकाबला मिल रहा था चीन के ही क्यूनान जू से और साथ ही फिनलैंड के हेनरी हैकिनन से। 9वें और 10वें राऊंड में जो खेल बिंद्र ने दिखाया, वो दर्शाता है कि वो उस वक्त मानसिक तौर पर भी मजबूत थे। वो क्षण काफी रोमांचक था और अपनी दिमागी कुशलता का परिचय देते हुए अभिनव ने ये खिताब जीता है। एथेंस की गलती को ना दोहराते हुए जब कि वो क्वालिफाई करते वक्त तीसरे नंबर पर थे लेकिन खत्म उन्होंने सातवीं रेंक से किया था।
क्यूनान जू ने यदि 10वें राऊंड में निशाना ठीक मार दिया होता तो हमारे हाथ से स्वर्ण निकल जाता। 9वें राऊंड में सिर्फ 0.1 से पीछे थे अभिनव लेकिन 10वें राऊंड में क्यूनान को मात देते हुए अभिनव ने 10.8 प्वाइंट बनाए वहीं क्यूनान ने 9.7 प्वाइंट। हमें गोल्ड मिल चुका था। अभिनव उस वक्त भी शांत दिखे जबकि राष्ट्रगान बज रहा था। बीजिंग में भारत को गर्व महसूस कराने वाले अभिनव पर हम सबको गर्व है।
इनामों की झड़ी लगनी शुरू होगई है। रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने आजीवन गोल्डन पास देने का एलान कर दिया है। अभिनव के पहले कोच जे एस ढिल्लन काफी खुश नजर आ रहे हैं, जैसे कि उनका जीवन सफल हो गया। वैसे अभिनव आर्थिक तौर पर बहुत मजबूत हैं। उनके एक कोच जर्मनी में भी रहते हैं। तो वहां पर भी आना जाना लगा रहता है।
हॉकी में भारत ने 8 बार स्वर्ण पदक जीते लेकिन 1980 में आखिरी बार स्वर्ण पदक जीतने के बाद स्वर्णों की सिलसिला देश से रूठ गया और हम खाली हाथ ही रहे। पिछले ओलंपिक में राज्यवर्धन
सिंह राठौर ने रजत पदक दिलाया था। एकल मुकाबलों में इस बार भी उनसे हम उम्मीद लगाए बैठे हैं। अब सानिया नेहवाल सिर्फ एक जीत दूर हैं भारत को एक और पदक दिलाने से। वो क्वार्टर फाइनल में पहुंच चुकी हैं। 18 साल की भारत की सानिया नेहवाल रैंकिंग 15, हांगकांग की 4 नबंर की खिलाड़ी चेन बांग को एक रोमांचक मुकाबले में हरा दिया। अब सानिया नेहबाल से भी एक पदक की उम्मीद और है। पूरे देश को अभिनव बिंद्र पर गर्व है।

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नीतीश राज
फोटो सौजन्य: गूगल

Saturday, August 9, 2008

“हां, सेल्समैन बन गया है मीडिया”

जो जितना अच्छा सेल्समैन वो उतना ही बड़ा और बढ़िया एड़िटर। इस बात को साबित करने की होड़ बहुत दिन से चल रही थी और बहुत लोग जुगत में भी थे और अब ये बात साबित भी हो गई है। आपको माल बेचना आता है कि नहीं। अपने सामान यानी शो को बेकने की कला जिसको भी आगई वो सबसे आगे और जो नहीं बेच पाया तो समझो कि उस की खैर नहीं। ज्यादा दिन तक वो कुर्सी उस शख्स का भार सहन नहीं कर पाएगी।
अब उस कुर्सी पर बैठने के लिए मार्केटिंग के गुणों का होना भी जरूरी है। अब सभी चैनलों में कुछ लोग सिर्फ और सिर्फ इस के लिए होते हैं कि दूसरे चैनल कर क्या रहे हैं। कब दूसरा चैनल अधिकतर राइवल चैनल क्या दिखा रहा है और साथ ही साथ उसने उस कार्यक्रम की मार्केटिंग कब से और किस ढंग से की। चैनल अब प्रोग्राम से ज्यादा इस बात की ओर ज्यादा अग्रसर हो चले हैं या यूं कहें कि ज्यादा तबज्जो देने लगे हैं कि कैसे अपने इस टाइम बैंड को बेचना है। अब बेचने के हिसाब से प्रोग्राम तय किए जाते हैं। किस तरह के प्रोग्राम किस टाइम बैंड पर जाएगा, लोगों की नब्ज किस तरह पकड़नी है इन सब पर देश और विदेशों में भी बैठकें होती हैं।
यहां पर पहले बात छेड़ते हैं न्यूज चैनलों की। अब हर न्यूज चैनलों पर आप को बड़ी ही आसानी से हास्य के फूहड़ शो देखने को मिल जाएंगे। एक हंसइया, कम से कम दो, नहीं तो तीन चैनलों पर तो आराम से दिख जाएगा वो भी एक ही समय पर। वो ही बे-सर पैर की बात और वो ही द्वि अर्थी संवाद। पता नहीं ये जज लोगों को क्या उस प्रोग्राम में सरीक होने का और उस हंसइयों को झेलने का भी पैसा मिलता है। शायद इसे ही मार्केटिंग कहते हैं।
तो अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या न्यूज चैनल अब इंटरटेनमेंट चैनल बन गए हैं? क्योंकि अब हर चैनल के कुछ टाइम बैंड तो फिक्स हैं जहां पर ये हंसोड़े आप को हर रोज बिना नागा दिख ही जाएंगे। यदि ये ही चीज इंटरटेनमेंट चैनलों पर चलनी ही है तो फिर न्यूज चैनलों पर ये क्यों दिखाए जाते हैं? तो जवाब शायद है कि ये न्यूज चैनलों पर इन कार्यक्रमों की मार्केटिंग।
अब कुछ टाइम बैंड ऐसे हैं कि जहां पर आप भविष्य देख सकते हैं हर रोज। कुछ लोग इन भविष्यफल बताने वालों से खुश हैं तो कुछ त्रस्त।
ये सब चलता है तो क्या न्यूज चैनलों की परिभाषा बदल गई है? क्या न्यूज चैनलों पर राशिफल, नाच गाने जैसे कार्यक्रम होने चाहिए। इसी कारण से हमेशा ये आवाज़ उठती रहती है कि जो न्यूज़ चैनल ये सब दिखाते हैं उनको अलग श्रेणी में रखना चाहिए।
अब तो ख़बरों को भी बेकने के अंदाज से ही बनाया जाता है। खबर ऐसे जैसे कि दूसरे को रोचक लगे। अलग-अलग प्रयोग किए जाते हैं। इस पर कई बार लगता है कि खबर को बेचने के चक्कर में खबर की असलियत ही मर जाती है।
अब तो चैनल पर दिखने वाली हर चीज टीआरपी को ध्यान में रखकर की जाती है। एडिटर टीआरपी ही खाते, सोते, पहनते हैं। हर समय सिर्फ इस की ही बात होती है। एक स्क्रीन को दुल्हन मान कर, उस पर किस तरह से लीपा पोती की जाए कि वो और भी हसीन लगने लगे। कई बार तो ऐसा लगता है कि स्क्रीन पर कंटेंट ज्यादा हो गया, तस्वीरों के मुकाबले। तस्वीरें तो लगता है कि छुप ही गई हैं। कोई बैंड ऊपर से, नीचे से साइड से, बीच से हर जगह चलते रहते हैं, स्क्रीन को भर दिया जाता है। दर्शक एक को पढ़ने के चक्कर में कुछ भी नहीं पढ़ पाता। लेकिन कोशिश ये की जाती है कि स्क्रीन को कैसे लुभावना बनाया जाए। जैसे कि स्क्रीन एक दुकान हो ना कि कोई एक बार आजाए तो जा ना सके कुछ टीआरपी दिए। न्यूज चैनलों में कई बार तो खबर ढूंढने से भी नहीं मिलती।
इंटरटेनमेंट चैनलों में एक अलग तरह की होड़ है। जब आईपीएल के मैच चल रहे थे तो सेट मैक्स चैनल की टीआरपी सबसे ज्यादा थी। कोई भी चैनल आसपास तक नहीं फड़क पाया था इस चैनल के। इंटरटेनमेंट चैनल जैसे स्टार, जी सभी ने अपने आने वाले क्रार्यक्रमों की मार्केटिंग जोर-शोर से शुरू कर दी लेकिन उस दौरान कोई भी नया प्रोग्राम लॉन्च नहीं किया। जो भी किया गया वो सुपर फ्लॉप रहा।
कभी-कभी सोचने पर लगता है कि क्या टीआरपी ही सिर्फ सबकुछ है। खासतौर पर न्यूज चैनल जो कि समाज का एक आयना होते हैं कि क्या वो सिर्फ और सिर्फ टीआरपी के लिए या फिर पॉपुलरिटी के लिए कुछ भी कर सकते हैं। कुछ भी अनाप सनाप दिखाने को तैयार हो जाते हैं। क्या इन पर ऐसे में लगाम लगाने की जरूरत नहीं है?


आपका अपना
नीतीश राज

फोटो साभार-गूगल

Thursday, August 7, 2008

'तू डाल डाल, मैं पात पात'

अपील तो अपील है इसे माने या ना मानें, हमारी मर्जी पर डिपेंड करता है। ये तो हमारे पर निर्भर करता है कि अपील को हम लेते किस तरह से हैं। आप इस में कुछ रोक टोक तो लगा नहीं सकते हैं। आप फिर अपील करेंगे और हम फिर देखेंगे कि आप की अपील में कितना दम है। गौर करेंगे की आप की अपील को सुनें या फिर अपनी राजनीति की रोटियां उस अपील के जरिए सेक लें। हमारे नेताओं को असल में रोटियां सेकनी आती हों या ना आती हों पर राजनीति की रोटियां और वो भी जलती हुई गांड़ियों पर, चिताओं पर, सरकारी संपत्तियों पर, कमाल की तंदूरी रोटियां सेकने में उन्हें महारत हासिल हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर पूरे फसाद को राजनीति से दूर रखने की अपील की थी। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। पूरा एक दिन भी नहीं बीता कि शब्दों के बाणों से अग्नि फिर बरसने लगी। अब फिर बीजेपी मिले सुर मेरा तुम्हारा गाने में लगी हुई है, नहीं छोड़ेंगे अमरनाथ मुद्दा। बीजेपी को लग रहा है कि सरकार के साथ खड़े होने में पार्टी को सियासी नुकसान है और एक महीने से हाथ में रही बाजी अब कहीं कांग्रेस के पक्ष में ना चली जाए।
एक दिन और जलता रहा जम्मू। दो जगहों पर लोगों ने कर्फ्यू को तोड़ा। वहीं अमरनाथ संघर्ष समिति ने बातचीत से इनकार नहीं किया है पर वो जमीन वापस दिए जाने से कम किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगे। अमरनाथ को लेकर शुरू हुई ये लड़ाई अब घाटी और जम्मू के बीच अहम की जंग में तब्दील हो गई है। जम्मू को इस बात से ऐतराज है कि राज्य सरकार क्यों हर बार घाटी के दबाव में झुक जाती है और वहीं घाटी के लोगों को इस बात का दर्द है कि आखिर उनके रहते ज़मीन हासिल करने की जम्मू के लोगों की मांग क्यों पूरी हो?

अब ये बताना जरूरी है कि ये अहम कि लड़ाई आखिर शुरू कहां से हुई थी।


अमरनाथ यात्रियों के ठहरने और अन्य सुविधाओं के लिए अमरनाथ श्राइन बोर्ड ने अमरनाथ बेस कैंप के पास यानि बालताल औऱ दोमेल में 800 कैनाल यानि 90 हैक्टेयर ज़मीन देने की मांग साल 2005 में सरकार के सामने रखी। करीब दो साल की माथापच्ची के बाद राज्य की पीडीपी-कांग्रेस सरकार मई 2008 में जंगल की ज़मीन सिर्फ 2 महीने के लिए 2 करोड़ 31 लाख के रेंट पर किराए पर देने के लिए राज़ी हो गई।
फैसले के तीन-चार दिन तक सब शांत रहा। अचानक घाटी की हुर्रियत कॉन्फ्रेंस सहित अलगाववादी ताकतों ने श्रीनगर सहित तमाम घाटी इलाकों में अफवाह फैलानी शुरू कर दी कि ज़मीन अमरनाथ श्राइन बोर्ड को हमेशा, हमेशा के लिए दे दी गई। बस घाटी के लोग उतर आए सड़कों पर और शुरू हो गया बवाल। यहीं राज्य की पीडीपी- कांग्रेस सरकार को चाहिए था कि अफवाह का मुकाबला करती, लोगों को बताती कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को ज़मीन कड़ी शर्तों पर सिर्फ औऱ सिर्फ दो महीने के लिए किराए पर देने की बात हुई है। और साथ में ये भी बताती कि ज़मीन पर किसी भी पक्की इमारत का निर्माण वो नहीं कर सकते। अमरनाथ यात्रा खत्म होते ही ज़मीन खाली करा ली जाएगी। लेकिन ये ही गलती कांग्रेस की सरकार को भारी पड़ गई और इन्होंने निज़ी फायदे के लिए कर दिया खेल, और इस मसले पर कुछ भी नहीं बोले।
जैसे ही कश्मीर में बवाल शुरू हुआ पीडीपी ने सरकार से समर्थन खींच लिया। पीडीपी की भी इसमें चाल थी वो जानती थी कि घाटी में यदि वोट बैंक बनाए रखना है तो ये तो करना ही होगा। लेकिन पीडीपी की भी थू थू हो रही है। जब कैबिनेट ज़मीन देने के प्रस्ताव को अमली जामा पहना रही थी तो उसमें उप मुख्यमंत्री, कानून मंत्री और वन पर्यवारण मंत्री तीनों पीडीपी के थे। कश्मीर में बवाल बढ़ता देख राज्य की कांग्रेस सरकार ने श्राइन बोर्ड से ज़मीन वापस ले ली। सियासी फायदे के लिए फिर मैदान में उतरी सियासी पार्टियां-बीजेपी और तमाम हिंदु संगठन औऱ अमरनाथ संघर्ष समिति के बैनर तले 30 जून से शुरू कर दिया जम्मू में बवाल। शुरूआत में राजनीतिक संगठनों ने आंदोलन को जिंदा रखने के लिए जम्मू के लोगों को हवा दी। उन्हें बताया कि राज्य सरकार घाटी के लोगों के दबाव मे फैसले लेती है और यही से शुरू हो गया वो खेल जिसकी आग आज भी सुलग रही है। जिस जंग को पहले राजनीतिक पार्टियों ने शुरू किया था अब उसमें शामिल हो गए आम लोग और अब हर रोज जल रहा है जम्मू।
आपका अपना
नीतीश राज

"सियासतदारों जाओ और जम्मू की आग बुझाओ"


30 जून को पहली बार एक चिंगारी ने आग पकड़ी थी, और तभी से जल रहा है जम्मू। जम्मू में लगी हुई है आग। अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन वापस देने की मांग पर लगातार फूंकी जा रही है गाड़ियां, जलाए जा रहे हैं घर। घरों में दुबके-सहमें हुए हैं लोग। आए दिन किसी के मरने की ख़बर आती है। कभी किसी पुलिसवाले की जान गई तो कभी किसी के घर से उठती रहीं चीखें। लेकिन ये आग अभी भी नहीं बुझी है। कर्फ्यू तोड़कर भी लोग हंगामा करने से बाज नहीं आ रहे। उपद्रव भीड़ और पुलिस के बीच हर दिन झड़प हो रही है। 100-150 से भी ज्यादा बार इन झड़पों में भीड़ के निशाने पर रहीं गाड़ियां, दुकानों और सरकारी संपत्ति। इन्हें ये भी नहीं मालूम कि इन नुकसानों की भरपाई आने वाली जम्मू-कश्मीर सरकार के लिए सरदर्द बन जाएगी।
तीन दिन पहले पुलिस चौकी फूंकी दी गई। 7 पुलिसवाले घायल हो गए और लगातार ख़बर मिलती रही कि कुछ पुलिसवाले बंधक बनाए जा चुके हैं। पुलिस और लोगों की इस झड़प में 5 पुलिसवालों की मौत भी हो चुकी है और अब तक 10 लोग भी इस हिंसा का शिकार हो चुके हैं।
जम्मू और घाटी के बीच चल रही इस जंग में अब 37 दिन बाद सियासत चमकाने नेता वहां का रुख कर रहे हैं। सर्वदलीय बैठक में यह फैसला लिया गया कि एन एन वोहरा को राज्यपाल के पद से नहीं हटाया जाएगा। अब एक कमेटी का गठन भी कर दिया गया है जो जम्मू-कश्मीर के उन हिस्सों में जाएगी जहां पर आग का क़हर बरपा है। ये कमेटी लोगों से भी बात करेगी। लेकिन जो हाल इस समय इस राज्य का लग रहा है उससे तो कतई नहीं लगता कि ये कमेटी वहां पर जाकर कुछ ठोस कर भी पाएगी। समस्याओं पर जब सियासी समाधान की कोशिश होती है, तो वो किसी बंद कमरे में लंबी मेज के चारों और बैठे बड़े-बड़े नेताओं के सामने होती है। लेकिन, वो भूल जाते हैं कि बंद कमरे के बाहर सियासत फिर भी रुकती नहीं।
बीजेपी की सुषमा स्वराज ने फिर मुंह खोल दिया और कांग्रेस की पूर्व सरकार पर इसका ठीकरा फोड़ दिया है। इस में तो कोई दो राय नहीं कि अमरनाथ की आग कांग्रेस की लगाई हुई है। पर अभी वक्त है उस आग पर पानी डाल कर इसे शांत करने का। ये नहीं कि इस आग में घी डालकर दूर खड़े होकर मजा लेने का। यदि मजा लिया तो ऐसा ना हो कि इस देश के स्वर्ग पर जो नजर लग गई है उस पर पड़ी इस कालिख की कालक इतनी चढ़ जाए और हमारे हाथ उस कालिख से इतने काले हो जाएं कि फिर कभी चाह कर भी साफ ना हो सकें।

आपका अपना
नीतीश राज

Wednesday, August 6, 2008

मां की बेटे से फरियाद घर आजा, बेटा बोला, 'बापू की सेवा में हूं...नहीं आऊंगा'

एक मां का दर्द है उसका ही अपना बेटा। 14 साल से बेटे का मुंह नहीं देखा है मां ने। 14 साल से है इंतजार अपने बेटे का। मां का आरोप है कि आसाराम बापू ने उसके बेटे को कैद कर रखा है। मां कहती है कि उसके बेटे को बहला फुसला कर आसाराम बापू ने अहमदाबाद में रखा हुआ है। वो मां चाहती है कि उसका बेटा घर आजाए। लेकिन चाहने और असलियत में बहुत अंतर होता है।
उस मां का लड़का अजय शर्मा, नहीं मिलना चाहता अपनी मां से। वो तो अपनी मां को मां से भी नहीं पुकारता, लेता है तो सिर्फ उनका नाम। एक मां का दर्द बढ़ जाता है जब उसके जिगर का टुकड़ा उसे मां कहकर नहीं पुकारता। अजय तो बापू की धुन में धुनी रमाए बैठा है। वो कहता है कि मैं यहां खुश हूं और जब मेरी मां के पास एक और बेटा है ही, तो मुझे क्यों बुलातीं है। ये जवाब है उस बेटे का जिसे की पढ़ा लिखा कर उस मां ने चार्टड एकाउंटेंट बनाया। पति का साया तो 20 साल पहले ही साथ छोड़कर चला गया था आज बेटा भी जुदा-जुदा होगया है। मां पुकार-पुकार के कहती है मेरा बेटा मुझे लौटा दो। लेकिन बेटा बालिग है। ये भी कोई साबित नहीं कर सकता कि बेटे का दिमाग चला हुआ है। तो कानून की तरफ से कोई मदद नहीं हो मिल सकती।
जो बेटा 25 साल तक अपनी मां का मां मानता रहा आज ऐसा क्या होगया है कि वो मां को मां कहने को तैयार नहीं। 14 साल का समय बहुत होता है। क्या आसाराम बापू उसे ये ही शिक्षा दे रहे हैं कि दुनिया की मोह माया छोड़कर मेरे पास रहो और अपनी बूढ़ी मां को छोड़ दो। मां तो मोह-माया नहीं होती। क्या आसाराम बापू उसे नहीं समझा सकते कि जाओ अपने घर जाओ, मां की सेवा करो। बेटा कहता है कि उसे करनी है गुरू की सेवा। क्या ये लड़ाई मां की ममता और एक गुरु की आस्था की है?
मां अपने बेटे को पाने के लिए दर दर की ठोकरें खाती रहती है। कई बार अहमदाबाद और सूरत के चक्कर काटे लेकिन हर बार वो नाकाम ही रही।
हर बार मां असफल रही। आस्था और ममता की इस लड़ाई में हमेशा ही आस्था का पलड़ा भारी रहा। लेकिन क्या करे वो मां जिसका जवान बेटा उसे छोड़ किसी जंग के मैदान में नहीं है, एक संत के दर पर आस्था में डूबा हुआ है। सब को अपनी जिंदगी जीने का हक है अपनी तरह से, जैसे जी में आए वैसे जिंदगी जिए। लेकिन ये तो ना भूले कि उसके कुछ फर्ज हैं और दूसरों के उससे जुड़े कुछ हक जिन्हें कि उसको पूरा करना है। क्या आसाराम बापू के प्रवचनों उस बेटे को कुछ शिक्षा नहीं देते। खुद आसाराम बापू माता-पिता की सेवा का उपदेश देते रहते हैं क्या इस शिक्षा से उस बेअकल को अकल नहीं आरही है। यदि नहीं आ रही है तो आसाराम बापू को ये कदम उठाना चाहिए कि उसे घर का रास्ता दिखाएं और यदि नहीं तो फिर उसे अपने आश्रम से निकाल दें। यदि वो ऐसा नहीं करते हैं तो सवालों के घेरे में आसाराम बापू खुद हैं। (वैसे भी उनके बेटे नारायणस्वामी पर 7 साल तक आश्रम में रहे पूर्व कर्मचारी ने आरोप लगाया है कि वो तंत्र साधना करता है। लेकिन ये तो जांच का विष्य है पर आश्रम पर शक गहराता जा रहा है।)

आपका अपना
नीतीश राज

Tuesday, August 5, 2008

'हम यहां और वो वहां'

यहां पर हम लड़ रहे थे और वहां विदेश मैं वो। यहां पर कोशिश हमारी भी पूरी थी, देश से बाहर वहां, कोशिश उनकी भी पूरी थी। वो वहां डट कर जम चुके थे, यहां पर हम भी डटने का ढोंग कर रहे थे। जब भी हमारी तरफ से कोई भी अंदर जाता तो पीछे से एक सुर में सभी कहते, ‘पूरा खेल के आईं’। पर बरसात के मौसम में झड़ी तो लग चुकी थी। ‘तु चल मैं आया’ कि तर्ज पर हमारे धुरंधर वापिसी की राह पकड़ चुके थे। और आते समय ये भाव होते कि यदि गेंद नीचे नहीं रही होती, तो गोली की तरह गेंद चार रन के लिए चली जाती। बॉल बैट पर पूरी नहीं आ रही, पिच ज्यादा टर्न ले रही है...बस.... नो..नो ....बच गया होता तो....ये बॉल तो मैदान के बाहर ही थी। खुद बाहर बैठा हर शख्स ये ही सोचता है। वैसे हमारी टीम पूरी टीम इंडिया की तर्ज पर ही है। जब चल गए तो राजा वर्ना बज गया बाजा।
मेरी टीम के एक मैंबर ने कहा कि खिलाड़ी जात ही अंधविश्ववासी होती है। तो अब ये बहाना हमारी टीम को मिल गया कि देखो यार, यहां हम आउट हो रहे हैं। लेकिन वहां टीम तो जमी हुई है। लेकिन क्या पता था कि 252 पर 5 और 269 पर पूरी टीम आउट हो चुकी थी। हमने कप्तान साहब से पूछा कि क्या हुआ, यहां हमारी टीम पूरी आउट नहीं हुई लेकिन वहां तो सारे वापस आ गए। मेंडिस ने इस टेस्ट में भी 10 विकेट ले ही लिए। कप्तान साहब ने विचारिक मुद्रा में थोड़ी देर शांत रहने के बाद, ना में मुंडी हिलाते हुए जो कहा वो बुदबुदाने से ज्यादा नहीं था, ये मैच भी नहीं जीत पाएंगे।
हम लोगों की दशा ऐसी ही थी। पहला मैच हम हार चुके थे। वहां टीम इंडिया भी पहला टेस्ट हार चुकी थी। सीरीज बराबर करने का चांस दोनों के पास। पर हमारी टीम के पास कुछ स्कोर ही नहीं था। लेकिन उधर टीम इंडिया के पास मौका था लाज बचाने का।
पहली ही बॉल पर कैच उछला और फिल्डर ने लपक कर कैच करने की कोशिश की पर बॉल हाथ में नहीं आई। लेकिन दूसरे छोर का बल्लेबाज बॉल को देखने के चक्कर में ये भूल गया कि दौड़ना भी है और रन आउट हो गया। पहली ही बॉल पर हमें सफलता मिल चुकी थी। और वहां पर टीम इंडिया को दूसरे ओवर में ही सफलता मिल गई। यहां पर हमें दूसरे और तीसरे ओवर में एक-एक सफलता और मिल गई। हम खुश थे कि अब तो मैच धीरे-धीरे मुट्ठी में आ रहा है। वहां पर भी तीसरे-चौथे ओवर में भारत को सफलता मिल गई।
यहां पर जब बल्लेबाज जमे तो लगा कि नहीं अब उनकी मंजिल दूर नहीं। एक बल्लेबाज जिसका पहली ही बॉल पर कैच उछला था वो ऐसे जमा जैसे फैविकॉल का जोड़। जहां चाह रहा था वहीं पर शॉट खेल रहा था। एक दो बार बीट हुआ लेकिन तब तक वो अपनी टीम को जीत के करीब ले जा चुका था। वो अंत तक नॉट आउट रहा।
वहां पर एक दो जोड़ियां हुई लेकिन टीम इंडिया के सिंह इज किंग ने कमाल किया। जब-जब जोड़ियों ने कदम जमाने चाहे तो उसने तोड़ दी जोड़ी। इस टेस्ट में भज्जी ने भी 10 विकेट झटके।
यहां हमारे सिंह को सफलता नहीं मिली।
वहां टीम इंडिया जीत के करीब पहुंच चुकी थी।
यहां हम मैच हार चुके थे।
वहां टीम इंडिया मैच जीत चुकी थी।
यहां हम पछता रहे थे क्योंकि पिछली हार से हमने कोई भी सबक नहीं लिया था।
वहां टीम ने पिछली हार से सबक लिया और जीत झोली भर चुकी थी।

यहां पर एक बात थी कि हम मैच हारने के बाद भी खुश थे। हम वो शर्मनाक हार भूल गए। हम भी उसी जीत में खो गए जहां पर सब खो रखे थे। हम भी हंस रहे थे और हमें हराने वाले भी। दोनों टीमें जोश के साथ उस समय को जी रही थी। पर हार तो हार है और जीत तो जीत।

आपका अपना
नीतीश राज

Friday, August 1, 2008

पंडित जी, तुसी ग्रेट हो...

हमारे ऑफिस के बाहर एक पान का ठिया है। जहां पर कोई सिगरेट पीने और हम जैसे जो पान के शौकीन हैं वो पान खाने चले जाते हैं। यहीं पर खड़े होकर अधिकतर ऑफिस की राजनीति, खेल, हरियाली सभी तरह की बातें होती हैं। यहां पर एक 45-50 साल के शख्स बैठते हैं जिन्हें लोग पंडित जी कहकर बुलाते हैं। वैसे साथ में उनके दो बेटे भी हैं जो उनका इस काम में बखूबी हाथ बटाते हैं। पंडित जी तो ज्ञान के भंडार हैं। उनसे किसी बात पर भी आप बात कर सकते हैं और वो ज्ञान देने में हैं भी बहुत काबिल हैं। वो अपनी बातों से आप को घंटों उलझाए रह सकते हैं।
आप एक पान बनवाने जाएं और सौ फीसदी गारंटी के साथ ऑफिस की खुफिया से खुफिया जानकारी लेकर वापस ऑफिस में लौट आएं। हम ऑफिस में काम करते हैं जो बात हमें नहीं पता होती वो उनको पता चल होती है। ऑफिस की जो जानकारी आप के पास नहीं हो वो आप उनसे जा कर ले लीजिए और फिर वो ही नमक मिर्ची बनकर ऑफिस के गलियारे में घूमती फिरती हैं। आप को जानना है कि कौन लड़की कब जाती है, किसके साथ जाती है कहां जाती है या किसके साथ कुछ चक्कर चल रहा है। तो जवाब बिना किसी लाग लपेट के हाजिर है जैसे कि एक पान का बीड़ा दे रहे हों। मर्द हो या लड़की फैशनेबल है या नहीं सब पंडित जी की आंखों में चमकते रहते हैं। इस साल किस के साथ ऑफिस में क्या खेल होने वाला है उस तरह की जानकारी के साथ पंडित जी हमेशा हाजिर रहते हैं। आपको पता हो ना हो कि फलां के साथ फलां ने क्या कर दिया लेकिन उनको पता होगा। कौन आज लिफ्ट में किस से टकरा गया। हर किस्म का और हर तरह का मसाला उनके पास होता है। अरे, आप उस लड़की की बात तो नहीं कर रहे जिसका इंजन हमेशा ही चालू रहता है। पंडित जी मतलब? अरे! वही जो खूब सिगरेट पीती हैं।
कई लड़कियों के नाम तो उन्होंने सिगरट के ब्रांड के नाम पर रख रखे हैं। वो विल्स वाली, नेवीकट वाली, मालबोरो वाली, गोल्ड फ्लेक वाली ये तो हुई सिगरेट वालियों के नाम। कोई चपरासी यदि किसी मैडम के लिए सिगरेट या फिर पान लेने आया और आप वहीं खड़े हैं तो बस फिर तो उन मैडम की पूरी हिस्ट्री सुन लीजिए हमारे पंडित जी के मुंह से। कब देखा, कहां देखा, क्या देखा, साथ में कौन था वगैरा-वगैरा।
पानवालियों के नाम भी उन्होंने रख रखे हैं। वो जो 120 नंबर का पान खाती हैं, या 300 नंबर वाली, अरे जिनके पान में यदि चूना थोड़ा भी ज्यादा लग जाए तो बाप रे, क़हर बरपा देती हैं। अरे, वो 300 नंबर पान खाने वाली को क्या होगया है। कई दिनों से देख रहा हूं कि सुबह आ जाती हैं और देर रात तक ऑफिस में रहती हैं। साथ में अब तो क्लासिक की दो -दो डिब्बी खींच जाती हैं। आखिर क्या माजरा हैं? अब इन्हें क्या बताए की आप अपनी दुकान के मालिक हैं जब चाहेंगे, दुकान बंद करेंगे, चल देंगे, कोई भी पूछने वाला नहीं। लेकिन नौकरी करने वाले को ये आज़ादी कहां? नौकरी करते हैं अपनी दुकान तो है नहीं। वैसे जब भी उनकी तरफ से सवाल उछला जाता है तो वहां खड़े लोगों में से कोई भी बात का जवाब देना पसंद नहीं करता। सभी जानते हैं कुछ भी बोलोगे तो बात यहीं पर खत्म नहीं होगी वो तो फिर पूरे ऑफिस में घूमेगी। और एक बार बात निकली तो दूर तलक जाएगी। फिर बात की खिचड़ी बनने में कितनी देर लगती है?
पंडित जी सब जानते हैं, वो ये भी जानते हैं कि आप की उन महाशय से लगती है और वो इस बात का बतंगड़ बनाने से भी नहीं चूकते। आप एक चुटकी (सुपाड़ी का एक ब्रांड) लेने पहुंचिए तो आप के साथ चुटकी लेने से भी वो नहीं चूकेंगे। उनको दूसरे की वॉट लगाने में जरा भी झिझक नहीं होती। यदि उनकी आप से ठन गई है तो फिर प्यार से बातों में खूब गुलुकंद और चटनी मिलाकर के आप के विरोधी की तारीफ करेंगे।

एक हथियार से दो वार करते हैं। एक तो आप सिगरेट से कलेजा जलाइए और फिर उनकी बातें आप को जलाएंगी।
बस, पंडित जी की ये ही बातें ऑफिस वालों को उनके पास लेजाती हैं और ये ही दूर। आप जल्दी कहेंगे लेकिन वो तो अटल बिहारी वाजपेयी जी की बातों की स्पीड से भी धीरे हाथ चलाएंगे। आप उनसे अपना ब्रांड मांगेंगे वो दूसरे से बात करने में मशगूल रहेंगे। उनके पास जाना मतलब 10-15 मिनट एक पान के लिए लगाने होंगे। वैसे भीड़ तो थोड़ी बहुत होती है लेकिन यदि वो खाली भी हैं तब भी वो जल्दी करने वाले नहीं। अब उम्र में इतने बड़े हैं कि कोईं भी उन्हें कुछ कह नहीं पाता। लेकिन इंटरटेनमेंट का पूरा मसाला हैं पंडित जी।
मुझे तो हमेशा कहते हैं कि, 'यार, जब भी तुम्हें देखता हूं तो बड़ा शुकून मिलता है'।
मैं पूछता हूं 'क्यों'?
तो जवाब 5-10 मिनट बाद देते हैं। जब कि उन्हें एक-दो बार टोक नहीं दिया जाए। अरे भई, जवाब तो सुनना ही है।
पान का बीड़ा हाथ में देते हुए बोले, 'तुम मुझसे भी ज्यादा परेशान दिखते हो, बड़ा ही शुकून मिलता है, देखने से लगता है कि भगवान ने मुझसे भी ज्यादा किसी की ले रखी है।'
क्या बात कर रहे हैं। जी में आता है कि कहूं, क्या मेरे चेहरे पर लिखा है कि में 'वो' हूं। अरे, जड़ भी तो आप ही हैं। 15-20 मिनट में निगोड़ा एक पान लगाते हैं, और बात बनाते हैं वो ही पुरानी। ऑफिस की 5 दिन की पुरानी बासी खबरें देते हो, उसका फॉलोअप भी नहीं रखते। शर्म भी नहीं आती। पंडित जी, अब सब बासी होगया है। आप का खूफिया तंत्र किसी काम का नहीं रहा। अगली बार जब आऊं और आप के पास कोईं ताजा खबर नहीं हो तो दो मिनट में पान दे दीजिएगा।

आपका अपना
नीतीश राज
“जब भी बोलो, सोच कर बोलो,
मुद्दतों सोचो, मुख्तसर बोलो”